विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० विवाहवृन्दावनम्- [ग्रहयोग-
रविकविरविजेन्दुभिः क्रमेण व्ययधनपण्निधनेषु कूर्म एषः ।
इह विहितकरग्रहा गृहाणि भ्रमति भुजिष्यतया परःशतानि ॥६॥
सं०-रवि-कवि-रविजेन्दुभिः क्रमेण व्यय-धन-षण्-निधनेषु स्थितैः
एषः कूर्मः (कूर्मनामा योगः) स्यात्, इह (अस्मिन्योगे) विहितकरग्रहा
(कृतविवाहा) भुजिष्यतया (भुजिष्यायाः परिचारिकायाः भावो भुजिष्यता
तया) परः शतानि शतेभ्योऽधिकानि गृहाणि भ्रमति ॥ ९ ॥
भा०-द्वादश में सूर्य, द्वितीय में शुक्र, षष्ठ में शनि और अष्टम भाव में
चन्द्रमा हो तो कूर्म योग होता है। इस योग में विवाहिता स्त्री सौ से भी अधिक
घरों में नौकरनी होकर भ्रमण करती है ॥ ९ ॥
भवपरिभवविक्रमैः क्रमेण द्युमणिमहीसुतसौरिभिः सनाथैः ।
परिणमति दलेन्दुरिन्दुमुख्याः कुलयुगलोद्धृतिधुर्यतां विधास्यन् ॥
सं०-भव-परिभव-विक्रमैः (एकादश-षष्ठ-तृतीयैः) क्रमेण द्युमणि-
महीसुत-सौरिभिः सनाथैः (सहितैः) इन्दुमुख्याः (चन्द्रवदनायाः
कन्यायाः) कुलयुगलोद्धृतिधुर्यतां विधास्यन् (करिष्यन्) दलेन्दुः
(अर्धचन्द्रयोगः) परिणमति भवतीत्यर्थः ॥१०॥
भा०-एकादश, षष्ठ और तृतीय भावों में क्रम से सूर्य, मंगल और' शनि
हों तो कन्या को दोनों (पति और पिता के) कुल के उद्धार करने में योग्या
बनाने वाला अर्धचन्द्रनामक योग होता है। अर्थात् इस योग में विवाहिता कन्या
दोनों कुल का उद्धार करती है ॥१०॥
व्ययनिधनतनूषु मन्दचन्द्रारुणकिरणैर्मुशलं जगुर्मुनीन्द्राः ।
इह वृष्णिकुलान्तके कुमारी कुलमारी न च कापि कार्यसिद्धिः ॥
सं०-व्यय-निधन-तनूषु क्रमेण मन्दचन्द्रारुणकिरणैः स्थितैः
मुनीन्द्राः मुसलं योगं जगुः । इहास्मिन् वृष्णिकुलान्तके मुसले योगे वि-
वाहिता कुमारी कुलमारी (कुलनाशिनी) भवति । तथा च कापि कार्य-
सिद्धिर्न भवति ॥ ११ ॥
भा०-१२, ८, और लग्न इनमें क्रम से शनि, चन्द्र और सूर्य हों तो
मुनियों ने मुसल नामक योग कहा है। इस यादव कुल को अन्त करने वाले
(मुसल) योग में विवाहिता स्त्री कुल को नाश करने वाली होती है। और
उसकी कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता है ॥ ११ ॥