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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

प्राणियोंकी हिंसा होती है, इसलिये इसे आधाकर्म कहते हैं ।$^{१}$ यह सामान्य नियम है । परन्तु यदि कोई मुनि
रोग आदिके कारण अपने संयमका निर्वाह करनेमें असमर्थ हो गया है तो आपत्कालमें उस मुनिको शास्त्रमें
उद्दिष्ट भोजन ग्रहण करनेकी भी आज्ञा दी गई है । यदि आधाकर्मको सर्वथा अधोगतिका कारण मानकर
उससे एकान्त रूपसे कर्मबंध$^{२}$ माना जाय, तो मुनिको भोजन न मिलनेके कारण मुनिका आर्तध्यानके द्वारा
प्राणान्त होना संभव है । उदाहरणके लिये, जिस मुनिकी आंख दुख रही है, वह मुनि पृथ्वीको देखकर न
चल सकनेके कारण त्रस जीवोंकी हिंसा नहीं बचा सकता । वैसे ही यदि रोगादिके कारण साधु उद्दिष्ट
भोजनका त्याग नहीं कर सकता तो वह दोषका भागी नहीं है । यदि आपत्कालमें भी इस प्रकारका अपवाद
नियम न बनाया जाय तो क्लेशित परिणामोंसे आर्तध्यानसे मरकर साधुको दुर्गतिमें जाना पड़े, इससे और
भी अधिक पापका बंध हो । अतएव रोगादिके कारण असामान्य परिस्थितिके उत्पन्न होने पर साधुको आधा-
कर्म—उद्दिष्ट भोजन ग्रहण—करनेकी आज्ञा शास्त्रोंमें दी गई है ।$^{३}$ इसी प्रकार सामान्यतः शास्त्रोंमें मुनिके
लिये नवकोटिसे विशुद्ध आहार ग्रहण करनेकी आज्ञा है, लेकिन यदि मुनि किसी आपदासे ग्रस्त हो जाय तो
वह केवल पांच कोटिसे शुद्ध आहार ग्रहण करके अपना जीवन यापन कर सकता है ।
श्लो. २३ पृ०. २०४ पं० ४ : द्रव्यषट्कं
जैन दर्शनकारोंने जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छहं द्रव्यँ$^{४}$ स्वीकार किये हैं । इन
छह द्रव्योंमें काल द्रव्यको छोड़कर बाकीके पांच द्रव्योंको पंच अस्तिकायके नामसे कहा जाता है । कुछ श्वेता-
म्बर विद्वान् काल द्रव्यको द्रव्योंमें नहीं गिनते । इसलिये उनके मतमें पांच अस्तिकाय ही पांच द्रव्य माने गये हैं ।$^{५}$
काल शब्द बहुत प्राचीन है । वैदिक विद्वान् अघमर्षण ऋग्वेदमें$^{६}$ काल शब्दको 'संवत्सर' के अर्थमें
प्रयुक्त करते हैं । यहाँ कालको सृष्टिका संहार करनेवाला कहा गया है । अथर्ववेदमें कालको नित्य पदार्थ माना
है, और इस नित्य पदार्थसे प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति स्वीकार की गई है ।$^{८}$ बृहदारण्यक$^{९}$, मैत्रायण$^{९}$ आदि उप-
निषदोंमें भी काल शब्दको विविध अर्थोंमें प्रयुक्त किया है । महाभारतमें कालका विस्तृत वर्णन पाया जाता है ।$^{१०}$
यहां काल शब्दको दिष्ट, दैव, हठ, भव्य भवितव्य, विहित, भागधेय आदि अनेक अर्थोंमें प्रयुक्त किया गया है ।
वैदिक और बौद्ध दर्शनोंमें काल संबंधी दो प्रकारकी मान्यतायें दृष्टिगोचर होती हैं : (१) न्याय वैशे-
षिकोंका मत है कि काल एक सर्वव्यापी अखंड द्रव्य है । यह केवल उपाधिसे भिन्न-भिन्न क्षण, मुहूर्त आदिके
रूप में प्रतीत होता है । पूर्वमीमांसकोंने भी कालको व्यापक और नित्य स्वीकार किया है । इनके मतमें जिस
१ अतएवाधोगतिनिमित्तं कर्माधःकर्मेत्यन्वर्थोऽपि घटते । तदेतदधःकर्म गृहस्थ्याश्रितो निकृष्टव्यापारः । अथवा
सूनाभिरङ्गिहिंसनं यत्रोत्पाद्यमाने भक्तादौ तदधःकर्मेत्युच्यते । आशाधर-अनगारधर्मामृत ५-३ वृत्ति ।
२ आहाकम्माणि भुंजंति अण्णमण्णे सकम्मुणा ।
उवलित्तेत्ति जाणिज्जा णुवलित्तेत्ति वा पुणो ॥ अभिधानराजेन्द्रकोष, भाग २ पृ. २४२ ।
३ विशेषके लिये देखिए अभिधानराजेन्द्रकोष, भाग २ पृ. २१९–२४२ ।
४ वैशेषिकों द्वारा मान्य छह पदार्थ हैं—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ।
५ भगवती २५-४; उत्तराध्ययन २८-७,८; प्रज्ञापना आदि श्वेताम्बर आगम ग्रंथोंमें काल द्रव्य संबंधी
दोनों पक्ष मिलते हैं।
६ १०-१९० ।
७ १९-५३, ५४ ।
८ ४-४-१६ ।
९ ६-१५ ।१० देखिये ।
१० डा० सिद्धेश्वर शास्त्री का कालचक्र पृ. ३९-४८। काल संबंधी वैदिक मान्यताओंके विस्तृत विवेचनके
लिए देखिये प्रोफेसर बरुआकी Pre-Buddhist Philosophy भाग ३ अ. १३ । कालवादियोंके
