बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( ११६ )
यद्यपि ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा परिश्रमी तथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले
होते हैं। परन्तु कई बार के प्रयत्नों के बाद ही इनको सामान्यतः सफलता नहीं मिल
पाती। जीवन के मध्य काल तक आते-आते ये व्यक्ति ऊब से जाते हैं।
यद्यपि इन व्यक्तियों के पास उर्वर मस्तिष्क होता है, तथा योजना बद्ध तरीके
से कार्य भी प्रारम्भ करते हैं। परन्तु जितने उत्साह से ये कार्य प्रारम्भ करते हैं उस
कार्य के मध्य में आते-आते उनका जोश या उत्साह ठंडा पड़ जाता है। ऐसे व्यक्ति
जीवन में असफल होने पर चिड़चिड़े हो जाते हैं तथा इनकी प्रकृति संशयालू हो जाती
है। इनके सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता है उन सब पर शक करना इनका स्वभाव
हो जाता है। धीरे-धीरे यह व्यक्ति अपने मित्रों तथा परिचितों से कट जाते हैं तथा
इनमें निराशा की भावना जरूरत से ज्यादा व्याप्त हो जाती है। एक प्रकार से ये
आगे चलकर अपने आपको बेसहारा और पराश्रय-सा अनुभव करते हैं।
अब मैं आगे के पृष्ठों में हृदय रेखा से सम्बन्धित उन तथ्यों को स्पष्ट कर
रहा हूं, जिसके माध्यम से इससे सम्बन्धित फला-फल ज्ञात किया जा सकता है :
१. हृदय रेखा जिस पर्वत के नीचे तक पहुंचती है, उस पर्वत में उससे
सम्बन्धित विशेष गुण स्वतः ही आ जायेंगे उदाहरणार्थ यदि हृदय रेखा अनामिका
के मूल में स्थित सूर्य पर्वत के नीचे जाकर समाप्त होती है तो सूर्य से सम्बन्धित विशेष
गुण प्रसिद्धि, कीर्ति, सम्मान आदि में स्वतः ही वृद्धि का योग बन जायगा।
२. यदि हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा की ओर झुके तो जिस जगह वह मुड़ती
है मस्तिष्क रेखा के उस बिन्दु के समान आयु में मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है।
३. यदि यह रेखा आगे चलकर मस्तिष्क रेखा से पूर्णतः मिल जाती है, तो वह
अपने दिमाग में कुछ नहीं सोचता अपितु दूसरों के कहने के अनुसार कार्य करता है,
और उसके आदेश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर लेता है।
४. यदि हृदय रेखा आगे बढ़कर मस्तिष्क रेखा को काट लेती है, तो दिमाग
अस्त-व्यस्त हो जाता है तथा उस व्यक्ति में निर्णय लेने की पूर्ण क्षमता नहीं होती।
५. यदि हृदय रेखा पर आकर कोई अन्य पतली रेखा मिले तो जिस पर्वत की
तरफ से वह पतली रेखा आती है, उस पर्वत के गुणों का उसके हृदय पर विशेष
प्रभाव रहता है।
६. यदि हृदय रेखा से पतली-पतली छोटी-छोटी रेखाएं मस्तिष्क रेखा की
ओर बढ़ती हों तो ऐसा व्यक्ति जीवन-भर मानसिक चिन्ताओं से परेशान रहता है।
७. यदि हृदय रेखा कई जगह टूट-फूट जाती है तो वह व्यक्ति हृदय रेखा का
धिकार होता है।
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८. यदि किसी की हथेली में हृदय रेखा पर द्वीप का चिह्न दिखाई दे तो वह
व्यक्ति समाज में विशेष सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता तथा उसका सामाजिक स्वरूप
एक तरह से खण्डित हो जाता है ।
९. हृदय रेखा जितनी अधिक लम्बी होती है और बृहस्पति पर्वत से जितनी
ही अधिक दूर होती है उतनी ही ज्यादा श्रेष्ठ कही जाती है ।
१०. यदि हृदय रेखा चलती-चलती मार्ग में कहीं टूट जाती है और फिर
आगे चलकर प्रारम्भ हो जाती है, तो जीवन के उस भाग में वह व्यक्ति मृत्यु-तुल्य कष्ट
उठाता है ।
११. यदि हृदय रेखा लम्बी स्पष्ट तथा सुन्दर होती है तो उस व्यक्ति को
प्रत्येक प्राणी से भरपूर प्यार तथा स्नेह मिलता है ।
१२. यदि हृदय रेखा हथेली के पास पहुंच जाती है तो वह व्यक्ति किसी के
भी प्रति अन्ध श्रद्धा का शिकार होता है ।
१३. यदि हृदय रेखा कई जगह से कटी हुई हो तो उस व्यक्ति के जीवन में
निराशा की भावना बराबर बनी रहती है ।
१४. यदि हथेली में दूसरी हृदय रेखा हो तो वह व्यक्ति जीवन में ऊंचे स्तर
पर प्रेम करता है परन्तु उसे जीवन में निराशा हाथ लगती है ।
१५. यदि हृदय रेखा के अन्त में तारे का चिह्न बना हुआ हो तो उस व्यक्ति
की मृत्यु आकस्मिक दुर्घटना से होती है ।
१६. यदि हृदय रेखा वृहस्पति पर्वत को घेर कर चलती हो तो उस व्यक्ति
में नफरत की भावना जरूरत से ज्यादा होती है ।
१७. यदि हृदय रेखा पर नक्षत्र का चिह्न दिखाई देता है तो वह व्यक्ति
आजीवन रोगी बना रहता है ।
१८. यदि हृदय रेखा के अन्तिम सिरे दो भागों में बंट जाते हैं तो ऐसा
व्यक्ति सफल न्यायाधीश सहृदय सामाजिक तथा सद्गुणों से सम्पन्न होता है ।
१९. यदि यह रेखा शनि पर्वत पर समाप्त हो जाती है तो वह व्यक्ति जरूरत
से ज्यादा कामी होता है ।
२०. यदि यह सूर्य पर्वत पर समाप्त हो जाती है तो ऐसा व्यक्ति बार-बार
धोखा खाता है ।
२१. यदि यह रेखा गुरु पर्वत के नीचे जाकर त्रिशूल की तरह बन जाती है,
तो उसका यौवन काल पागलखाने में ही व्यतीत होता है ।
२२. यदि शनि पर्वत के नीचे हृदय रेखा तथा मस्तिष्क रेखा पर क्रॉस का
चिह्न हो तो उस व्यक्ति की बहुत छोटी उम्र में मृत्यु हो जाती है ।
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२३. हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा से जितनी ही ज्यादा लम्बी, स्पष्ट और
लालिमा लिये हुए होती है उतनी ही ज्यादा श्रेष्ठ कही जाती है । ऐसा व्यक्ति विश्व-
स्तरीय सम्मान प्राप्त करता है ।
२४. दोहरी हृदय रेखा अत्यन्त उच्च पद प्राप्ति में सहायक होती है ।
२५. यदि मंगल पर्वत उभरा हुआ हो और हृदय रेखा स्पष्ट हो तो वह
व्यक्ति जीवन में जोखिम पूर्ण कार्य करता है ।
२६. यदि वर्गाकार उंगलियां हों और हृदय रेखा आगे चलकर मस्तिष्क
रेखा की ओर झुकती हो तो ऐसा व्यक्ति निम्नस्तर का होता है ।
२७. अत्यन्त छोटी हृदय रेखा व्यक्ति के दुर्भाग्य को सूचित करती है ।
२८. यदि हृदय रेखा जरूरत से ज्यादा लाल हो तो वह व्यक्ति हिंसक
होता है ।
२९. यदि यह रेखा पीलापन लिये हुए होती है तो उसे हृदय के रोग बराबर
बने रहते हैं ।
३०. यदि हृदय रेखा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तो स्वास्थ्य के मामले में
वह जीवन-भर बराबर कमजोर बना रहता है ।
३१. यदि यह रेखा बहुत अधिक पतली और लम्बी हो तो वह व्यक्ति
निस्संदेह हत्यारा होता है ।
