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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 138 में से

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पृष्ठ 67

५४ विवाहवृन्दावनम्- [.राहुसत्ता-
अथ राहोर्गतिप्रमाणं कथयति-
प्रतिदिनं खचरः प्रचरन्फलं किमपि यच्छति चारफलो हि सः ।
ग्रहणऋक्षग एव स चेन्न किं चलति किंचिदुपप्लव एव तत् ॥
सं०-खचरः प्रतिदिनं प्रचरन् ( गच्छन् ) किमपि ( शुभमशुभं
वा ) फलं यच्छति, हि यतः स चारफलः चारेण फलं यस्य स तथोक्तः ।
अर्थात् यथा यथा ग्रहश्चलति तथा तथा स्थानानुसारं फलमपि प्रयच्छति ।
स राहुः ग्रहणऋक्षग एव तिष्ठति, चेत् तदा स किं न चलति ? अपि तु
चलत्येव, न चेत् तत् तदा उपप्लवः ( ग्रहणं ) एव किञ्चित् चलति ?
ग्रहणनक्षत्रे तु राहुणाऽवश्यमेव भवितव्यम्, अतो ग्रहणचलनमेव राहो-
रपि चलनं स्यात् । एकं ग्रहणं यस्मिन्नक्षत्रे भवति पुनर्द्वितीयं ग्रहणं
तत्पृष्ठनक्षत्रे दृश्यतेऽत एव राहोर्विपरीतगतिसद्भावात् ग्रहत्वं सिद्धयति ॥
भा०-ग्रह प्रतिदिन चलता हुआ ही कुछ फल देता है । क्योंकि वह (ग्रह)
चारफल कहलाता है । और जिस नक्षत्र में ग्रहण होता है उसी नक्षत्र में
राहु भी रहता है तो क्या वह नहीं चलता है ? अवश्य चलता है । यदि नहीं
चलता तो कुछ ग्रहण ही चलता है ?
भाव यह है कि एक ग्रहण जिस नक्षत्र में होता है फिर दूसरा ग्रहण उससे
पीछे के अन्य नक्षत्र में होता है । तथा जिस नक्षत्र में ग्रहण होता है वहाँ राहु
अवश्य रहता है यह पूर्व सिद्ध हो चुका है, इसलिये ग्रहण की गति ही राहु की
गति सिद्ध होती है, अतः राहु में ग्रहत्व सिद्ध है ॥१५॥
एवमेव केतुरपि चलतीत्याह-
उदयमेति यदा दिवि तत्परं चरति केतुरपि प्रतिवासरम् ।
भवति न ग्रह एव गतिं विना जगति कर्मविपाकवदावदः ॥१६॥
सं०-यदा दिवि आकाशे तत्परं ( तस्य राहोरपरमङ्गं ) उदयमेति
तदा स केतुरपि प्रतिवासरं चरति ( गच्छति ) 'इति प्रत्यक्षं दृश्यते' ।
'यतः' जगति संसारे गतिं विना कर्मविपाकवदावदः(कर्मफलसूचकः)
ग्रह एव न भवति । अतो गतिसद्भावात् केतुरपि ग्रहः फलप्रदश्चेति ॥१६॥
भा०-जब राहु का अपर अङ्ग ( केतु ) आकाश में उदित होता है, तो वह
भी प्रतिदिन चलता है। और बिना गति के शुभाशुभ कर्मफलसूचक ग्रह नहीं
होता है । अर्थात् सिद्ध हुआ कि गति होने के कारण केतु भी फलदायक ग्रह है।