वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर
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७८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर
आत्मपरीक्षा भी पूर्ण रीति से की गई ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
तृतीयाऽध्यायस्य
द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
इति तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥
ओ३म्
अथ चतुर्थोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
पृथिवी आदि ९ द्रव्यों की चतुर्थ सूत्रोक्त उद्देशक्रमानुसार उद्देश लक्षण
और परीक्षायें गत तीन अध्यायों में कर चुके। अब जीवात्मा और परमात्मा=
आत्मा द्रव्य को छोड़कर शेष पृथिवी आदि आठ द्रव्यों के मूल कारण प्रकृति
की परीक्षा करना चाहते हुये आचार्य कणाद मुनि चतुर्थाध्याय का आरम्भ
करते हुये मूल कारण प्रकृति का स्वरूप वर्णन करते हैं:—
१५५—सदकारणवन्नित्यम् ॥ १ ॥
( सत् ) जो हो ( अकारणवत् ) जिस का अन्य कारण न हो ( नित्यम् )
यह नित्य है ॥
जो पदार्थ सत्स्वरूप है, जिस का अन्य कोई कारण भी नहीं, वह नित्य
पदार्थ एक मूल प्रकृति है ॥ १ ॥ और—
१५६–तस्य कार्यं लिङ्गम् ॥ २ ॥
( तस्य ) उस का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( कार्यम् ) कार्य है ॥
अर्थात् उस प्रथम सूत्रोक्त कारणरहित सत्स्वरूप प्रकृति का लिङ्ग उस के
अनेक कार्य हैं जो पृथिवी आदि कार्यस्वरूप से प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥
क्यों जी ! कार्य को कारण का लिङ्ग क्यों माना जावे ? उत्तर:—
१५७–कारणभावात् कार्यभावः ॥ ३ ॥
( कारणभावात् ) कारण के भाव से ( कार्यभावः ) कार्य का भी भाव
होता है ॥
अर्थात् कारण हो तब उस से कोई कार्य उत्पन्न होता है, न हो तो
नहीं। इस लिये कार्य को देखकर अनुमान से कारण की सिद्धि होती है तब
कार्य को कारण का लिङ्ग ( अनुमापक ) क्यों न माना जावे ॥
यह निश्चित नियम है कि जिस के होने से जो हो और न होने से न
हो, वह उस का लिङ्ग ( अनुमान कराने वाला ) होता है । अर्थात् कार्य
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का भाव बिना कारणभाव के नहीं होता, यह अटूट नियम है। संसार में
हम स्थूल पदार्थों को देखते हैं और फिर उन स्थूलों की बनावट में सूक्ष्म
अवयवों के जोड़ देखते हैं और फिर उन सूक्ष्मोँ में भी सूक्ष्मतर अवयवों के
जोड़ देखते हैं तथा फिर सूक्ष्मतर पदार्थों में भी अन्य सूक्ष्मतम अवयवों का
जोड़ देखते हैं, इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, जिस से परे अन्य सूक्ष्म न हो उस
पदार्थ का नाम परमाणु है और वे परमाणु ऐसे अनन्त हैं कि मनुष्य उन
को किसी प्रकार गिन नहीं सकता इस लिये वे किसी प्रकार संख्या में नहीं
आसकते। यद्यपि वे परमाणु अनन्त हैं तथापि उन को सांख्य योग और
वेदान्त में सत्त्व रजस् तमस् भेद से तीन प्रकार का गुण बताया गया है और
न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में परमाणु नाम से पुकारा गया है, इन्हीं
परमाणुओं को श्वेताश्वतर शाखा वाले श्वेत, रक्त और कृष्ण नाम से पुका-
रते हैं, इन्हीं को कहीं प्रकाश, क्रिया और आवरण शक्ति बताया गया है।
इन्हीं परमाणुओं की कोई दिव्य शक्ति है जिस को प्रमाणकुशल लोग भी
पहुंच नहीं सकते, जिस का योगी भी लक्षण नहीं कर सकते और मुमुक्षु
भी जिस का उल्लङ्घन नहीं कर सकते, वैज्ञानिक जिस का लक्षण नहीं कर
सकते वह अप्रज्ञात, अलक्षण, अतर्क्य, अविज्ञेय, अव्यक्त कोई पदार्थ है जो
इन सत्त्वादि गुणों की वा परमाणुओं की साम्यावस्था है, उसी का नाम प्रकृति
है। अनेक ग्रन्थों में देवी, शक्ति, पराशक्ति, माया, महामाया, प्रकृति,
अव्यक्त, अव्याकृत, प्रधान इत्यादि इसी के अनेक नाम हैं। इसी मूल प्रकृति
में ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में प्रलय अवस्था में सम्पूर्ण जगत् सोया
हुवा सा अन्धकार से छिपा हुवा सा लीन हुवा रहता है, उस समय में इस
प्रकृति का नाम 'स्वधा' होता है। जैसा कि वेद में लिखा हैः-
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास॥
ॠ० १०। १२९। २
अर्थात् (प्रलय काल में) न मृत्यु था, न जीवन था, न रात्रि और दिन
का चिह्न था (किन्तु) स्वधा=प्रकृति के सहित वह एक (ब्रह्म) चेतन था
जो निष्कम्प था और उस से परे कुछ न था ॥ २ ॥
