विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
विनय-पत्रिका २३
२—'वामा'—शब्दका अर्थ कई टीकाकारोंने पार्वती किया है। पर अमर-
कोशमें इस शब्दका अर्थ 'सामान्य स्त्री' पाया जाता है। पुराणोंमें यह शब्द
दुर्गाके लिए प्रयुक्त हुआ है, पार्वतीके लिए नहीं। यथा:—
वामं विरुद्धरूपन्तु विपरीतन्तु गीयते।
वामेन सुखदा देवी वामा तेन मता बुधैः॥
इति देवीपुराणे ४५ अध्यायः।
अथवा—
या पुनः पूज्यमानातु देवादीनान्तु पूर्वतः।
यज्ञभागं स्वयं धत्ते सा वामा तु प्रकीर्त्तिता॥
इति कालिका पुराणे ७७ अध्यायः।
किन्तु आगेके पदमें गोस्वामीजीने पार्वतीकी स्तुति की है, इसलिए यह
पद भी पार्वतीकी ही स्तुतिमें लिखा गया प्रतीत होता है। क्योंकि शिवकी
स्तुतिके बाद किसी अन्य देवीकी स्तुति और उसके बाद पार्वतीकी स्तुति असंगत
है। इस स्तुतिमें ग्रन्थकारने दुर्गा और पार्वतीमें अभेद सम्बन्ध माना है।
३—मार्कण्डेय और देवीपुराणमें चण्ड, मुण्ड, महिषासुर और शुम्भ-
निःशुम्भ नामक प्रबल पराक्रमी दैत्योंकी कथा है। जब इनके अत्याचारोंसे तीनों
लोक थर्रा उठा, तब सब देवताओंने तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आद्या शक्ति
भगवती महामायाकी स्तुति की। देवीने उक्त राक्षसोंका वध करके संसारमें
शान्ति स्थापित की।
राग रामकली
( १६ )
जय जय जगजननि देवि, सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,
मुक्ति-भुक्ति-दायिनि, भय-हरनि कालिका।
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वसर्बरीस बदनि,
ताप-तिमिर तरुन तरनि-किरन मालिका ॥१॥
२४ विनय-पत्रिका
वर्म-चर्म कर कृपान, सूल-सेल-धनुष वान,
धरनि, दलनि, दानव-दल, रन-करालिका !
पूतना-पिसाच-प्रेत-डाकिनि-साकिनि समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥
जय महेस-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक स्वामिनी, हिमसेल-बालिका ।
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु है प्रसन्न पाहि प्रनत-पालिका ॥३॥
शब्दार्थ—भुक्ति = भोगैश्वर्य । पर्वसर्वरीस = (पर्व+ शर्वरी+ईश) पूर्णिमाकी रात्रिके
स्वामी, चन्द्रमा । तरुन = मध्याह्नकाल । तरनि = सूर्य । मालिका = माला । सेल = साँगी ।
मृगालि = मृगसमूह । भामिनी = पत्नी ।
भावार्थ—हे जगज्जननी ! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो । देवता,
मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं । हे कालिके ! तुम भोग-
सामग्री और मोक्ष दोनों देनेवाली हो । कल्याण, आनन्द और अष्टसिद्धियोंकी
तुम स्थान हो । तुम हो तो पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान मुखवाली, पर त्रिताप-
रूपी अन्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्यकी किरण-माला
हो ॥१॥ तुम्हारे शरीरपर कवच है और हाथोंमें ढाल, तलवार, त्रिशूल, साँगी
और धनुष-बाण है । तुम युद्धमें विकराल रूप धारण करके पृथ्वीके दानव-दलका
संहार करनेवाली हो । पूतना, पिशाच, प्रेत, डाकिनी, शाकिनीके सहित भूत,
ग्रह और बेतालरूपी पक्षी एवं मृग-समूहको पकड़नेके लिए तुम जालरूप हो ॥२॥
हे शिवे ! तुम्हारी जय हो । तुम्हारे नाम और रूप अनन्त हैं । तुम विश्व-ब्रह्मांड-
की स्वामिनी और हिमाचलकी कन्या हो । हे भक्तोंका पालन करनेवाली !
तुलसीदास तुम्हारी शरणमें है । उसे तुम प्रसन्न होकर श्री रघुनाथजीके चरणोंमें
परम प्रेम और अचल नेम दो ।
विनय-पत्रिका २७
गंगा-स्तुति
राग रामकली
( १७ )
जय जय भगीरथ-नन्दिनि, मुनि-चय-चकोर-चन्दिनि,
नर-नाग-बिबुध-वन्दिनि, जय जह्नु-बालिका।
बिस्नु-पद-सरोज जासि, ईस-सीस पर विभासि,
त्रिपथगासि, पुन्य-रासि, पाप-छालिका ॥१॥
विमल-विपुल-वहसि वारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर वर विभंगतर तरंग-मालिका।
सुर जन पूजोपहार, सोभित ससि धवल धार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥२॥
निज तटवासी विहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग,
कीट, जटिल तापस सब सरिस पालिका।
तुलसी सब तीर तीर सुमिरत रघुबंस-वीर,
विचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥३॥
शब्दार्थ—नन्दिनि = पुत्री। चय = समूह। त्रिपथगासि = पृथिवी, पाताल और स्वर्ग-
लोकके मार्गोंसे जानेवाली हो। छालिका = धोनेवाली। विभंगतर = अत्यन्त चञ्चल।
थालिका = थाल्हा, खन्तोला।
भावार्थ—हे भगीरथ-नन्दिनी गंगे ! तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम मुनि-
समूहरूपी चकोरोंके लिए चन्द्रिकारूप हो। मनुष्य, नाग और देवता तुम्हारी
वन्दना करते हैं। हे जाह्नवी ! तुम्हारी जय हो। तुम विष्णु भगवान्के चरण-
कमलोंसे उत्पन्न हुई हो; शिवजीके मस्तकपर शोभा पा रही हो; तुम आकाश,
पाताल और मर्त्यलोक तीनों मागोंमें तीन धाराओंसे बहती हो। तुम पुण्य-राशि
हो और पापोंको धो डालनेवाली हो ॥१॥ तुम शीतल और दैहिक-दैविक-भौतिक
तीनों तापोंको हरनेवाला अथाह निर्मल जल धारण किये हो। तुम सुन्दर भँवर
२६ विनय-पत्रिका
तथा अत्यन्त चंचल तरंगोंकी माला धारण किये रहती हो। पुरवासियोंने तुम्हें
पूजामें जो सामग्री भेंट की है, उससे चन्द्रमाके समान तुम्हारी उज्ज्वल धारा
सुशोभित है। वह धारा संसारके भारको नाश करनेवाली तथा भक्तिरूपी कल्प-
वृक्षके लिए थाल्हा है ॥२॥ तुम अपने किनारेपर रहनेवाले पक्षी, जलचर,
थलचर, पशु, पतंग, कीड़े-मकोड़े तथा जटाधारी तपस्वी सबका समान रूपसे
पालन करती हो। हे मोहरूपी महिषासुरका वध करनेके लिए कालिकारूप गंगे !
