बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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—करुणालय सद्गुरु महादेव को हृदयमें करके वेदमार्ग से—वेदानुसार धर्मशास्त्र, पुराण-अलङ्कार
ग्रन्थ, वस्तु का इतिवृत्त आदि तथा भौतिक आदि विविध शास्त्रों को एवं विधिशास्त्रों सब श्रौत स्मार्तपरक
शास्त्रों को भी वेदरूप हृदय का अनुसरण करके बनाया। पश्चात् लोक में उनकी प्रतिष्ठा—व्यवहार प्रचार
परम्परा को यथाक्रम किया। उनमें उन अन्तरिक्षविमान के बोधक शास्त्रों को भी यथाविधि किया, वे छः
शास्त्र कहे जाते हैं। यान्त्रिक, तान्त्रिक और कृतक क्रम से विमान हैं उनमें से प्रत्येक सर्व प्रकार से
निरूपित किये जाते हैं ॥ ३५-३६ ॥
उक्तं हि विमानचन्द्रिकायाम्—कहा ही है विमानचन्द्रिका में—
व्योमयानप्रभेदानि प्रवक्ष्यम्यद्य शास्त्रत ।
मन्त्रप्रभावाधिक्यत्वात् त्रेताया केवल नृणाम् ॥ ४० ॥
विमाना अपि मन्त्रप्रभावादेव विनिर्मिता ।
तस्माद् विमानाश्शास्त्रेण मान्त्रिका इति निर्णताः ॥४१॥
तन्त्रप्रभावाधिक्यत्वाद् द्वापरे सर्वदेहिनाम् ।
तन्त्रप्रभावादेव सर्वे विमानास्सम्प्रकल्पिता ॥ ४२ ॥
विमाना द्वापरे तस्मात्तान्त्रिका इति वर्णिताः ।
मन्त्रतन्त्रविहीनत्वाद् विमानाः कृतका इति ॥ ४३ ॥
प्रोक्ताः कलियुगे व्योमयानशास्त्रविशारदैः ।
त्रैविध्य व्योमयानाना धर्मव्यत्ययकारणात् ॥ ४४ ॥
पूर्वाचार्यैर्विशेषेण शास्त्रेष्वेव प्रकीर्तितम् ॥ इत्यादि ॥
व्योमयान के भेदों को अब शास्त्रानुसार कहूंगा, मन्त्रप्रभाव की अधिकता से त्रेता में मनुष्यों
के होने से विमान भी मन्त्रप्रभाव से ही बनाये गये। अतः विमान शास्त्र द्वारा मान्त्रिक निश्चित किये
गये। द्वापर में मनुष्यों के तन्त्रप्रभाव —वस्तुयोग प्रभाव की अधिकता से सब विमान तन्त्रप्रभाव से
सम्पन्न किये गये अतः द्वापर में तान्त्रिक कहे गये। कलियुग में मन्त्रतन्त्रविहीन होने से विमान कृतक
( यान्त्रिक यन्त्रवाले ) कहे गये व्योमयान शास्त्र के कुशल जनों द्वारा। धर्म के व्यतिक्रम—उलटफेर से
व्योमयानों के तीन प्रकार पूर्वाचार्यों द्वारा विशेषतः शास्त्रों में कहे गये हैं ॥ ४०-४४ ॥
व्योमयानतन्त्रेपि—व्योमयानतन्त्र में भी—
मन्त्रप्रभावात् त्रेताया विमाना मान्त्रिका इति ।
द्वापरे तन्त्रप्रधानत्वाद् विमानास्तान्त्रिकाः स्मृताः ॥ ४५ ॥
मन्त्रतन्त्रविहीनत्वात् तिष्ये तु कृतका इति ।
त्रैविध्यं व्योमयानानामेव जात्यनुसारत ॥ ४६ ॥
उक्त शास्त्रेषु सर्वत्र पूर्वाचार्यमत यथा ॥ इति ॥
त्रेता में मन्त्रप्रभाव से विमान मान्त्रिक, द्वापर में तन्त्र के प्रधान होने से विमान तान्त्रिक,
कलियुग में मन्त्र तन्त्र विहीन होने से कृतक ( यान्त्रिक ) कहे जाते हैं। इस प्रकार जाति के अनुसार
विमानों की त्रिविधता शास्त्रों में सर्वत्र आचार्यों ने मानी है ॥