३२. यदि हृदय रेखा हथेली के अन्तिम सिरे पर पहुंचती है, परन्तु अपने
आप में बहुत ही कमजोर होती है तो उस व्यक्ति के सन्तान नहीं होती ।
३३. यदि हृदय रेखा जंजीर के समान हो तो ऐसे व्यक्तियों का विश्वास
नहीं किया जा सकता । झूठ बोलने में ये व्यक्ति चतुर होते हैं ।
३४. यदि यह रेखा जंजीरदार हो और शनि पर्वत के नीचे जाकर समाप्त
होती हो तो उसे विपरीत सैक्स के प्रति घृणा रहती है ।
३५. यदि किसी स्त्री के हाथ में शनि पर्वत पर जाकर हृदय रेखा जंजीर
के समान बन गई हो तो वह स्त्री कुलटा होती है ।
३६. यदि यह रेखा सूर्य पर्वत के नीचे छिन्न-भिन्न हो जाती है, तो वह
व्यक्ति कमजोर होता है ।
३७. बुध पर्वत के नीचे यदि यह रेखा टूट-फूट जाती है तो उसका वैवाहिक
जीवन दुखमय होता है ।
३८. यदि हृदय रेखा से कोई शाखा निकल कर मंगल पर्वत की ओर जाती
है तो ऐसा व्यक्ति कठोर हृदय का तथा निर्दयी स्वभाव का होता है ।
३९. हृदय रेखा पर काले बिन्दु उसके विवाह में बाधा कारक माने गये हैं ।
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४०. यदि हृदय रेखा पर सफेद बिन्दु हों तो उसका वैवाहिक जीवन आदर्श
कहा जाता है ।
४१. यदि हृदय रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसे विश्व व्यापी कीर्ति
मिलती है ।
४२. यदि हृदय रेखा गुरु पर्वत पर जाकर मंगल पर्वत की ओर मुड़ जाती
है तो वह व्यक्ति मूर्ख होता है ।
४३. यदि यह रेखा चतुर्भुज के साथ कहीं पर भी समाप्त होती है तो वह
अस्थिर स्वभाव वाला माना जाता है ।
४४. यदि यह रेखा शनि पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा से मिलती हो तो
उसके जीवन में कई दुर्घटनाएं होती हैं ।
४५. यदि हृदय रेखा बुध पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा से मिलती हो तो उस
व्यक्ति की यौवन काल में ही मृत्यु हो जाती है ।
४६. यदि यह रेखा नीचे झुक कर चन्द्र पर्वत की ओर जा रही हो, या चन्द्र
पर्वत से कोई रेखा निकलकर इससे मिलती हो तो उसे जीवन में अप्रत्याशित
सफलता प्राप्त होती है ।
४७. यदि कुछ तिरछी रेखाएं हृदय रेखा को कई जगह से काटती हों तो
उसे जीवन में कई प्रकार के रोग होते हैं ।
४८. यदि हृदय रेखा से निकल कर कोई सहायक रेखा मस्तिष्क रेखा से
जुड़ जाती है तो उसमें प्रेम करने की क्षमता जरूरत से ज्यादा होती है ।
४६. यदि हृदय रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर शनि पर्वत की ओर
जाती है तो उसे प्रेम के क्षेत्र में निराशा मिलती है ।
५०. यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर हृदय रेखा को स्पर्श
करती हो तो उसका गृहस्थ-जीवन परेशानी पूर्ण होता है ।
५१. यदि शुक्र पर्वत से कोई सहायक रेखा निकल कर हृदय रेखा से
मिलती हो तो वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भोगी होता है ।
५२. यदि इस रेखा पर बुध पर्वत के नीचे क्रॉस हो तो उसे व्यापार में बार-
बार असफलता का मुंह देखना पड़ता है ।
५३. यदि इस रेखा से कई चतुर्भुज बनते हों तो उसकी प्रतिभा अत्यधिक
होती है, परन्तु अपने मामले में वह असफल रहता है ।
५४. यदि हृदय रेखा गुरु पर्वत के नीचे कई शाखाओं में बंट जाती है, तो
वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है ।
५५. यदि इस रेखा के प्रारम्भ में ही शाखा पुंज हो तो वह व्यक्ति जरूरत
से ज्यादा बोलने वाला होता है ।
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५६. यदि इस रेखा के मध्य में शाखा पुंज हो तो ऐसा व्यक्ति कट्टर एवं
घमण्डी होता है ।
५७ अगर किसी व्यक्ति के हाथ में हृदय रेखा नहीं हो तो वह निर्दयी
होता है ।
५८. यदि हृदय रेखा से किसी प्रकार की कोई सहायक रेखा नहीं निकलती
है तो ऐसे व्यक्ति को सन्तान का सुख नहीं मिलता ।
५९. यदि बिना किसी शाखा के यह रेखा गुरु पर्वत के नीचे समाप्त होती
हो तो ऐसा व्यक्ति जीवन में गरीब बना रहता है ।
६०. यदि रेखा के अन्तिम सिरे पर कोई अलग तरह का निशान हो तो वह
व्यक्ति लकवे का शिकार होता है ।
६१. यदि सूर्य पर्वत के नीचे कोई बिन्दु हो तो ऐसा व्यक्ति भावुक होता है ।
६२. बुध पर्वत के नीचे यदि कोई बिन्दु दिखाई दे तो वह प्रसिद्ध चिकित्सक
होगा ।
६३. यदि रेखा पर वृत्त का चिह्न अनुभव हो तो हृदय रेखा की दृष्टि से
कमजोर होता है ।
६४. यदि हृदय रेखा पर कोई द्वीप दिखाई दे तो उसके जीवन में कई
विश्वासघात होते हैं ।
६५. यदि भाग्य रेखा तथा हृदय रेखा दोनों का द्वीप के चिह्न दिखाई दें तो
वह व्यक्ति व्यभिचारी होता है ।
६६. हृदय रेखा पर कोई चोट का चिह्न प्रतीत हो तो उसे जीवन में असफल
प्रेम का सामना करना पड़ता है ।
६७. हृदय रेखा जितनी ही ज्यादा स्पष्ट सुन्दर और लालिमा लिये हुए होगी
वह व्यक्ति जीवन में उतनी ही ज्यादा सफलताएं एवं श्रेष्ठता प्राप्त करता है ।
वस्तुतः हृदय रेखा का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है और हस्तरेखा
विशेषज्ञ के लिए यह आवश्यक है कि वह इस रेखा का सावधानी के साथ अध्ययन
करें ।
सूर्यरेखा
अंग्रेजी में इस रेखा को 'सन लाइन' एवं हिन्दी में यश रेखा भी कहते हैं। प्रत्येक
व्यक्ति की यह सामान्य इच्छा होती है कि वह जीवन में कुछ ऐसा कार्य करे जिससे
समाज में उसके कार्यों की सराहना हो । लोग उसके विचारों को आदर दें और उसकी
मृत्यु के बाद भी उसकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। इन सबके अध्ययन के लिए सूर्य रेखा
का सहारा लेना अत्यन्त आवश्यक होता है। यह सूर्य रेखा ही मानव को उसके जीवन
में यश, मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, तथा कीर्ति दिलाने में सहायक होती है। यदि किसी
व्यक्ति के हाथ में स्वास्थ्य रेखा, हृदय रेखा और जीवन रेखा चाहे कितनी ही अधिक
पुष्ट हो परन्तु उसके हाथ में सूर्य रेखा कमजोर होती है तो उस व्यक्ति का जीवन
नगण्य-सा होकर रह जाता है। स्पष्ट गहरी और निर्दोष सूर्य रेखा ही मानव को ऊंचा
उठाने में सहायक होती है। हस्त रेखा विशेषज्ञ के लिए इस रेखा का सूक्ष्मता से अध्ययन
अत्यन्त आवश्यक है।
यद्यपि विद्वानों के अनुसार हथेली में केवल सूर्य रेखा को ही महत्त्व नहीं दिया
जाना चाहिए । क्यों कि जब तक हथेली में भाग्य रेखा प्रबल नहीं होती तब तक सूर्य