मुझ तुलसीदासको ऐसी बुद्धि दो कि जिससे मैं श्रीरामजीका स्मरण करता हुआ
तुम्हारे किनारे-किनारे विचरण कर सकूँ ॥३॥
विशेष
१—‘भगीरथ-नन्दिनि’—सूर्यवंशमें सगर नामके महापराक्रमी राजा थे।
उनकी दो रानियाँ थीं। एकसे अंशुमान् पैदा हुए और दूसरीसे साठ हजार पुत्र
उत्पन्न हुए। राजा सगरके प्रतापसे देवराज इन्द्र सदैव संत्रस्त रहा करता था।
उसने ईर्ष्यावश राजा सगरके अश्वमेध यज्ञका घोड़ा चुरा लिया और उसे ले
जाकर योगेश्वर कपिलमुनिके आश्रमपर बाँध दिया। उस घोड़ेको ढूँढ़नेके लिए
सगरके साठ हजार पुत्र निकले। मुनिके आश्रमपर घोड़ेको बँधा देखकर उन्हें
कटु वाक्य कहा। इससे कपिलदेवजीने क्रुद्ध होकर उन्हें भस्म कर दिया।
महाराज अंशुमान्के पुत्र भगीरथ हुए। उन्होंने घोर तपस्या की और
श्रीगंगाजीको पृथ्वीपर लाकर उन लोगोंका उद्धार किया। इसीसे श्रीगंगाजीको
‘भगीरथ नन्दिनी’ या ‘भागीरथी’ कहा जाता है।
२—‘जह्नु बालिका’—राजा भगीरथ अपने रथके पीछे-पीछे गङ्गाजीको
भूलोकमें ला रहे थे। मार्गमें जह्नु मुनिका आश्रम मिला। मुनिने कुपित होकर
उस प्रवाहको पान कर डाला। जब राजा भगीरथने स्तुति द्वारा उन्हें प्रसन्न
किया, तब मुनिने संसारके कल्याणार्थ गङ्गाजीको अपनी जङ्घासे निकाल दिया।
इसीसे गङ्गाजीका नाम ‘जह्नुसुता’ या ‘जाह्नवी’ पड़ा। लिखा है:—
जानु द्वारा पुरा दत्ता जह्नु सम्पीय कोपतः।
तस्य कन्यास्वरूपा च जाह्नवी तेन कीर्त्तिता ॥
—ब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डम्।
विनय-पत्रिका २७
( १८ )
जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी।
बिस्नु-पदकञ्ज-मकरन्द इव अम्बुवर
वहसि, दुख दहसि अघवृन्द-विद्राविनी ॥१॥
मिलित जलपात्र-अज जुक्त-हरिचरन रज,
विरज-चर-चारि त्रिपुरारि सिर-धामिनी।
जह्नु-कन्या धन्य, पुन्य कृत सगर-सुत,
भूधर द्रोनि-विद्दरनिवहु नामिनी ॥२॥
जच्छ, गन्धर्व, मुनि, किन्नरोरग, दनुज,
मनुज मज्जहिं सुकृत-पुञ्ज जुत-कामिनी।
स्वर्ग-सोपान, विज्ञान-ज्ञानप्रदे,
मोह-मद-मदन-पाथोज-हिम यामिनी ॥३॥
हरित गम्भीर वानीर दुहुँ तीर वर,
मध्य धारा विसद, विश्व-अभिरामिनी।
नील-परजंक-कृत-सयन सर्पेस जनु,
सहस सीसावली स्रोत सुर-स्वामिनी ॥४॥
अमित-महिमा, अमित रूप, भूपावली,
मुकुट-मनिद्य त्रैलोक पथ गामिनी।
देहि रघुवीर-पद-प्रीति निर्भर मातु,
दास तुलसी त्रास हरनि भव-भामिनी ॥५॥
शब्दार्थ—पावनी = पवित्र करनेवाली। मकरन्द = मधु। विद्राविनी = नाश करने-
वाली। विरज = निर्मल। द्रोनि = कन्दरा। विद्दरनि = विदीर्ण करनेवाली। किन्नरोरग =
(किन्नर + उरग) किन्नर और नाग। पाथोज = कमल। वानीर = बेंत वृक्ष। विसद =
उज्ज्वल। परजंक = पर्यङ्क, पलंग।
भावार्थ—हे समूचे संसारको पवित्र करनेवाली गंगे! तुम्हारी जय हो,
जय हो। तुम विष्णु भगवान्के चरण-कमलोंमें मधुके समान सुन्दर जल धारण
करनेवाली हो, दुःखोंको जला डालनेवाली हो और पाप-पुंजको नाश करनेवाली
हो ॥१॥ विष्णु भगवान्की चरण-रजसे संयुक्त तुम्हारा निर्मल (रजोगुणका नाश
२८ विनय-पत्रिका
करके सतोगुण उत्पन्न करनेवाला) और सुन्दर जल ब्रह्माके कमण्डलुमें भरा
रहता है। तुमने शिवजीके मस्तकको ही अपना घर बना रखा है। हे अनन्त
नामवाली जाह्नवी ! तुमने राजा सगरके साठ हजार पुत्रोंको धन्य और पवित्र
कर दिया है। तुमने पहाड़ोंकी कन्दराओंको विदीर्ण कर डाला है ॥२॥ बड़े
पुण्यके फलसे यक्ष, गन्धर्व, मुनि, किन्नर, नाग, दैत्य और मनुष्य अपनी स्त्रियोंके
सहित तुम्हारे जलमें स्नान करते हैं। तुम स्वर्गकी सीढ़ी हो और ज्ञान-विज्ञान-
दायिनी हो। तुम मोह, मद और कामरूपी कमलोंके नाशके लिए शिशिर
ऋतुकी रात हो ॥३॥ तुम्हारे दोनों सुन्दर किनारोंपर हरे और घने बेंतके वृक्ष हैं
और बीचमें संसारको प्रसन्न करनेवाली उज्ज्वल धारा है; यह दृश्य ऐसा प्रतीत
होता है कि मानों नीले पलंगपर शेषनाग सो रहे हैं। हे देवताओंकी स्वामिनी
श्रीगंगाजी ! तुम्हारे हजारों स्रोत शेषनागके हजार मस्तकके समान हैं ॥४॥ हे
त्रिपथगे ! तुम्हारी महिमा अपार है, रूप असंख्य हैं, तुम राजाओंकी मुकुट-
मणियोंसे वन्दनीय हो। हे माता ! हे शिव-प्रिये ! तुम भयको हरनेवाली हो;
तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें पूर्ण प्रीति दो ॥५॥
विशेष
'जन्हुकन्याधन्य'—पद १७ के विशेष में देखिये।
१—'नील पर्यङ्क'—इस पूरी पंक्तिमें उत्प्रेक्षालङ्कार है। दोनों किनारोंका
हरित गम्भीर बेत वृक्ष ही नीला पलंग है; गङ्गाजीकी धवल धारा मानो
शेषनाग है; क्योंकि शेषका वर्ण उज्ज्वल है और गङ्गाकी धारा भी उज्ज्वल है।
गङ्गा भी हजारों धाराओंसे समुद्रमें मिली हैं; अतः वे धाराएँ ही मानो शेष-
नागके हजार फन हैं।
२—'भव-भामिनी'—हिमवानके दो कन्याएँ हुईं। बड़ीका नाम गङ्गाजी
