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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

२६२ | तर्कभाषा | [ निग्रहस्थानानि

१६ निग्रहस्थानानि

पराजयहेतुः निग्रहस्थानम् । तच्च न्यून-अधिक-अपसिद्धान्त-अर्थान्तर-
अप्रतिभा मतानुज्ञा-विरोधआदिभेदाद् बहुविधमपि विस्तरभयान्नेह
कृत्स्नमुच्यते । यद् विवक्षितार्थे किञ्चिन्न्यूनं तन्न्यूनम् । विवक्षितात्
किञ्चिदधिकम् अधिकम् । सिद्धान्तादपध्वंसः-अपसिद्धान्तः । प्रकृतेनानभि-
जाता है । बल्कि न्याय से अधिक संख्या में जाति के भेद गिनाए गए हैं ।
न्याय में कुल २२ प्रकार के जाति भेद माने गए हैं । बौद्धों के 'प्रमाण-समुच्चय'
'वाद-विधि' आदि ग्रन्थों में उनके अतिरिक्त 'कार्यभेद', 'अनुक्ति' और 'स्वार्थ-
विरुद्ध' यह तीन भेद और करके जाति के २५ भेद कर दिए हैं । 'उपायहृदय'
ग्रन्थ में न्याय के २२ प्रकार के जाति-भेदों के अतिरिक्त १ भेदाभेद, २ प्रश्न-
बाहुल्योत्तराल्पता, ३ प्रश्नाल्पतोत्तरबाहुल्य, ४ हेतुसम, ५ व्याप्तिसम, अभ्यासि-
सम, ६ विरुद्ध, ७ अविरुद्ध, ८ असंशय, ९ श्रुतिसम और १० श्रुतिभिन्न इस
प्रकार जाति के दस भेद और बढ़ा दिए हैं । इस लिए यह कहना चाहिए कि
सिद्धान्ततः छल आदि के प्रयोग को अभीष्ट न मानते हुए भी बौद्ध तथा जैन
विद्वान् उनकी सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सके हैं । उनका वर्णन उन्होंने भी किया
ही है । बौद्ध तथा जैन तार्किकों के समान अन्य सभी नैयायिक भी छल
तथा जाति के प्रयोग को सिद्धान्ततः अच्छा नहीं समझते हैं । फिर भी उन्होंने
अपने ग्रन्थ में छल और जाति का प्रतिपादन इसी लिए किया है कि यदि
प्रतिवादी इनका आश्रय ले तो वादी उनके इस 'छल' या असदुत्तररूप 'जाति'
को समझ सके और उसका उचित उत्तर दे सके ।

१६ निग्रहस्थान

पराजय का हेतु निग्रहस्थान [ कहलाता ] है । वह न्यून, अधिक, अपसि-
द्धान्त, अर्थान्तर, अप्रतिभा, मतानुज्ञा, विरोध आदिभेद से बहुत [ २२ ] प्रकार
का होने पर भी [ ग्रन्थ के ] 'विस्तार के भय से यहाँ पूर्णरूप से नहीं कहा जा
रहा है । [ फिर भी कुल ७ उदाहरण देते हैं ] ।
१—जो विवक्षित अर्थ से कुछ कम रह जाय [ पूरी बात न कही जा सके ]
वह 'न्यून' [ निग्रहस्थान कहलाता है ] ।
२—विवक्षित से कुछ अधिक [ कहना ] 'अधिक' [ निग्रहस्थान ] है ।
३—सिद्धान्त से च्युत होना 'अपसिद्धान्त' [ नामक निग्रहस्थान ] है ।