रेखा का प्रभाव विशेष नही मिलता । अतः सूर्य रेखा का अध्ययन करते समय भाग्य
रेखा पर भी विचार करना चाहिए ।
मेरे अनुभव में ऐसा आया है कि सभी व्यक्तियों के हाथों में सूर्य रेखा नहीं
होती और यह बात भी सही है कि सूर्य रेखा का उद्गम भी अलग-अलग हाथों में
अलग-अलग स्थानों से होता है। इसका प्रभाव इसकी लम्बाई तथा स्पष्टता से ही
अनुभव होती है। इसलिये हाथ देखते समय सूर्य रेखा के उद्गम पर भी विशेष ध्यान
रखना चाहिए ।
यह रेखा सूर्य पर्वत के नीचे होती है। इसकी पहचान यह है कि इस रेखा
का उद्गम चाहे कही से भी हुआ हो, परन्तु इस रेखा की समाप्ति सूर्य पर्वत पर ही होती
है। जो रेखा सूर्य पर्वत तक नहीं पहुंचती वह रेखा सूर्य रेखा नहीं कहला सकती ।
पाठकों के हित के लिए मैं इस रेखा के उद्गम स्थल स्पष्ट कर रहा हूं :
१. कुछ लोगों के हाथो में यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
जाती है ।
२. कुछ हथेलियों में यह रेखा जीवन रेखा के समाप्ति के स्थान से प्रारम्भ
होकर सूर्य पर्वत तक जाती है ।
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३. इसका उद्गम मंगल पर्वत से भी देखा गया है। यहां से प्रारम्भ होकर
यह रेखा हृदय रेखा को काटती हुई सूर्य पर्वत पर पहुंचती है।
४. कुछ हथेलियों में यह रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत को
स्पर्श करती है।
५. इसका उद्गम हृदय रेखा से भी होता देखा गया है। यहां से यह सूर्य पर्वत
तक जाती है।
६. कभी-कभी यह रेखा हर्षल क्षेत्र से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक पहुंच
जाती है।
७. कभी-कभी यह रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत की ओर
जाती हुई दिखाई देती है।
८. कुछ हाथों में यह रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत पर मार्ग की
सभी रेखाओं को काटती हुई जा पहुंचती है।
९. हथेली में इस रेखा को केतु पर्वत से प्रारम्भ होकर भी अनामिका के मूल
तक पहुंचते हुए देखा गया है।
१०. कई बार इस रेखा का उद्गम राहू क्षेत्र से भी देखा गया है।
११. कुछ हथेलियों में यह रेखा हथेली के बीच में से प्रारम्भ होकर सूर्य
पर्वत पर पहुंच जाती है।
१२. कुछ हथेलियों में यह रेखा बुध पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
पहुंचने में सक्षम होती है।
जहां तक मेरी जानकारी है, इस रेखा के उद्गम यहीं हैं। परन्तु इसके अलावा
भी इस रेखा के उद्गम हो सकते हैं, परन्तु पाठकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि
सूर्य रेखा वही मानी जा सकती है जिसकी समाप्ति सूर्य पर्वत पर होती है।
अब मैं प्रत्येक उद्गम स्थल से प्रारम्भ होने वाली सूर्य रेखा का संक्षेप में
वर्णन स्पष्ट कर रहा हूं :
१. प्रथमा अवस्था : यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
पहुंचती है। ऐसी रेखा अपने आप में अत्यन्त अनुकूल मानी जाती है। ऐसी रेखा
रखने वाला व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता है। जीवन में पत्नी के अलावा
अन्य कई स्त्रियों से सम्पर्क रहता है और उनसे धन-लाभ करता है अथवा ऐसे
व्यक्ति को ससुराल से विशेष धन प्राप्त होता है। सही शब्दों में कहा जाय तो ऐसे व्यक्ति
का भाग्योदय विवाह के उपरांत ही होता है और अधिकतर ऐसे लोगों के भाग्योदय
प्रेमिका के माध्यम से होते देखे गये हैं। कई बार ऐसे व्यक्ति गोद चले जाते हैं जिससे
उन्हें विशेष धन-प्राप्ति हो जाता है।
२. द्वितीयावस्था : बहुत कम हाथों में ऐसी रेखा देखने को मिलती हैं परन्तु
जिन लोगों के हाथों में ऐसी रेखा होती है वे व्यक्ति उच्च कोटि के कलाकार तथा
भावुक होते हैं साथ ही कला के माध्यम से धन-संचय करते हैं। उनका भाग्य अपने
आप में उज्ज्वल होता है। स्वभाव से ये व्यक्ति रसिक मिलनसार तथा सम्मोहक
व्यक्तित्व वाले होते हैं।
३. तृतीयावस्था : इस प्रकार की सूर्य रेखा जिन हथेलियों में होती है वे
व्यक्ति मिलिट्री में या पुलिस विभाग में उच्च पद पर पहुंचते हैं तथा अपने कार्यों से
राज्यस्तरीय अथवा राष्ट्रस्तरीय सम्मान प्राप्त करते हैं। यद्यपि ऐसे व्यक्ति अपने ही
प्रयत्नों से सफलता प्राप्त करते हैं, परन्तु धीरे-धीरे परिश्रम करते हुए अन्त में अपने
लक्ष्य तक पहुंच जाते हैं।
४. चतुर्थावस्था : ऐसे व्यक्ति प्रमुखः बुद्धिजीवी होते हैं। इसके अन्तर्गत
उच्च कोटि के वैज्ञानिक तथा तार्किक एवं दार्शनिक व्यक्ति होते हैं। ये जीवन में चाहे
किसी भी प्रकार का कार्य प्रारम्भ करें इन्हें पूरी सफलता मिलती है और प्रत्येक
क्षेत्र मे वे अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रयोग करते हैं। इनके कार्य अपने आप में महत्त्व-
पूर्ण होते हैं। जीवन के २८ वें वर्ष से इनका भाग्योदय होता है तथा समाज में इनको
विशेष सम्मान तथा यश प्राप्त होता है।
५. पंचमावस्था : जिन हथेलियो में इस प्रकार की रेखा होती है, वे अपने
जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। यद्यपि यह बात सही है कि इनका प्रारम्भिक
जीवन जरूरत से ज्यादा कष्टमय होता है परन्तु अपने प्रयत्नों से ये इतनी अधिक
प्रगति कर लेते हैं कि लोग दांतो तले उंगली दबाते हैं। जीवन के १५ वर्षों के बाद
इनका सम्मान और ख्याति अत्यन्त उच्च स्तर का हो जाता है। इनके कार्य चमत्कार-
पूर्ण ढंग से सम्पन्न होते हैं तथा जीवन में और मृत्यु के बाद भी इन्हें अक्षुण्ण यश
मिलता है। परन्तु यदि यह रेखा मार्ग में ही टूट जाती है तो उसे जीवन में बदनामी
का भी सामना करना पड़ता है।
६. षष्ठावस्था : ऐसे व्यक्ति को जीवन में बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता
है। न तो उसे जीवन में व्यवस्थित ढंग से शिक्षा मिलती है और न उसे जीवन में
ऊंचा उठाने में कोई सहायता देता है। ऐसे व्यक्ति जीवन में जो भी उन्नति करते हैं
अपने प्रयत्नों से ही कर पाते हैं। फिर भी आगे चलकर ये व्यक्ति न्यायाधीश बैरिस्टर
अथवा प्रमुख शिक्षा-शास्त्री बन जाते हैं। जीवन में कई बार विदेश यात्राएं करते हैं
तथा विदेश में प्रेम सम्बन्ध के कारण बदनामी भी सहन करनी पड़ती है।
७. सप्तावस्था : ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय विवाह के बाद ही होता है।
