विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १२ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ८७
भावफलों को नहीं दे सकता है । अर्थात् सबल ग्रहों का ही भावफल समझना
चाहिये ॥ ११ ॥
अथ द्वादशस्थानस्थितग्रहाणां फलानि—
व्यये शुभाः सद्व्ययकर्षितां शनिः
सुरारुचिं रचयति दुर्विधां विधुः ।
अदक्षिणावयवरुजं कुजो रवि-
र्विरूपयत्यतिरुचिरामपि स्त्रियम् ॥१२॥
सं०—व्यये द्वादशस्थाने शुभाः ( शुभग्रहाः चन्द्रबुधगुरुशुक्राः )
सद्व्ययकर्षितां स्त्रियं रचयति । शनिः सुरारुचिं, विधुः दुर्विधां दुष्टकार्या,
कुजः अदक्षिणावयवरुजं ( वामाङ्गरोगिणीं ), रविः अतिरुचिरां ( अति-
सुन्दरीं ) अपि स्त्रियं विरूपयति रूपहीनां करोति । रुचिरेति च्छन्दोपि
सूचितम् ॥ १२ ॥
भा०—विवाह लग्न से द्वादश स्थान में शुभग्रह ( चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र )
हों तो स्त्री को समुचित व्यय ( खर्च ) करनेवाली बनाते हैं । शनि हो तो
मदिरा से रुचि रखने वाली, चन्द्रमा हो तों कुकर्म करने वाली, मंगल हो तो
वाम अंग में रोग वाली और सूर्य हो तो अत्यन्त सुन्दरी स्त्री को भी कुरूपा बना
देते हैं ॥ १२ ॥
अथ फलानां प्राशस्त्यं कथयति—
इति मुनिजनमतमतनुवितर्कं प्रतिगृहचरखचरोद्यदुदर्कम् ।
परिविगणय्य विशेषमशेषं फलमिदमूह्यमनुज्झितरेखम् ॥१३॥
सं०— इत्येवमुक्तं मुनिजनमतं अतनुवितर्कं ( अतनुर्बहुः वितर्को
यस्य तत् ) प्रतिगृहचरखचरोद्यदुदर्कं ( प्रतिराशिगतखचराणां उद्यन्
उदर्को भाविफलं यस्मिन् तत् ) इदं अशेषं ( समस्तं ) फलं विशेषं परि-
विगणय्य ( सम्यग् विचार्य ) अनुज्झितरेखं ( नोज्झिता रेखा येन तत्
तथोक्तं ) ऊह्यम् ज्ञेयम् ॥ १३ ॥
भा०--इस प्रकार मुनिजनों के सम्मत प्रति राशिगत ग्रहों के भविष्य
शुभाशुभ है जिसमें ऐसे पूर्वोक्त फलों को विशेष रूप से विचार करके सत्य
समझना चाहिये ॥ १३ ॥