व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ५६
अनुवाद—तो ऐसे में न हीं (केवल) ज्ञान में धर्म है न (केवल) प्रयोग में ।
तो क्या है ?
"वेद के शब्द के समान शास्त्रपूर्वक प्रयोग में अभ्युदय है"—
शास्त्रज्ञान पूर्वक जो शब्दों का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त
होता है । 'तत्तुल्यं वेदशब्देन' का अभिप्राय है । कि वेद शब्द भी इसी प्रकार से
कहते हैं ।—"जो अग्निष्टोम यज्ञ करता है और जो इसे इस प्रकार से जानता है,"
"जो नाचिकेत अग्नि का चयन करता है और जो इसे इस प्रकार से जानता है"।
"तत्तुल्यं वेदशब्देनेति" (के व्याख्यान में) दूसरा कहता है कि जिस प्रकार
से वेदशब्द नियमपूर्वक अध्ययन किये गये फलवान् होते हैं उसी प्रकार से जो
शास्त्रपूर्वक शब्दों का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त होता है ,
उषा—शब्दज्ञान तथा शब्द प्रयोग दोनों ही पक्षों के निरस्त हो जाने पर
सिद्धान्ती श्रुति को प्रमाण मानता हुआ इन दोनों पक्षों में समन्वय स्थापित करके
शास्त्र ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग से धर्म प्राप्ति के पक्ष को सिद्धान्त के रूप में
उपस्थापित करता है, अर्थात् जो ज्ञानपूर्वक साधु शब्दों का प्रयोग करता है, वह
अभ्युदय से युक्त होता है ।
अपने इस सिद्धान्त पक्ष के समर्थन में भगवत्पाद ने वेद के वाक्यों को प्रमाण
के रूप में उपस्थित किया है । क्योंकि व्याकरण की दार्शनिक परम्परा भी शब्द-
प्रमाणवादी है, यहाँ शब्द को प्रत्यक्ष के समान ही प्रामाणिक माना जाता है ।
भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में इस विषय में कहा है कि—
आविर्भूतप्रकाशानामनुपप्लुतचेतसाम् ।
अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥
"योऽग्निष्टोमेन यजते य उ चैनमेवं वेद", "योऽग्निं नाचिकेतं चिनुते य
उ चैनमेवं वेद" इत्यादि वेदवाक्य ज्ञान और प्रायोगिकता दोनों की साथ-साथ स्थिति
को अभ्युदय हेतुत्व के रूप में स्वीकार करते हैं ।
"शब्दक्रमादर्थक्रमो बलीयान्" इस नियम से इन वेद वाक्यों में "य उ
चैनमेवं वेद" इस भाग का अन्वय पहले होना चाहिए, क्योंकि पहले ज्ञान तथा
उसके अनन्तर ही अनुष्ठान की कल्पना सम्भव हो सकती है ।
"तत्तुल्यं वेदशब्देन" की एक अन्य व्याख्या भी भाष्यकार ने उपस्थापित
की है कि वेद जिस प्रकार से नियमपूर्वक अध्ययन किये जाने पर फल से युक्त होते
हैं, उसी प्रकार से शास्त्रज्ञानपूर्वक जो शब्द का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय
से युक्त होता है । वेद का अध्ययन भी ज्ञानपूर्वक ही करने का विधान है—
अविदित्वा ऋषि छन्दो दैवतं योगमेव च ।
योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु सः ॥
६० महाभाष्यम्
मूलम्—अथवा पुनरस्तु—ज्ञान एव धर्म इति ।
ननु चोक्तं ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्म इति ।
नैष दोषः । शब्दप्रमाणका वयम्, यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम् ।
शब्दश्च शब्दज्ञाने धर्ममाह, नापशब्दज्ञानेऽधर्मम् । यच्च पुनरशिष्टमप्रतिषिद्धं, नैव
तद्दोषाय भवति, नाभ्युदयाय । तद् यथा हिक्कितहसितकण्डूयितानि नैव दोषाय
भवन्ति, नाभ्युदयाय ।
अथवाऽभ्युपाय एवापशब्दज्ञानं शब्दज्ञाने । यो ह्यपशब्दाञ्जानाति । शब्दा-
नप्यसौ जानाति । तदेवं “ज्ञाने धर्मः” इति ब्रुवतोऽर्थादापन्नं भवति—“अपशब्द-
ज्ञानपूर्वके शब्दज्ञाने धर्मः” इति ।
अथवा कूपखानकवदेतद्भविष्यति । तद्यथा कूपखानकः कूपं खनन्यद्यपि मृदा
पांसुभिश्चावकीर्णो भवति । सोऽप्सु सञ्जातासु तत एव तं गुणमासादयति । येन
च स दोषो निर्हण्यते, भूयसा चाभ्युदयेन योगो भवति । एवमिहापि यद्यप्यपशब्द-
ज्ञानेऽधर्मस्तथापि यस्त्वसौ शब्दज्ञाने धर्मस्तेन च स दोषो निर्हनिष्यते भूयसा
चाभ्युदयेन योगो भविष्यति ।
यदप्युच्यते “आचारे नियम” इति ।
याज्ञे कर्मणि स नियमोऽन्यत्रानियमः । एवं हि श्रूयते “यर्वाणस्तर्वाणो
नाम ऋषयो बभूवुः प्रत्यक्षधर्माणः परापरज्ञा विदितवेदितव्या अधिगतयाथा-
तथ्याः ।” ते तत्रभवन्तो यद्वानस्तद्वान इति प्रयोक्तव्ये यर्वाणस्तर्वाण इति
प्रयुञ्जते, याज्ञे पुनः कर्मणि नापभाषन्ते । तै पुनरसुरैर्यज्ञे कर्मण्यपभाषितम्
ततस्ते पराभूताः ।
प्रदीपः—अथवेति । अपशब्दज्ञानानान्तरीयकतवाच्छब्दज्ञानस्य पृथक् फलमप-
शब्दज्ञानस्य नास्तीत्यर्थः । दोष इति । उत्कृष्टधर्मफलावाप्तौ स्वल्पधर्मफलमुत्पन्न-
मप्यनुत्पन्नकल्पं भवतीत्यर्थः । प्रत्यक्षधर्माण इति । योगजप्रत्यक्षेण सर्वं विदित-
वन्तः परापरज्ञा इति । विद्याविद्याविभागज्ञाः ।
अनुवाद—अथवा फिर (ऐसा) हो—(शब्द के) ज्ञान में ही धर्म है ।
अभी जो कहा है कि यदि ज्ञान में धर्म है तो (अपशब्द के ज्ञान से) अधर्म
भी है ।
यह दोष नहीं है । हम शब्दप्रमाणवादी हैं, जो शब्द कहता है वह
हमारा प्रमाण है और शब्द (वेद) शब्द के ज्ञान में धर्म कहता है, अपशब्द के
ज्ञान में अधर्म नहीं । और जो न तो शिष्ट हो और न प्रतिषिद्ध हो, वह न तो
दोषजनक ही होता है, न अभ्युदयकारक ।
अथवा अपशब्दज्ञान शब्दज्ञान में उपाय ही है । जो अपशब्दों को जानता
है, वह शब्दों को भी जानता है । इस प्रकार से “ज्ञान में धर्म है” ऐसा कहते
हुए स्वयं ही यह अर्थ आपन्न होता है कि अपशब्दज्ञानपूर्वक शब्दज्ञान में धर्म है ।
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६१
अथवा (इसका समाधान) कूपखानक की तरह से होगा । जैसे कि कूप
खोदने वाला यद्यपि मिट्टी और धूलि से अवलिप्त हो जाता है, वह जल से उत्पन्न