विवाह के बाद ये व्यक्ति आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करते हैं। अपने कार्यों में सफ-
लता प्राप्त करते हैं, तथा अपने लक्ष्य तक पहुंचने की योग्यता जुटा पाते हैं। ऐसे व्यक्ति
भावुक सहृदय एवं रसिक होते हैं। शान-शौकत, दिखावा आदि इनको प्रिय लगता है।
आडम्बर-प्रिय ये व्यक्ति अपने चारों ओर भ्रम का वातावरण बनाये रखते हैं।
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८. अष्टमावस्था : बहुत ही कम लोगों के हाथों में इस प्रकार की सूर्य रेखा
देखने को मिलती है । ऐसे व्यक्तियों के जीवन में धन, मान, पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, यश,
कीर्ति आदि का कोई प्रभाव नहीं रहता । ये व्यक्ति सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने
वाले तथा धर्म में पूरी आस्था रखने वाले होते हैं । ऐसे व्यक्ति उच्च कोटि के
व्यापारी एवं सफल साहित्यकार होते हैं ।
६. नवमावस्था : यह रेखा सुन्दर, स्पष्ट और लालिमा लिये हुए जिस व्यक्ति
की हथेली में होती है उस व्यक्ति का बचपन अत्यन्त सुखमय व्यतीत होता है । उसके
जीवन में धन, ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं रहती । जीवन में ऐसे लोगों को बहुत अधिक
परिश्रम नहीं करना पड़ता । थोड़े से प्रयत्नों से ही इनको जीवन में सफलताएं मिलती
रहती हैं । ऐसे व्यक्ति ऊंचे स्तर के व्यापारी होते हैं । परन्तु इन लोगों में एक कमी
यह होती है कि इनका सम्बन्ध निम्नस्तर के व्यक्तियों से विशेष होता है, जिसकी
वजह से समाज में इनका सम्मान कुछ कम होता है । परन्तु ये अपने जीवन में न तो
समाज की परवाह करते हैं और न अपने ऊपर किसी प्रकार का अंकुश ही मानते हैं ।
१०. दशमावस्था : जिन हथेलियों में इस प्रकार के यश रेखा, या सूर्य रेखा
देखने को मिलती है वे व्यक्ति चतुर तथा उत्साही होते हैं । बात के मूल में ये तुरन्त
पहुंच जाते हैं, और सामने वाले व्यक्ति के चेहरे को देख कर ही उसके मन के भावों
को पहिचान लेते हैं । जीवन में ये स्वतंत्र प्रकृति से बने रहते हैं । एक बार ये जो भी
निर्णय ले लेते हैं, उस पर पूरी तरह से अमल करते हैं । जीवन में ऐसे व्यक्ति सफल
एवं श्रेष्ठ मित्र कहे जा सकते हैं ।
११. एकादशावस्था : जिन लोगों के हाथों में यह रेखा पाई जाती है, वे
व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली होते हैं, उनको जीवन में कई बार आकस्मिक धन-लाभ होता
है । समाज में भौतिक दृष्टि से इनके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती
सभी दृष्टियों से ये व्यक्ति सुखी और सफल कहे जाते हैं ।
१२. द्वादशावस्था : बहुत कम व्यक्तियों के हाथों में इस प्रकार की सूर्य रेखा
देखने को मिलती है, जिन व्यक्तियों के हाथों में ये रेखा होती है वे सफल अभिनेता
होता है, तथा अपनी कला के माध्यम से अतुल्य धन तथा यश प्राप्त करते हैं ।
अब मैं सूर्य से सम्बन्धित कुछ नए तथ्य पाठकों के सामने स्पष्ट कर रहा हूं :
१. लम्बी स्पष्ट और सीधी सूर्य रेखा व्यक्ति को यश, मान, प्रतिष्ठा दिलाने
में सहायक होती है ।
२. यदि दोनों हाथों में यह रेखा स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण
सफलता प्राप्त करता है ।
३. यदि यह रेखा बिना कहीं से कटे हुए अपनी पूरी लम्बाई लिये हुए हो तो
उसके जीवन में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती ।
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४. छोटी सूर्य रेखा व्यक्ति के जीवन में परिश्रम एवं संघर्ष के बाद ही
सफलता देने में सहायक होती है ।
५. सूर्य रेखा जिस जगह कट जाती है आयु के उस भाग में वह व्यक्ति अपना
व्यापार अथवा कार्य बदल लेता है ।
६. यदि हथेली गहरी हो और सूर्य रेखा स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति की प्रतिभा
का सही रूप में उपयोग नहीं हो पाता ।
७. यदि यह रेखा पतली या फीकी हो तो वह व्यक्ति अपनी कला का पूरा-
पूरा उपयोग नहीं कर पाता ।
८. यदि सूर्य रेखा के मार्ग में द्वीप के चिह्न हों तो वह जीवन में दिवालिया
होता है तथा उसको समाज से अपयश मिलता है ।
६. यदि हथेली में वृहस्पति पर्वत उभरा हुआ हो और सूर्य रेखा गहरी हो तो
उस व्यक्ति के संबंध अत्यन्त ऊंचे स्तर के व्यक्तियों से होते हैं ।
१०. यदि सूर्य रेखा पर तारे का चिह्न हो तो वह व्यक्ति अपनी कला के
माध्यम से विश्वव्यापी सफलता प्राप्त करता है ।
११. हथेली में जिस स्थान पर सूर्य रेखा सबसे अधिक गहरी हो आयु के उस
भाग में वह व्यक्ति विशेष धन लाभ प्राप्त करता है ।
१२. यदि सूर्य रेखा की समाप्ति पर बिन्दु का चिह्न हो तो उसे जीवन में
बहुत अधिक कष्ट उठाना पड़ता है और अन्त में सफलता मिलती है ।
१३. यदि हथेली में सूर्य रेखा पतली हो परन्तु सीधी और स्पष्ट हो तो वह
व्यक्ति समृद्धिवान होता है ।
१४. यदि सूर्य रेखा के अन्त में नक्षत्र का चिह्न हो तो उसे राष्ट्रव्यापी
सम्मान मिलता है ।
१५. यदि सूर्य रेखा के प्रारम्भ में और अन्त में नक्षत्र का चिह्न हो तो उसे
जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती ।
१६. यदि सूर्य रेखा की समाप्ति कई छोटी-छोटी रेखाओं से हो तो उसे
जीवन में असफलता ही मिलती है ।
१७. यदि सूर्य रेखा की समाप्ति किसी तिरछी रेखा से हो तो वह जीवन में
भली प्रकार से प्रगति नहीं कर पाता ।
१८. यदि सूर्य रेखा की समाप्ति पर क्रॉस का चिह्न हो तो व्यक्ति का अन्त
अत्यन्त दुखमय होता है ।
१६. यदि सूर्य रेखा कई जगह से टूटी हुई हो तो उसमें प्रतिभा तो होती है
परन्तु उसके माध्यम से न तो वह श्रेष्ठ धन लाभ कर सकता है और न उसे उच्च
कोटि का सम्मान ही मिलता है ।
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२०. यदि सूर्य रेखा हाथ में नहीं हो तो उस व्यक्ति का जीवन लगभग बेकार
रहता है ।
२१. यदि सूर्य रेखा पर वर्ग का चिह्न हो तो उसे जीवन में कई बार अपमान
सहन करना पडता है ।
२२. यदि दोनों ही हाथों में यह रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ होती हो तो वह
कला के माध्यम से सफलता प्राप्त करता है ।
२३. यदि सूर्य रेखा का अन्त दो धाराओं से होता हो या अन्त में यह रेखाएं
