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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

५२ विवाहवृन्दावनम्- [ राहुसत्ता-
“चन्द्रस्य कक्षावलये हि पातः” इत्यादि । तदुच्चं च प्रतिवृत्तेऽत एव चन्द्र-
पातस्यैव ग्रहत्वं, न च तदुच्चस्येत्यर्थः ।
वस्तुतस्तु “व्युच्चहेतुं” इति ग्रन्थकारेण यदुक्तं तत् लोकप्रतारण-
मात्रमेव । उच्चं तु स्फुटचन्द्रस्य हेतुरेव । यथोक्तं भगवता श्री सूर्येण स्व-
सिद्धान्ते— “अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः । शीघ्रमन्दोच्चपाता-
ख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ।” इत्यलं पल्लवितेन ॥१०॥
भा०—और भी यह है कि—जिस भूमध्य को केन्द्र मान कर गोल गणित
किये गये हैं, वहाँ स्थित होकर पात मार्ग में ही स्पष्ट चन्द्रमा देख पड़ता है।
जिसमें उच्च हेतु नहीं होता है । अर्थात् जिस वृत्त में स्पष्ट चन्द्रमा रहता है
उसीमें उसका पात भी रहता है । उच्च दूसरे वृत्त में रहता है । अतः चन्द्रपात
में ही ग्रहत्व उचित है । उच्च में नहीं ॥१०॥
अथात्र सिद्धान्तं कथयति—
अत्र ये न विकलादलार्द्धमप्यहि यान्ति फलमस्तु किं ततः ।
तावदेव फलगौरवं गतिर्यावतीत्यधिफलः कलानिधिः ॥११॥
सं०—अत्र ये ( कुजादीनां पाताः ) अहि ( एकस्मिन् दिने )
विकलादलार्धं अपि न यान्ति ( न गच्छन्ति ) ततः तेभ्यः कुजादिपाते-
भ्यः फलं किमस्तु ? । यतो यावती गतिस्तावदेव फलगौरवं स्यात् ।
अतएव कलानिधिश्चन्द्रः अधिफलः (सर्वेभ्योऽधिकफलः) तथा चोक्तम्—
“एकतो हि ग्रहाः सर्वे एकतो मृगलाञ्छनः ।
ततोऽधिकतरश्चन्द्रस्तस्माच्चन्द्रं परीक्षयेत” इति ॥११॥
भा०—जो कुजादि ग्रहों के पात दिन में विकलार्ध का आधा भी नहीं
चलते हैं, उनसे फल क्या हो सकता है ? । क्योंकि जितनी ही गति अधिक होती
उतनी ही फल में भी अधिकता होती है । अतः सबसे अधिक गति होने के कारण
चन्द्रमा सबसे अधिक फलप्रद है । अर्थात् इसी कारण से चन्द्रपात (राहु) में
फलप्रदता सिद्ध हैं ॥११॥
पात एव राहुरित्याह—
किंच गोलगणितेषु जिष्णुजः सोमरोमकमयादयोऽपि च ।
पर्ययेण ननु राहुपातयोर्नामनी विदधुरेव तान्त्रिकाः ॥१२॥
सं०—किञ्च जिष्णुजो ब्रह्मगुप्तः, तथा सोमरोमक-मयादयोऽपि