और छोटीका नाम उमा था। गङ्गाजीको लोक-कल्याणार्थ देवता लोग माँग ले
गये और उमाका विवाह शिवजीके साथ हुआ। जब बहुत दिनोंतक उमासे
कोई सन्तान नहीं हुई, तब शिवजीने सन्तानोत्पत्ति के लिए तेज छोड़ा। उस
तेजको श्रीगङ्गाजीने धारण किया। उससे कार्त्तिकेयकी उत्पत्ति हुई। देवताओं-
ने उनके दूध पिलानेका भार षट्कृत्तिकाको दिया। षट्कृत्तिकाने उनके
विनय-पत्रिका २९
पालनका भार इस शर्तपर लिया कि वह षट्कृत्तिकाके ही पुत्र कहे जायँ । देव-
लोकने इस शर्तको स्वीकार कर लिया । फिर क्या था, षट्कृत्तिकाने
स्वामिकार्त्तिकको दूध पिलाकर सयाना दिया । इसीसे उनका नाम कार्त्तिकेय
पड़ा । यही कारण है कि गोस्वामीजीने गंगाजीको 'भव-भामिनी' अर्थात् सिव-
प्रिया कहा है । महाराजाधिराज श्रीरघुराजसिंहने भी रामस्वयम्बरमें गंगाजीको
शिव-प्रिया लिखा है । यथाः-
"गंगा जेठी उमा दूसरी देवी शम्भु पियारी ।
जेहिविधि गमनी गंग सुरालै सो सब दियो उचारी ॥
( १९ )
हरनि पाप त्रिविध ताप सुमिरत सुरसरित ।
बिलसति महि कल्प-बेलि मुद, मनोरथ फरित ॥१॥
सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित ।
विमलतर तरंग लसत रघुवर कैसे चरित ॥२॥
तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित ?
घोर भव-अपार सिंधु तुलसी किमि तरित ॥३॥
शब्दार्थ—सुरसरित = देवनदी गंगाजी । बिलसति = शोभित । सलिल = जल ।
भरित = परिपूर्ण । तो = तुम्हारे ।
भावार्थ—हे गंगाजी ! स्मरण करते ही तुम कायिक, वाचिक और मान-
सिक तीनों पापों और दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों दुःखोंको हर लेती हो ।
आनन्द और मनोरथरूपी फलोंसे लदी हुई कल्पलताके समान तुम पृथ्वीपर
सुशोभित हो ॥१॥ अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारी जो
उज्ज्वल धारा शोभायमान है, उसमें राम-चरितके समान अत्यन्त निर्मल तरंगें
शोभा पा रही हैं ॥२॥ हे जगज्जननी गंगे ! यदि तुम न होतीं, तो कलियुग
न-जानें क्या कर डालता ! उस अवस्थामें तुलसीदास इस भयंकर और अपार
संसार-सागरसे कैसे तरता ? ॥३॥
३० विनय-पत्रिका
विशेष
१—यहाँ प्रारम्भमें लिखा है कि गंगाजीके स्मरणमात्रसे ही तीनों तरहके
ताप दूर हो जाते हैं। अतः गोसाईंजीने आगे 'सोहत ससि...चरित' में ही
स्मरणके लिए गंगाजीका स्वरूप भी दिखा दिया है। भविष्य पुराणमें गंगाजीका
ध्यान करनेके लिए उनके स्वरूपका बृहद् वर्णन है।
( २० )
ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि, नभ-पताल-धरनि।
सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-सुजन-मंगल-करनि ॥१॥
देखत दुख-दोष-दुरित-दाह-दारिद-दरनि।
सगर-सुवन-साँसति-समनि, जलनिधि जल-भरनि ॥२॥
महिमा की अवधि करसि बहु विधि-हरि-हरनि।
तुलसी करु बानि विमल, विमल बारि बरनि ॥३॥
शब्दार्थ—ईस = शिवजी। दुरित = पाप। दाह = त्रिताप। दरनि = नाश करने-
वाली। साँसति = क्लेश। बरनि = वर्ण या रङ्ग।
भावार्थ—तुम शिवजीके मस्तकपर रहती हो और आकाश, पाताल तथा
पृथिवी—इन तीनों मार्गोंमें सुशोभित हो। देवता, मनुष्य, मुनि, नाग, सिद्ध
और सुजनोंका तुम कल्याण करनेवाली हो ॥१॥ तुम्हारे दर्शनमात्रसे ही दुःखों,
दोषों, पापों, तापों और दरिद्रताका नाश हो जाता है। तुम सगर-पुत्रोंके क्लेशों-
का नाश करनेवाली और समुद्रमें जल भरनेवाली हो ॥२॥ तुमने ब्रह्मा, विष्णु
और महेशकी महिमाकी सीमा बहुत बढ़ा दी है। हे मातेश्वरी गंगे ! जिस
प्रकार तुम्हारे जलका वर्ण निर्मल है, उसी प्रकार तुलसीदासकी वाणीको भी
तुम निर्मल कर दो जिससे वह श्रीरामजीके चरितका गान कर सके।
विशेष
१—'विधि-हरि-हरनि'—ब्रह्माके कमण्डलुमें रहनेके कारण गङ्गाजीने
ब्रह्मकमण्डली, विष्णुके चरणोंसे निकलनेके कारण विष्णुपदी तथा शिवजीके
मस्तकपर रहनेके कारण शिवजटा-विहारिणी नाम धारण किया। इससे तीनों
देवताओंका महत्त्व चरम सीमापर पहुँच गया है।
विनय-पत्रिका ३१
२—'महिमा की अवधि करसि'- वास्तवमें गङ्गाजीकी महिमा अपार है।
देखिये यमराज भी हैरान हो रहा है:—
गङ्गके चरित्र लखि भाषै जमराज इमि ऐरे चित्रगुप्त मेरे हुकुममें कान दे।
कहै पदमाकर ये नरकनि मूँदि करि मूँदि दरवाजनको तजि यह ध्यान दे॥
देखु यह देवनदी कीन्हे सब देव याते दूतन बुलायकै विदाके वेगि पान दे।
फारि डारु फरद न राखु रोजनामा कहुँ खाता खति जान दे बहीको बहि जान दे॥
यमुना-स्तुति
राग बिलावल
( २१ )
जमुना ज्यों ज्यों लागी बाढ़न ।
त्यों त्यों सुकृत-सुभट कलि-भूपहिं, निदरि लगे बहु काढन ॥१॥
ज्यों ज्यों जल मलीन त्यों त्यों जमगन मुख मलीन है आड़न ।
तुलसिदास जगदघ जवास ज्यों अनघ मेघ लागे डाढ़न ॥२॥
शब्दार्थ—सुकृत = पुण्य । सुभट = अच्छे योद्धा । निदरि = अपमान करके । आड़ =
