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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 330 में से

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पृष्ठ 319

२५४ तर्कभाषा [ अनैकान्तिकः
असाधारणानैकान्तिकः स एव यः सपक्षविपक्षाभ्यां व्यावृत्तः पक्ष
एव वर्तते । यथा 'भूर्नित्या गन्धवत्त्वात्' इति । अत्र गन्धवत्त्वं हेतुः । स
च सपक्षान्नित्याद् व्योमादेः, विपक्षाच्चानित्याज्जलादेर्व्यावृत्तो, गन्ध-
वत्त्वस्य पृथिवीमात्रवृत्तित्वादिति ।
व्यभिचारस्तु लक्ष्यते । सम्भवत्सपक्षविपक्षस्य हेतोः सपक्षवृत्तित्वे
सति विपक्षाद् व्यावृत्तिरेव नियमो गमकत्वात् । तस्य च साध्यविपरीत-
ताव्याप्तस्य तन्नियमाभावो व्यभिचारः । स च द्वेधा सम्भवति । सपक्ष-
विपक्षयोर्वृत्तौ, ताभ्यां व्यावृत्तौ च ।
यस्य प्रतिपक्षभूतं हेत्वन्तरं विद्यते स प्रकरणसमः । स एव सत्प्रतिपक्षः
इति चोच्यते । तद्यथा 'शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुपलब्धेः', 'शब्दो
नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः' इति । अत्र साध्यविपरीतसाधकं समानबल-
मनुमानान्तरं प्रतिपक्ष इत्युच्यते । यः पुनरतुल्यबलो न स प्रतिपक्षः ।
'असाधारणानैकान्तिक' वह ही होता है जो सपक्ष विपक्ष दोनों से व्यावृत्त
[ केवल ] पक्ष में ही रहता है । जैसे 'पृथिवी नित्य है गन्धवती होने से' । यहां
गन्धवत्त्व हेतु है । और वह सपक्ष नित्य आकाशादि से विपक्ष अनित्य जलादि
से व्यावृत्त है गन्धवत्त्व के पृथिवी मात्र में रहने वाला होने से ।
[ इसको सव्यभिचार इसलिए कहते हैं कि इसमें नियमोल्लङ्घन रूप ]
व्यभिचार तो दिखलाई देता है । जिस हेतु के सपक्ष, विपक्ष दोनों सम्भव हों उसमें
सपक्षसत्त्व होने पर विपक्ष व्यावृत्ति ही [ साध्य की ] गमक होने से नियम है ।
साध्यविपरीत के साथ व्याप्त उस [ हेतु ] में नियम का अभाव ही व्यभिचार है ।
वह [ व्यभिचार ] दो प्रकार से होता है । १ सपक्ष विपक्ष [ दोनों ] में रहने पर,
और [ दूसरा ] दोनों में न रहने पर । [ सपक्ष में सत्त्व और विपक्ष में व्यावृत्ति
का नियम है । परन्तु जब दोनों में रहता है अथवा दोनों में नहीं रहता है तब,
इस नियम का उल्लङ्घन होने से सव्यभिचार कहलाता है ] ।
४ जिस [ हेतु ] का प्रतिपक्ष भूत दूसरा हेतु विद्यमान है वह 'प्रकरणसम' है
और वह ही 'सत्प्रतिपक्ष' भी कहलाता है । जैसे [ एक अनुमान है ] 'शब्द
अनित्य है नित्य धर्म की अनुपलब्धि होने से' । [ इसके विपरीत दूसरा तुल्यबल
अनुमान है ] 'शब्द नित्य है अनित्य धर्म की अनुपलब्धि होने से' । यहां [ पहिले
अनुमान के ] साध्य से विपरीत का साधक समानबल दूसरा अनुमान 'प्रतिपक्ष'