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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 326, कुल 475 में से

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पृष्ठ 326

विनय-पत्रिका ३१५
शब्दार्थ—अनुसरिये = चलता हूँ । संत्रत = सदैव । सोग = शोक । निस्तरिय = निस्तार,
उद्धार । आन = दूसरा ।
भावार्थ—किस प्रकार विनती करूँ नाथ ! अपने आचरणपर विचार करते
ही, यह जानकर हृदयमें हार मानकर डर जाता हूँ ॥१॥ कि हे हरे ! जिस
साधनसे आप अपना भक्त जानकर द्रवित होते हैं, उसे मैं हठपूर्वक छोड़ रहा
हूँ, और जिसमें विपत्तियोंका जाल है, रात-दिन दुःख है, उसी मार्गका अनु-
सरण करता हूँ ॥२॥ जानता हूँ कि मन, बचन और कर्मसे दूसरोंकी भलाई
करनेसे तर जाऊँगा; फिर भी मैं उसके विपरीत आचरण करता हूँ और
दूसरोंका सुख देखकर अकारण ही जलता हूँ ॥३॥ वेदों और पुराणोंका
यह मत है कि सत्संगको दृढ़ताके साथ पकड़ना चाहिये; किन्तु मैं अपने अभि-
मान, मोह और ईर्ष्याके कारण उनका आदर नहीं करता ॥४॥ सदैव मुझे
वही प्रिय है, जिससे सदा भव-सागरमें पड़ा रहूँ । अतः हे नाथ ! अब आप ही
कहिये कि मैं किस बलसे संसारका शोक दूर करूँ ? ॥५॥ जब कभी आप
अपने कारुणिक स्वभावसे मुझपर पिघलेंगे, तभी मेरा निस्तार होगा । तुलसी-
दासको दूसरेका विश्वास नहीं है, इसलिए वह क्यों (दूसरा उपाय करनेमें)
पच-पचकर मरे ? ॥६॥
[ १८४ ]
ताहिते आयौं सरन सबेरे ।
ग्यान बिराग भगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ ! न मेरे ।
लोभ-मोह-मद-काम-क्रोध रिपु फिरत रैन-दिन घेरे ।
तिनहिं मिले मन भयो कुपथ-रत, फिरै तिहारेहि फेरे ॥१॥
दोष निलय यह बिषय सोक-प्रद कहत संत श्रुति टेरे ।
जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सौं, हरि तुम्हारेहिं प्रेरे ॥३॥
विष पीयूष सम करहु अगिनि हिम, तारि सकहु बिनु बेरे ।
तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाइहौं हेरे ॥४॥
यह जिय जानि रहौं सब तजि रघुवीर भरोसे तेरे ।
तुलसिदास यह विपति बाँगुरो तुम्हहिं सों बनै निबेरे ॥५॥