दो भागों में बंट जाती हो तो समाज में उसे सम्मान नहीं मिलता ।
२४. यदि सूर्य रेखा के साथ-साथ कई ओर सहायक रेखाएं दिखाई दें तो
वह जीवन में आश्चर्यजनक प्रगति प्राप्त करता है ।
२५. यदि विवाह रेखा के द्वारा सूर्य रेखा कटी हुई हो तो उसका गृहस्थ-
जीवन पूर्णतः दुखदायी होता है ।
२६. यदि सूर्य रेखा से कोई एक रेखा मस्तिष्क रेखा की ओर जाती हो तो
उसे जीवन में पूर्ण धन-लाभ रहता है ।
२७. यदि इस रेखा पर चतुर्भुज का चिह्न हो तो उसे प्रारम्भ में बहुत ज्यादा
असफलताएं मिलती हैं परन्तु अन्त में पूर्ण सफलता मिल जाती है ।
२८. यदि इस रेखा को तीन-चार रेखाएं काटती हों तो वह जीवन में किसी
भी कार्य में सफल नहीं होता ।
२६. यदि शनि पर्वत से कोई रेखा निकलकर सूर्य रेखा को काटती हो तो
आर्थिक कमी की वजह से वह जीवन में सफल नहीं हो पाता ।
३०. यदि यह रेखा स्पष्ट हो पर साथ में कुछ लहरदार रेखाएं दिखाई दें
तो उस व्यक्ति की प्रतिभा का कोई उपयोग नहीं होता ।
३१. यदि सूर्य रेखा गहरी हो और इसके दोनों ओर जो सहायक रेखाएं चल
रही हो तो उस व्यक्ति को उच्चस्तरीय सम्मान मिलता है ।
३२. यदि सूर्य रेखा से कोई शाखा निकलकर शनि पर्वत की ओर जाती है तो
उस पर्वत के विशेष गुण व्यक्ति को प्राप्त होते हैं ।
३३. यदि सूर्य रेखा से कोई शाखा निकलकर गुरु पर्वत पर पहुंचे तो उस
व्यक्ति को जीवन में श्रेष्ठ राज्य पद प्राप्त होते है ।
३४. यदि इस रेखा के आस-पास बहुत सी छोटी-छोटी रेखाएं दिखाई दें तो
उसके जीवन में आर्थिक बाधा रहती है ।
३५. यदि हृदय रेखा से निकलकर कोई शाखा त्रिशूल वत बन कर सूर्य रेखा
को स्पर्श करे, तो ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं के प्रयत्नों से ही सफलता प्राप्त
करता है ।
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३६. यदि अनामिका उंगली टेढ़ी-मेढ़ी हो पर सूर्य रेखा स्पष्ट हो तो उसे
अपराध पूर्ण कार्यों से यश मिलता है ।
३७. यदि सूर्य रेखा के अन्त में तीन रेखाएं दिखाई दें तो उसके जीवन में
आर्थिक दृष्टि से कोई कमी नहीं रहती ।
३८. यदि यह रेखा बार-बार टूट कर बढ़ रही हो तो वह अपने आलस्य के
कारण ही सफलता प्राप्त नहीं कर पाता है ।
३६. यदि यह रेखा जंजीरदार हो तो उस व्यक्ति के जीवन में काफी बाधाएं
रहती हैं।
४०. यदि यह रेखा टेढ़ी-मेढ़ी हो तो उस व्यक्ति के कार्य ही उसके जीवन
में बाधाएं उत्पन्न करते हैं ।
४१. यदि हथेली में भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा दोनों ही श्रेष्ठ हों तो उसका
जीवन सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ होता है ।
४२. यदि रेखा के अन्त में द्वीप हो तो वह जीवन-भर बीमार बना रहता है
वस्तुतः सूर्य रेखा व्यक्ति के जीवन को और उसके भाग्य को समझने के लिए
बहुत अधिक उपयोगी है । अतः हस्तरेखा विशेषज्ञ को सूर्य रेखा का अत्यन्त सूक्ष्मता
से और गहराई से अध्ययन करना चाहिए ।
भाग्य रेखा
यदि मानव के जीवन में सब कुछ होता है पर यदि उसका भाग्य साथ नहीं
देता है तो एक प्रकार से उसका पूरा जीवन व्यर्थ कहा जाता है। चाहे व्यक्ति के पास
भव्य व्यक्तित्व, हो चाहे हृदय से वह कितना ही उदार हो, चाहे स्वास्थ्य की दृष्टि
से उसमें सभी प्रकार की श्रेष्ठता हो, परन्तु यदि उसका भाग्य उसे साथ नहीं देता है
तो उसका जीवन एक प्रकार से निष्क्रिय हो जाता है। कहा जाता है कि यदि व्यक्ति
का भाग्य साथ देता हो और यदि वह मिट्टी भी छू ले तो वह सोना बन जाती है।
इसके विपरीत यदि भाग्य साथ नहीं देता तो सोने को भी स्पर्श करने पर वह मिट्टी
के समान हो जाता है।
वस्तुतः जीवन में भाग्य का महत्त्व सबसे अधिक माना गया है। इसीलिए
हाथ में भी भाग्य रेखा या प्रारब्ध रेखा को महत्त्व दिया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'फेट
लाइन' कहते हैं। यह रेखा जितनी अधिक गहरी, स्पष्ट और निर्दोष होती है उसका
भाग्य उतना ही ज्यादा श्रेष्ठ कहा जाता है। यदि व्यक्ति के हाथ में सभी रेखाएं
दूषित एवं कमजोर हो परन्तु यदि उसकी भाग्य रेखा अपने आप में अत्यन्त श्रेष्ठ हो
तो यह बात निश्चित है कि उसकी ये सारे दुर्गुण छिप जाते हैं और वह जीवन में पूर्ण
प्रगति करने में समर्थ हो पाता है। अतः हस्त रेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली
का अध्ययन करते समय भाग्य रेखा का सावधानी से अध्ययन करे।
सभी हाथों में यह भाग्य रेखा नहीं पाई जाती है और मेरा तो यह अनुभव
है कि लगभग ५० प्रतिशत हाथों में भाग्य रेखा का अभाव ही होता है। परन्तु मेरे
कथन का यह अभिप्राय नहीं लिया जाना चाहिए कि जिसके हाथ में भाग्य रेखा नहीं
होती वह व्यक्ति भाग्यहीन होता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भाग्य रेखा के
अभाव में प्रयत्न करने पर भी व्यक्ति को पूर्ण सफलता नहीं मिल पाती। भाग्य रेखा
होने से व्यक्ति थोड़ी-सी प्रतिभा और परिश्रम से ही कार्य को अपने मनोनुकूल बना
लेता है।
इस रेखा को शनि रेखा भी कहा जाता है क्योंकि इस रेखा की समाप्ति शनि
पर्वत पर होती है। यद्यपि यह रेखा व्यक्ति के हाथों में अलग-अलग स्थानों से प्रारम्भ
होती है परन्तु इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर ही होती देखी गई है। इसलिए
भी इसको शनि रेखा के नाम से पुकारते हैं।
( १३२ )
जिन हाथों में यह रेखा कमजोर होती है या नहीं होती है उन व्यक्तियों की
उन्नति तो होती है परन्तु उनकी उन्नति में भाइयों, सम्बन्धियों या रिश्तेदारों का किसी
प्रकार का कोई सहयोग उसे उसके जीवन में नहीं मिलता । इस प्रकार से वह जो
भी प्रगति करता है स्वयं के प्रयत्नों से ही कर पाता है। ऐसे लोगों को न तो समाज
से किसी प्रकार का कोई सहयोग मिलता है और न परिवार से ही सहायता मिलती
है । जिन लोगों के हाथों में शनि रेखा का अभाव हो तो यह समझ लेना चाहिए कि
इसके जीवन में जो भी दिखाई दे रहा है वह सब इसके प्रयत्नों से ही संभव हुआ है ।
यह रेखा नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है जैसा कि मैंने स्पष्ट किया है कि
हथेली में इस रेखा के उद्गम स्थान अलग-अलग होते हैं परन्तु इस रेखा की समाप्ति
शनि पर्वत पर ही जाकर होती है। इस रेखा के माध्यम से मानव की इच्छाएं, भावनाएं
