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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 331

३२० विनय-पत्रिका
पाँच तत्त्व न उपपति हो परले के पार ।
तीन देव ना तैंतिस हो न दसो अवतार ॥
सोरहो संखके आगे हो साम्यर्थ दरबार ।
स्वेत सिंहासन आसन हो जहाँ सबद् प्रकास ॥
पुरुष रूपका बरनउँ हो गति अपरम्पार ।
कोटि भानु की सोभा हो एक रोम उजार ॥
छर अच्छरसे न्यारा हो सोइ नाम हमार ।
सार सबद् लेइ आये हो मृतलोक मँझार ॥
चारि गुरू मिलि थापल हो जगके कनहार ।
उनकर बहियां उबारहु हो हंसा उतरहु पार ॥
जम्ब दीप कै हंसा हो गहु सबद् हमार ।
साहब कबीरा दीहल हो निरगुन टकसार ॥
२—'विषम कहार'—पर भी कबीरदासजीने कहा है:—
पाये हरिनाम गले कै हरवा ॥
साँकरी खटोलिया रहनि हमारी, दुबरे दुबरे पाँचों कहरवा ।
ताला कुंजी हमें गुरु दीन्हीं, जब चाहो तब खोलो किवरवा ॥
परम प्रीति की चुनरी हमरी, जब चाहो तब नाचो सहरवा ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, बहुरि न आइब एही नगरवा ॥
[ १९० ]
सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह ।
तातें भव-भाजन भयो, सुनु अजहूँ सिखावन एह ॥१॥
ज्यों मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि ।
त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥२॥
दै दै सुमन तिल बासि कै अरु खरि परिहरि रस लेत ।
स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥३॥
करि बीत्यो, अब करतु है, करिबे हित मीत अपार ।
कबहूँ न कोउ रघुबीर सो नेहु निबाहनिहार ॥४॥