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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 50

विनय-पत्रिका ३९
मनुष्यको जानना चाहिए, पर हे तुलसीदास, तुझे विशेषरूपसे समझना चाहिए;
क्योंकि तुझे उस एकहीका विश्वास, प्रेम और भरोसा है ॥६॥
विशेष
१—'जहँ जनमे हरिहर'—चित्रकूटमें महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता
धर्मपत्नी अनुसूया देवीने पुत्र-कामनासे घोर तपस्या की। ब्रह्मा, विष्णु और
महादेवजीने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा। अनुसूयाने यह वर माँगा
कि मेरे गर्भसे तुम्हारे समान पुत्र उत्पन्न हों। तीनों देवता 'तथास्तु' कहकर
अन्तर्द्धान हो गये। उसके बाद ब्रह्माने चन्द्रमाके रूपमें, विष्णुने दत्तात्रेयके
रूपमें और शिवने दुर्वासाके रूपमें अनुसूयाके गर्भसे जन्म लिया।
२—'परिहरि प्रपंच छल'—का आशय यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिवने
अपना-अपना निर्दिष्ट कार्य (उत्पत्ति, पालन और संहार) छोड़कर निष्छल भावसे
जन्म लिया।
३—'पारथ नलु'—जुएमें हारकर राजा नल और युधिष्ठिरादि पाण्डव
वन-वन भटकते हुए चित्रकूटमें पहुँचे थे। उन लोगोंने कामतानाथकी पूजा
की थी और अपनी मनोभिलाषा पूर्ण करनेके लिए प्रार्थना की थी। उस समय
पाण्डवोंने यह संकल्प किया था कि यदि हम लोग युद्धमें दुर्योधनको हरा देंगे
तो फिर आकर कामतानाथगिरिका पूजन करेंगे। परिणाम यह हुआ कि राजा
नल और धर्मराज युधिष्ठिरकी मनोभिलाषा पूरी हो गयी। यह कथा चित्रकूट-
माहात्म्यमें विस्तारपूर्वक है।
४—'महाफलु'—का अर्थ है 'राम-पद-प्रेम'। क्योंकि अर्थ, धर्म, काम,
मोक्ष—ये चारों फल हैं। यदि यहाँ इसका अर्थ केवल मोक्ष किया जाय, जैसा
कि अधिकांश टीकाकारोंने किया है—तो भी ठीक नहीं। क्योंकि गोस्वामीजी
मोक्षके भूखे नहीं थे। भक्त तो कभी 'राम-पद-प्रेम' के सिवा दूसरी वस्तु
चाहता ही नहीं। देखिये भरतजी क्या कहते हैं:—
'अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरवान।
जनम जनम रति रामपद, यह वरदानु न आन ॥'
इसके सिवा गोस्वामीजीने जिन-जिन देवताओंकी स्तुति की है, सबसे