सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

विनय-पत्रिका ३११
प्रेमसे विमुख हो रहा है, तथापि हे दीनबन्धु ! वह आपके द्वारपर सत्याग्रह
किये बैठा है ।
[१८४]
राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि ।
कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये,
जैसे तम नासिबेको चित्रके तरनि ॥१॥
करम-कलाप परिताप पाप-साने सब;
ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि ।
दंभ, लोभ, लालच, उपासना बिनासि नीके
सुगति साधन भई उदर भरनि ॥२॥
जोग न समाधि निरुपाधि न विराग-ग्यान,
बचन बिसेष बेष, कहूँ न करनि ।
कपट कुपथ कोटि, कहनि-रहनि खोटि,
सकल सराहँ निज निज आचरनि ॥३॥
मरत महेस उपदेस हैं कहा करत,
सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि ।
राम-नाम को प्रताप हर कहैं, जपैं आपु
जुग जुग जानै जग, बेदहूँ वरनि ॥४॥
मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों,
गति राम-नाम ही की बिपति-हरनि ।
राम-नाम सों प्रतीति प्रीति राखे कवहूँक,
तुलसी ढरैंगे राम अपनी ढरनि ॥५॥
शब्दार्थ—अपाय = व्यर्थ; विनाश; यथा, 'सा काशी त्रिपुरारि राजनगरी पायाद्-
पायाज्जगत्।'—इति काशीखंडम् । तरनि = सूर्य । कलाप = समूह । परिताप = दुःख ।
ढरनि = स्वभावानुसार ।
भावार्थ—रामका नाम जपनेसे दिलकी जलन मिट जाती है । इस कलि-
कालमें और जितने दूसरे उपाय हैं वे वैसे ही अपाय (व्यर्थ) हो गये हैं जैसे
अन्धकार दूर करनेके लिए चित्राङ्कित सूर्य ॥१॥ कर्मोंका समूह दुःखों और