तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमोद्रव्यखण्डनम् ] प्रमेयनिरूपणम् १७१
छः द्रव्यों में किसी प्रकार का रूप नहीं रहता है और तम में नील रूप
रहता है इसलिए तम का अन्तर्भाव इन नौ द्रव्यों में नहीं हो सकता
है। इसलिए तम को नौ द्रव्यों से भिन्न दशम द्रव्य मानना चाहिए। यह
मीमांसकों का अभिप्राय है।
नैयायिक मत से तम के द्रव्यत्व का खण्डन—
इसके उत्तर में नैयायिकों का कहना यह है कि—
आवश्यकतेजोऽभावेनोपपत्तौ द्रव्यान्तरकल्पनाया अन्याय्यत्वात् । रूप-
वत्ताप्रतीतिस्तु भ्रमरूपा । कर्मवत्ता प्रतीतिरपि आलोकापसरणौपाधिकी भ्रान्ति-
रेव । तमोऽतिरिक्तत्वेऽनन्तावयवादिकल्पनागौरवञ्च स्यात् ।
आवश्यक तेजोऽभाव से ही तम का उपपादन हो जाने से उसको अलग
पदार्थ मानना उचित नहीं है। अर्थात् तेजः पदार्थ माना ही है। उसके
अनित्य होने से उसका अभाव मानना भी आवश्यक है। उस तेजोऽभाव का
नाम ही तम है। इस प्रकार तेजोऽभाव से ही तम का काम निकल जाता है
इसलिए तम को अलग द्रव्य मानने की आवश्यकता नहीं है। फिर उसको
द्रव्य सिद्ध करने के लिए जो नीलरूप गुण का और चलन रूप क्रिया का
आश्रय उसको कहा जाता है यह भी ठीक नहीं है। यह दोनों प्रतीतियाँ
वस्तुतः भ्रम हैं। तम में नील रूप की प्रतीति उसी प्रकार भ्रम है जिस
प्रकार आकाश में नील रूप की प्रतीति । आकाश वस्तुतः निराकार
अतएव रूप रहित है। फिर भी स्वच्छ आकाश को देख कर 'नीलं नभः'
इस प्रकार की प्रतीति तथा व्यवहार होता है। परन्तु आकाश के
नीलरूप होने से इस प्रतीति को भ्रम मानने के अतिरिक्त और कोई मार्ग
नहीं है। इसलिये जिस प्रकार आकाश में 'नीलं नभः' यह नीलरूपवत्ता
प्रतीति भ्रान्त है। उसी प्रकार 'नीलं तमः' यह प्रतीति भी भ्रान्त है। रही
चलन क्रिया की प्रतीति वह भी औपचारिक होने से भ्रान्ति ही है। जहां
'तमश्चलति' ऐसी प्रतीति होती है वहां वस्तुतः तम नहीं चलता है, अपितु
प्रकाश अथवा आवरक द्रव्य चलता है। उसके चलने से जो तेजका भाग
आवरण में आ जाता है, जहां जहां तेज नहीं पहुँच पाता है
वही तेजोऽभाव वाला स्थल चलता हुआ प्रतीत होता है। इसलिए तम में
गति की प्रतीति भी भ्रान्ति रूप ही है। अतएव तम को द्रव्य सिद्ध करने
वाले दोनों हेतुओं के भ्रम रूप होने से तम द्रव्य नहीं है। यह नैयायिकों का
आशय है। तम के इस द्रव्यत्व के खण्डन की चर्चा न्याय तथा वैशेषिक दोनों
१ न्याय सिद्धान्त मुक्तावली प्र० ख० ।