निग्रहस्थानानि ] निग्रहस्थाननिरूपणम् २६३
सम्बद्धार्थवचनम् अर्थान्तरम्। उत्तरापरिस्फूर्तिः अप्रतिभा। पराभिमत-
स्वार्थस्य स्वप्रतिकूलस्य स्वयमेवाभ्यनुज्ञानं स्वीकारो मतानुज्ञा।
इष्टार्थभङ्गो विरोधः।
४—प्रकृत [विषय] से असम्बद्ध अर्थ को कहना 'अर्थान्तर' [निग्रहस्थान] है।
५—उत्तर न सूझना 'अप्रतिभा' [ निग्रहस्थान ] है।
६—दूसरे के अभीष्ट और अपने प्रतिकूल अर्थ को स्वयं स्वीकार कर 'लेना
'मतानुज्ञा' है।
७—[ अपने ] इष्ट अर्थ का [ स्वयं ] खण्डन कर देना 'विरोध' [ नामक
निग्रहस्थान ] है।
यहां तर्कभाषाकार ने केवल सात निग्रहस्थानों का उल्लेख किया परन्तु
न्यायसूत्र में २२ निग्रहस्थान इस प्रकार गिनाए गए हैं—
प्रतिज्ञाहानिः-प्रतिज्ञान्तरं-प्रतिज्ञाविरोधः-प्रतिज्ञासंन्यासो-हेत्वन्तरम्-अर्था-
न्तरम्-निरर्थकम्-अविज्ञातार्थम्-अपार्थकम्-अप्राप्तकालम्-न्यूनम्-अधिकम्-
पुनरुक्तम्-अननुभाषणम्-अज्ञानम्-अप्रतिभा-विक्षेपो-मतानुज्ञा-पर्यनुयोज्योपेक्षणं-
निरनुयोज्यानुयोगः-अपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानि। ५, १, १।
निग्रह-स्थानों की त्रिविध परम्परा—
जिन स्थितियों में आ जाने पर मध्यस्थ वादी अथवा प्रतिवादी को पराजित
घोषित कर सकता है उनका नाम 'निग्रहस्थान' है। इन नियमों का निर्धारण
भी सबसे पहिले न्यायसूत्रों में किया गया था। उसके आधार पर आयुर्वेद के
प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी उनका प्रतिपादन लगभग उसी रूप में पाया जाता
है। उसी से प्रारम्भ में बौद्ध आचार्यों ने भी उन निग्रहस्थानों को पूर्ण रूप से
ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया था। इस लिए उनके 'तर्कशास्त्र' तथा 'उपाय-
हृदय' आदि ग्रन्थों में निग्रहस्थानों का वर्णन न्याय तथा चरक के वर्णन से
मिलता हुआ पाया जाता है। परन्तु पीछे बौद्ध आचार्य 'धर्मकीर्ति' ने अपने
'वादन्याय' नामक ग्रन्थ में न्याय के निग्रहस्थानों का खण्डन करके स्वतन्त्र रूप
से अपने नए निग्रहस्थानों का निरूपण किया। इसी प्रवाह में जैन आचार्य
'अकलङ्कदेव' ने भी 'निग्रहस्थानों' के विषय में स्वतन्त्र रीति से विचार किया।
इस प्रकार निग्रहस्थानों के विषय में भी बौद्ध तथा जैन परम्परा को मिला कर
तीन प्रकार की विचारधारा पाई जाती है।

२६४ तर्कभाषा [ उपसंहारः
उपसंहारः
इहात्यन्तमुपयुक्तानां स्वरूपभेदेन भूयो भूयः प्रतिपादनम् । यदनति-
प्रयोजनं तल्लक्षणमदोषाय । एतावतैव बालव्युत्पत्तिसिद्धेः ।
इति श्रीकेशवमिश्रविरचिता तर्कभाषा समाप्ता ।
उपसंहार
यहां [ तर्कभाषा ग्रन्थ ] में अत्यन्त उपयोगी [ हेत्वाभास आदि पदार्थों ]
का स्वरूपभेद से बार बार प्रतिपादन किया गया है। और जो अधिक उपयोगी
नहीं है उसका लक्षण न करना दोषजनक नहीं है। क्योंकि हमने जो कुछ कहा
है ] इतने से ही बालव्युत्पत्ति सिद्ध हो सकती है। [ बालव्युत्पत्ति के लिए ही
ग्रन्थ लिखा था। इसमें जितना विषय वर्णन किया है, बालव्युत्पत्ति के लिए वही
पर्याप्त है। इसलिए जाति, निग्रहस्थान आदि जो अधिक उपयोगी पदार्थ नहीं हैं,
उनका विस्तारपूर्वक वर्णन न करना दोषाधायक नहीं है ] ।
श्रीकेशवमिश्र-विरचित तर्कभाषा समाप्त हुई ।
मासाभ्यां पौषमाघाभ्यां, द्विसहस्रेऽष्टकोत्तरे ।
वैक्रमे, तर्कभाषायाः व्याख्येयं पूर्तिमागता ॥
उत्तरप्रदेशस्थ-'पीलीभीत' मण्डलान्तर्गत-मकतुलग्रामनिवासिनां
श्री शिवलाल-बख्शी-महोदयानां तनुजनुषा
वृन्दावनस्थगुरुकुलविश्वविद्यालयाधीतविद्येन तत्रत्याचार्यपदमधितिष्ठता
एम्० ए० इत्युपपदधारिणा श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिना
विरचिता 'तर्करहस्यदीपिका' हिन्दीव्याख्या समाप्ता
समाप्ताश्चायं ग्रन्थः
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'रामरुद्री' (तरंगिणी) (का. ६)
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• जा० सिद्धान्तलक्षणम्। जगदीश तर्कालंकारकृत। शिवदत्तमिश्र कृत 'गंगा'
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(का. १८४)
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