विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
विनय-पत्रिका ३०१
कुत्ते और सूअरके समान व्यर्थ जीता है ॥१॥ यों तो काम, क्रोध, मद, लोभ,
नींद, भय, भूख और प्यास सबमें है, किन्तु जिस कारणसे देवता और साधु लोग
मानव-शरीरकी सराहना करते हैं वह केवल जानकीनाथके स्नेहके कारण ॥२॥
कोई कितना ही वीर, चतुर, सुपुत्र, सुन्दर लक्षणोंवाला तथा गुण और गम्भीरता-
में गणना करने योग्य क्यों न हो, भगवद्भजनके बिना वह इन्दारुन (इन्द्रायण)
फलके समान है, जो अपना कड़वापन नहीं छोड़ता ॥३॥ कीर्ति, कुल, करतूत
(कर्तव्य) और अच्छी विभूति हो, शील हो, सलोना स्वरूप हो, किन्तु
तुलसीदास कहते हैं कि यदि प्रभुजीमें अनुराग नहीं है तो यह ठीक वैसे ही है
जैसे अलोना (बिना नमकके) साग और कढ़ी ॥४॥
विशेष
१—'तौ नर……माहीं'—गुसाईंजीने ऐसी ही फटकार कवितावलीमें भी
सुनायी है:—
तिन तें खर सूकर स्वान भले जड़ता बस ते न कहै कछु वै ।
तुलसी जेहि रामसों नेह नहीं सो सही पसु पूँछ विषानन द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास भई किन बाँझ गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवन जानकिनाथ रहै जग में तुम्हरो बिनु ह्रै ॥
२—'इन्दारुन'—का फल देखनेमें बड़ा सुन्दर, पर कड़वा होता है।
३—वियोगी हरिजीने 'सालन साग' का अर्थ 'साग भाजी' किया है।
किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं। 'सालन' कहते हैं 'कढ़ी' को। इलाहाबादके पश्चिमी
भागमें 'सालन' 'दाल' को भी कहते हैं।
[ १७६ ]
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेहु न नातो।
एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो ॥१॥
जोरे नये नाते नेहु फोकट फीके।
देह के दाहक, गाहक जीके ॥२॥
अपने अपने को सब चाहत नीको।
मूल दुहूँको दयालु दूलह सी को ॥३॥
३०२ | विनय-पत्रिका
जीवको जीवन प्रान को प्यारो।
सुखहू को सुख राम सो बिसारो ॥४॥
कियो करैगो तोसे खल को भलो।
ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यों चलो ॥५॥
तुलसी तेरी भलाई अजहू बूझै।
राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै ॥६॥
शब्दार्थ—हातो = पृथक् हुआ। फोकट = मुफ्तमें, व्यर्थ ही। सी = जानकीजी। राढ़उ
= कायर भी। राउत = वीर। जूझै = लड़ता है।
भावार्थ—रे नीच! तूने राम-सरीखे अच्छे स्वामीसे न तो स्नेह ही किया
और न कोई नाता ही रखा। यद्यपि तूने उनका इतना निरादर किया,
फिर भी उन्होंने तुझे नहीं छोड़ा ॥१॥ तूने मुफ्तमें नये-नये फीके नाते और
स्नेह जोड़ लिये जो कि शरीरको जलानेवाले और जानके ग्राहक (मारने-
वाले) हैं ॥२॥ अपना और अपने प्रियजनोंका भला सब लोग चाहते हैं, पर
दोनोंके मूल कारण (कल्याण करनेवाले) दयालु जानकीनाथ ही हैं ॥३॥ तूने
राम-सरीखे जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्यारे और सुखोंके सुखको भुला दिया ॥४॥
उन्होंने तुझ-सरीखे खलका भला किया है और भविष्यमें भी करेंगे। ऐसे अच्छे
स्वामीसे तूने कुचाल क्यों चली या उनके साथ बुरा बर्ताव क्यों किया ? ॥५॥
हे तुलसी! तेरे समझ जानेपर या चेत जानेपर अब भी तेरी भलाई हो सकती
है। क्योंकि लड़ाईसे भागा हुआ कायर पुरुष भी जब वापस आकर लड़ता है,
तो शूरवीर हो जाता है ॥६॥
[ १७७ ]
जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं त्यागौं।
परिहरि पाँय काहि अनुरागौं ॥१॥
सुखद सुप्रभु तुम सो जग माहीं।
श्रवन-नयन मन-गोचर नाहीं ॥२॥
हौं जड़ जीव, ईस रघुराया।
तुम मायापति, हौं बस माया ॥३॥
विनय-पत्रिका ३०३
हौं तो कुजाचक, स्वामि सुदाता।
हौं कपूत, तुम हितु पितु-माता ॥४॥
जो पै कहुँ कोउ बूझत बातो।
तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो ॥५॥
शब्दार्थ—हौ = मैं। अनुरागों = प्रेम करूँ। कुजाचक = निकृष्ट, भिखमंगा।
भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप मुझे त्याग भी दें, तो भी मैं आपको नहीं
छोड़ सकता। (आप ही बतायें कि) मैं आपके चरणोंको छोड़कर और किससे
प्रेम करूँ? ॥१॥ संसारमें आपके समान सुख देनेवाले अच्छे स्वामी कान, आँख,
मन, इन्द्रियोंके विषय नहीं हुए। अर्थात् आप सरीखा स्वामी मैंने न तो कानोंसे
सुना है, न आँखोंसे देखा है, और न मनमें ही निश्चय होता है कि ऐसा कोई
दूसरा स्वामी है ॥२॥ मैं मूर्ख जीव हूँ और आप ईश्वर हैं। आप मायापति हैं,
और मैं मायाके अधीन हूँ ॥३॥ मैं निकृष्ट याचक (मंगन) हूँ, और आप
स्वामी हैं, अच्छे दाता हैं। मैं, आपका कपूत हूँ और आप हित करनेवाले मेरे
माता-पिता हैं ॥४॥ यदि कहीं कोई मेरी बात पूछता, तो मैं अर्थात् यह तुलसी
दास बिना मोल उसके हाथ बिक जाता। तात्पर्य यह है कि यदि कोई मेरा
ग्राहक होता, तो मैं आपको कष्ट न देता—उसीका हो जाता ॥५॥
[ १७८ ]
भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी।
आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥१॥
जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये।
प्रेम-नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥२॥
मीन तें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीन को।
जल बिनु थल कहा मीचु बिनु झीन को ॥३॥