(प्रकट) हो जाने पर वहीं से इष्ट साधन को प्राप्त करता है । जिससे वह दोष
नष्ट हो जाता है और (वह) महान् अभ्युदय से युक्त होता है । इसी प्रकार से
यहाँ भी यद्यपि अपशब्द के ज्ञान से अधर्म है तथापि जो शब्दज्ञान से धर्म प्राप्त
होता है उससे वह दोष नष्ट हो जाता है और अभ्युदय का योग होता है ।
जो यह कहा जाता है कि आचार में नियम है ।
वह नियम यज्ञ कर्म में ही है, अन्यत्र नहीं । ऐसा सुना जाता है कि प्रत्यक्ष-
धर्मा, विद्याऽविद्याविभागज्ञ, विदितवेदितव्य, अधिगतयाथातथ्य यर्वन् और तर्वन्
नाम के ऋषि हुए थे । वे श्रीमान् “यद्वानः, तद्वानः” ऐसा प्रयोग करने के स्थान
पर “यर्वाणः, तर्वाणः” ऐसा प्रयोग करते थे । परन्तु उन असुरों के द्वारा यज्ञ कर्म में
भी अपभाषण किया गया, इसलिए वे पराभूत हुए ।
उषा—अथवा, जैसा कि पहले भी कहा गया था, केवल ज्ञान मात्र से भी
अभ्युदय की प्राप्ति हो सकती है । उस विवेचन प्रसङ्ग में इस पक्ष में जो दोष
दिखाये गये थे, उनका भी समाधान हो सकता है ।
प्रथम दोष धर्म प्राप्ति के साथ-साथ अधर्म की सम्भावना को लेकर
उपस्थापित किया गया था । भाष्यकार ने तीन प्रकार से इसका समाधान
किया है—
(१) प्रथम समाधान श्रुति को आधार मानकर उपस्थित किया गया है ।
शब्द “एकः शब्दः सम्यग्ज्ञात०” इत्यादि श्रुति के अनुसार शब्दज्ञान से धर्मप्राप्ति
का निर्देश अवश्य करता है, परन्तु अपशब्द के ज्ञान से अधर्म प्राप्ति की बात
श्रुति में नहीं कही गई । “तेऽसुरा०” इत्यादि के द्वारा जो पराभूत होने की बात है,
वह अपशब्द के ज्ञान से नहीं, प्रत्युत असाधु शब्द के प्रयोग से उपपन्न होती है ।
और जिस वस्तु का निर्देश नहीं होता वह न तो अभ्युदय का हेतु हो सकती है,
न अधर्म का कारण । जिस प्रकार से हिक्कित, श्वसित, कण्डूयित इत्यादि क्रियाओं
के करने से न तो पुरुष अभ्युदय को प्राप्त करता है और न इनसे अधर्म ही
होता है । अत एव श्रुति में निर्दिष्ट न होने के कारण अपशब्द का ज्ञान भी अधर्म-
कारक नहीं होता ।
(२) अपशब्द का ज्ञान भी शब्द का एक साधन ही है । गावी, गोणी,
गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपशब्दों का ज्ञान होने पर ही, “इनसे इतर ‘गो’
साधु शब्द है”। इस प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता है । अथवा कहा जा सकता है
कि जो अपशब्द को अपशब्दत्वेन जानता है, वही साधु शब्द को भी साधुशब्दत्वेन
जान सकता है । अतएव जब शब्दज्ञान से धर्म की बात कही जाती है तो उसका
६२ महाभाष्यम्
अभिप्राय यह होता है कि अपशब्दों के अपशब्दत्वेन ज्ञान सहित साधु शब्दों का
साधुशब्दत्वेन ज्ञान धर्म का हेतु है ।
(३) प्रथम दो हेतुओं से ही यह सिद्ध हो जाता है कि अपशब्द का ज्ञान
अधर्म का कारण नहीं प्रत्युत साधुशब्दज्ञान का साधन रूप होने के कारण फलवान्
भी होता है । फिर भी, एक क्षण के लिए यदि यह कल्पना कर भी ली जाये कि
अपशब्द से अधर्म की प्राप्ति होती है तो भी इसे दोषजनक नहीं कहा जा सकता ।
कूपखनन में जिस प्रकार से व्यक्ति पहले मिट्टी इत्यादि से लिप्त हो जाता है,
परन्तु अनन्तर स्वच्छ जल उपलब्ध होने पर पुनः उसमें स्नान कर निर्मल हो जाता
है, उसी प्रकार से अपशब्दों के ज्ञान से यदि कोई दोष लगता भी है तो साधु शब्द
का ज्ञान होने पर पुनः व्यक्ति उस दोष से मुक्त होकर अभ्युदय से युक्त होता है ।
उत्कृष्ट अधिक फल की प्राप्ति में यदि स्वल्प अधर्म फल भी हो रहा हो तो वह
अनुत्पन्न के समान ही होता है ।
ज्ञानपक्ष में दूसरा दूषण श्रुति सम्मत आचार में नियम की बात को लेकर
पूर्वपक्षी के द्वारा स्थापित किया गया था । भाष्यकार के अनुसार यह विशेष
व्यवस्था यज्ञादि के लिए ही की गई है । अन्यत्र साधारण स्थिति में इसकी
सम्भावना नहीं हो सकती । इसके समर्थन में पतञ्जलि ने यर्वाणः, तर्वाणः नाम
के ऋषियों से सम्बद्ध कथा को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि सामान्य जीवन में
अपशब्दों का प्रयोग करते हुए भी वे याज्ञकर्म में अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते
थे, अतः वे अपुण्य से युक्त नहीं हुए । असुरों ने याज्ञकर्म में भी अपभाषण किया,
अतः वे पराभूत हुए ।
मूलम्—अथ व्याकरणमित्यस्य शब्दस्य कः पदार्थः ?
सूत्रम् ।
*सूत्रे व्याकरणे षष्ठ्यर्थोऽनुपपन्नः—
सूत्रे व्याकरणे षष्ठ्यर्थो नोपपद्यते—‘व्याकरणस्य सूत्रम्’ इति । किं हि
तदन्यत्सूत्राद् व्याकरणम्, यस्यादः सूत्रं स्यात् ।
*शब्दाप्रतिपत्तिः
शब्दानां चाप्रतिपत्तिः प्राप्नोति—व्याकरणाच्छब्दान्प्रतिपद्यामहे इति ।
नहि सूत्रत एव शब्दान्प्रतिपद्यन्ते ।
किं तर्हि ?
व्याख्यानतश्च ।
ननु च तदेव सूत्रं विगृहीतं व्याख्यानं भवति ।
न केवलानि चर्चापदानि व्याख्यानम्—‘वृद्धिः, आत्, ऐच्’ इति,
किं तर्हि
उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहार इत्येतत्समुदितं व्याख्यानं भवति ।
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६३
प्रदीपः—अथेति । उक्तमिदं न चान्तरेण व्याकरणमित्यादि । तत्र पक्ष-
द्वयेऽपि दोषदर्शनात् पदार्थप्रश्नः । षष्ठ्यर्थ इति । द्वाभ्यामपि शब्दाभ्यामष्टाध्याय्याः
प्रतिपादनाद्व्यतिरेकाभावः । सामान्यविशेषशब्दतया तु द्वयोः सहप्रयोगो न विरुध्यते,
यदा त्वष्टाध्याय्येकदेशः सूत्रशब्देनोच्यते, तदा षष्ठ्यर्थोऽप्युपपद्यते । शब्दाप्रतिपत्ति-
रिति । न हि व्याख्यानरहितसूत्रमात्रश्रवणाच्छब्दाः प्रतीयन्ते । समुदितमिति ।
समुदायादेवार्थावसायोत्पादादित्यर्थः ।
अनुवाद—अब 'व्याकरण' इस शब्द का क्या अर्थ है ?
