बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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कुर्यादेव पात्रमूलाकारं पश्चाद् यथाविधि ।
वितस्त्यैकायामकं च वितस्त्यैकोन्नतं तथा ॥ १०१ ॥
नालवत्कल्पयित्वाथ तस्योपरि दृढं यथा ।
सन्धारयेद् यथाछिद्रं पात्रमध्यं भवेदिति ॥ १०२ ॥
चतुर्वितस्त्यायामेन वर्तुलाकारतं क्रमात् ।
तन्नालोर्ध्वमुखं कुर्यात्सुदृढं मनोहरम् ॥ १०३ ॥
पश्चान्मयूखकेशारुमृगचर्म सुशोधितम् ।
आहृत्य क्षारमातृष्णोत्पन्नद्रावकपूरिते ॥ १०४ ॥
भाण्डे निधाय विधिवत् पाचयेद् यामपञ्चकम् ।
सम्यक् प्रक्षालयित्वाथ शुद्धशीतकवारिणा ॥ १०५ ॥
इस प्रकार पात्रमूलाकार बना कर पीछे यथाविधि १ बालिश्त ऊंचा नाल के समान बना कर
उसके ऊपर ऐसे दृढ युक्त करदे जिससे नाल का छिद्र पात्र के मध्य में हो जावे । ४ बालिश्त लम्बाई से
गोलाकार उस नाल का उपरिमुख मनोहर दृढ करे पश्चात् मयूखकेश नाम मृग ( सम्भवत' केसरी सिंह )
के चर्म सुशोधित चार को लाकर आवृष्ण कण्ठुण-ओद्विष तृण से उत्पन्न द्रावक से भरे पात्र में रख कर
विधिवत् ५ प्रहर तक पकावे फिर शुद्ध शीत जल से धोकर—॥ १०१-१०५ ॥
ज्योतिर्मुखी कारुवेल्ली सारस्वतमतं परम् ।
एतेषा बीजतस्तैलं समाहरेत् पृथक् पृथक् ॥ १०६ ॥
त्रिसप्तषोडशांशप्रकारेणैकघटे क्रमात् ।
सम्मेल्य पश्चात् क्षारस्य द्रावकं च यथाविधि ॥ १०७ ॥
चतुष्षष्ट्येकभागांशं तस्मिन् सम्मेलयेत् पुन ।
तच्चर्म पुनरादाय एतत्तैले नियोजयेत् ॥ १०८ ॥
पश्चात् सूर्यपुटे दद्याच्चतुर्विंशदिनावधि ।
रक्तवर्णं (१?)स्था (ध्या ?) लतुल्यं तच्चर्मणि भवेत् क्रमात् ॥१०६॥
पूर्वोक्तपात्रनालस्य मुखच्छिद्राकृतिर्यथा ।
प्रच्छिद्य तच्चर्मं तस्मिन् पञ्चरन्ध्राणि कारयेत् ॥ ११० ॥
ज्योतिर्मुखी-मालकंगनी, करेला, सारस्वत-ब्राह्मी ? इनके बीज से निकले तैल पृथक् पृथक्
लावे, तीन सात सोलह अंशों में क्रमशः लेकर घडे में मिला कर क्षार का द्रावक भी यथाविधि ६४ वें
का १ भागांश उसमें मिलावे पुन. उस चर्म को लेकर तैल में २४ दिन तक नियुक्त करे-तर करे पश्चात्
सूर्यपुट में दे वे-धूप में रख दे जब स्थाल-हड्डी का नीचे का भाग रक्त वर्ण उस चर्म पर हो जावे पूर्वोक्त
यन्त्रनाल के मुखछिद्र की आकृति जैसी थी, उस चर्म को छेदकर उसमें पांच छिद्र करे—॥१०६-११०॥
पश्चात् समन्तात् तत्पात्रमूले छिद्रं दृढं यथा ।
आच्छाद्य तच्चर्म पश्चाद् बन्धयेच्छङ्कुभिः क्रमात् ॥ १११ ॥