बड़े ही की ओट बलि वाँचि आये छोटे हैं।
चलत खरे के सङ्ग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥४॥
यहि दरबार भलो दाहिनेहु-वाम को।
मोको सुखदायक भरोसो राम-नाम को ॥५॥
३०४ विनय-पत्रिका
कहत नसानी है हैं हिये नाथ नीकी है।
जानत कृपानिधान तुलसीके जीकी है ॥६॥
शब्दार्थ—बावरी = पागलोंकी तरह । घन = मेघ । जीवन = पानी । मीन = मछली ।
पीन = पुष्ट । मीच = मृत्यु । दाहिना = अनुकूल ।
भावार्थ—हे रामजी ! आपके उदासीन हो जानेपर भी मुझे तो केवल आप
हीकी आशा है। दुःखी और स्वार्थी मनुष्य सारी बातें पागलोंकी तरह कहता
है ॥१॥ जो मेघ (पपीहेका) जीवनदाता है, उस पपीहेको किस बातकी चाहना
है ? किन्तु प्रेमका नेम निबाहनेके कारण चातककी सराहना होती है। भाव यह
कि मेघ बिना किसी स्वार्थके पपीहेको स्वातिका जल देकर जीवनदान देता है,
फिर भी उसकी तारीफ नहीं होती, किन्तु अपूर्व प्रेम देखकर प्रशंसा होती है
पपीहेकी ॥२॥ पवित्र और पुष्टिकारक जलको मछलीसे लेशमात्र भी
लाभ नहीं है; किन्तु क्या मछलीके लिए जलको छोड़कर कोई ऐसा स्थल है जहाँ
वह मौतसे बच सके ? तात्पर्य यह कि परमात्माका इस जीवसे कोई लाभ नहीं
है, पर यह जीव परमात्माको छोड़कर कहीं रक्षा नहीं पा सकता ॥३॥ मैं आपकी
बलैया लेता हूँ। छोटे लोग हमेशा बड़ोंकी ही ओटमें रक्षा पाते आये हैं। जहाँ-
तहाँ खरेके साथ खोटे भी चल जाते हैं (जैसे खरे रुपयोंके साथ खोटे ,रुपये)
॥४॥ इस दरबारमें अनुकूल और प्रतिकूल सबका भला होता आया है। इसीसे
मुझे तो शुभ दायक केवल राम-नामका भरोसा है ॥५॥ हे नाथ ! कहनेमें
खराबी होगी (कहते न बनेगा), उसे हृदयमें ही रखना अच्छा है। क्योंकि हे
कृपानिधान ! आप तो तुलसीके दिलकी बातको जानते ही हैं (अतः कहनेकी
कोई जरूरत नहीं) ॥६॥
राग बिलावल
[ १७९ ]
कहाँ जाउँ, कासों कहौं, कौन सुनै दीन की।
त्रिभुवन तुही गति सब अङ्गहीन की ॥१॥
विनय-पत्रिका ३०५
जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं।
निराधार के अधार गुनगन तेरे हैं ॥२॥
गजराज-काज खगराज तजि धायो को।
मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय-जायो को ॥३॥
मोसे क्रूर कायर कपूत कौड़ी आध के।
किये बहुमोल तैं करैया गीध-स्राध के ॥४॥
तुलसी को तेरे ही बनाये, बलि, बनैगी।
प्रभुकी विलंब-अंब दोष-दुख जनैगी ॥५॥
शब्दार्थ—अंगहीन = असहाय। घनेरे = बहुतसे। खगराज = गरुड़। जायो = पैदा
किया है।
भावार्थ—कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, दीनकी कौन सुनता है ? तीनों लोकमें
सब असहायोंकी गति एकमात्र आप ही हैं। ॥१॥ यों तो संसारमें घर-घरमें
बहुतसे जगदीश हैं, पर निराधारके लिए आपके गुणोंका ही आधार है ॥२॥
गजेन्द्रकी रक्षाके लिए गरुड़को छोड़कर (पैदल) कौन दौड़ा था ? मेरे जैसे महा
अपराधीका पोषण करनेवाला आप सरीखा पुत्र और किस माताने पैदा किया
है ? ॥३॥ मेरे जैसे क्रूर, कायर, कपूत और आधी कौड़ीके मूल्यवालोंको आपने
बहुमूल्य कर दिया। आप गीध जटायुका श्राद्ध करनेवाले हैं ॥४॥ बलिहारी !
आपहीके बनाये तुलसीकी बन सकेगी। हे प्रभो ! आपकी विलम्बरूपी माता दोष
और दुःख पैदा करेगी। तात्पर्य यह है कि यदि आप मुझपर कृपा करनेमें देर
करेंगे, तो वह देर ही मेरे लिए दोष और दुःख उत्पन्न करनेवाली जननी हो
जायगी ॥५॥
विशेष
१—'गजराज...धायोको'—गजेन्द्रकी रक्षाके लिए भगवान् पैदल ही दौड़े
थे। ८३ वें पदके विशेषमें देखिये।
२—'गीध-स्राधके'—२१५ वें पदके विशेषमें देखिये।
[ १८० ]
बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो।
राय दसरथके तू उथपन-थापनो ॥१॥
२०
३०६ विनय-पत्रिका
साहिब सरनपाल सबल न दूसरो।
तेरो नाम लेत ही सुखेत होत ऊसरो ॥२॥
वचन करम तेरे मेरे मन गड़े हैं।
देखे सुने जाने मैं जहान जेते बड़े हैं॥३॥
कौन कियो समाधान सनमान सीला को।
भृगुनाथ सो रिषी जितैया कौन लीला को ॥४॥
मातु-पितु-बन्धु-हित, लोक-वेदपाल को।
बोल को अचल, नत करत निहाल को ॥५॥
संग्रही सनेहबस अधम असाधु को।
गीध सबरी को कहौ करि है सराघु को ॥६॥
निराधार को अधार, दीन को दयालु को।
मीत कपि-केवट-रजनिचर-भालु को ॥७॥
रंक निरगुनी, नीच जितने निवाजे हैं।
महाराज ! सुजन-समाज ते विराजे हैं ॥८॥
साँची बिरुदावली न बढ़ि कहि गई है।
सीलसिंधु ! ढील तुलसी की बेर भई है ॥९॥
शब्दार्थ-बारुक = एक बार । उथपन = उखड़े हुए । थापनो = जमानेवाले । सीला =
शिला, अहल्या । निवाजे = कृपा की ।
भावार्थ-बलिहारी ! एक बार मेरी ओर देखकर मुझे अपना बना लीजिये ।
हे महाराज दशरथके लाल ! आप उखड़े हुएको जमानेवाले हैं ॥१॥ शरणागतों-
को पालनेवाला सबल स्वामी (आपके अतिरिक्त) दूसरा कोई नहीं है । आपका
नाम लेते ही ऊसर भी उपजाऊ खेत हो जाता है; अर्थात् आपके नामके प्रभाव-
से मूढ़ हृदयमें भी भक्तिका उद्रेक उमड़ने लगता है ॥२॥ आपके वचन और
कर्म मेरे मनमें गड़ गये हैं । संसारमें जितने बड़े-बड़े लोग हैं, सबको मैंने देखा,
सुना और समझा है ॥३॥ शिला (अहल्या) को सम्मानपूर्वक शान्ति किसने
दी ? परशुराम जैसे ऋषिको सहजहीमें जीतनेवाला कौन है ? ॥४॥ माता,
पिता और भाईके लिए लोक तथा वेदोंकी मर्यादा पालनेवाला कौन है ?
