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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 43

३२ विनय-पत्रिका
ग्वाल कवि अधिक अनीतें विपरीतें भईं दीजिये तुराय वेगि कुलपकिवारे कों ।
हम ना लिखेंगे वही गमना जु खैहैं हम जमुना बिगारें देत कागज हमारे को ॥
काशी-स्तुति
राग भैरव
(२२)
सेइय सहित सनेह देह-भरि, कामधेनु कलि कासी।
समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल-रासी ॥१॥
मरजादा चहुँ ओर चरन वर, सेवत सुरपुर-वासी।
तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अविनासी ॥२॥
अंतरऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ वेद-विस्वासी।
गलकंबल बरुना विभाति जनु, लूम लसति सरिताऽसी ॥३॥
दंडपानि भैरव विषाण, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।
लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥
मनिकर्निका बदन-ससि सुन्दर, सुरसरि-सुख सुखरा-सी।
स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी ॥५॥
विस्वनाथ पालक कृपालु चित, लालति नित गिरिजा-सी।
सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मन जोगवति रहति रमा-सी॥६॥
पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गव्य सुपंचनदा-सी।
ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर बिस्व-विकासी ॥७॥
चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी।
लहत परम पद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥८॥
कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी।
तुलसी बसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी ॥९॥
शब्दार्थ—अन्तर अयन = अन्तरगृही। बच्छ = बछड़ा। गलकंबल = गायके गलेमें
लटकती हुई खाल, यानी लुलरी। विभाति = शोभित। लूम = पूँछ। विषाण = सींग।