भाड़ । जगदघ = (जगत्+अघ) संसारका पाप । जवास = जवासा या हिंगुआ । अनघ =
(अन्+अघ) पाप-रहित । डाढ़न = जलाने लगे ।
भावार्थ—वर्षाकालमें यमुनाजी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगीं, त्यों-त्यों पुण्यरूपी
योद्धा कलिकालरूपी राजाका अत्यन्त निरादर करते हुए उसे निकालने लगे ॥१॥
बाढ़के कारण ज्यों-ज्यों यमुनाजीका जल मैला होने लगा, त्यो-त्यों यमदूतोंका
मुख भी मलिन होने लगा; अन्तमें उन्हें किसीकी भी आड़ न रही । तुलसीदास
कहते हैं कि जैसे पुण्यरूपी मेघ संसारके पापरूपी हिंगुएको जलाने लगे ॥२॥
विशेष
१—'जमगन मुख मलीन' पर ग्वाल कविने कहा है:—
भाषै चित्रगुप्त सुनि लीजै अर्ज यमराज कीजिये हुकुम अब मूँदें नर्क द्वारे को ।
अधम अभागे औ कृतघ्नी क्रूर कलहिन करत कन्हैया कर्न-कुंडल समारे को ॥
३२ विनय-पत्रिका
ग्वाल कवि अधिक अनीतें विपरीतें भईं दीजिये तुराय वेगि कुलपकिवारे कों ।
हम ना लिखेंगे वही गमना जु खैहैं हम जमुना बिगारें देत कागज हमारे को ॥
काशी-स्तुति
राग भैरव
(२२)
सेइय सहित सनेह देह-भरि, कामधेनु कलि कासी।
समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल-रासी ॥१॥
मरजादा चहुँ ओर चरन वर, सेवत सुरपुर-वासी।
तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अविनासी ॥२॥
अंतरऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ वेद-विस्वासी।
गलकंबल बरुना विभाति जनु, लूम लसति सरिताऽसी ॥३॥
दंडपानि भैरव विषाण, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।
लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥
मनिकर्निका बदन-ससि सुन्दर, सुरसरि-सुख सुखरा-सी।
स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी ॥५॥
विस्वनाथ पालक कृपालु चित, लालति नित गिरिजा-सी।
सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मन जोगवति रहति रमा-सी॥६॥
पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गव्य सुपंचनदा-सी।
ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर बिस्व-विकासी ॥७॥
चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी।
लहत परम पद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥८॥
कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी।
तुलसी बसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी ॥९॥
शब्दार्थ—अन्तर अयन = अन्तरगृही। बच्छ = बछड़ा। गलकंबल = गायके गलेमें
लटकती हुई खाल, यानी लुलरी। विभाति = शोभित। लूम = पूँछ। विषाण = सींग।
विनय-पत्रिका ३३
लोलदिनेस = लोलार्क कुण्ड। त्रलोचन = काशीमें एक तीर्थका नाम। मणिकर्णिका = एक
स्थानका नाम है। लालति = प्यार करती है। सची = इन्द्राणी। माधव = बिन्दुमाधव।
गव्य = पंचगव्य; गोबर, गोमूत्र, गोदधि, गोदुग्ध और गोघृतका मिश्रण। चारितु = चारा।
प्रपंच = संसार। सुपासी = समीपवासी या कल्याण।
भावार्थ—कलियुगमें काशीपुरी कामधेनुके समान है। शरीरकी अवधितक
काशीरूपी कामधेनुका सेवन करना चाहिये। यह शोक, सन्ताप, पाप और
रोगका नाश करनेवाली तथा कल्याणोंकी खान है ॥१॥ काशीके चारों ओरकी
मर्यादा अर्थात् चौहद्दी ही कामधेनुके श्रेष्ठ चरण हैं; देवलोक-वासी उन चरणोंकी
सेवा करते हैं। यहाँके सब तीर्थस्थान ही इसके पवित्र अंग हैं, और अविनाशी
अगणित शिवलिंग ही रोम हैं ॥२॥ अंतर्गृही इसके रहनेके लिए बढ़िया घर है,
अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष—ये चारों फल ही चार थन हैं, और वेदपर विश्वास रखने-
वाले लोग ही बछड़े हैं (अर्थात् जिस प्रकार बछड़ेसे गाय पेन्हाकर दूध देती है,
उसी प्रकार वेद-वचनमें जो विश्वास है, उस विश्वासरूपी बछरूस यह गाय ईश्वर-
प्राप्तिरूप दूध देतो है)। वरुणा नदी ही मानों ललरी होकर सुशोभित हो रही है
और असी नदी पूँछके रूपमें विराजमान है ॥३॥ दण्डपाणि और भैरव इसके
दो सींग हैं। यह कामधेनु अपने इन दोनों सींगोंसे पापमें रुचि रखनेवाले दुष्टों-
को भयभीत करती रहती है। लोलार्क कुण्ड और त्रिलोचन (एक तीर्थ) ये दो
नेत्र हैं कर्णघंटा नामका स्थान इसके गलेमें बँधा हुआ घंटारूप है ॥४॥
मणिकर्णिका नामका स्थान चन्द्रमाके समान सुन्दर मुख है और गंगाजीसे जो
सुख प्राप्त हो रहा है, वही इसकी शोभा है। स्वार्थ और परमार्थसे परिपूर्ण
पंचकोसीकी परिक्रमा ही महिमा है ॥५॥ कृपालुचित्त विश्वनाथजी इसका पालन
करनेवाले हैं और पार्वती-जैसी देवी इसका सदैव लालन करती रहती हैं।
अष्टसिद्धियाँ, इन्द्राणी और सरस्वती इसकी पूजा करती हैं और लक्ष्मी-सरीखी
तीनों लोककी स्वामिनी इसका रुख देखती रहती हैं ॥६॥ पंचाक्षरी मन्त्र ही
इसका पंचप्राण है, भगवान् बिन्दुमाधव आनन्द हैं और पंचनदी (पंचगंगा)