अपने शब्दोंपर दृढ़ रहनेवाला कौन है ? प्रणाम करनेवालेको निहाल करनेवाला
विनय-पत्रिका ३०७
कौन है ? ॥५॥ स्नेहवश पापियों और असाधुओंका संग्रह करनेवाला कौन है ?
कहिये तो सही, गीध और शबरीका श्राद्ध कौन करेगा ? ॥ निरवलम्बका
अवलम्ब और दीनोंपर दया करनेवाला कौन है ? (यह सब करनेवाले) बन्दर,
केवट, निशाचर और रीछके मित्र (श्रीरामजी) हैं—(दूसरा कोई नहीं) ॥७॥
हे महाराज ! आपने जितने कंगाल, मूर्ख और नीचोंपर कृपा की है, वे सब सन्त-
समाजमें जा बैठे हैं ॥८॥ यह सब आपकी सच्ची बिरदावली है, जरा भी बढ़ा-
कर नहीं कही गयी है । किन्तु हे शीलके समुद्र ! (यह जरूर कहूँगा कि) तुलसी-
की बेर (आपकी ओरसे) ढिलाई हुई है ॥९॥
विशेष
१—‘सीला’—अहल्या; ४३ वें पदके विशेषमें देखिये ।
२—‘गीध’—८३ वें पदके विशेषमें देखिये ।
३—‘सबरी’—१०६ वें पदके विशेषमें देखिये ।
[ १८१ ]
केहू भाँति कृपासिन्धु मेरी ओर हेरिये ।
मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥१॥
सहस सिलातें अति जड़ मति भई है ।
कासों कहौं, कौने गति पाहनहिं दई है ॥२॥
पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं ।
कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं ॥३॥
करम-कपीस वालि-बली-त्रास-त्रस्यो हौं ।
चाहत अनाथ-नाथ ! तेरी बाँह बस्यो हौं ॥४॥
महा मोह-रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं ।
त्राहि, तुलसीस ! त्राहि, तिहूँ ताप तयो हौं ॥५॥
शब्दार्थ—हेरिये=देखिये । सुटेक=सहारा । कौसिक=विश्वामित्र । भियो हौं=डर
गया हूँ । हयो=हुआ ।
भावार्थ—हे कृपासिन्धु ! आप किसी प्रकार मेरी ओर देखिये । मुझे दूसरा
कोई ठौर नहीं है, एक आपहीका सहारा है ॥१॥ मेरी बुद्धि हजारों पत्थरके
३०८ विनय-पत्रिका
समान (पत्थरसे हजार गुना अधिक) जड़ हो गयी है। किससे कहूँ कि आपने
किस प्रकारकी गति पत्थरको (अहल्याको) दी है ॥२॥ विश्वामित्रकी तरह मैं भी
आपके चरणोंमें प्रेमरूपी यज्ञ करना चाहता हूँ। किन्तु कलिके पापरूपी दुष्टोंको
देखकर मेरे हृदयमें गहरा भय पैदा हो गया है ॥३॥ मैं कर्मरूपी बन्दरोंके बली
राजा बालिके त्राससे त्रस्त हूँ। अतः हे अनाथोंके नाथ ! मैं आपकी
भुजाओंके सहारे (सुग्रीवकी भाँति) बसना चाहता हूँ ॥४॥ महा मोहरूपी रावण
है और विभीषणकी तरह मैं हुआ हूँ। हे तुलसीके स्वामी ! त्राहि, त्राहि !