सूत्र ।
"सूत्र को व्याकरण मानने पर षष्ठ्यर्थ अनुपपन्न"—
सूत्र को व्याकरण मानने पर षष्ठी (विभक्ति) का अर्थ उपपन्न नहीं हो
सकता—'व्याकरण का सूत्र ।' क्या सूत्र से अतिरिक्त व्याकरण कुछ (तत्त्व) है
जिसका वह सूत्र होगा ।
"शब्दों की अप्रतिपत्ति"—
और (सूत्र को ही व्याकरण मानने पर) शब्दों का प्रतिपादन भी नहीं हो
सकेगा—(हम) व्याकरण से शब्दों का प्रतिपादन करते हैं । (और) सूत्रों से ही
शब्दों का प्रतिपादन नहीं हो सकता ।
फिर किससे ?
व्याख्यान से भी ।
वही सूत्र तो विगृहीत होकर व्याख्यान होता है ।
केवल चर्चित पद—वृद्धि, आत्, ऐच् आदि ही व्याख्यान नहीं होते ।
तो क्या (व्याख्यान होता है) ?
उदाहरण, प्रत्युदाहरण, वाक्य का अध्याहार, यह सब मिलकर व्याख्यान
होता है ।
उषा—'तस्मादध्येयं व्याकरणम्' इत्यादि शास्त्र के द्वारा व्याकरणाध्ययन
की अनिवार्यता का प्रतिपादन किया गया है । अतः अध्ययन के निमित्त व्याकरण
शब्द के अर्थ तथा विस्तार सीमाओं को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है । यहाँ
इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम सूत्र और शब्द को व्याकरण पद के वाच्य के रूप में रखकर
विचार किया गया है ।
परन्तु सूत्र में व्याकरणत्व स्वीकार करने पर दो आपत्तियाँ हो सकती हैं—
(१) षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वहीं उपपन्न हो सकता है जहाँ दो पृथक्
वस्तुओं का निर्देश करना हो, क्योंकि यह विभक्ति दो पदार्थों का सम्बन्ध बताने में
ही प्रयुक्त होती है । परन्तु व्यवहार में सूत्र और व्याकरण इन दोनों ही पदों के
६४ महाभाष्यम्
द्वारा अष्टाध्यायी का प्रतिपादन किया जाता है। अतः सूत्र और व्याकरण में
अभिन्नता होने के कारण भेदसम्बन्धबोधिका षष्ठी विभक्ति का प्रयोग नहीं हो
सकता । यद्यपि सूत्र शब्द से सूत्र सामान्य तथा व्याकरण शब्द से अष्टाध्यायी
का ग्रहण होने पर इस प्रयोग में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता । और भी जब
अष्टाध्यायी के एक भाग को सूत्र शब्द के द्वारा अभिहित किया जाये तो “राहोः
शिरः” इत्यादि प्रयोगों के समान इसकी सङ्गति दिखाई जा सकती है ।
(२) इसी पक्ष में दूसरी आपत्ति यह है कि केवलमात्र सूत्र को ही व्याकरण
मानने पर शब्दों का सम्यक् प्रतिपादन नहीं हो सकता, प्रत्युत उदाहरण, प्रत्युदा-
हरण तथा सूत्रान्तरों में श्रूयमाण पदों का अध्याहार कर सूत्र के सम्पूर्ण अर्थ को
स्पष्ट करके ही शब्दप्रतिपत्ति सम्भव हो पाती है ।
मूलम्—एवं तर्हि शब्दः ।
*शब्दे ल्युडर्थः—
यदि शब्दो व्याकरणं ल्युडर्थो नोपपद्यते—व्याक्रियन्ते शब्दा अनेनेति
व्याकरणम् । नहि शब्देन किञ्चिद् व्याक्रियते ।
केन तर्हि ?
सूत्रेण ।
*भवे च तद्धितः—
भवे च तद्धितो नोपपद्यते—‘व्याकरणे भवो योगो वैयाकरणः’ इति । नहि
शब्दे भवो योगः ।
क्व तर्हि ?
सूत्रे ।
*प्रोक्तादयश्च तद्धिताः—
प्रोक्तादयश्च तद्धिता नोपपद्यन्ते । पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम् । आपिशलं
काशकृत्स्नमिति । न हि पाणिनिना शब्दाः प्रोक्ताः ।
किं तर्हि ?
सूत्रम् ।
प्रदीपः—शब्द इति । करणे ल्युड् विधीयते । शब्दश्च व्याक्रियमाणत्वात्कर्म
न तु करणमिति भावः । भवे चेति । शब्देऽप्यन्वाख्यापकत्वेन भवो योग इति
चेन्मीमांसादियोगस्यापि शब्दं प्रति विचारकत्वाद्वैयाकरणत्वप्रसङ्गः ।
अनुवाद—तो फिर शब्द (व्याकरण है) ।
“शब्द में ल्युट् का अर्थ”—
यदि शब्द को व्याकरण माना जाये तो ल्युट् का अर्थ उपपन्न नहीं होता—
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ६५
जिसके द्वारा शब्दों को व्याकृत किया जाता है, वह व्याकरण है। शब्द के द्वारा
कुछ भी व्याकृत नहीं किया जाता ।
तो फिर किससे ?
सूत्र से ।
"भव अर्थ में तद्धित" —
"तत्र भवः" इस अर्थ में तद्धित का प्रयोग भी उपपन्न नहीं होता—
'व्याकरण में होने वाला योग वैयाकरण है।" शब्द में योग नहीं होता ।
तो कहाँ (होता हैं) ?
सूत्र में ।
'और प्रोक्तादि में तद्धित'—
"तेन प्रोक्तम्" इस अर्थ में तद्धित प्रत्यय उपपन्न नहीं हो सकते। पाणिनि
के द्वारा प्रोक्त पाणिनीय है। (इसी प्रकार से) आपिशल और काशकृत्स्न (शब्द
भी सिद्ध होते हैं)। पाणिनि ने शब्दों को नहीं कहा ।
तो क्या (कहा है) ?
सूत्र ।
उषा—सूत्र में व्याकरणत्व का निरास करके सम्प्रति शब्द में व्याकरणत्व
स्वीकार करने पर आक्षेप किया गया है। शब्द में व्याकरणत्व स्वीकार करने पर
दो समस्यायें उत्पन्न होती हैं—
(१) ल्युट् प्रत्यय करण और अधिकरण में आता है। शब्द को व्याकरण
मानने पर उसका अर्थ सङ्गत नहीं हो सकता । 'व्याकरण' शब्द 'वि' और 'आ'
उपसर्ग पूर्वक √कृ से ल्युट् प्रत्यय करके निष्पन्न हुआ है। व्याकरण से शब्दों
का प्रकृति प्रत्यय विभागादि किया जाता है, परन्तु यह विभाग शब्दों से नहीं,
सूत्रों की सहायता से ही निष्पन्न होता है ।
(२) "तत्र भवः" और "तेन प्रोक्तम्" से होने वाले तद्धित प्रत्ययों का अर्थ
भी इससे उपपन्न नहीं हो पाता । व्याकरण में होने वाला योग वैयाकरण कहा
जाता है, परन्तु यह योग शब्द से नहीं, सूत्र से होता है। इसी प्रकार "तेन प्रोक्तम्"
से पाणिनि शब्द से तद्धित अण् प्रत्यय करने पर पाणिनीय शब्द सिद्ध होता है।
परन्तु पाणिनि ने शब्दों का आख्यान नहीं किया प्रत्युत उत्सर्ग और अपवाद रीति
से सूत्रों का ही अन्वाख्यान किया है। अतः शब्द को व्याकरण का वाचक नहीं कहा
जा सकता ।
मूलम् —किमर्थमिदमुभयमुच्यते—"भवे," "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इति ।
न "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इत्येव सर्वेऽपि तद्धितश्चोदितः स्यात् ?