पंचगव्यरूप हैं। संसारको विकसित करनेवाले रामनामके दोनों अक्षर ब्रह्म और
जीवके समान हैं ॥७॥ यहाँ सुकर्म और कुकर्म करके जितने प्राणी मरते हैं,
उनका वह शुभ-अशुभ कर्मरूपी घास ही इसका चारा है—उसीको यह चरा
३
३४ विनय-पत्रिका
करती है । उस चारेको खाकर यह कामधेनु मोक्ष-रूपी पवित्र दूध देती है । उसे
वे मरनेवाले प्राणी पीते हैं । वह मोक्षरूपी दूध इतना दुर्लभ है कि उसके लिए
संसारमें उदासीन महात्मागण झींखते हैं ॥८॥ पुराणोंका कथन है कि भगवान्
बिन्दुमाधवने अपने हाथोंसे इसकी रचना की है, उनकी यह कारीगरी कलारूप है ।
तुलसीदास कहते हैं कि यदि तू अपना कल्याण चाहता है तो काशीमें रहकर
श्रीरामजीका नाम जप ॥९॥
विशेष
१—'अंतर्गृही'—पद्मपुराणमें काशीके चार विभाग किये गये हैं । काशी,
वाराणसी, अविमुक्त और अन्तर्गृही । मध्यमेश्वर और देहली विनायकके बीच
मण्डलाकार भूमिको काशी कहा गया है । यहाँ मृत्यु होनेसे सालोक्य (शिवलोक)
मुक्ति प्राप्त होती है । उत्तरमें वरुणा, दक्षिणमें असी नदी, पूरबमें गङ्गाजी और
पश्चिममें पाशपाणि गणेशके बीचकी भूमिको वाराणसी कहते हैं । यहाँ मृत्यु
होनेसे सारूप्य मुक्ति होती है । विश्वनाथजीके चारों ओर दो सौ धन्वा
(एकधन्वा = ४ हाथ) का दायरा अविमुक्त कहलाता है । यहाँकी मृत्युसे
साम्निध्य (सामीप्य) मुक्ति प्राप्त होती है । पश्चिम गोकर्णेश, पूरब गङ्गा, उत्तर
भारभूत और दक्षिण ब्रह्मेश, इसके बीचकी भूमिको शिवजीका अन्तर्गृह माना
गया है । यहाँकी मृत्युसे साक्षात् कैवल्य अर्थात् शिवस्वरूपकी प्राप्ति होती है ।
गोस्वामीजीने यहाँ उसी अन्तर्गृहीका उल्लेख किया है ।
२—'करनघंट'—काशीमें एक शिव-भक्त ब्राह्मण था । वह शिवजीके सिवा
दूसरे किसी भी देवताका नाम नहीं सुनना चाहता था । इसीसे उसने अपने
दोनों कानोंमें घंटे लटका रखे थे ताकि उसे किसी दूसरेका नाम सुनाई न
पड़े । यदि कोई मनुष्य उसके सामने किसी दूसरेका नाम लेता तो वह घंटा
बजाते हुए दूर भाग जाता । इसीसे उसका नाम 'करनघंट' पड़ गया था ।
जिस स्थानपर वह रहता था, वह स्थान काशीमें आज भी कर्णघंटाके नामसे
प्रसिद्ध है ।
३—'पंचाच्छरी'—'नमः शिवाय' यही पंचाक्षरी मन्त्र है ।
१—'प्राण'—पाँच हैं:—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ।
विनय-पत्रिका ३५
५—'गव्य'—पंचगव्यमें गायका दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र—ये
पाँच वस्तुएँ हैं।
६—इस पदमें रूपकालंकारका लक्षण यह है:—
उपमेयरु उपमान को इक करि कहत जु रूप ।
सो रूपक द्वै भाँति को, मिलि अभेद तद्रूप ॥ (पद्माभरण)
अर्थात् उपमेय और उपमानको एक करके कहनेको रूपक (रूपं स्वभावे;
मनोहर कृतौ) कहते हैं। इसके अभेद और तद्रूप दो भेद हैं। इनमें प्रत्येकके
तीन-तीन (१ अधिक, २ न्यून, ३ सम) उपभेद हैं।
अभेदके उदाहरण
अभेद अधिक—नव बिधु विमल तात जस तोरा ।
रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥
(रा० च० मा०)
अभेद न्यून—अति खल जे विषयी बक कागा।
अभेद सम—तुव मुख पंकज विमल यह, धरत सुवास भछेह ।
तद्रूपके उदाहरण
तद्रूप अभेद—विष वारुनी बंधुप्रिय तेही । कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥
तद्रूप न्यून—राममात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बढ़ नाम तुम्हारा ॥
तद्रूप सम—लषन उतरु आहुति सरिस, भृगुपति कोप कृसानु ।
सूचना—जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उपमानसे ही उसकी तुलना की
जाती है, उसे तद्रूप रूपक और जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उसकी तुलना
उपमानसे नहीं की जाती, उसे अभेद रूपक अलङ्कार कहते हैं ।
चित्रकूट-स्तुति
राग बसन्त
( २३ )
सब सोच-विमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्यान कूट ॥१॥
सुचि अवनि सुहावनि आलबाल। कानन विचित्र, बारी बिसाल ॥२॥
३६ विनय-पत्रिका
मंदाकिनि-मालिनि सदा सींच। बर बारि, विषम नर नारि नीच ॥३॥
साखा सुस्रृंग, भूरूह-सुपात। निरझर मधुवर, मृदु, मलय बात ॥४॥
सुक पिक, मधुकर मुनिवर-विहारु। साधन प्रसून, फल चारि चारु ॥५॥
भव-घोर घाम-हर सुखद छाँह। थप्यो थिर प्रभाव जानकी-नाहु ॥६॥
साधक-सुपथिक बड़े भाग पाइ। पावत अनेक अभिमत अघाइ ॥७॥
रस एक, रहित-गुन-करम-काल। सिय राम लखन पालक कृपाल ॥८॥
तुलसी जो रामपद चहिय प्रेम। सेइय गिरि करि निरुपाधि नेम ॥९॥
शब्दार्थ-बूट = हरा वृक्ष। बारी = बगीचा। भूरुह = पेड़। मलय = चन्दन। बात =
हवा। नाहु = स्वामी। अघाइ = तृप्त होना या पूर्ण होना।
भावार्थ—सब शोकोंसे छुड़ानेवाला चित्रकूट (पर्वत) कलिका नाश करने-
वाला और कल्याण करनेवाला हरा वृक्ष है ॥१॥ वहाँकी पवित्र भूमि उस वृक्षके