मैं तीनों तापोंसे तप गया हूँ (मेरी रक्षा कीजिये) ॥५॥
विशेष
१—'पाहनहिं'—अहल्याको, ४३ वें पदके विशेषमें देखिये।
[ १८२ ]
नाथ ! गुनगाथ सुनि होत चित चाउ सो।
राम रीझिबेको जानौं भगति न भाउ सो ॥१॥
करम, सुभाउ, काल, ठाकुर न ठाउँ सो।
सुधन न सुतन न सुमन सुआउ सो ॥२॥
जाचौं जल जाहि कहै अमिय पिआउ सो।
कासों कहौं काहू सों न बढ़त हियाउ सो ॥३॥
बाप ! बलि जाउँ, आपु करिये उपाउ सो।
तेरे ही निहारे परै हारेहू सुदाउ सो ॥४॥
तेरे ही सुझाये सूझै असूझ सुझाउ सो।
तेरे ही बुझाये बूझै अबुझ बुझाउ सो ॥५॥
नाम-अवलंबु-अंबु दीन मीन-राउ सो।
प्रभुसों बनाइ कहौं जीह जरि जाउ सो ॥६॥
सब भाँति बिगरी है एक सुबनाउ सो।
तुलसी सुसाहिबहिं दियो है जनाउ सो ॥७॥
शब्दार्थ-गाथ = समूह । सुआउ = अच्छी आयु । हियाउ = हिम्मत,साहस । बुझाये =
समझाने से । अबुझ = अज्ञ । अंबु = जल । जनाउ = जना देना, बता देना ।
विनय-पत्रिका ३०९
भावार्थ—हे नाथ ! आपकी गुणावली सुनकर मेरे चित्तमें आनन्द-सा
होता है; किन्तु हे रामजी ! मैं आपको रिझानेवाला भक्ति-भाव जानता ही नहीं
॥१॥ कर्म, स्वभाव, काल, स्वामी और ठौर ये सब अनुकूल नहीं हैं। तात्पर्य,
न तो मेरे कर्म अच्छे हैं, न स्वभाव अच्छा है, न समय अच्छा है (कलिकाल
है), न कोई मालिक अनुकूल है और न कहीं ठौर-ठिकाना है। न मजेदार
धन है, न बढ़िया (नीरोग) शरीर है, न पवित्र मन है और न बड़ी आयु है
॥२॥ जिस किसीसे मैं पानी माँगूँगा, वही (उलटा) मुझसे कहेगा कि तू
अमृत पिला अर्थात् यदि मैं किसी देवतासे कुछ माँगूँ भी तो वह पहले ही मुझसे
भरपूर दक्षिणा माँगेगा। (इसीसे मैं सोचता हूँ कि) किससे कहूँ, किसीसे कुछ
माँगनेके लिए साहस नहीं बढ़ता ॥३॥ हे परमपिता ! मैं आपकी बलि जाऊँ !
आप ही मेरे लिए उपाय कीजिये। आपके देखते ही हारनेपर भी अच्छा दाँव
हाथ आ जायगा ॥४॥ आपहीके सुझानेसे सूझ सकता है। इसलिए आप इस
असूझ (अन्धे) को सुझा दीजिये। आपहीके समझानेसे यह अज्ञ समझ सकता
है, अतः आप इसे समझा दीजिये ॥५॥ मुझ दीन मत्स्य-राजके लिए आपके
नामका सहारा जलके समान है। यदि मैं यह बात स्वामीसे बनाकर कहता
होऊँ, तो मेरी जीभ जल जाय ॥६॥ मेरी सब तरहसे बिगड़ चुकी है, केवल एक
बात करते बन पड़ी है कि इस तुलसीदासने आप जैसे अच्छे स्वामीको अपना
हाल जना दिया है—स्वामीके कानोंमें डाल दिया है ॥७॥
विशेष
१—'जाचौं जल......सो'—इसका आशय यह भी हो सकता है कि यदि
मैं प्यासा होनेपर किसीसे पानी माँगता हूँ तो वह मुझे सिद्ध समझकर मुझसे
धन, सन्तान आदि माँगता है। इससे मेरे लिए जीवन निर्वाह करना भी कठिन
हो गया है।
राग आसावरी
[ १८३ ]
राम ! प्रीतिकी रीति आप नीके जनियत है।
बड़ेकी बड़ाई, छोटेकी छोटाई दूरि करै,
ऐसी विरुदावली, बलि, वेद मनियत है ॥१॥
३१० विनय-पत्रिका
गीधको कियो सराध, भीलनी को खायो फल,
सोऊ साधु-सभा भली भाँति भनियत है।
रावरे आदरे लोक वेद हूँ आदरियत,
जोग ग्यान हूँ ते गरु गनियत है ॥२॥
प्रभुकी कृपा कृपालु ! कठिन कलि हूँ काल,
महिमा समुझि उर अनियत है।
तुलसी पराये बस भये रस अनरस,
दीनबन्धु ! द्वारे हठ ठनियत है ॥३॥
शब्दार्थ—नीके = अच्छी तरह । भनियत है = कही जाती है । गरु = भारी ।
भावार्थ—हे रामजी ! आप प्रीतिकी रीति अच्छी तरह जानते हैं। बलि-
हारी ! वेद आपकी विरुदावलीको इस प्रकार मानते हैं कि आप बड़ेका बड़प्पन
और छोटेका छोटापन दूर कर देते हैं। अर्थात् आप बड़ोंके अभिमानको कुचल-
कर उसे धूलमें मिला देते हैं और दीन भक्तोंको अपनी कृपादृष्टि फेरकर श्रेष्ठ बना
देते हैं ॥१॥ आपने गीधका श्राद्ध किया और शबरीके फल खाये, यह बात भी
साधु-सभामें अच्छी तरह बखानी जाती है। जिसका आप आदर करते हैं, वह
लोक और वेद दोनोंमें आदरणीय हो जाता है। आपका आदर करना, योग
और ज्ञानसे भी अधिक वजनदार समझा जाता है ॥२॥ हे प्रभो ! आपकी कृपा
बड़ी कृपालु है। उसकी महिमा समझकर इस कठिन कलिकालमें भी उसे अपने
हृदयमें लाता हूँ । यदि तुलसी दूसरोंके वशमें हो जायगा तो सब रस फीका पड़
जायगा—रंगमें भङ्ग पड़ जायगी। इसीसे हे दीनबन्धु ! वह (और किसीके
अधीन न होकर) आपहीके द्वारपर हठ ठाने पड़ा है ॥३॥
विशेष
१—'गीध'—८३ वें पदके विशेषमें देखिये ।
२—'भीलनी'—शबरी; १०६ वें पदके विशेषमें देखिये ।
३—'तुलसी······ठनियत है'—इसका यह अर्थ भी हो सकता है—
“यद्यपि तुलसी दूसरोंके (विषयों या इन्द्रियोंके) वशमें होनेके कारण आपके
विनय-पत्रिका ३११
प्रेमसे विमुख हो रहा है, तथापि हे दीनबन्धु ! वह आपके द्वारपर सत्याग्रह
किये बैठा है ।
[१८४]
राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि ।
कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये,
जैसे तम नासिबेको चित्रके तरनि ॥१॥
करम-कलाप परिताप पाप-साने सब;
ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि ।
दंभ, लोभ, लालच, उपासना बिनासि नीके
सुगति साधन भई उदर भरनि ॥२॥
जोग न समाधि निरुपाधि न विराग-ग्यान,
बचन बिसेष बेष, कहूँ न करनि ।
कपट कुपथ कोटि, कहनि-रहनि खोटि,
सकल सराहँ निज निज आचरनि ॥३॥