महाभाष्यम्
पुरस्तादिदमाचार्येण दृष्टम् "भवे च तद्धितः" इति, तत्पठितम् । तत
उत्तरकालमिदं दृष्टम् 'प्रोक्तादयश्च तद्धितः" इति, तदपि पठितम् । न चेदानीमा-
चार्याः सूत्राणि कृत्वा निवर्तयन्ति ।
प्रदीपः — न चेदानीमिति । लक्षणप्रपञ्चाभ्यां मूलसूत्रवद्वार्त्तिकानामुपपत्त्या
दोषाभावः ।
अनुवाद — "भवे च तद्धितः" और "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" ये दोनों किस
लिए कहे गये हैं । क्या "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इतना कहने से ही भव अर्थ में भी
तद्धित का आक्षेप नहीं हो जाता ?
पहले आचार्य ने "भवे च तद्धितः" इस सूत्र का दर्शन किया और उसे
पढ़ दिया । तदनन्तर "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इसका (दर्शन किया) और उसे पढ़
दिया । अब आचार्य सूत्रों को (एक बार) पढ़कर (उन्हें) लौटाते नहीं ।
उषा — प्रस्तुत अवतरण भाष्यकार की सूत्रकार के प्रति श्रद्धातिशय का
द्योतक है । आचार्य लोग एक बार सूत्र
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६७
अनुवाद—यह कोई दोष नहीं है, जो कहा है—"शब्द (को व्याकरण
मानने में) ल्युट् का अर्थ (उपपन्न नहीं होता)। केवल करण और अधिकरण में
ही ल्युट् का विधान नहीं है।
तो क्या (नियम है) ?
दूसरे (कारकों) में भी कृत्य और ल्युट् होते हैं। जैसे कि प्रस्कन्दनम्,
प्रपतनम् इत्यादि (में ल्युट् है) ।
पुनश्च शब्दों के द्वारा भी शब्दों का व्याकरण होता है। जैसे कि 'गौः'
इस शब्द के कहने पर सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं कि यह अश्व अथवा गर्दभ नहीं
है।
भव अर्थ और प्रोक्तादि अर्थ में (यह) अवश्य दोष है।
उषा—शब्द के व्याकरणत्व पर इस अवतरण में और समीक्षात्मक विचार
किया गया है। इस पक्ष पर जिन दोषों की उद्भावना पहले की गई है, उनमें सर्व
प्रथम यह है कि करणाधिकरण अर्थ में आने वाला ल्युट् प्रत्यय शब्द में व्याकरणत्व
मानने पर उपपन्न नहीं हो सकता । परन्तु "कृत्यल्युटो बहुलम्" यह सूत्र करणा-
धिकरण के अतिरिक्त अन्य अर्थों में भी ल्युट् प्रत्यय का विधान करता है। अत एव
प्रपतन, प्रस्कन्दन आदि रूप उपपन्न होते हैं। अपि च, जो केवल सूत्रों से शब्दों के
व्याख्यान की बात कही गई थी, वह भी उचित नहीं है। लोकव्यवहार में शब्दों
से ही शब्दों का व्याख्यान देखा जाता है। 'गो' शब्द का उच्चारण करने पर
केवल सास्नादिमत् पदार्थ का ही बोध होता है, अश्व, गर्दभ आदि सभी की निवृत्ति
हो जाती है । इसी प्रकार से एक उदाहरण का उपन्यास करने से उसके सदृश समस्त
शब्दों की प्रतीति हो जाती है। इसी पक्ष में यदि व्याकरण की निरुक्ति "व्याक्रियन्ते
विभज्यन्तेऽपशब्दा येनेति" इस प्रकार से की जाये तो 'गो' शब्द के उच्चारण से
ज्ञात हो जाता है कि गावी, गोणी आदि अपशब्द हैं। यह शब्द के द्वारा ही
शब्दों का व्याख्यान है, अतः यह तर्क समीचीन नहीं ।
हाँ, भव और प्रोक्तादि अर्थों में तद्धित प्रत्ययों की अनुपपत्ति की बात
अवश्य उचित है, अतः इस दृष्टि से शब्द को व्याकरण मानना अनुचित ठहरता है।
मूलम्—एवं तर्हि
- लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्—
लक्ष्यं च लक्षणं चैतत्समुदितं व्याकरणं भवति ।
किं पुनर्लक्ष्यम्, किं वा लक्षणम् ?
शब्दो लक्ष्यः, सूत्रं लक्षणम् ।
६८ महाभाष्यम्
एवमप्ययं दोषः --समुदाये व्याकरणशब्दः प्रवृत्तोऽवयवे नोपपद्यते । सूत्राणि
चाप्यधीयान इष्यते — वैयाकरण इति ।
नैष दोषः । समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते । तद्यथा पूर्वे
उत्तरे पञ्चालाः, तैलं भुक्तं, घृतं भुक्तं, शुक्लो नीलः कपिलः कृष्ण इति । एव-
मयं समुदाये व्याकरणशब्दः प्रवृत्तोऽवयवेष्वपि वर्तते ।
प्रदीपः—पूर्वे पञ्चाला इति । जनपदान्तरनिवृत्तिविवक्षायामेकदेशेऽपि
समुदायरूपारोपात्प्रयोगः । तैलमिति । यदौषधसंस्कृता घृततैलमात्रा भवति तदेद-
मुदाहरणम् । आकृतिवाचित्वे तु घृततैलशब्दयोः संस्थानप्रमाणनिरपेक्षा सर्वत्र मुख्या
वृत्तिः । शुक्ल इति । अशुक्लेऽप्यवयवेऽवयवान्तरस्य शौक्ल्यात्समुदायस्य शुक्लत्वे '
सत्या (तस्या) रोपात्प्रयोगः ।
अनुवाद — तो फिर —
“लक्ष्य और लक्षण व्याकरण हैं”—
लक्ष्य और लक्षण ये दोनों मिलकर व्याकरण होते हैं ।
तो फिर लक्ष्य क्या है और लक्षण क्या है ?
शब्द लक्ष्य है, सूत्र लक्षण है ।
ऐसा होने पर भी यह दोष है — समुदाय में प्रवृत्त व्याकरण शब्द अवयव
में उपपन्न नहीं हो सकता । सूत्रों का अध्ययन करने वाला वैयाकरण (रूप में) ही
इष्ट होता है ।
यह दोष नहीं है । क्योंकि समुदायों में प्रवृत्त शब्द अवयवों में भी प्रयुक्त
होते हैं । जैसे कि पूर्व पञ्चाल, उत्तर पञ्चाल, (औषध आदि के रूप में थोड़ा सा
सेवन करके ही) तेल खाया, घी खाया (आदि प्रयोग), (वस्त्र के एक भाग के
कारण) शुक्ल, नील, कपिल, कृष्ण आदि । इसी प्रकार समुदाय में प्रवृत्त व्याकरण
शब्द (उसके) अवयव में भी प्रयुक्त होता है ।
उषा—सूत्र और शब्द दोनों में ही व्याकरणत्व का निरास करके सम्प्रति
सिद्धान्त के रूप में इन दोनों को युगपद् व्याकरण संज्ञा से अभिहित किया गया है ।
व्याकरण का लक्ष्य शब्द है, सूत्रों के द्वारा शब्दों की ही प्रतिपत्ति होती है तथा
सूत्र लक्षण है । लक्ष्य और लक्षण अर्थात् शब्द और सूत्र इन दोनों का समुचित
नाम ही व्याकरण है ।
समुदाय के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्द अवयव में भी प्रयुक्त हो जाते
हैं । जिस प्रकार से वन के एक भाग के पुष्पित होने पर भी “पुष्पितं वनम्” तथा
पट के एक भाग के शुक्ल होने पर भी “शुक्लः पटः” आदि रूप उपपन्न होते हैं
उसी प्रकार से लक्ष्य और लक्षण अथवा शब्द और सूत्र रूप व्याकरण के एक भाग,
अर्थात् सूत्रों में अध्ययनरत व्यक्ति को भी वैयाकरण कह दिया जाता है । “पूर्वे
पाञ्चालाः” “तैलं भुक्तम्” आदि रूप भी इसी प्रकार उपपन्न होते हैं ।
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ६६
मूलम् — अथवा पुनरस्तु सूत्रम् ।
ननु चोक्तं "सूत्रे व्याकरणे षष्ठ्यर्थोऽनुपपन्न" इति ।
नैष दोषः । व्यपदेशिवद्भावेन भविष्यति ।
यदप्युच्यते "शब्दाप्रतिपत्तिः" नहि सूत्रत एव शब्दान्प्रतिपद्यन्ते ।
किं तर्हि ?