लिए सुहावना थाल्हा है। बगीचोंमें अपूर्व वृक्ष हुआ करते हैं। चित्रकूटके
चारों ओर जो विचित्र वन है, वही बड़ा बगीचा है ॥२॥ जिस प्रकार मालिन
जल-सिंचनके समय किसी खास वृक्षके प्रति पक्षपात नहीं करती और न तो
किसीकी उपेक्षा, उसी प्रकार मन्दाकिनी नदी रूपी मालिन अपने श्रेष्ठ जलसे,
वहाँ निवास करनेवाले सभी अच्छे-बुरे (ऊँच-नीच) नर-नारियोंका हमेशा समान
भावसे पोषण करती है ॥३॥ चित्रकूट पर्वतके सुन्दर शिखर ही उस वृक्षकी
शाखाएँ हैं और उसके ऊपरके वृक्ष ही उत्तम पत्ते हैं। झरनोंसे झरनेवाला श्रेष्ठ
और मीठा जल ही मृदु मलय वायु है, और हवा ही उसकी कोमलता है ॥४॥
वहाँ बिहार करनेवाले मुनीश्वर ही तोता, कोयल और भौंरे हैं। उन मुनीश्वरोंकी
नाना प्रकारकी साधनाएँ ही उस वृक्षके पुष्प हैं और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—
ये ही चार सुन्दर फल हैं ॥५॥ उस वृक्षकी सुखदायिनी छाया संसारकी जन्ममृत्यु-
रूपी कड़ी धूपको हरनेवाली है। जानकी-वल्लभ श्रीरामने वहाँ निवास करके
उसके प्रभावको और भी स्थायी कर दिया है ॥६॥ साधकरूपी उत्तम बटोही
बड़े भाग्यसे उसे प्राप्त करते हैं और पाते ही उनकी नाना प्रकारकी आकांक्षाएँ
पूर्ण हो जाती हैं ॥७॥ वह गुण, कर्म और कालसे रहित एवं एकरस रहनेवाला
है। कृपालु सीता, राम और लक्ष्मण उनके रक्षक हैं। तुलसीदास कहते हैं कि
विनय-पत्रिका ३७
यदि तू श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता है, तो उपाधि-रहित नेमसे चित्रकूट
पर्वतका सेवन कर ।
विशेष
१—'बारी' शब्दका प्रयोग बिहार, संयुक्तप्रान्त और अवधमें बगीचेके
अर्थमें ही किया जाता है। यथा 'बारी बगीचा' 'खेती-बारी'। वास्तवमें यह
शब्द ऐसे बगीचोंके लिए आता है, जिनमें श्रेणी-बद्ध वृक्ष क्यारियोंमें नहीं लगे
रहते; अथवा कुछ वृक्ष श्रेणीबद्ध लगे हुए होते हैं, और कुछ यत्र-तत्र लगे रहते
हैं। ऐसे बगीचेको भी 'बारी' ही कहते हैं। 'वियोगी हरि' ने 'बारी' शब्दका
अर्थ किया है, 'खेतों या वृक्षोंके चारों तरफ लगाये हुए कांटेदार पेड़, जिनसे
पशु आदिसे उनकी रक्षा रहती है।' यह अर्थ करनेमें आपने बुन्देलखंडी भाषा-
की शरण ली है।
२—'थप्यो थिर प्रभाव'—श्रीरामजीके निवाससे चित्रकूटकी महिमा बहुत
बढ़ गयी, इसीसे वाल्मीकिजीने श्रीरामजीसे चित्रकूटमें रहनेकी प्रार्थना की थी।
यथा:—
'चलहु सफल सुभ सबकर करहू। राम देहु गौरव गिरिवरहू ॥'
जहाँ-जहाँ श्रीरामजीका चरण पड़ा, वह भूमि धन्य हो गयी। जैसे:—
'धन्य भूमि वन पंथ पहारा। जहँ-जहँ नाथ पाउँ तुम्ह धारा ॥'
३—'मंदाकिनि-मालिनि...बात' सब टीकाकारोंने इसका अर्थ बड़ा ही
विचित्र किया है। मालिनके ही जलसे चित्रकूट वृक्षका सिंचन कराया है।
वियोगी हरिजी भला कब चूकने लगे ? इन्होंने तो ऐसा अर्थ लिखा है जिससे
कोई बात ही स्पष्ट नहीं होती ।
राग कान्हरा
[ २४ ]
अब चित चेति चित्रकूटहिं चलु ।
कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, विलसत बढ़त मोह-माया-मलु ॥१॥
भूमि बिलोकु राम-पद अंकित, बन बिलोकु रघुबर-विहार-थलु ।
सैल-सृंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-दलु ॥२॥
३८ विनय-पत्रिका
जहँ जनमे जग-जनक जगतपति, विधि-हरि-हर परिहरि प्रपंच छल ।
सकृत प्रबेस करत जेहि आश्रम, बिगत-विषाद भये पारथ नलु ॥३॥
न करु विलम्ब विचारु चारुमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु ।
मंत्र सो जाइ जपहि जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु ॥४॥
रामनाम-जप-जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु ।
करिहैं राम भावतो मन को, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥५॥
कामद मनि कामता-कलप तरु, सो जुग-जुग जागत जगतीतलू ।
तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतीति-प्रीति एकै वलु ॥६॥
शब्दार्थ - भवभंग = संसार-बन्धनसे छुटकारा। सकृत = एक बार। पारथ = पृथाके पुत्र
युधिष्ठिर आदि। नलु = राजा नल। अचई = पीकर। कामद = सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला।
जगतीतलू = पृथ्वीतलपर।
भावार्थ - हे चित्त, अब तू चेतकर चित्रकूटको चल। कलिने कुपित होकर
कल्याण-मार्गों (ज्ञान, भक्ति, वैराग्यादि) का लोप कर दिया है। इससे मोह,
माया और पापोंकी वृद्धि विशेषरूपसे शोभा पा रही है ॥१॥ चल, रे चित्त, तू
श्रीरामजीके चरणोंसे अंकित भूमिको देख; श्रीरघुनाथजीके विहार-स्थल वनका
अवलोकन कर। वहाँ कपट, पाखंड और दम्भके समूहका नाश करनेवाले तथा
संसार-बन्धनसे मुक्त करनेके कारणस्वरूप पर्वतके शिखरोंको देख ॥२॥ जहाँ
जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और महेशने छल-प्रपंच छोड़कर जन्म लिया