मरत महेस उपदेस हैं कहा करत,
सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि ।
राम-नाम को प्रताप हर कहैं, जपैं आपु
जुग जुग जानै जग, बेदहूँ वरनि ॥४॥
मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों,
गति राम-नाम ही की बिपति-हरनि ।
राम-नाम सों प्रतीति प्रीति राखे कवहूँक,
तुलसी ढरैंगे राम अपनी ढरनि ॥५॥
शब्दार्थ—अपाय = व्यर्थ; विनाश; यथा, 'सा काशी त्रिपुरारि राजनगरी पायाद्-
पायाज्जगत्।'—इति काशीखंडम् । तरनि = सूर्य । कलाप = समूह । परिताप = दुःख ।
ढरनि = स्वभावानुसार ।
भावार्थ—रामका नाम जपनेसे दिलकी जलन मिट जाती है । इस कलि-
कालमें और जितने दूसरे उपाय हैं वे वैसे ही अपाय (व्यर्थ) हो गये हैं जैसे
अन्धकार दूर करनेके लिए चित्राङ्कित सूर्य ॥१॥ कर्मोंका समूह दुःखों और
३१२ विनय-पत्रिका
पापोंसे वैसे ही सना हुआ है जैसे किसी वृक्षमें मुफ्तमें सुन्दर फूल फूलें, पर
फल न लगें। भाव यह कि यज्ञ-यागादि साधन देखने-सुननेमें तो बड़े अच्छे
हैं, पर करनेमें बड़े कठिन हैं, बीचमें ही कोई विघ्न पड़ जाता है, परिश्रम व्यर्थ
चला जाता है। दम्भ, लोभ और लालचने उपासनाका भली भाँति नाश कर
डाला है, मोक्षका साधन (ज्ञान) पेट भरनेका उपाय हो गया है। (इस प्रकार
कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनोंकी दुर्गति हो रही है) ॥२॥ न तो योग ही
करते बनता है और न समाधि ही उपाधि-रहित है; ज्ञान-वैराग्य भी लम्बी-चौड़ी
बातें करने तथा भेष बनानेके लिए रह गये हैं। करनी कहीं भी नहीं है। कपट-
पूर्ण करोड़ों मार्ग हैं, कहनि और रहनि (कहना और रहन-सहन) खोटी हो गयी
है; सब लोग अपने-अपने आचरण की सराहना करते हैं ॥३॥ शिवजी गंगाजी-
के किनारे काशीकी धर्म-भूमिपर किसीके मरते समय उसे क्या उपदेश करते हैं ?-
उस समय शिवजी राम-नामका प्रताप कहते हैं; स्वयं भी उसे जपते हैं। युग-युग
से संसार इसे जानता आ रहा है और वेद भी यही कहते हैं ॥४॥ केवल राम-
नाममें ही बुद्धि लगाना; राम-नामसे ही प्रेम करना और राम-नामसे ही गति
मानना विपत्तिको हरनेवाला साधन है। तुलसीदास कहते हैं कि राम-नाममें
विश्वास और प्रेम रखनेसे कभी-न-कभी श्रीरामजी अपने स्वभावानुसार अवश्य
ही पिघलेंगे ॥५॥
विशेष
१—'उपाय ते अपाय'—इसपर हितोपदेशकी एक कथा लिखी जा रही है।
एक पेड़पर बहुतसे बगुले रहते थे। उनके बच्चे भी बहुतसे थे। उसी वृक्षके
कोटरमें एक सर्प भी रहता था। वह प्रतिदिन दो-चार बच्चोंको खाया करता
था। अन्तमें एक दिन जब यह भेद मालूम हुआ तो बगुलोंको एक यत्न सूझा।
सर्पके कोटरसे लेकर एक नेवलेकी बिलतक मछलियाँ बिछा दी गयीं। नेवला
बिलसे बाहर निकला और मछलियोंको खाता हुआ सर्पके कोटरतक पहुँच
गया। फिर क्या था, नेवले और साँपमें लड़ाई हुई। नेवला उस सर्पको मार-
कर पेड़पर चढ़ गया और बगुलों के बच्चोंको खाने लगा, बहुतोंको तोड़-ताड़कर
मारने लगा। साँप तो दो-चार बच्चोंको खाकर सन्तोष करता था, पर नेवला
क्षणभरमें बहुतोंको सफाया कर गया।—इसी प्रकार उपाय करते अपाय हुआ
करता है। कलिमें राम-नामके सिवा अन्यान्य उपाय ऐसे ही हैं।
२—'मरत......धरनि'—काशीकी महिमाके सम्बन्धमें निम्नलिखित
व्याज-स्तुति देखिये:—
एक दिएँ जहाँ कोटिक होत हैं सो कुरु खेत मैं जाइ अन्हाइय ।
तीरथ राज प्रयाग बड़े मन-वांछितके फल पाइ अघाइय ॥
श्री मथुरा बसि 'केसवदासजू' द्वै भुज तें भुज चार है जाइय ।
कासी पुरीकी कुरीति बुरी जहाँ देह दिएँ पुनि देह न पाइय ॥
—केशवदास (द्वितीय)
[१८५]
लाज न लागत दास कहावत ।
सो आचरन बिसारि सोच तजि, जो हरि तुम कहँ भावत ॥१॥
सकल सङ्ग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग बनावत ।
मो-सम मन्द महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत ॥२॥
हरि निरमल, मलग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत ।
जेहि सर काक कङ्क वक सूकर, क्यों मराल तहँ आवत ॥३॥
जाकी सरन जाइ कोबिद दारुन त्रयताप बुझावत ।
तहूँ गये मद मोह लोभ अति, सरगहुँ मिटत न सावत ॥४॥
भव-सरिता कहँ नाउ सन्त, यह कहि औरनि समुझावत ।
हौं तिनसों हरि ! परम बैर करि, तुम सों भलो मनावत ॥५॥
नाहिंन और ठौर मो कहँ, ताते हठि नातो लावत ।
राखु सरन उदार-चूड़ामनि ! तुलसिदास गुन गावत ॥६॥
शब्दार्थ-भावत = अच्छा लगता है। कङ्क = गीध। वक = बगुला। मराल = हंस।
कोविद = पण्डित, ज्ञानी। सावत = ईर्ष्या, सौतियाडाह। ठौर = जगह। लावत = जोड़ता
हूँ। चूड़ामनि = शिरोमणि।
भावार्थ—हे हरे! आपको जो आचरण भाता है, उसे निश्चिन्ततापूर्वक
भुलाकर आपका दास कहलानेमें मुझे लज्जा भी नहीं मालूम होती ॥१॥ जिसे
निःसंग (आसक्ति-रहित) होकर मुनि लोग भजते हैं, जप, तप, यज्ञ-यागादि
३१४ विनय-पत्रिका
करते हैं, उसे भला मुझ-सरीखा, मन्द, नीच और महाखल किस प्रकार पा
सकता है ? ॥२॥ हरिजी निर्मल हैं, और मेरा हृदय मलसे जकड़ा हुआ है।
अतः (मेरा मल-ग्रसित हृदय) मुझे यह सूचित कर रहा है कि जिस (गन्दे)
तालाबमें कौए, गीध बगुले और सूअर रहते हैं वहाँ हंस क्यों आने लगा ?