उसका बौद्धिक एवं मानसिक स्तर तथा उसकी क्षमताओं का अनुमान हो जाता है ।
भाग्य रेखा के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्ति जीवन में कितनी
प्रगति करेगा। इसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से क्या स्थिति होगी ? क्या इसको
जीवन, में धन, मान, पद प्रतिष्ठा आदि मिल सकेंगे ? क्या इसका जीवन परेशानियों
से भरा हुआ है ? क्या यह व्यक्ति अपने जीवन में इन बाधाओं को पार कर सफलता
प्राप्त कर सकता है ? ये सारे तथ्य भाग्य रेखा के माध्यम से ही जाने जा सकते हैं ।
मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत होता है । हथेली के किसी भी स्थान से
कोई भी रेखा प्रारम्भ होकर शनि पर्वत को स्पर्श कर लेती है तो वह भाग्य रेखा
कहलाने लगती है । हथेली के भिन्न-भिन्न स्थानों से प्रारंभ होने के कारण भाग्य रेखा
का महत्त्व भी भिन्न-भिन्न हो जाता । इसलिये भाग्य रेखा का उद्गम तथा उसकी
समाप्ति दोनों ही बिन्दुओं का भलीभांति सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिये ।
यदि यह रेखा कहीं से भी प्रारम्भ होकर बिना किसी अन्य रेखा का सहारा
लिये शनि पर्वत पर पहुंच जाती है तो निःसन्देह ऐसी रेखा प्रबल भाग्य वर्द्धक एवं
श्रेष्ठ मानी जाती है परन्तु यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत को पार कर मध्यमा उंगली
के पौर तक पहुंचने की कोशिश करती है तो ऐसी रेखा दूषित कहलाती है ।
ऊपर मैने भाग्य रेखा के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट किये हैं । मेरे अनुभव के
आधार पर भाग्य रेखा का उद्गम निम्न प्रकार से हो सकते हैं :
१. हथेली में भाग्य रेखा मणिबन्ध के ऊपर से निकल कर अन्य रेखाओं का
सहारा लेती हुई शनि पर्वत तक पहुंचती है ।
२. कई बार यह रेखा जीवन रेखा के पास में से निकल कर शनि क्षेत्र पर
पहुंच जाती है ।
३. भाग्य रेखा शुक्र पर्वत से भी निकल कर शनि पर्वत तक पहुंचती है ।
४. कभी-कभी यह रेखा मंगल पर्वत से भी निकलती हुई दिखाई दी है ।
( १३३ )
५. यह रेखा जीवन रेखा को काटती हुई शनि पर्वत तक पहुंचने का प्रयास
भी करती है।
६. कुछ हाथों में मैंने भाग्य रेखा राहू क्षेत्र से भी निकलती हुई देखी है।
७. भाग्य रेखा हृदय रेखा से निकलकर शनि पर्वत को स्पर्श करती हुई
अनुभव की है।
८. कई बार यह रेखा नेपच्यून क्षेत्र तक शनि पर्वत तक जाती है।
६. कुछ हाथों में यह रेखा चन्द्र पर्वत से भी निकलती है।
१०. हर्षल क्षेत्र से भी इस रेखा का प्रारम्भ देखा जा सकता है।
११. कई बार यह रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारम्भ होकर शनि पर्वत की ओर
जाती है।
ऊपर मैंने भाग्य रेखा के ग्यारह उद्गम स्थान बताये हैं। अधिकतर हाथों में
उद्गम स्थल इसी प्रकार के दिखाई देते हैं। परन्तु इसके अलावा भी उद्गम स्थल हो
सकते हैं।
आगे के पृष्ठों में मैं इन उद्गम स्थलों से संबंधित भविष्यफल स्पष्ट कर
रहा हूं :
१. प्रथमा अवस्था :— इस प्रकार की भाग्य रेखा सर्वात्मक कहलाती है। यह
रेखा जितनी अधिक स्पष्ट गहरी और निर्दोष होगी उतनी ही अच्छी कही जायेगी और
उतना ही श्रेष्ठ मिल सकेगा। इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि भाग्य रेखा
शनि पर्वत तक पहुंचती है तो वह शुभ कहलाती है। परन्तु यदि शनि पर्वत को पार
कर मध्यमा उंगली पर चढ़ने लग जाती है तो वह विपरीत फल देने लग जाती है
कुछ हाथों में मैंने यह भाग्य रेखा मध्यमा रेखा के दूसरे पौर तक पहुंचते हुए देखा है
परन्तु इस प्रकार की रेखा बनने का यह तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति में महत्त्वा-
कांक्षाएं तथा इच्छाएं जरूरत से ज्यादा होंगी परन्तु वह अपने जीवन में अपनी
इच्छाओं को पूरी होते हुए नहीं देख पाता। यह बढ़ी हुई भाग्य रेखा व्यक्ति बने
बनाये कार्य को बिगाड़ देती है।
परन्तु इस प्रकार की यह रेखा मध्यमा उंगली पर न चढ़े अपितु शनि क्षेत्र
तक ही जाकर रुक जाय तो ऐसी रेखा शुभ फलदायक कही जाती है। यदि भाग्य रेखा
शनि क्षेत्र तक जाते-जाते दुमुंही हो जाती है तो यह विशेष सफलता का सूचक है।
यदि भाग्य रेखा के अन्तिम बिन्दु पर दो सिराएं फटकर एक सिरा शनि पर्वत पर
रुकता है और दूसरा सिरा गुरु पर्वत तक पहुंच जाय तो वह व्यक्ति अपने जीवन में
बहुत अधिक ऊंचे पद पर पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति सामान्य घराने में जन्म लेकर भी
उच्चपद प्राप्त होते देखा गया है।
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यदि भाग्य रेखा को शनि पर्वत पर तिरछी रेखाएं काटती हों तो उसे अपने
जीवन में बाधाएं देखने को मिलती हैं । बहुत अधिक बाधाओं के बाद भी वह अपने
जीवन में सफल हो पाता है । ये बाधक रेखाएं जितनी ही कम होती हैं उतनी ही
ज्यादा अच्छी मानी जाती हैं ।
यदि भाग्य रेखा का उद्गम मणिबन्ध के नीचे से हो तो ऐसी रेखा भी दोष-
पूर्ण मानी जाती है । ऐसे व्यक्ति दरिद्र तथा भाग्यहीन जीवन व्यतीत करते हैं ।
२. द्वितीयावस्था :—सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार इस प्रकार की रेखा भी
श्रेष्ठ मानी गई हैं । परन्तु यदि इस प्रकार की रेखा मध्यम उंगली पर चढ़ने का प्रयत्न
करे तो यह बाधाओं को पैदा करने वाली मानी गई है । ऐसे व्यक्ति साहसी होते हुए
भी परेशानियों से घिरे रहते हैं । ऐसे व्यक्तियों को जीवन में सफलता बहुत मुश्किल
से मिलती है ।
जिसके हाथ में इस प्रकार की रेखा शनि पर्वत पर पहुंच जाती है तो यद्यपि
वह व्यक्ति बचपन में परेशानियां उठाता है परन्तु आगे चलकर वह अपने प्रयत्नों से
उन्नति करता है । और २८वें वर्ष में उसका पूर्ण भाग्योदय होता है ।
ऐसे व्यक्ति संकोची स्वभाव के होते हैं तथा तुरन्त निर्णय लेने में समर्थ नहीं
हो पाते । यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति
के जीवन में कई बार बाधाएं आती हैं । और अत्यन्त परिश्रम के बाद भी वह जीवन
में सफल हो पाता है ।
यदि भाग्य रेखा के साथ-साथ जीवन रेखा भी बढ़ रही हो तो ऐसी रेखा शुभ
नहीं मानी जाती । जीवन रेखा और भाग्य रेखा का परस्पर मिलना या आपस में
लिपटना ही अनुकूल नहीं कहा जाता ।
३. तृतीयावस्था :—यह रेखा जितनी स्पष्ट होती है उतना ही ज्यादा शुभ
