व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाभाष्यम्
पुरस्तादिदमाचार्येण दृष्टम् "भवे च तद्धितः" इति, तत्पठितम् । तत
उत्तरकालमिदं दृष्टम् 'प्रोक्तादयश्च तद्धितः" इति, तदपि पठितम् । न चेदानीमा-
चार्याः सूत्राणि कृत्वा निवर्तयन्ति ।
प्रदीपः — न चेदानीमिति । लक्षणप्रपञ्चाभ्यां मूलसूत्रवद्वार्त्तिकानामुपपत्त्या
दोषाभावः ।
अनुवाद — "भवे च तद्धितः" और "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" ये दोनों किस
लिए कहे गये हैं । क्या "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इतना कहने से ही भव अर्थ में भी
तद्धित का आक्षेप नहीं हो जाता ?
पहले आचार्य ने "भवे च तद्धितः" इस सूत्र का दर्शन किया और उसे
पढ़ दिया । तदनन्तर "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इसका (दर्शन किया) और उसे पढ़
दिया । अब आचार्य सूत्रों को (एक बार) पढ़कर (उन्हें) लौटाते नहीं ।
उषा — प्रस्तुत अवतरण भाष्यकार की सूत्रकार के प्रति श्रद्धातिशय का
द्योतक है । आचार्य लोग एक बार सूत्र