(यहाँ तुलसीदासजीने अपने हृदयको गन्दा तालाब बनाया है, काम, क्रोधादिको
कौआ, गीध आदि बनाया है और रामजीको हंस बनाया है।) ॥३॥ जिसकी
शरणमें जाकर ज्ञानी लोग अपने दारुण त्रितापोंको बुझाते हैं, वहाँ जानेपर भी
मुझे मद, मोह और लोभ सतावेंगे, स्वर्गमें भी ईर्ष्या नहीं छूटती ॥४॥
संसाररूपी नदीके पार जानेके लिए सन्तजन नौकारूप हैं, यह कहकर मैं
दूसरोंको समझाया करता हूँ; किन्तु हे नाथ! मैं स्वयं उनसे (सन्तोंसे)
गहरी शत्रुता करके आपसे कल्याणकी कामना करता या मनाता हूँ ॥५॥
मेरे लिए और कहीं ठौर नहीं है, इसीसे मैं जबर्दस्ती आपसे नाता जोड़ रहा
हूँ। हे उदार-चूड़ामणि श्रीरामजी ! तुलसीदास आपके गुण गा रहा है,—
उसे अपनी शरणमें रख लीजिये ॥६॥
[ १८६ ]
कौन जतन बिनती करिये ।
निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये ॥१॥
जेहि साधन हरि ! द्रबहु जानि जन सो हठि परिहरिये ।
जाते बिपति-जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ॥२॥
जानत हूँ मन बचन करम पर-हित कीन्हें तरिये ।
सो बिपरीत देखि पर-सुख, बिनु कारन ही जरिये ॥३॥
स्रुति पुरान सबको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये ।
निज अभिमान मोह ईर्षा बस तिनहिं न आदरिये ॥४॥
संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जातें भवनिधि परिये ।
कहौ अब नाथ, कौन बलतें संसार-सोग हरिये ॥५॥
जब कब निज करुना-सुभाव तें द्रबहु तौ निस्तरिये ।
तुलसिदास बिस्वास आन नहिं, कत पचि-पचि मरिये ॥६॥
विनय-पत्रिका ३१५
शब्दार्थ—अनुसरिये = चलता हूँ । संत्रत = सदैव । सोग = शोक । निस्तरिय = निस्तार,
उद्धार । आन = दूसरा ।
भावार्थ—किस प्रकार विनती करूँ नाथ ! अपने आचरणपर विचार करते
ही, यह जानकर हृदयमें हार मानकर डर जाता हूँ ॥१॥ कि हे हरे ! जिस
साधनसे आप अपना भक्त जानकर द्रवित होते हैं, उसे मैं हठपूर्वक छोड़ रहा
हूँ, और जिसमें विपत्तियोंका जाल है, रात-दिन दुःख है, उसी मार्गका अनु-
सरण करता हूँ ॥२॥ जानता हूँ कि मन, बचन और कर्मसे दूसरोंकी भलाई
करनेसे तर जाऊँगा; फिर भी मैं उसके विपरीत आचरण करता हूँ और
दूसरोंका सुख देखकर अकारण ही जलता हूँ ॥३॥ वेदों और पुराणोंका
यह मत है कि सत्संगको दृढ़ताके साथ पकड़ना चाहिये; किन्तु मैं अपने अभि-
मान, मोह और ईर्ष्याके कारण उनका आदर नहीं करता ॥४॥ सदैव मुझे
वही प्रिय है, जिससे सदा भव-सागरमें पड़ा रहूँ । अतः हे नाथ ! अब आप ही
कहिये कि मैं किस बलसे संसारका शोक दूर करूँ ? ॥५॥ जब कभी आप
अपने कारुणिक स्वभावसे मुझपर पिघलेंगे, तभी मेरा निस्तार होगा । तुलसी-
दासको दूसरेका विश्वास नहीं है, इसलिए वह क्यों (दूसरा उपाय करनेमें)
पच-पचकर मरे ? ॥६॥
[ १८४ ]
ताहिते आयौं सरन सबेरे ।
ग्यान बिराग भगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ ! न मेरे ।
लोभ-मोह-मद-काम-क्रोध रिपु फिरत रैन-दिन घेरे ।
तिनहिं मिले मन भयो कुपथ-रत, फिरै तिहारेहि फेरे ॥१॥
दोष निलय यह बिषय सोक-प्रद कहत संत श्रुति टेरे ।
जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सौं, हरि तुम्हारेहिं प्रेरे ॥३॥
विष पीयूष सम करहु अगिनि हिम, तारि सकहु बिनु बेरे ।
तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाइहौं हेरे ॥४॥
यह जिय जानि रहौं सब तजि रघुवीर भरोसे तेरे ।
तुलसिदास यह विपति बाँगुरो तुम्हहिं सों बनै निबेरे ॥५॥
३१६ विनय-पत्रिका
शब्दार्थ—रैन = रात। निलय = घर। टेरे = पुकारकर। पियूष = अमृत। बेरे =
बेड़ा। बाँगुरो = जाल। निबेरे = काटनेसे।
भावार्थ—इसीसे मैं जल्द आपकी शरणमें आया हूँ। हे नाथ ! मुझमें
ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि साधन स्वप्नमें भी नहीं है ॥१॥ लोभ, मोह, मद,
काम और क्रोधरूपी शत्रु मुझे रात-दिन घेरे रहते हैं। इनके साथ मिला रहनेके
कारण मेरा मन कुमार्गमें रत रहता है, और वह (मन) आपहीके फेरनेसे फिर
सकता है ॥२॥ सन्तजन और वेद पुकारकर कह रहे हैं कि विषय, दोषोंके
घर और शोकप्रद हैं। किन्तु हे हरे ! यह जानते हुए भी मेरा जो उनमें
(विषयोंमें) अत्यन्त अनुराग है, वह आपहीकी प्रेरणासे ॥३॥ आप विषको अमृत
और अग्निको बर्फके समान कर सकते हैं, और विना बेड़ाके ही पार कर सकते