माना जाता है । ऐसी भाग्य रेखा जीवन रेखा को काट कर ही आगे बढ़ती है परन्तु
जिस जगह वह जीवन रेखा को काटती है । जीवन की उस अवधि में उसे बहुत अधिक
परेशानियों का सामना करना पड़ता है । ऐसी स्थिति होने पर वह व्यक्ति भयंकर
दुर्घटना में घायल हो सकता है । दिवालिया हो सकता है, अथवा आत्महत्या कर
सकता है ।
यह रेखा शुक्र पर्वत से निकलती है अतः यह बात सही समझनी चाहिए कि
उस व्यक्ति का भाग्योदय विवाह के बाद ही होता है । ऐसा व्यक्ति प्रेम के क्षेत्र में
बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा होता है । तथा ससुराल से बहुत अधिक धन मिलता है । ऐसे
व्यक्ति की स्त्री सुन्दर, आकर्षक तथा तड़क-भड़क से रहने वाली होती है ।
परन्तु ऐसे व्यक्तियों का बुढ़ापा बहुत कष्ट का होता है । उनका वैवाहिक
जीवन भी सुखमय नहीं माना जाता । इस प्रकार की भाग्य रेखा के बीच में यदि द्वीप
का चिह्न दिखाई दे तो पति पत्नी मतभेद की वजह से एक साथ नहीं रह पाते ।
( १३५ )
४. चतुर्थावस्था :—यह भाग्य रेखा भी शुभ मानी गई है, परन्तु इसका
भाग्योदय यौवनावस्था के बाद ही होता है। शिक्षा के क्षेत्र में इसको बार-बार बाधाएं
देखनी पड़ती है तथा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता।
यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा के साथ कोई सहायक रेखा न हो तो व्यक्ति
जीवन में अपनी ही की हुई गलतियों पर पछताता रहता है। मित्रों का सहयोग उसे
नहीं मिल पाता जीवन में उन्नति के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उसका
भाग्योदय अत्यधिक विलम्ब से होता है और किसी के सहयोग से ही यह उन्नति कर
पाता है ऐसा व्यक्ति पुलिस या मिलिट्री विभाग में विशेष उन्नति कर सकता है।
यदि यह रेखा मार्ग में टूट गई हो तो व्यक्ति को अपने जीवन में बार-बार
बाधाओं का सामना करना पड़ता है यदि इस रेखा पर द्वीप हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य-
हीन होता है।
५. पंचमावस्था :—यह रेखा हथेली में अनुकूल कही जाती है, परन्तु यह यदि
मध्यमा उंगली के छोर पर पहुंचने का प्रयत्न करती है तो वह व्यक्ति जीवन में
सफलता नहीं प्राप्त कर पाता। यद्यपि यह आगे बढ़ने के लिए बराबर प्रयत्न करता रहेगा
परन्तु उसे जीवन में बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है किसी महत्त्वपूर्ण
व्यक्ति के सहयोग से ही यह उन्नति कर सकता है।
जीवन के मध्य काल में ये व्यक्ति विकास करते हैं, ऐसे व्यक्ति सफल चित्र-
कार अथवा साहित्यकार होते हैं, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति किसी
एक क्षेत्र में पारंगत होते हैं।
यदि ऐसी रेखा जीवन रेखा के आगे बढ़ने पर टूटी हुई हो या लहरदार बन
गई हो तो उस व्यक्ति की उन्नति नहीं हो पाती, और निरन्तर अपने भाग्य को कोसता
रहता है। यदि ऐसी रेखा को आड़ी या तिरछी रेखाएं काटे तो उस जीवन में बाधाओं
का सामना करना पड़ता है, ऐसे व्यक्ति सफल देश भक्त होते हैं तथा इनकी वृद्धावस्था
अत्यन्त सुखमय होता है।
६. षष्ठावस्था:—जिसके हाथ में इस प्रकार की भाग्य रेखा होती है वह अत्यन्त
सौभाग्यशाली माना जाता है, इस प्रकार के व्यक्ति का भाग्योदय ३६वें वर्ष के बाद
से ही होता है जीवन के ३६ से ४२वें वर्ष के बीच आश्चर्यजनक रूप से उन्नति
करता है।
ऐसे व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्टदायक होता है, परन्तु उसका
यौवनकाल और उसकी वृद्धावस्था अत्यन्त सुखकर मानी जाती है, और अपने जीवन के
उत्तरकाल में उसे धन, मान, यश, प्रतिष्ठा, आदि प्राप्त होती हैं।
यदि ऐसी रेखा बीच बीच में टूटी हुई हो तो उसके भाग्य में बाधाएं आती
हैं और यदि उस रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य हीन कहा जाता है
यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर गुरू पर्वत की ओर जाती हो तो वह
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व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है ।
७. सप्तमावस्था :—हृदय रेखा से निकलने वाली यह भाग्य रेखा सीधी शनि
पर्वत तक पहुंच जाती है पर कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा आगे चलकर त्रिशूल की
तरह बन जाती है जिसका एक सिरा सूर्य पर्वत की ओर दूसरा हिस्सा गुरु पर्वत की
ओर जाता है । ऐसी भाग्य रेखा अत्यन्त शुभ मानी गई हैं । यदि इस प्रकार की भाग्य
रेखा अन्त मे जाकर दो टुकड़ों में बंट जाय तो वह व्यक्ति अपने जीवन में अपूर्व धन
मान, यश, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ।
ऐसा व्यक्ति सहृदय होता है अपने जीवन में वह निरन्तर दूसरों की सहायता
करता रहता है । वह अपने प्रयत्नों से लाखो करोड़ों रुपये कमाता है और धार्मिक कार्यों
में खर्च भी करता है । यदि इस रेखा के प्रारम्भ में द्वीप का चिह्न हो तो उसे अपने
जीवन में बहुत बड़ी बदनामी उठानी पड़ती, है यदि यह रेखा बीच में टूटी हुई हो तो
आयु के उस भाग में उसे विशेष आर्थिक हानी सहन करनी पड़ती है, यदि इस रेखा
पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति को जीवन में कई बार संघर्षों का सामना
करना पड़ता है और अत्यन्त कठिनाई के बाद ही वह सफलता प्राप्त कर पाता है ।
यदि इस रेखा के अन्तिम स्थान पर तारे का चिह्न हो तो उसकी अकाल
मृत्यु होती है । यदि यह रेखा मध्यमा उंगुली पर चढ़ने का प्रयत्न करें तो वह जीवन
में बराबर असफलता का सामना करता है ।
८. अष्टमावस्था : यदि यह रेखा निर्दोष स्पष्ट और गहरी हो तो उस व्यक्ति
का बचपन अत्यन्त सुखमय व्यतीत होता है । विद्या की दृष्टि से वह श्रेष्ठ विद्या प्राप्त
करता है । इस प्रकार के बालक की बुद्धि तेज होती है और वे अपने स्वतंत्र विचारों
के कारण पहिचाने जाते हैं । यद्यपि परिवार से इनको किसी प्रकार का कोई विशेष
सहयोग नहीं मिलता । फिर भी ये प्रयत्न करके सफलता की ओर बढ़ जाते हैं। ऐसे
व्यक्ति सफल साहित्यकार न्यायाधीश अथवा दार्शनिक होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ
जीवन पूर्णतः सुखमय कहा जा सकता है ।
विदेश यात्रा का योग इनके जीवन में कई बार होता है परन्तु इस प्रकार की
भाग्य रेखा टूटी हुई या लहरदार हो तो उस व्यक्ति के जीवन में सफलता के अवसर कम