व्याख्यानतश्च ।
परिहृतमेतत् — तदेव सूत्रं विगृहीतं व्याख्यानं भवति ।
ननु चोक्तं — न केवलानि चर्चापदानि व्याख्यानम् — वृद्धिः, आत्, ऐच् इति ।
किं तर्हि ?
"उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहार इत्येतत्समुदितं व्याख्यानं भवति
इति ।
अविजानत एतदेवं भवति । सूत्रत एव हि शब्दान् प्रतिपद्यन्ते । आतश्च
सूत्रत एव । यो ह्यसूत्रं कथयेन्नादो गृह्येत ।
प्रदीपः — व्यपदेशिवद्भावेनेति । यथा राहोः शिर इत्येकस्मिन्नपि वस्तुनि
शब्दार्थभेदादभेदव्यवहारः । एवमिहापि व्याकरणशब्देन शास्त्रस्य व्याकृतिक्रियायां
करणरूपत्वमुच्यते । सूत्रशब्देन तु समुदायरूपतेति भेदव्यवहार उपपद्यते । सूत्रत
एवेति । पदच्छेदादिभिः सूत्रार्थस्यैवाभिव्यञ्जनात् । आत इति निपातः । अतश्च
हेतोरित्यर्थः । नाद इति । नैतदित्यर्थः । अथवा नादोऽर्थरहितत्वाद् घोषमात्रमेवेत्यर्थः ।
अनुवाद — अथवा फिर (व्याकरण पद का अर्थ) सूत्र ही हो ।
अभी जो कहा था सूत्र को व्याकरण मानने में षष्ठ्यर्थ अनुपपन्न हो
जायेगा ।
यह दोष नहीं है । व्यपदेशिवद् भाव (की कल्पना) से (इसका समाधान)
हो जायेगा ।
जो यह कहा गया है कि शब्दों का प्रतिपादन नहीं हो सकेगा । (केवल)
सूत्र से ही शब्दों का प्रतिपादन नहीं हो सकता ।
फिर किससे (होता है) ?
व्याख्यान से भी ।
इसका परिहार कर दिया था कि वही सूत्र विगृहीत होकर व्याख्यान होता
है ।
और यह जो कहा गया था कि केवल, वृद्धिः, आत् और ऐच् (आदि)
चर्चित पद ही व्याख्यान नहीं ।
तो (फिर) क्या है ?
७० महाभाष्यम्
उदाहरण, प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार यह सब मिलकर व्याख्यान होता है ।
न जानने वाले के लिए यह ऐसा होता है । सूत्र से ही शब्दों का प्रतिपादन
हो जाता है इस हेतु से भी सूत्र से ही (शब्दों का प्रतिपादन होता है) । जो सूत्रों
का अतिक्रमण करके कहे वह ग्रहण नहीं किया जाता ।
उषा—सूत्र रूप प्रथम पक्ष का पुनरभ्युपगम करते हुए प्रस्तुत अवतरण
में उससे सम्बद्ध भ्रान्तियों का निराकरण किया गया है । सूत्र को व्याकरण मानने
के विरोध में जो सर्वप्रथम षष्ठ्यर्थ के अनुपपन्न होने की बात कही गई थी, वह
उचित नहीं है । राहु और राहु के शिर में तात्त्विक भेद न होने पर भी जिस
प्रकार से व्यपदेशिवद्भाव से सम्बन्धविवक्षा आरोपित कर ली जाती है उसी प्रकार
से सूत्र और व्याकरण में भी सम्बन्ध की कल्पना करके षष्ठी विभक्ति का उपपादन
किया जा सकता है ।
और जो सूत्र के अतिरिक्त उदाहरण, प्रत्युदाहरण आदि रूप व्याख्यान
से युक्त होने पर ही शब्द-प्रतिपत्ति की बात कही गई थी, वह भी उपयुक्त नहीं है,
क्योंकि यह सब प्रपञ्च व्याकरणज्ञान से हीन व्यक्ति के लिए ही है । व्याकरणज्ञ
केवल चर्चित पदों से सूत्रार्थ का सम्यक् अवबोध कर सकता है ।
मूलम्—अथ किमर्थो वर्णानामुपदेशः ?
- वृत्तिसमवायार्थ उपदेशः—
वृत्तिसमवायार्थो वर्णानामुपदेशः—
किमिदं वृत्तिसमवायार्थ इति ?
वृत्तये समवायो वृत्तिसमवायः । वृत्त्यर्थो वा समवायो वृत्तिसमवायः ।
वृत्तिप्रयोजनो वा समवायो वृत्तिसमवायः ।
का पुनर्वृत्तिः ?
शास्त्रप्रवृत्तिः ।
अथ कः समवायः ?
वर्णानामानुपूव्येण सन्निवेशः ।
अथ क उपदेशः ?
उच्चारणम् ।
कुत एतत् ?
दिशिरुच्चारणक्रियः । उच्चार्य हि वर्णनाह—उपदिष्टा इमे वर्णा इति । - अनुबन्धकरणार्थश्च—
अनुबन्धकरणार्थश्च वर्णानामुपदेशः—अनुबन्धानासङ्क्ष्यामीति । न ह्यनुपदिश्य
वर्णाननुबन्धाः शक्या आसङ्क्तुम् । स एष वर्णानामुपदेशो वृत्ति
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७१
*इष्टबुद्ध्यर्थश्च—
इष्टबुद्ध्यर्थश्च वर्णानामुपदेशः—‘इष्टान्वर्णान्भोत्स्यामहे’ इति । न
ह्यनुपदिश्य वर्णानिष्टा वर्णाः शक्या विज्ञातुम् ।
प्रदीपः—वृत्तिसमवायार्थ इति । लाघवेन शास्त्रप्रवृत्त्यर्थ इत्यर्थः । धर्मनियम-
वत्समासः । वृत्त्यर्थ इति । शास्त्रप्रवृत्तिप्रत्यासन्नत्वं समवायस्य दर्शयति । इग्यण
इत्यादी हि यथासंख्यशास्त्रं वर्णसंनिवेशमात्रादेवावतिष्ठते । वृत्तिप्रयोजन इति ।
पारंपर्येण शास्त्रप्रवृत्तावस्थातृत्वम् । सति हि समवाये इत्संज्ञा । तत आदिरन्त्येनेति
[प्रत्याहार ] । ततो ङ्लोप इत्यादि शास्त्रप्रवृत्तिः । प्रत्याहारार्थमिति । प्रत्याहार-
शब्देनाणादिकाः संज्ञा उच्यन्ते । इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति । सति ह्युपदेशे कलादिदोषरहिता
ये वर्णा निर्दिष्टास्तथैव प्रयोक्तव्या इत्युक्तं भवति ।
अनुवाद—अब वर्णों का उपदेश किसलिए है ?
“वृत्तिसमवाय के लिये उपदेश है”—
वर्णों का उपदेश वृत्तिसमवाय के लिए है ।
यह वृत्तिसमवाय क्या है ?
वृत्ति के लिए समवाय वृत्तिसमवाय है। वृत्त्यर्थ (वृत्ति का हेतु) समवाय
वृत्तिसमवाय है । वृत्ति का प्रयोजक समवाय वृत्तिसमवाय है ।
फिर वृत्ति क्या है ?
