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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 96 में से

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पृष्ठ 88

७४ महाभाष्यम्
अतोऽन्ये व्यञ्जनदोषाः ।
नैष दोषः ।

  • गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां प्रतिषेधः—
    गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यति ।
    प्रदीपः—संवृतादीनामिति । आकारादीनां संवृतत्वं दोषः । न त्वकारस्य
    संवृतगुणत्वात् । तत्र सन्ध्यक्षरेषु विवृततमेषूच्चार्येषु संवृतत्वं दोषः । कलः—
    स्थानान्तरनिष्पन्नः काकलिकत्वेन प्रसिद्धः । ध्मातः—श्वासभूयिष्ठतया ह्रस्वोऽपि
    दीर्घ इव लक्ष्यते । एणीकृतः—अविशिष्टः किमयमकारोऽथौकार इति यत्र सन्देहः ।
    अम्बूकृतः—यो व्यक्तोऽप्यन्तर्मुखमिव श्रूयते । अर्धकः—दीर्घोऽपि ह्रस्व इव ।
    ग्रस्तः—जिह्वामूले निगृहीतः, अव्यक्त इत्यपरे । निरस्तः—निष्ठुरः । प्रगीतः—
    सामवदुच्चारितः । उपगीतः—समीपवर्णान्तरगीत्यानुरक्तः । क्ष्विण्णः—कम्पमान
    इव । रोमशः—गम्भीरः । अवलम्बितः—वर्णान्तरसंभिन्नः । निर्हतः—रूक्षः ।
    सन्दष्टः—वर्धित इव । विकीर्णः—वर्णान्तरे प्रसृतः, एकोऽप्यनेकनिर्भासीत्यपरे ।
    स्वरदोषभावना इति । स्वरदोषगोत्राणि । अनन्ता हि दोषा अशक्तिप्रमादकृताः ।
    अनुवाद—आकृत्युपदेश से ही सिद्धि हो तो संवृतादि का प्रतिषेध—
    आकृत्युपदेश से ही यदि (इष्ट) सिद्धि हो सके तो संवृतादि (दोषों) का
    प्रतिषेध करना होगा ।
    वे संवृतादि दोष कौन से हैं ?
    संवृत, कल, ध्मात, एणीकृत, अम्बूकृत, अर्धक, ग्रस्त, निरस्त, प्रगीत,
    क्ष्विण्ण और रोमश इत्यादि ।
    अन्य (व्यक्ति) के अनुसार (वे दोष निम्नलिखित हैं) —
    “ग्रस्त, निरस्त, अवलम्बित, निर्हत, अम्बूकृत, ध्मात, विकम्पित, सन्दष्ट,
    एणीकृत, अर्धक, द्रुत और विकीर्ण, ये स्वर के दोष हैं ।” इसके अतिरिक्त व्यञ्जनों
    के दोष भी हैं ।
    यह कोई दोष नहीं है ।
    —गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि का प्रतिषेध—
    गर्गादि बिदादि (गण) पाठों से संवृत आदि (दोषों) की निवृत्ति हो
    जायेगी ।
    उषा—अवर्ण और इवर्ण की आकृति यदि दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि
    सभी आकृति रूपों का ग्रहण करवा सकती है तो इससे संवृतादि दोषों का भी ग्रहण
    होने लगेगा । परन्तु दोषों में परिगणित होने के कारण शास्त्रीय मर्यादाओं में
    उनका ग्रहण नही किया जा सकता, अतः उनका प्रतिषेध करने के लिए अलग से