हैं। अपने परम हितके लिए आपके समान समर्थ और कृपालु (स्वामी) मैं फिर
कभी ढूँढ़नेसे भी न पाऊँगा ॥४॥ हे रघुनाथजी ! अपने हृदयमें यही समझकर
मैं सब छोड़छाड़कर आपके भरोसे पड़ा हूँ। क्योंकि तुलसीदासका यह विपत्ति-
जाल आपहीके काटे कटेगा ॥५॥
विशेष
१—'तारि सकहु बिनु बेरे'—का यह भी अर्थ हो सकता है कि 'आप
बिना देर किये' (अविलम्ब) जिसे चाहें 'तार सकते हैं'।
[१८८]
मैं तोहिं अब जान्यो संसार।
बाँधि न सकहि मोहि हरिके बल, प्रगट कपट-आगार ॥१॥
देखत ही कमनीय, कछू नाहिंन पुनि किये बिचार।
ज्यों कदलीतरु-मध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार ॥२॥
तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायौं पार।
महामोह-मृगजल-सरिता महँ बोरयो हौं बारहिं बार ॥३॥
सुनु खल ! छल-बल कोटि किये बस होहिं न भगत उदार।
सहित सहाय तहाँ बसि अब, जेहि हृदय न नन्द-कुमार ॥४॥
तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार।
सो परि डरै मरै रजु-अहि तें बूझे नहिं व्यवहार ॥५॥
विनय-पत्रिका ३१७
निज हित सुनु सठ ! हठ न करहि, जो चहहि कुसल परिवार ।
तुलसिदास प्रभुके दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार ॥६॥
शब्दार्थ—कमनीय = सुन्दर। कदली-तरु = केलेका पेड़। सार = गूदा। सहाय =
सेना। मार = कामदेव।
भावार्थ—ऐ संसार ! मैंने तुझे अब जाना है। प्रकट हो गया कि तू कपट-
का घर है। किन्तु अब तू मुझे बाँध नहीं सकता; क्योंकि अब मुझे भगवान्के
बलका सहारा मिल गया है ॥१॥ तू देखनेमें ही कमनीय है, पर विचार करनेसे
ज्ञात हुआ कि तू कुछ भी नहीं है (मिथ्या है); जैसे केलेके पेड़के भीतर देखनेसे
कभी गूदा नहीं निकलता (वही हाल इस असार-संसारका है) ॥२॥ तेरे लिए
मैं अनेक जन्मोंतक फिरता रहा, पर तेरा पार न पाया; तूने मुझे महामोहरूपी
मृगजलकी नदीमें बारम्बार डुबाया ॥३॥ रे खल ! सुन, करोड़ों छल-बल करने-
से भी ईश्वरके उदार भक्त तेरे वशमें नहीं हो सकते। जिस हृदयमें नन्दलाल
भगवान् श्रीकृष्णका वास न हो, उस हृदयमें तू अपने दल-बलके सहित बस॥४॥
जो तेरा मर्म न जानता हो उसीसे चालाकी कर। वही मनुष्य पड़ी हुई रस्सीमें
सर्पकी भ्रान्ति करके डरकर मर सकता है, जो असली रहस्यको नहीं जानता ॥५॥
रे शठ ! यदि तू अपने परिवारकी कुशल चाहता है, तो हठ न करके अपने
हितकी बात सुन। तुलसीदासके स्वामी श्रीरामजीके भक्तोंको छोड़कर (तू)
उन्हें भज जहाँ काम और मद आदि हों ॥६॥
विशेष
१—'ज्यों कदली······सार'—केलेके खम्भेका छिलका उतारते जाइये और
देखते जाइये, छिलका उतारते-उतारते ही तना खतम हो जायगा, पर उसके
भीतर गूदेका दर्शन न मिलेगा; ठीक वही हाल इस संसारका है। यह इतना
कमनीय होनेपर भी निःसार है।
राग गौरी
[८९]
राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे।
नाहिं तौ भव-बेगारि महँ परिहै, छूटत अति कठिनाई रे ॥१॥
३१८ विनय-पत्रिका
बाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकौन खटोला रे।
हमहिं दिहल करि कुटिल करमचंद मंद मोल बिनु डोला रे ॥२॥
विषम कहार मार-मद-माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे।
मंद-विलंद अमेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥
काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे।
जस जस चलिय दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे ॥४॥
मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँ कर भूला रे।
तुलसिदास भव-त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे ॥५॥
शब्दार्थ- पुरान = पुराना। अठकठ = आठकाठ, लकड़ीके टुकड़े, बेढंगा। सरल =
सड़ा हुआ। खटोला = छोटी खाट। मंद = नीचा। बिलंद = ऊँचा। अमेरा = दरार। कुराय
= कंकड़। बझाऊ = अटकाव। लगाऊ = लगाव। संबल = कलेवा।
भावार्थ- हे भाई ! राम-राम कहता चल, नहीं तो संसाररूपी बेगारमें
(जन्म-मरण के चक्रमें) पड़ जायगा, जहाँसे छूटना बड़ा ही कठिन है किन्तु यदि
तू राम-राम जपता चलेगा तो यमराजके दूतों द्वारा बेगारमें नहीं पकड़ा जा
सकेगा ॥१॥ कुटिल और मन्द कर्मचन्दने (हमारे पूर्व जन्मार्जित पापोंके
प्रारब्धने) बिना दामके हमें डोला दे दिया है; जिसका सब साज बेढंगा है, बाँस
पुराना है और तीन कोनका सड़ा हुआ खटोला है ॥२॥ इस डोलेमें कामके