शास्त्र में प्रवृत्ति (वृत्ति है) ।
अब समवाय क्या है ?
वर्णों का पूर्वापरसन्निवेश ।
अब उपदेश क्या है ?
उच्चारण ।
यह कहाँ से ?
दिश् धातु उच्चारणार्थक है । (वर्णों का ) उच्चारण करते ही (श्राचार्य)
कहता है—‘इन वर्णों का उपदेश कर दिया गया है ।’
“अनुबन्ध करने के लिए”—
अनुबन्ध करने के लिए भी वर्णों का उपदेश है । (आचार्य की प्रतिज्ञा है
कि) मैं अनुबन्धों को लगाऊँगा । वर्णों का उपदेश किये बिना अनुबन्धों को नहीं
लगाया जा सकता । यह वर्णों का उपदेश वृत्तिसमवाय के लिए है और अनुबन्ध
करने के लिए भी । वृत्तिसमवाय और अनुबन्धकरण प्रत्याहार के लिए है ।
प्रत्याहार (शास्त्र की) प्रवृत्ति के लिए है ।
“इष्ट बोध के लिए”—
७२ महाभाष्यम्
वर्णों के इष्ट बोध के लिए भी वर्णों का उपदेश है।—"हम इष्ट वर्णों
का बोध करेंगे।" वर्णों का उपदेश किये बिना इष्ट वर्णों का ज्ञान नहीं हो सकता।
उषा—व्याकरण का उद्देश्य वर्णों के साधुत्व का प्रतिपादन करना है,
परन्तु वर्णोपदेश से किसी भी शब्द का साधुत्व प्रतिपादित नहीं होता। अत एव
माहेश्वर वर्णसमाम्नाय का उपदेश किसलिए किया गया यह प्रश्न उपस्थापित
किया गया है।
"वृत्तये समवायः" से अभिप्राय है—"लाघवेन शास्त्रप्रवृत्तये," अर्थात्
लाघव से शास्त्र में प्रवृत्ति हो सके, यही वर्ण समाम्नाय का प्रयोजन है। वर्ण-
समाम्नाय करने पर अच् आदि संज्ञाओं की प्राप्ति हो सकेगी। ततश्च लाघवेन
शब्दानुशासन।
'इ, उ, ऋ, लृ के स्थान पर य्, व्, र्, ल् हों" ऐसा विस्तृत व्याख्यान करने
के स्थान पर "इको यणचि" इतना मात्र कह देने से ही शास्त्र-प्रवृत्ति हो सकती है।
अत एव द्वितीय विग्रह उपस्थित किया गया है—'वृत्त्यर्थो वा समवायः, वृत्ति-
समवायः।' "इग्यणः सम्प्रसारणम्" इत्यादि स्थलों में यथासंख्य प्रतीति भी सुलभ
हो पायेगी।
'ण्' आदि की इत्संज्ञा करके प्रत्याहार सिद्धि की जाती है। यह भी लाघव
से शास्त्रप्रवृत्ति के लिए उपयोगी है। "वृत्तिप्रयोजनो वा समवायः" का यही
अभिप्राय है।
वर्णोपदेश का दूसरा प्रयोजन अनुबन्ध लगाना है। अनुबन्धों को लगाकर ही
वर्णसमुदाय का उपपादन किया जा सकता है।
इस प्रकार से वर्णोपदेश के दो प्रयोजन हुए—१. वृत्तिसमवाय और २.
अनुबन्धकरण। वृत्तिसमवाय और अनुबन्धकरण का प्रयोजन प्रत्याहारों का निर्माण
करना है। "प्रत्याह्रियन्ते वर्णा अस्मिन्" इस व्युत्पत्ति से प्रत्याहार शब्द अण् आदि
का वाचक है। अणादि की सिद्धि से लाघवेन शास्त्रप्रवृत्ति सम्भव हो पाती है। अतः
परम्परया वर्णों का उपदेश शास्त्रप्रवृत्ति के लिए ही है।
वर्णोपदेश का एक अन्य प्रयोजन इष्ट वर्णों का बोध कराना भी है। स्पष्ट
उपदेश कर देने पर कलादि दोषों से युक्त वर्णों का ग्रहण नहीं होगा, क्योंकि
उच्चारण करके इनका सही स्वरूप बतला दिया गया है।
शास्त्रप्रवृत्ति में सहायकभूत मात्र होने के कारण इसका शास्त्र से
बहिर्भूतत्व भी सूचित होता है। अत एव "वृद्धिरादैच्" सूत्र की व्याख्या में आदि में
पढ़े गये 'वृद्धि' शब्द का प्रयोजन मङ्गलार्थक सिद्ध हो सकेगा।
मूलम्—* इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुताना-
मप्युपदेशः—
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७३
इष्टसिद्ध्यर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुतानामप्युपदेशः
कर्तव्यः । एवं गुणा अपि हि वर्णा इष्यन्ते ।
- आकृत्युपदेशात्सिद्धम्—
अवणाकृतिरुपदिष्टा सर्वमवर्णकुलं ग्रहीष्यति । तथैवणाकृतिः । तथोवर्णा-
कृतिः ।
प्रदीपः—एकश्रुत्या हि सूत्राणां पाठात्सर्वेषामुदात्तादीनामुपदेशः कर्तव्य
इत्याह—इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति चेदिति । आकृत्युपदेशादिति । उपात्तोऽपि विशेषो
नान्तरीयकतयाज्जातिप्राधान्यविवक्षायां न विवक्ष्यत इत्यर्थः ।
अनुवाद—"और इष्टबुद्ध्यर्थ होने पर उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक,
दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश"—
(वर्णों के) इष्ट बोध (को यदि वर्णोपदेश का प्रयोजन माना जाये तो)
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश करना
चाहिए । क्योंकि इस प्रकार के भी वर्ण इष्ट हैं ।
"जातिपरक उपदेश से सिद्ध"—
'अ' वर्ण की आकृति का उपदेश सारे 'अ' वर्णों (उदात्त, अनुदात्त आदि)
का ग्रहण करायेगा । इसी प्रकार से इत्व जाति । इसी प्रकार से उत्व जाति ।
उषा—प्रस्तुत अवतरण में वर्णोपदेश के 'इष्टबुद्ध्यर्थ' प्रयोजन पर आक्षेप
किया गया है । पूर्वपक्षी का कहना है कि वर्णोपदेश में केवल ह्रस्व अचों का ही
उपदेश किया गया है । परन्तु शास्त्रीय प्रक्रिया में इसके उदात्त, अनुदात्त, स्वरित,
दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि सभी रूप आवश्यक हैं । अतः इनका भी वर्णोपदेश
में उपदेश किया जाना चाहिए था ।
परन्तु सिद्धान्ती का मत है कि वर्ण की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य
सभी रूपों का ग्रहण करवायेगी । अवर्ण का उच्चारण उदात्तानुदात्तादि सभी रूपों
का प्रतिनिधित्व करता है । अत एव जहाँ वर्ण के अन्य रूपों का ग्रहण इष्ट नहीं
होता, ऐसे स्थलों के लिए "तपरस्तत्कालस्य" इत्यादि सूत्र बनाये गये हैं ।
मूलम्—आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधः—
आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधो वक्तव्यः ।
के पुनः संवृतादयः ?