रहते हैं । उसे जीवन में बार बार संघर्ष करना पड़ता है बहुत अधिक प्रयत्न के बाद
ही सफलता मिल पाती है । यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा अन्त में जाकर दो मुही
बन जाती है तो यह श्रेष्ठ संकेत है, और ऐसा व्यक्ति निश्चय ही अपने उद्देश्यों में
सफल होता है ।
६. नवमावस्था : इस प्रकार की भाग्य रेखा को अत्यन्त शुभ माना गया है ।
यदि यह रेखा शनि पर्वत पर जाकर दो भागों में या तीन भागो में बंट जाती है तो
वह व्यक्ति अतुलनीय धन का स्वामी होता है तथा जीवन में पूर्ण प्रगति करता है ।
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ऐसे व्यक्ति के जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं। यदि इस प्रकार की भाग्य
रेखा का अन्तिम सिरा गुरु पर्वत की ओर जा रहा हो तो वह व्यक्ति साहित्य के माध्यम
से श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है। यदि इस प्रकार का सिरा सूर्य पर्वत की ओर जाता हो
तो वह विदेश में व्यापार कर पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़
कर हिस्सा लेता है तथा समाज में उसे सम्माननीय स्थान मिलता है।
यदि इस प्रकार की रेखा टूटी हुई या जंजीरदार हो तो उसे जीवन में बहुत
अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि यह रेखा मध्यमा उंगली की पोर
पर चढ़ रही हो तो उसे जीवन में जरूरत से ज्यादा हानि सहन करनी पड़ती है।
जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसी भाग्य रेखा होती है उनका भाग्योदय विवाह के
बाद ही होता है। उनका मन अस्थिर तथा वृत्ति चंचल होती है। जीवन में एक से
अधिक स्त्रियों से वह सम्पर्क रखता है। इनके जीवन में जलयात्रा के योग बहुत
अधिक होते हैं। ऐसे व्यक्ति एकान्त प्रेमी सहृदय एवं मधुर स्वभाव के होते हैं।
१०. दशमावस्था : जिस व्यक्ति के हाथ में इस प्रकार की भाग्य रेखा होती
है वह निश्चय ही उच्च पद प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में कई बार विदेश
यात्राएं करता है अथवा वह वायु सेना में उच्च पद प्राप्त अधिकारी होता है। जीवन
में ऐसा व्यक्ति राष्ट्र-स्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। इनके जीवन में साहस तथा धैर्य
की किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। यदि ऐसी भाग्य रेखा जंजीरदार
टूटी हुई या लहरियादार हो तो उसे जीवन में बहुत अधिक बाधाओं का सामना करना
पड़ता है। यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा अन्त में जाकर दो भागों में बंट जाय और
उसका एक सिरा गुरु पर्वत तथा दूसरा सिरा सूर्य पर्वत की ओर जाता हो तो वह
व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली होता है।
११. एकादशावस्था : ऐसी भाग्य रेखा बहुत ही कम लोगों के हाथ में देखने
को मिलती है। इन व्यक्तियों का व्यक्तित्व अपने आप में भव्य होता है। ये शुक्र की
तरह जीवन में चमकते हैं। इनके कार्यों से समाज प्रभावित होता है। देश के दिशा-
निर्देश में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनके विचार इनके कार्य सभी कुछ योजना
बद्ध होते हैं। एक साधारण कुल में जन्म लेकर भी ऐसा व्यक्ति सभी दृष्टियों से योग्य
सम्पन्न और सुखी होता है।
यदि ऐसी रेखा अन्त में जाकर दो भागों में बंट जाय तो वह उच्च स्तर का
अधिकारी होता है तथा उसके जीवन में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार की कोई
कमी नहीं रहती।
ऊपर मैंने ग्यारह प्रकार के भाग्य रेखा के उद्गम स्थल बतलाये हैं। परन्तु
इसके अलावा भी उद्गम स्थल हो सकते हैं। पाठकों को एक बात ध्यान में रखनी
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चाहिए कि जो भी रेखा शनि पर्वत को स्पर्श करती है वास्तव में वही रेखा भाग्य
रेखा कहलाने की अधिकारी होती है ।
यदि किसी के हाथ में एक से अधिक भाग्य रेखाएं हों और दोनों की समाप्ति
शनि पर्वत पर होती हो तो उन दोनों रेखाओं का मिला-जुला फल उस व्यक्ति को
जीवन में देखने को मिलेगा । शनि रेखा या भाग्य रेखा की समाप्ति पर यदि कई
छोटी-छोटी रेखाएं निकलती हों तो ये रेखाएं व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षाओं को सूचित
करती हैं । यदि इस प्रकार की रेखाएं नीचे की तरफ गिरती हुई दिखाई दें तो वह
व्यक्ति जीवन में बहुत अधिक परेशानियों का सामना करता है ।
आगे के पृष्ठों में भाग्य रेखा से सम्बन्धित कुछ नए तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं ।
१. यदि भाग्य रेखा सीधी तथा स्पष्ट हो और शनि पर्वत से होती हुई सूर्य
पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति कला के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त
करता है ।
२. यदि यह रेखा लाल रंग की हो तथा मध्यमा उंगली के प्रथम पोर तक
पहुंच जाय तो उस व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु होती है ।
३. यदि यह रेखा हृदय रेखा को काटते समय जंजीर के समान बन जाय तो
उसे प्रेम के क्षेत्र में बदनामी का सामना करना पड़ता है ।
४. यदि हृदय रेखा हथेली के मध्य में फीकी या पतली अथवा अस्पष्ट हो
तो व्यक्ति का यौवनकाल दुखमय होता है ।
५. यदि व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा के साथ-साथ सहायक रेखाएं भी हों
तो उसका जीवन अत्यन्त सम्मानित होता है ।
६. यदि भाग्य रेखा जंजीरदार अथवा लहरदार हो तो जीवन में उसे बहुत
अधिक दुख भोगना पड़ता है ।
७. जिस व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा नहीं होती उसका जीवन अत्यन्त
साधारण और नगण्य सा होता है ।
८. यदि भाग्य रेखा प्रारंभ से ही टेढ़ी-मेढ़ी हो तो उसका बचपन अत्यन्त
कष्टदायक होता है ।
६. भाग्य रेखा अपने उद्गम स्थल से प्रारंभ होकर जिस पर्वत की ओर भी
मुड़ती है या शनि पर्वत से उसमें से कोई शाखा निकलकर जिस पर्वत की ओर जाती
है उस पर्वत से सम्बन्धित गुणों का विकास उस व्यक्ति को जीवन में मिलता है ।
१०. यदि भाग्य रेखा चलते-चलते रुक जाय तो वह व्यक्ति जीवन में बहुत
अधिक तकलीफ उठाता है ।
११. हथेली में भाग्य रेखा जिस स्थान में भी गहरी, निर्दोष, और स्पष्ट होती
है जीवन के उस भाग में उसे विशेष लाभ या सुख मिलता है ।