मदसे या काम रूपी शराबसे मतवाले ऊँचे नीचे कदके कहार लगे हुए हैं
जोकि पैर बटोरकर (कायदेसे पैर रखकर) नहीं चलते। ऊँची-नीची जमीन है,
दरारें फटी हुई हैं, (दलदलकी) दलकन भी है; इन सबके झकोरेसे भारी दुःख
मिलता है ॥३॥ मार्गमें काँटे और कंकड़ बिछे हैं, जगह-जगह पैरोंको लपेटनेवाली
फैली हुई लताओंका अटकाव है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों अपने
(लक्ष्य स्थानसे) दूर होते जाते हैं; रास्ते में न तो बस्ती है, न किसीसे भेंट होती
है, और न अन्य ही कोई लगाव है ॥४॥ अगम मार्ग है, साथमें कलेवा भी नहीं
है, गाँवका नाम भी भूल गया हूँ। हे रामजी ! अब आप अनुकूल हूजिये और
मेरा संसार-भय हर लीजिये ॥५॥
विशेष
यहाँ तीन कोनका खटोला बनाया गया है सत्व, रज, तम-मिश्रित शरीरको ।
विनय-पत्रिका ३१९
शरीर नाशवान् है, इसलिए सरल (सड़ा हुआ) कहा है। शरीरकी रचना
पंचीकृत पंचमहाभूत-पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश-से हुई है; अतः
पंचभूत ही इस शरीररूपी डोलीके साज हैं। अविद्या ही बाँस हैं। प्रारब्ध
ही इस खटोलेका बनानेवाला बढ़ई है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु,
जिह्वा और घ्राण ही विषम कहार हैं और कामनारूपी शराब है। शराबीके पैर
लड़खड़ाते हैं, यहाँ इन्द्रियरूपी मतवाले कहारोंके पैर भी ठिकानेसे नहीं पड़
रहे हैं। इस डोलीमें जीव बैठा है और उसे ईश्वररूपी नगरमें जाना है। मनका
संकल्प-विकल्प ही ऊँची-नीची जमीन है, और पाँचों विषय ही दरारें और
दलदल हैं। मनोरथ ही झकझोरा है। कर्म-मार्ग बड़ा दुर्गम है। उसमें स्थल-
स्थलपर बझाव है—उलझन है। यह शरीररूपी डोली ज्यों-ज्यों कर्म-मार्गपर
जाती है, त्यों-त्यों हम अपने लक्ष्यस्थानसे दूर हटते जाते हैं। अगम मार्ग है,
डोली सड़ी-गली है, कहार उन्मत्त हैं, सत्कर्मरूपी कलेवा भी संगमें नहीं है,
जहाँ जाना है, वहाँका नाम भी भूल गया है, साधु-महात्माओंसे भेंट भी नहीं
होती कि मार्ग पूछा जाय; ऐसी दशामें हम कब गिर जायँगे, पता नहीं।
डोली टूटेगी, तब भी गिर जायँगे, कहार चूकेंगे या फँस जायँगे, तब भी हम
गिर जायँगे, कलेवा नहीं है, अतः लक्ष्यस्थानपर पहुँचनेमें देर लगेगी या बुढ़ापा
आ जायगा तब भी हमारा सर्वनाश हो जायगा। ऐसी दशामें भाई रे ! राम
कहता चल, राम कहता चल। क्योंकि नामके प्रतापसे यदि डोली टूट भी
जायगी तो 'भवबेगारि' (यानी चौरासी लक्ष योनियों)में न फँसना पड़ेगा।
१—'करमचँद'—व्यंगोक्ति है बुरे प्रारब्धके लिए।
२—'लोटन'—शब्दका अर्थ कुछ टीकाकारोंने सर्प भी लिखा है।
३—इस यात्रापर महात्मा कबीरकी बानी भी देखिये:—
दूर गवन तेरो हंसा हो वर अगम अपार ॥
नहिं काया नहिं माया हो ना त्रिगुन पसार ।
चारि बरन उहाँ नाहीं हो ना कुल बेवहार ॥
नौ सौ चौदह विद्या हो ना वेद बिचार ।
जप तप संयम तीरथ हो ना नेम अचार ॥
३२० विनय-पत्रिका
पाँच तत्त्व न उपपति हो परले के पार ।
तीन देव ना तैंतिस हो न दसो अवतार ॥
सोरहो संखके आगे हो साम्यर्थ दरबार ।
स्वेत सिंहासन आसन हो जहाँ सबद् प्रकास ॥
पुरुष रूपका बरनउँ हो गति अपरम्पार ।
कोटि भानु की सोभा हो एक रोम उजार ॥
छर अच्छरसे न्यारा हो सोइ नाम हमार ।
सार सबद् लेइ आये हो मृतलोक मँझार ॥
चारि गुरू मिलि थापल हो जगके कनहार ।
उनकर बहियां उबारहु हो हंसा उतरहु पार ॥
जम्ब दीप कै हंसा हो गहु सबद् हमार ।
साहब कबीरा दीहल हो निरगुन टकसार ॥
२—'विषम कहार'—पर भी कबीरदासजीने कहा है:—
पाये हरिनाम गले कै हरवा ॥
साँकरी खटोलिया रहनि हमारी, दुबरे दुबरे पाँचों कहरवा ।
ताला कुंजी हमें गुरु दीन्हीं, जब चाहो तब खोलो किवरवा ॥
परम प्रीति की चुनरी हमरी, जब चाहो तब नाचो सहरवा ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, बहुरि न आइब एही नगरवा ॥
[ १९० ]
सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह ।
तातें भव-भाजन भयो, सुनु अजहूँ सिखावन एह ॥१॥
ज्यों मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि ।
त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥२॥
दै दै सुमन तिल बासि कै अरु खरि परिहरि रस लेत ।
स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥३॥
करि बीत्यो, अब करतु है, करिबे हित मीत अपार ।
कबहूँ न कोउ रघुबीर सो नेहु निबाहनिहार ॥४॥