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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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८६ विवाहवृन्दावनम्- [ कुण्डलिका-


अथ दशमभावगतग्रहाणां फलानि-
शनिरनियमशौचां कन्यकामन्यकार्यै-
र्विधुरतिविधुराङ्गीं शाकिनीं व्योम्नि वक्रः ।
रचयति रविरुग्रां कोविदः कार्मणज्ञा-
मविकृतसुकृतश्रीमालिनीमार्यशुक्रौ ॥१०॥
सं०-व्योम्नि दशमस्थाने स्थितः शनिः कन्यकां अनियमशौचां
रचयति । विधुश्चन्द्रः अन्यकार्यैः अतिविधुराङ्गीं ( अत्यन्तविकलाङ्गीं ),
वक्रो मङ्गलः शाकिनीं ( मांसादिभक्षणतत्परां ), रविः उग्रां दुःशीलां,
कोविद्ः बुधः कार्मणज्ञां ( कार्मणं क्षुद्रकर्म जानातीति तथाभूतां ) आर्य-
शुक्रौ अविकृतसुकृतश्रीमालिनीं ( पूर्णपुण्यसम्पत्तिसहितां ) रचयतः ।
मालिनीति च्छन्दोऽपि सूचितम् ॥ १० ॥
भा०-विवाहलग्न से दशमस्थान में शनि हो तो कन्या नियम से शौच
( पवित्रता ) रखनेवाली नहीं होती है । चन्द्रमा हो तो दूसरों के कार्य से
अत्यन्त खिन्न शरीर वाली होती है । मंगल हो तो शाकिनी के समान ( मांसादि
भक्षण करने वाली ), रवि हो तो दुष्ट स्वभाववाली, बुध हो तो क्षुद्रकर्म को
करनेवाली और गुरु, शुक्र हो तो पूर्ण पुण्य और सम्पत्ति वाली होती है ॥ १० ॥
अथैकादशभावगतग्रहाणां फलानि-
एकादशे दशशतांशुमुखाः सुखानि
रत्नाम्बरद्रविणभोगभरोन्मुखानि ।
पाणिग्रहे ददति दीर्घदृशां ग्रहेन्द्राः
सर्वेपि सर्वभवनेष्वबला न किञ्चित् ॥११॥
सं०-पाणिग्रहे विवाहे एकादशे स्थाने दशशतांशुमुखाः ( रव्यादयः )
सर्वेपि ग्रहेन्द्राः दीर्घदृशां मृगलोचनानां स्त्रीणां रत्नाम्बरद्रविणभोग-
भरोन्मुखानि सुखानि ददति । अबला निर्बला ग्रहाः सर्वेष्वपि भावेषु
किञ्चित् अपि फलं न ददति । अर्थात् सबला ग्रहा एवोक्तं फलं दातु-
मर्हन्ति, नाबला इति ॥ ११ ॥
भा०-विवाह लग्न से ११ स्थान में स्थित सूर्यादि सब ग्रह स्त्रियों को रत्ना-
भरण, वस्त्र, धन आदि भोग सुख देते हैं । निर्बल ग्रह कुछ भी (शुभ या अशुभ)