है, जिस आश्रममें एक बार प्रवेश करते ही युधिष्ठिरादि पाण्डवों तथा राजा नलका
दुःख दूर हो गया था ॥३॥ वहाँ चलनेमें देर न कर और अच्छी बुद्धिसे विचार
तो कर कि शेष आयुका प्रत्येक पल बीती हुई आयुके वर्षके समान है। वहाँ
जाकर तू उस मन्त्रको जप जिसे जपकर शंकरजी हलाहल विष पीनेपर भी अजर
और अमर हो गये ॥४॥ यदि तू वहाँ नित्यप्रति रामनामका जपरूपी यज्ञ करता
रहेगा, तपस्विनी नदीके पवित्र जलमें स्नान करता रहेगा तथा उसका जल पीता
रहेगा, तो श्रीरामजी तेरी मनोवाञ्छा पूरी कर देंगे और इस सुखमय साधनसे तुझे
अनायास ही महाफल (अपने चरणोंमें भक्ति) प्रदान करेंगे ॥५॥ चित्रकूटमें
कामतानाथ पर्वत ही सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला कल्पवृक्ष और चिन्तामणि है;
वह युग-युगसे पृथ्वीतलपर प्रकाशमान है। यों तो चित्रकूटका प्रभाव प्रत्येक
विनय-पत्रिका ३९
मनुष्यको जानना चाहिए, पर हे तुलसीदास, तुझे विशेषरूपसे समझना चाहिए;
क्योंकि तुझे उस एकहीका विश्वास, प्रेम और भरोसा है ॥६॥
विशेष
१—'जहँ जनमे हरिहर'—चित्रकूटमें महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता
धर्मपत्नी अनुसूया देवीने पुत्र-कामनासे घोर तपस्या की। ब्रह्मा, विष्णु और
महादेवजीने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा। अनुसूयाने यह वर माँगा
कि मेरे गर्भसे तुम्हारे समान पुत्र उत्पन्न हों। तीनों देवता 'तथास्तु' कहकर
अन्तर्द्धान हो गये। उसके बाद ब्रह्माने चन्द्रमाके रूपमें, विष्णुने दत्तात्रेयके
रूपमें और शिवने दुर्वासाके रूपमें अनुसूयाके गर्भसे जन्म लिया।
२—'परिहरि प्रपंच छल'—का आशय यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिवने
अपना-अपना निर्दिष्ट कार्य (उत्पत्ति, पालन और संहार) छोड़कर निष्छल भावसे
जन्म लिया।
३—'पारथ नलु'—जुएमें हारकर राजा नल और युधिष्ठिरादि पाण्डव
वन-वन भटकते हुए चित्रकूटमें पहुँचे थे। उन लोगोंने कामतानाथकी पूजा
की थी और अपनी मनोभिलाषा पूर्ण करनेके लिए प्रार्थना की थी। उस समय
पाण्डवोंने यह संकल्प किया था कि यदि हम लोग युद्धमें दुर्योधनको हरा देंगे
तो फिर आकर कामतानाथगिरिका पूजन करेंगे। परिणाम यह हुआ कि राजा
नल और धर्मराज युधिष्ठिरकी मनोभिलाषा पूरी हो गयी। यह कथा चित्रकूट-
माहात्म्यमें विस्तारपूर्वक है।
४—'महाफलु'—का अर्थ है 'राम-पद-प्रेम'। क्योंकि अर्थ, धर्म, काम,
मोक्ष—ये चारों फल हैं। यदि यहाँ इसका अर्थ केवल मोक्ष किया जाय, जैसा
कि अधिकांश टीकाकारोंने किया है—तो भी ठीक नहीं। क्योंकि गोस्वामीजी
मोक्षके भूखे नहीं थे। भक्त तो कभी 'राम-पद-प्रेम' के सिवा दूसरी वस्तु
चाहता ही नहीं। देखिये भरतजी क्या कहते हैं:—
'अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरवान।
जनम जनम रति रामपद, यह वरदानु न आन ॥'
इसके सिवा गोस्वामीजीने जिन-जिन देवताओंकी स्तुति की है, सबसे
४० विनय-पत्रिका
'राम-पद-प्रेम' ही माँगा है—मोक्ष नहीं। इससे सिद्ध होता है कि ग्रन्थकारको
'महाफलु'का अर्थ 'राम-पद-प्रेम' ही अभिप्रेत है।
हनुमत्-स्तुति
राग धनाश्री
[ २५ ]
जयति-अंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत-बिधु, विबुध-कुल कैरवानन्दकारी।
केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन सोक-संतापहारी ॥१॥
जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित चंडकर-मंडल-ग्रास-कर्त्ता।
राहु-रवि-सक्र पवि-गर्व-खर्बीकरन सरन भयहरन जय भुवन-भर्त्ता॥२॥
जयति रनधीर, रघुबीर-हित, देवमनि, रुद्र-अवतार, संसार-पाता।
विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपु, विमलगुन, बुद्धि-वारिधि-विधाता ३
जयति सुग्रीव सिच्छादि रच्छन-निपुन, वालि-बल-सालि-बध-मुख्यहेतू।
जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात-केतू॥४॥
जयति भूतनन्दिनी-सोच-मोचन विपिन-दलन घननादवस विगत संका।
लूम लीला अनल-ज्वालमाला-कुलित, होलिकाकरन लंकेस-लंका॥५॥
जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंदकर, ऋच्छ-कपि कटक-संघट-विधायी।
बद्ध-वारिधि-सेतु, अमर-मंगल हेतु, भानुकुल-केतु-रनविजयदायी ॥६॥
जयति जय वज्र तनु दसन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु-सैल-पानी।
समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, पेरि डारे सुभट घालि घानी ॥७॥
जयति दसकंठ-घटकरन-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता।
अघट घटना-सुघट सुघट-विघटन विकट,भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता॥८
जयति विस्व-विख्यात चानैत-विरुदावली, विदुष वरनत वेद विमल वानी।
दास तुलसी-त्रास-समन सीतारमन, संग सोभित राम-राजधानी ॥९॥
