विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ७ ] वसन्तलक्ष्मसहितम् । ५५
'तमो न ग्रह' इति यन्मतं तद् भोजराजेन खण्डितमित्याह—
परिहरन्त्युपरागपरागतां तम उपप्लव एव स किं ग्रहः ।
इति मणित्थवचांसि विवृण्वता मतमतक्ष्यत भोजमहीभुजा ॥१७॥
सं०—उपरागपरागतां ग्रहणगतं तमो जनाः परिहरन्ति, स
किं ग्रहः ? स ग्रहो नेति स उपप्लव एवेति यन्मतं तन् मतं मणित्थवचांसि
विवृण्वता ( मणित्थवाक्यानां विवरणं कुर्वता ) भोजमहीभुजा भोजराजेन
अतक्ष्यत ( अच्छिद्यत, खण्डितमित्यर्थः ) ॥१७॥
भा०—'ग्रहण में प्राप्त अन्धकार तो उत्पात मात्र है जिसे लोग त्याग कर
देते हैं, क्या वह ग्रह है ? अर्थात् ग्रह नहीं है' इस प्रकार के मत को मणित्थाचार्य
के वाक्यों का विवरण करते हुए भोजराज ने भी खण्डन कर दिया है ॥१७॥
अथाप्यसौ केवलवासनायां नायाति सिद्धिं तदपि प्रियं नः ।
अवासनं किं न सुरद्युरात्रमर्कायनाभ्यां भवतैव भेजे ॥१८॥
सं०—अथापि यद्यपि असौ राहुश्छादक इति केवलवासनायां सिद्धिं
नायाति, तदपि नः ( अस्माकं ) प्रियमेव । किं अवासनं ( वासनारहितं )
अर्कायनाभ्यां सुरद्युगात्रं भवतैव न भेजे ? ( न स्वीकृतम् ? ) अपि तु
संहितायुक्तप्रमाणेेन स्वीकृतमेव । तथैव राहोश्छादकत्वमपीत्यर्थः ॥१८॥
भा०—'यद्यपि राहु छादक है' यह केवल वासना से सिद्ध नहीं होता है ।
नहीं हो, यह तो हमारा इष्ट ही है, क्या वासना से सिद्ध बिना देवता का अहो
रात्र आप सूर्य के सौम्यायन और याम्यायन से ही नहीं स्वीकार किया है ? अवश्य
किया है । अर्थात् जैसे संहिता स्मृति प्रमाणों से—सूर्यके अयन से ही देवताका
अहोरात्र मानते है तो उसी प्रमाण से राहु को भी ग्रहण में छादक मानैं ॥१८॥
वि०—वासना से नाड़ीवृत्त देवों का क्षितिज है, अतः जब मेषादि में सूर्य
आते हैं तब देवों के दिन की तथा तुलादि में जाने से रात्रि की प्रवृत्ति होनी
चाहिये । परञ्च संहितादि में मकर की संक्रांति ( सौम्यायन ) से हीं दिन, और
कर्क की संक्रान्ति ( याम्यायन ) से ही रात्रि कही गयी है । यह वासना से
विरुद्ध भी स्वीकृत है ॥१८॥
अयनाभ्यामेव कथं सुराणां द्युरात्रमित्याह—
सिद्धान्तपक्षस्तु परं दिनार्द्धान्निशा निशार्धात्परतो दिनश्रीः ।
एवं पुराणे गणिते च साम्यमर्कायनाभ्यां सदसत्फलेषु ॥१९॥