विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभा०—इसी हेतु से कितने (वैष्णव और निम्बादित्यसम्प्रदाय के लोग)
दशमी में पूर्वकापालिक वेध मानते हैं । अर्थात् मध्यरात्रि से मध्यदिन पर्यन्त
पूर्व कपाल है—अतः रात्रि उत्तरार्ध में भी दशमी से विद्धा एकादशी हो तो
व्रत में त्याग देते हैं । इसी प्रकार पूर्णमासी में पितर लोग के मध्यरात्रि होने से
नियम और कार्तिकादि व्रत में पूर्णिमान्त से ही (कृष्णादि) मास ग्राह्य है ॥
पुनः प्रमाणान्तरेण राहुसत्तां कथयति—
तदिति विद्यत एव स किं परै रुधिरबिन्दुवपुर्विलसन्ति ये ।
त इह तामसकीलककेतवः स्वपितूराहुसमर्थनहेतवः ॥२२॥
सं०—तत् तस्मात् इत्येवं स राहुर्विद्यत एव, परैः अन्यैः हेतुभिः किं ?
न किमपि प्रयोजनमित्यर्थः । इह आकाशे—रुधिरविम्बवपुर्यथा स्यात्
तथा ये तामसकीलककेतवो विलसन्ति ते स्वपितृराहुसमर्थनहेतवः ।
अर्थात् ये तामसकीलकाख्याः केतवः सन्ति ते राहोः पुत्रा ऐतेत्यतो राहु-
रस्त्येवेत्यर्थः ॥ तथा च वराहसंहितायाम्—
"त्रिंशत्त्र्यधिका राहोस्ते तामसकीलका इति ख्याताः ।
रविशशिगा दृश्यन्ते तेषां फलमर्कवच्चोक्तम् ॥" इति ॥२२॥
भा०—अतः उपरोक्त हेतुओं से राहु विद्यमान है । दूसरे हेतुओं से क्या
प्रयोजन ? । और आकाश में रुधिरबिन्दु के समान भासमान जो तामस कीलक
नाम से ख्यात केतु हैं वे भी अपने पिता राहु के समर्थक हैं । अर्थात् राहु के पुत्रों
से भी राहु की सत्ता सिद्ध होती है ॥२२॥
उक्तार्थमेव द्रढ़यति—
यः पर्वगस्तस्य गतिर्न दृष्टा सैव ग्रहत्वेपि महत्प्रमाणम् ।
विलोमगामी विधुपात एव तस्माद्ग्रहो राहुरिति प्रतीतः ॥२३॥
सं०—यः पर्वगः ग्रहणस्थितो राहुः तस्य ‘प्रत्यक्षरूपेण’ गतिर्न दृष्टा,
सैव (गतिरेव) ग्रहत्वे महत्प्रमाणं स्यात् । यस्मादेव विधुपातो विलोमगामी
(पश्चिमगतिः) तस्माद् राहुरस्तीति प्रतीतः प्रत्ययं गत इति ॥२३॥
भा०—जो ग्रहण में स्थित रहता है उसकी गति प्रत्यक्ष देखने में नहीं
आती, तो भी वही (अनुमान से सिद्ध गति) ग्रहत्व में महा प्रमाण है । चन्द्र-
पात (राहु) विलोम (पश्चिमाभिमुख) चलता है, इसलिये राहु भी ग्रह है,
यह प्रतीत हुआ ॥२३॥
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