शब्दार्थ—विबुध = देवता । कैरवानन्दकारी = कुमुदिनीको विकसित करनेवाले । चंड-
कर = प्रचण्ड किरणवाले सूर्य । ग्रासकर्त्ता = निगल जानेवाले । सक्र = इन्द्र । पवि = वज्र ।
विनय-पत्रिका ४१
खवींकरन = तोड़नेवाले। पाता = रक्षक। वपु = शरीर। भूनन्दिनी = जानकीजी। आकुलित
= आर्त्त। विधायी = विधानकर्त्ता। तैलिक यन्त्र = कोल्हू। तमीचर = राक्षस। घालि =
डालकर। घटकरन = कुम्भकर्ण। कदन = नाश। सुघट विघटन = सम्भवको असम्भव करने-
वाले। विख्यात = प्रसिद्ध। विदुष = पण्डित।
भावार्थ—हे हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम अंजनीके गर्भरूपी समुद्रसे
उत्पन्न होकर चन्द्रमाके समान देवकुलरूपी कुमुदको विकसित करनेवाले हो।
तुम अपने पिताके शरीरके सुन्दर नेत्ररूपी चकोरोंको सुख देनेवाले और समस्त
लोकोंका शोक-सन्ताप हरनेवाले हो ॥१॥ तुम्हारी जय हो, जय हो। तुमने
बचपनमें उदयकालीन प्रचण्ड रवि-मण्डलको लाल खिलौना समझकर निगल
लिया था। उस समय तुमने राहु, सूर्य, इन्द्र और उनके वज्रका गर्व तोड़ दिया
था। हे शरणागतोंका भय हरनेवाले! हे चौदहो भुवनके स्वामी! तुम्हारी जय
हो ॥२॥ हे युद्धक्षेत्रमें धैर्य धारण करनेवाले महावीरजी, तुम्हारी जय हो! तुम
श्रीरामजीके हितार्थ देव-शिरोमणि रुद्रके अवतार हो और संसारके रक्षक हो।
तुम्हारा शरीर ब्राह्मण, देवता, सिद्ध और मुनियोंके आशीर्वादका साकार रूप
है। तुम निर्मल गुण और बुद्धिसागर तथा विधाता हो ॥३॥ हे उचित शिक्षा
आदिसे सुग्रीवकी रक्षा करनेमें चतुर हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम महापरा-
क्रमी बालिके मरवानेके मुख्य कारण हो। तुम समुद्र लाँघते समय सिंहिका नाम-
की राक्षसीका मद-मर्दन करनेवाले सिंह हो। निशाचरोंकी लंकापुरीमें उत्पात
करनेके लिए केतु हो ॥४॥ हे जानकीजीकी चिन्ताओंको दूर करनेवाले, अशोक
वनको उजाड़नेकी नीयतसे निःशंक होकर अपनेको मेघनादके ब्रह्मास्त्रमें बँधवाने-
वाले, तुम्हारी जय हो। तुमने अपनी पूँछकी लीला द्वारा आगकी ज्वालमालासे
आर्त्त रावणकी लंकापुरीमें होली-दहन-सा मचा दिया था ॥५॥ हे राम और
लक्ष्मणको आनन्दित करनेवाले, तुम्हारी जय हो! तुम रीछ और बन्दरोंकी सेना
संघटित करनेके विधायक होकर समुद्रपर पुल बाँधनेवाले हो, देवताओंका कल्याण
करनेवाले हो और सूर्यकुल-केतु (ध्वजा) श्रीरामजीको संग्राममें विजय-लाभ कराने-
वाले हो ॥६॥ तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम्हारा शरीर, दाँत, नख और विकट
मुँह वज्रके समान हैं। तुम्हारे भुजदंड बड़े प्रचंड हैं। तुम वृक्षों और पर्वतोंको
हाथोंसे उठानेवाले हो। तुमने समर-रूपी तेल पेरनेके कोल्हूमें राक्षस-समूह और
४२ विनय-पत्रिका
बड़े-बड़े योद्धारूपी तिलोंकी घानी डालकर पेर डाला है ॥७॥ हे रावण, कुम्भकर्ण
और मेघनादके नाशके कारण, तथा कालनेमि राक्षसको मारनेवाले, तुम्हारी
जय हो। तुम असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव कर दिखाने-
में बड़े ही विकराल हो। तुम पृथ्वी, पाताल, जल और आकाशमें गमन करने-
वाले हो ॥८॥ हे जगतप्रसिद्ध वाणैत, तुम्हारी जय हो। पण्डित और वेद
विमल वाणीसे तुम्हारी गुणावलीका वर्णन करते हैं। तुम तुलसीदासके भयको
नाश करनेवाले श्रीसीतारमणके साथ अयोध्यापुरीमें सदा शोभायमान रहते हो ॥९॥
विशेष
१—'जयति अंजनी गर्भ-अंभोधि···' में रूपक अलङ्कार है।
२—'केसरी'-नामक वानरकी स्त्रीका नाम अंजनी था। एक दिन अंजनी
शृङ्गार किये खड़ी थी। इतनेमें पवनदेव वहाँ आये और उसके रूपलावण्यपर
मुग्ध हो गये। उन्हींके वीर्यसे अंजनीके गर्भसे हनुमानजीका जन्म हुआ। इसीसे
इन्हें 'केसरी-नन्दन' भी कहते हैं ? यहाँ उसी केसरीका नाम आया है।
३—'ग्रासकर्ता'—अमावस्याका दिन था और प्रातःकालका समय। हनुमान-
जीको बहुत भूख लगी थी। वह उगते हुए सूर्यको लाल फल जानकर उनकी
ओर लपके और देखते-देखते पकड़कर निगल गये। उस दिन ग्रहण भी था।
सूर्यको न देखकर राहु बहुत निराश हुआ और इन्द्रके पास पहुँचकर बोला,
आज मैं क्या खाऊँगा ? सूर्यको किसी दूसरेने ही खा डाला। यह सुनते ही
इन्द्र दौड़े। उन दोनोंको आते देखकर हनुमानजीने उनको भी निगलनेके लिए
हाथ बढ़ाया। इतनेमें इन्द्रने उनपर वज्र चलाया, पर वज्र उनकी ठुड्डीमें लगा।
इससे वह मूर्च्छित हो गये और वज्र भी टूट गया। तभीसे महावीरजीका नाम
हनुमान पड़ा। यह कथा वाल्मीकीय रामायणके उत्तरकाण्डमें लिखी है।
४—'राहु रवि···खर्बीकरन'—जिस समय राहु देवराज इन्द्रके साथ आ
रहा था, उस समय हनुमानजी उसको काला फल समझकर उसकी ओर
लपके थे। इससे राहु भयभीत होकर भाग गया था। सूर्यको वह पहले ही
निगल चुके थे। उनका प्रभाव देखकर इन्द्र भी डर गये थे। जो वज्र पहाड़ोंको