इस में स्वधा का अर्थ यह है कि अपने धारण किये हुवे जीवग्रामसहित ॥
तथा इस से अगले मन्त्र ये हैं किः-
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥
कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
अर्थ-(अग्रे तमः आसीत्) प्रलयकाल में अन्धियारा रहता है और (इदं
सर्वमप्रकेतं सलिलम् आ तमसा गूढम्) यह सब चिह्नहित अदृश्य जल सा
अन्धियारे से आच्छादित रहता है। जैसे जल बाष्परूप होकर फिर आकाश
में अदृश्य अप्रकेत हो जाता है, वैसे जगत् भी अव्यक्तभाव में होता है। (यत्
आभू तुच्छये न अपिहितमासीत्) जो जगत् तुच्छ अर्थात् सूक्ष्म अव्यक्तभावा-
पन्न तम से आच्छादित होता है (तत् एकं तपसः महिना अजायत) वह
एक अन्धकारावृत अवस्था के पश्चात् महत्तत्त्वरूप से उत्पन्न होता है अर्थात्
प्रकृति से महत्तत्त्व की उत्पत्ति सब से प्रथम हुवा करती है। इस मन्त्र में यह
कहा है कि प्रथम प्रकृति रहती है, उससे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है। अब इस
से अगले मन्त्र में यह कहा जाता है कि महत्तत्त्व से काम अर्थात् अहङ्कार
की उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥
इस से पूर्वमन्त्र ३ (महिनाऽजायतैकम्०) में महत्तत्त्व की उत्पत्ति
कह चुके हैं। (तदग्रे कामः समविवर्त्तत) उस महत्तत्त्व के पश्चात् काम=
अहङ्कार उत्पन्न होता है, उसी को मन कहते हैं (मनसः रेतः प्रथमं यत्
आसीत्) उस मन का बीज जो पूर्व था (कवयः मनीषा हृदि प्रतीष्य)
विद्वान् लोग बुद्धि से हृदय में विचार करके (असति सतो बन्धुं निरविन्दन्)
असत्-अप्रतीयमान अवस्था में सत्-प्रतीयमान जगत् के बन्धु=बान्धने वाले
कर्म को जानते हैं अर्थात् प्रकृति से जगदुत्पत्ति में पूर्वकल्पकृत कर्म हेतु
होते हैं । निष्प्रयोजन जगद्रचना नहीं होती। इस सब से जीव ब्रह्म
प्रकृति और जीवों के कर्म प्रवाह से अनादि सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥
इस प्रकार महत्तत्त्व और अहङ्कार इन दोनों को सांख्य और योग शास्त्र
में प्रकृति के परिणाम माना गया है तथा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और
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वेदान्त में शुद्ध प्रकृति के भाग विशेष माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में
कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाभेद और प्रक्रियाभेद मात्र है । अहङ्कार के
सत्त्वगुणप्रधान भाग विशेष से ईश्वराज्ञानुकूल प्रत्येक जीव को एक आ-
भ्यन्तर इन्द्रिय मन दिया गया है । अहङ्कार के तमोगुणप्रधान भाग विशेष
से व्यापक दिशा और काल, व्यापक शब्द तन्मात्र, अणुस्पर्श तन्मात्र, रूप,
तन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र; यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों
को न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में द्वयणुक कहते हैं । शब्दतन्मात्र से
आकाश, स्पर्शतन्मात्र से वायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतन्मात्र से जल और
गन्धतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
शङ्का-कार्यलिङ्ग से किसी कारण की सिद्धि तौ अवश्य होती है पर उस
कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान-
१६१-अनित्य इति विशेषतः प्रतिषेधभावः ॥ ४ ॥
(अनित्यः इति) " अनित्य " इस शब्द में (विशेषतः) विशेष का
(प्रतिषेधभावः) निषेध होना पाया जाता है ॥
यदि नित्य कोई पदार्थ नहीं होता तौ " अनित्य " शब्द में नञ् का
अकार किस का निषेध करता ? बस अनित्य कहना भी किसी के नित्य होने
का लिङ्ग है ॥ ४ ॥
यदि कहो कि हम तौ नित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तौ उत्तर-
१६२-अविद्या ॥ ५ ॥
(अविद्या) तो आप की भ्रान्ति है । अर्थात् नित्य की अपेक्षा के विना
अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि अनित्य शब्द में जो निषेधार्थक
अकार है वह नित्य का ही तौ निषेध कर सकता है ॥ ५ ॥
क्यों जी ! यदि पृथिवी आदि तत्त्वों का मूल कारण प्रकृति है, तौ फिर
वह आंख से क्यों नहीं दीखती ? उत्तर-
१६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥
(महति) स्थूल वस्तु में अथवा महत्तत्त्व में (अनेकद्रव्यवत्त्वात्) अनेक
द्रव्यवाला होने से (च) और (रूपात्) रूप से (उपलब्धिः) उपलब्धि
होती है ॥