संवृतः कलो ध्मात एणीकृतोऽम्बूकृतोऽर्द्धको ग्रस्तौ निरस्तः प्रगीत उपगीतः
ष्विण्णो रोमश इति । अपर आह—
ग्रस्तं निरस्तमवलम्बितं निर्हतमम्बूकृतं ध्मातमथो विकम्पितम् ।
सन्दष्टमेणीकृतमर्धकं द्रुतं विकीर्णमेताः स्वरदोषभावनाः ॥ इति ।
७४ महाभाष्यम्
अतोऽन्ये व्यञ्जनदोषाः ।
नैष दोषः ।
- गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां प्रतिषेधः—
गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यति ।
प्रदीपः—संवृतादीनामिति । आकारादीनां संवृतत्वं दोषः । न त्वकारस्य
संवृतगुणत्वात् । तत्र सन्ध्यक्षरेषु विवृततमेषूच्चार्येषु संवृतत्वं दोषः । कलः—
स्थानान्तरनिष्पन्नः काकलिकत्वेन प्रसिद्धः । ध्मातः—श्वासभूयिष्ठतया ह्रस्वोऽपि
दीर्घ इव लक्ष्यते । एणीकृतः—अविशिष्टः किमयमकारोऽथौकार इति यत्र सन्देहः ।
अम्बूकृतः—यो व्यक्तोऽप्यन्तर्मुखमिव श्रूयते । अर्धकः—दीर्घोऽपि ह्रस्व इव ।
ग्रस्तः—जिह्वामूले निगृहीतः, अव्यक्त इत्यपरे । निरस्तः—निष्ठुरः । प्रगीतः—
सामवदुच्चारितः । उपगीतः—समीपवर्णान्तरगीत्यानुरक्तः । क्ष्विण्णः—कम्पमान
इव । रोमशः—गम्भीरः । अवलम्बितः—वर्णान्तरसंभिन्नः । निर्हतः—रूक्षः ।
सन्दष्टः—वर्धित इव । विकीर्णः—वर्णान्तरे प्रसृतः, एकोऽप्यनेकनिर्भासीत्यपरे ।
स्वरदोषभावना इति । स्वरदोषगोत्राणि । अनन्ता हि दोषा अशक्तिप्रमादकृताः ।
अनुवाद—आकृत्युपदेश से ही सिद्धि हो तो संवृतादि का प्रतिषेध—
आकृत्युपदेश से ही यदि (इष्ट) सिद्धि हो सके तो संवृतादि (दोषों) का
प्रतिषेध करना होगा ।
वे संवृतादि दोष कौन से हैं ?
संवृत, कल, ध्मात, एणीकृत, अम्बूकृत, अर्धक, ग्रस्त, निरस्त, प्रगीत,
क्ष्विण्ण और रोमश इत्यादि ।
अन्य (व्यक्ति) के अनुसार (वे दोष निम्नलिखित हैं) —
“ग्रस्त, निरस्त, अवलम्बित, निर्हत, अम्बूकृत, ध्मात, विकम्पित, सन्दष्ट,
एणीकृत, अर्धक, द्रुत और विकीर्ण, ये स्वर के दोष हैं ।” इसके अतिरिक्त व्यञ्जनों
के दोष भी हैं ।
यह कोई दोष नहीं है ।
—गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि का प्रतिषेध—
गर्गादि बिदादि (गण) पाठों से संवृत आदि (दोषों) की निवृत्ति हो
जायेगी ।
उषा—अवर्ण और इवर्ण की आकृति यदि दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि
सभी आकृति रूपों का ग्रहण करवा सकती है तो इससे संवृतादि दोषों का भी ग्रहण
होने लगेगा । परन्तु दोषों में परिगणित होने के कारण शास्त्रीय मर्यादाओं में
उनका ग्रहण नही किया जा सकता, अतः उनका प्रतिषेध करने के लिए अलग से
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७५
सूत्र बनाने पड़ेंगे। अतः आकृति रूप से उदात्तादि वर्णों का ग्रहण नहीं किया जा
सकता।
प्रमुख संवृतादि दोष निम्नलिखित हैं—
संवृत—अकार के संवृत गुण वाला होने के कारण यह अन्य आकारादि
स्वरों में दोष के रूप में परिगणित किया जाता है। इसके उच्चारण में मुख बन्द
रहता है ।
कल—स्वर का अपने स्थान से च्युत होकर स्थानान्तर से उच्चरित
होना 'कल' कहलाता है। इसे काकली भी कहते हैं ।
ध्मात—श्वासों की तीव्र गति के कारण जहाँ ह्रस्व भी दीर्घ के समान
उच्चरित होना प्रतीत होता है ।
एणीकृत—'ओ' और 'औ' में जहाँ अन्तर स्पष्ट नहीं हो पाता, इन दोनों
का समान साधारण सा उच्चारण किया जाता है ।
अम्बूकृत—व्यक्त होता हुआ भी जो स्पष्ट श्रुतिगोचर न हो, प्रत्युत मुख
के अन्दर ही उच्चरित होता हुआ सा प्रतीत हो
अर्धक—जो स्वर दीर्घ होता हुआ भी शीघ्रता से उच्चरित होने के कारण
ह्रस्व सा प्रतीत हो ।
ग्रस्त—जो जिह्वामूल में ही गृहीत होकर रह जाये । अन्य शिक्षाविदों के
अनुसार किसी भी अव्यक्त उच्चारण को ग्रस्त कह सकते हैं ।
निरस्त—स्वर का कठोर और कर्कश उच्चारण निरस्त कहलाता है ।
प्रगीत—गाकर उच्चारण किया गया स्वर ।
उपगीत—समीपस्थित दूसरे वर्ण के गीत से अनुरक्त ।
क्ष्विण्ण—कम्पमान स्वर ध्वनि ।
रोमश—गम्भीर अथवा गहन ।
अवलम्बित—वर्णान्तर के आश्रित हुआ-हुआ ।
निर्हत—रूखा ।
सन्दष्ट—बढ़ाकर उच्चारण किया हुआ स्वर ।
द्रुत—शीघ्रता से उच्चरित ।
विकीर्ण—दूसरे वर्ण से मिला हुआ अथवा एक होता हुआ भी जो स्वर
अनेक रूप में प्रतिभासित हो ।
ये सभी दोष स्वरों से सम्बद्ध हैं । इसके अतिरिक्त कुछ व्यञ्जन दोष भी
हैं, जैसे मूर्धन्य 'ष' का 'ख' के रूप में उच्चारण, इत्यादि ।
परन्तु सिद्धान्ती के अनुसार यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनकी निवृत्ति
गर्गादि तथा विदादि गण पाठों से हो जाती है। क्योंकि आचार्य ने इन्हें शुद्ध ही
७६ महाभाष्यम्
पढ़ा है, अतः यहाँ दोषों की शून्यता प्रतीत होती है। परन्तु इससे अन्य गार्ग्य
आदि दोषों की निवृत्ति नहीं हो सकेगी। नागेश कैयट के इस विचार से सहमत
नहीं। उनके अनुसार गर्गादि पाठ का प्रयोजन यञ् आदि प्रत्ययों से युक्त होकर
गार्ग्य आदि शब्दों का साधुत्व प्रतिपादन करना है, कलादि दोषों की निवृत्ति इनसे
नहीं हो सकती।
मूलम्—अस्त्यन्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् ।
किम् ?
समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति ।
एवं तर्ह्यष्टादशधा भिन्नां निवृत्तकलादिकामवर्णस्य प्रत्यापत्तिं वक्ष्यामि ।
सा तर्हि वक्तव्या ।
- लिङ्गार्था तु प्रत्यापत्तिः—
लिङ्गार्था सा तर्हि भवति ।
तत्तर्हि वक्तव्यम् ।
यद्यप्येतदुच्यते, अथवैतर्हि अनेकमनुबन्धशतं नोच्चार्यमित्संज्ञा च न
वक्तव्या, लोपश्च न वक्तव्यः। यदनुबन्धैः क्रियते तत्कलादिभिः करिष्यते ।
सिध्यत्येवम्, अपाणिनीयं तु भवति ।
प्रदीपः —अस्त्यन्यदिति । गर्ग इत्यादिनेव सन्निवेशेन गर्गादीनां साधुत्वं
यथा स्याद् गार्ग्य इत्यादीनां मा भूत् । ततश्च तद्गतानामेवाकारादीनां दोषनिवृत्तिः
कृता स्यात्, न तु समुदायान्तरस्थानाम् । यद्यपि प्रत्ययविध्यर्थो गर्गादीनां पाठस्तथापि
प्रसङ्गात्समुदायसाधुत्वार्थोऽपि भवति । निवृत्तकलादिकामिति । अकारस्य संवृत-
त्वात्निवृत्तसंवृतत्वादिकामिति नोक्तम् । अकारस्य निदर्शनार्थत्वात्सर्ववर्णानां
शास्त्रान्ते प्रत्यापत्तिरित्यर्थः । यदनुबन्धैरिति । यथा स्वरितत्वमधिकारार्थमेवमात्मने-
पदार्थं कलादिकं प्रतिज्ञाय कलादात्मनेपदमित्यादि करिष्यते न त्वनुदात्तङित
इत्यादि । ननु चानुबन्धाभावे कथमणादिकाः संज्ञा उपपद्यन्ते आदिरन्त्येनेत्यत्राविः
कलैः सहेत्युक्त्वा अ उ इत्यादिकाः संज्ञा करिष्यन्ते । स्वरसन्धिश्चासन्देहाय न
करिष्यत इत्यदोषः ।
अनुवाद—गर्गादि बिदादि पाठ का (तो) अन्य ही प्रयोजन है ।
क्या ?
जिससे (उन-उन) समुदायों का साधुत्व ज्ञान हो ।
तो फिर कलादि दोष रहित, अठारह प्रकार से भिन्न अवर्ण आदि की
(शास्त्र के अन्त में) प्रत्यापत्ति की जायेगी ।
वह फिर कहनी होगी (अर्थात् गौरव दोष हो जायेगा) ।
“लिङ्ग के लिए वह प्रत्यापत्ति”—
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७७
वह प्रत्यापत्ति लिङ्ग के लिए होगी ।
तो वह कहनी होगी । (इससे गौरव होगा) ।
यद्यपि यह कहनी होगी तथापि इससे अनेक अनुबन्धों को नहीं कहना
होगा, इत्संज्ञा नहीं कहनी पड़ेगी, लोप नहीं बताना पड़ेगा । जो (कार्य) अनुबन्धों
से किया जाता है वह कलादि दोषों से कर लिया जायेगा ।
ऐसा किया तो जा सकता है, परन्तु यह अपाणिनीय होगा ।
उ०—पूर्वपक्षी सिद्धान्ती के इस समाधान से सहमत नहीं है कि गर्गादि
बिदादि गणपाठों से संवृतादि दोषों की निवृत्ति हो जाती है । उसके अनुसार इन
गणपाठों का प्रयोजन गर्ग आदि शब्दों से यञ् प्रत्यय करके निष्पन्न गार्ग्य आदि
समुदायों के साधुत्व का प्रतिपादन है, अतः ये कलादि दोषों की निवृत्ति नहीं कर
सकते ।
सिद्धान्ती इसका समाधान करता हुआ कहता है कि शास्त्र के अन्त में "अ
अ" सूत्र का निर्माण करके जिस प्रकार अवर्ण से इस दोष का निवारण किया
गया है, उसी प्रकार से अन्य इ, उ आदि वर्णों के दोषों की भी निवृत्ति कर दी
जायेगी । कैयट के अनुसार अवर्ण यहाँ निदर्शनभूत है, अर्थात् 'अ' के समान ही
अन्य वर्णों का भी ग्रहण स्वयं कर लेना चाहिए । परन्तु नागेश के अनुसार इसका
अर्थ यह है कि 'अ' की जिस प्रकार से दोषनिवृत्ति की गई है, उसी प्रकार से अन्य
वर्णों की भी की जायेगी । परन्तु इससे गौरव दोष आ जायेगा, अतः पूर्वपक्षी
इस समाधान को स्वीकार नहीं करता ।
एक अन्य समाधान के रूप में पतञ्जलि ने एक नया प्रयोग करने का
प्रयास किया है । उसका अभिप्राय यह है कि अब धातु आदि से जो अनुबन्ध
लगाने पड़ते हैं, उनके स्थान पर कलादि को लिङ्ग रूप से समझा जा सकता है ।
अब जिस प्रकार से ङित् और अनुदात्तेत् की आत्मनेपद संज्ञा होती है, इसके स्थान
पर 'कल' दोष वाली धातु की आत्मनेपद संज्ञा हो जायेगी । स्वरितेत् और ञित्
के स्थान पर 'ध्मात' दोष से कार्य निष्पन्न किया जायेगा । इससे अनुबन्ध लगाने,
उनकी इत्संज्ञा करने और उसका लोप करने की सारी शास्त्रीय प्रक्रिया की बचत
हो जायेगी, अतः लाघव से शास्त्र प्रतिपादन भी हो सकेगा ।
परन्तु इस प्रकार से शास्त्रप्रक्रिया के सिद्ध होने पर भी यह पद्धति
अपाणिनीय हो जायेगी और अपाणिनीय समाधान को स्वीकार नहीं किया जा
सकता । और फिर असाधु प्रतिपादन का दोष भी इससे शास्त्र में आ जायेगा ।
अतः सिद्धान्ती का यह मत भी पूर्वपक्षी को अस्वीकार्य है ।
७८ महाभाष्यम्
मूलम् — यथान्यासमेवास्तु ।
ननु चोक्तम् — "आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेध इति ।"
परिहृतमेतत् — "गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यतीति ।
ननु चान्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् ।
किम् ?
समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति ।
एवं तर्ह्युभयमनेन क्रियते—पाठश्चैव विशेष्यते, कलादयश्च निवर्त्यन्ते ।
कथं पुनरेकेन यत्नेनोभयं लभ्यम् ?
लभ्यमित्याह ।
कथम् ?
द्विर्गता अपि हेतवो भवन्ति । तद्यथा—आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च
प्रीणिता इति । तथा वाक्यानि द्विष्ठानि भवन्ति—श्वेतो धावति, अलम्बुसानां
यातेति ।
प्रदीपः — उभयमिति । यथाभूता गर्गादिस्था अकारादयस्तथाभूता एव सर्वत्र
प्रयोक्तव्या इति प्रतिपाद्यत इत्यर्थः । द्विर्गता इति । द्वावर्थौ गताः प्रयोजनद्वय-
सम्पादका इत्यर्थः । तथा वाक्यान्त्यपीति । शब्दस्याप्यर्थवद् द्विगतत्वमित्यर्थः ।
अनुवाद — जैसे पहले कहा था । (आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति) (वही) हो ।
और (हमारी ओर से) कहा गया था कि आकृत्युपदेश से ही यदि सिद्धि
मानी जाये तो संवृतादि (दोषों में) प्रतिषेध करना होगा ।
इसका तो परिहार कर दिया गया था कि गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि
की निवृत्ति हो जायेगी ।
और जो गर्गादि बिदादि पाठ का तो अन्य ही प्रयोजन है ।
क्या ?
जिससे (तत्तत्) समुदायों का साधुत्व हो ।
तो फिर दोनों ही (कार्य) उसके द्वारा किये जाते हैं—पाठ को विशिष्ट किया
जाता है और कलादि दोष निवृत्त किये जाते हैं ।
एक ही यत्न से दोनों प्राप्तियाँ कैसे हो सकती हैं ?
हो सकती हैं, ऐसा कहते हैं ।
कैसे ?
द्विष्ठ हेतु भी होते हैं । जैसे कि (आम्रवृक्ष के नीचे पितृतर्पण करने से) आम
भी सिक्त हो जाते हैं और पितृतर्पण भी हो जाता है । इसी से वाक्य भी द्विष्ठ होते
हैं—"श्वेतो धावति" = (श्वेत गुण वाला दौड़ता है, कुत्ता यहां से दौड़ता है) ।"