सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

भाग्य रेखा
यदि मानव के जीवन में सब कुछ होता है पर यदि उसका भाग्य साथ नहीं
देता है तो एक प्रकार से उसका पूरा जीवन व्यर्थ कहा जाता है। चाहे व्यक्ति के पास
भव्य व्यक्तित्व, हो चाहे हृदय से वह कितना ही उदार हो, चाहे स्वास्थ्य की दृष्टि
से उसमें सभी प्रकार की श्रेष्ठता हो, परन्तु यदि उसका भाग्य उसे साथ नहीं देता है
तो उसका जीवन एक प्रकार से निष्क्रिय हो जाता है। कहा जाता है कि यदि व्यक्ति
का भाग्य साथ देता हो और यदि वह मिट्टी भी छू ले तो वह सोना बन जाती है।
इसके विपरीत यदि भाग्य साथ नहीं देता तो सोने को भी स्पर्श करने पर वह मिट्टी
के समान हो जाता है।
वस्तुतः जीवन में भाग्य का महत्त्व सबसे अधिक माना गया है। इसीलिए
हाथ में भी भाग्य रेखा या प्रारब्ध रेखा को महत्त्व दिया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'फेट
लाइन' कहते हैं। यह रेखा जितनी अधिक गहरी, स्पष्ट और निर्दोष होती है उसका
भाग्य उतना ही ज्यादा श्रेष्ठ कहा जाता है। यदि व्यक्ति के हाथ में सभी रेखाएं
दूषित एवं कमजोर हो परन्तु यदि उसकी भाग्य रेखा अपने आप में अत्यन्त श्रेष्ठ हो
तो यह बात निश्चित है कि उसकी ये सारे दुर्गुण छिप जाते हैं और वह जीवन में पूर्ण
प्रगति करने में समर्थ हो पाता है। अतः हस्त रेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली
का अध्ययन करते समय भाग्य रेखा का सावधानी से अध्ययन करे।
सभी हाथों में यह भाग्य रेखा नहीं पाई जाती है और मेरा तो यह अनुभव
है कि लगभग ५० प्रतिशत हाथों में भाग्य रेखा का अभाव ही होता है। परन्तु मेरे
कथन का यह अभिप्राय नहीं लिया जाना चाहिए कि जिसके हाथ में भाग्य रेखा नहीं
होती वह व्यक्ति भाग्यहीन होता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भाग्य रेखा के
अभाव में प्रयत्न करने पर भी व्यक्ति को पूर्ण सफलता नहीं मिल पाती। भाग्य रेखा
होने से व्यक्ति थोड़ी-सी प्रतिभा और परिश्रम से ही कार्य को अपने मनोनुकूल बना
लेता है।
इस रेखा को शनि रेखा भी कहा जाता है क्योंकि इस रेखा की समाप्ति शनि
पर्वत पर होती है। यद्यपि यह रेखा व्यक्ति के हाथों में अलग-अलग स्थानों से प्रारम्भ
होती है परन्तु इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर ही होती देखी गई है। इसलिए
भी इसको शनि रेखा के नाम से पुकारते हैं।