मतके खण्डनके लिए माध्यमिककारिका, सन्मतिटीका आदि ग्रंथ देखने चाहिये ।

२९४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रकार वर्ण नित्य और व्यापक होकर भी दीर्घ, ह्रस्व आदिके रूपसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, उसी तरह
काल भी उपाधिके भेदसे भिन्न मालूम देता है । सर्वास्तिवादी बौद्ध भी भूत, भविष्य और वर्तमान कालका
अस्तित्व मानते हैं ( २ ) काल संबंधी दूसरी मान्यताको माननेवाले सांख्य, योग, वेदान्त, विज्ञानवाद और
शून्यवाद मतके अनुयायी हैं । इन लोगोंके अनुसार काल कोई स्वतंत्र द्रव्य नहीं है । सांख्य विद्वान् विज्ञान-
भिक्षुका कथन है कि नित्यकाल प्रकृतिका गुण है, और खण्डकाल आकाशकी उपाधियोंसे उत्पन्न होता है ।
योगशास्त्रमें कहा है कि काल कोई वास्तविक पदार्थ नहीं है, केवल लौकिक व्यवहारके लिये दिन, रात
आदिका विभाग किया जाता है। यहां केवल क्षणको काल नामसे कहा गया है। यह क्षण उत्पन्न होते ही
नाश हो जाता है, और फिर दूसरा क्षण उत्पन्न होता है । क्षणोंका समुदाय एक कालमें नहीं हो सकता, इस
लिये क्षणों के क्रमरूप जो काल माना जाता है, वह केवल कल्पित है । शांकर वेदान्ती केवल ब्रह्मको ही सत्य
मानते हैं इसलिये इनके मतमें काल भी काल्पनिक वस्तु है । शंकरकी तरह रामानुज, निम्बार्क, मध्व और
वल्लभ सम्प्रदायवालोंने भी कालको वास्तविक पदार्थ स्वीकार नहीं किया । शांतरक्षित१ आदि बौद्ध आचार्य
भी काल द्रव्यका पृथक् अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । पाश्चात्य विद्वान् भी उक्त काल संबंधी दोनों सिद्धांतों-
को मानते हैं ।
जैन ग्रन्थोंमें काल संबंधी उक्त दोनों प्रकारकी मान्यतायें उपलब्ध होती हैं : ( १ ) एक पक्षका कहना
है कि काल कोई स्वतंत्र द्रव्य नहीं है । जीव और अजीव द्रव्योंकी पर्यायके परिणमनको ही उपचारसे काल
कहा जाता है, इसलिये जीव, अजीव द्रव्योंमें ही काल द्रव्य गर्भित हो जाता है ।२ ( २ ) जैन विद्वानोंका
दूसरा मत है कि जीव और अजीवकी तरह काल भी एक स्वतंत्र द्रव्य है । इस पक्षका कहना है कि जिस
प्रकार जीव और अजीवमें गति और स्थितिका स्वभाव होनेपर भी धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायको
पृथक् द्रव्य माना जाता है, उसी प्रकार कालको भी स्वतंत्र द्रव्य मानना चाहिये । यह मान्यता श्वेताम्बर
तथा दिगम्बर दोनों ग्रंथोंमें मिलती है३ ।
जैन शास्त्रोंमें काल संबंधी मान्यता
सामान्य रूपसे जैन शास्त्रोंमें कालके दो भेद माने हैं—निश्चयकाल ( द्रव्य रूप ) और व्यवहार-
काल ( पर्यायरूप ) । जिसके कारण द्रव्योंमें वर्तना होती है, उसे निश्चयकाल कहते हैं । जिस प्रकार धर्म
और अधर्म पदार्थोंकी गति और स्थितिमें सहकारी कारण हैं, उसी प्रकार काल भी स्वयं प्रवर्तमान द्रव्योंको
वर्तनामें सहकारी कारण है । जिसके कारण जीव और पुद्गलमें परिणाम, क्रिया, छोटापन, वड़ापन आदि
व्यवहार हों, उसे व्यवहारकाल कहते हैं । समय, आवली, घड़ी, घंटा आदि सब व्यवहारकालका ही रूप है ।
व्यवहारकाल निश्चयकालकी पर्याय है, और यह जीव और पुद्गलके परिणामसे ही उत्पन्न होता है, इसलिये
व्यवहारकालको जीव और पुद्गलके आश्रित माना गया है ।
१. तत्त्वसंग्रह पृ. २०९ ।
२. अत्राहुः केऽपि जीवादिपर्याया वर्तनादयः ।
काल इत्युच्यते तज्ज्ञैः पृथग् द्रव्यं तु नास्त्यसौ ॥ लोकप्रकाश २८-५ ।
दिगम्बर ग्रंथोंमें काल द्रव्यको स्वीकार न करनेका पक्ष कहीं उपलब्ध नहीं होता । परन्तु ध्यान
देने योग्य है कि यहां व्यवहार कालको निश्चय कालकी पर्याय स्वीकार करके व्यवहार कालको जीव
और पुद्गलका परिणाम माननेका उल्लेख मिलता हैं—यस्तु निश्चयकालपर्यायरूपो व्यवहारकालः स जीव-
पुद्गलपरिणामेनाभिव्यज्यमानत्वात्तदायत्त एवाभिगम्यत इति । अमृतचन्द्र-पंचास्तिकाय टीका गा. २३ ।
३. इस पक्षकी चार मान्यताओंका उल्लेख पं० सुखलालजीने 'पुरातत्व' के किसी अंकमें किया है— ( क )
काल एक और अणुमात्र है; ( ख ) काल एक है, लेकिन वह अणुमात्र न होकर मनुष्य क्षेत्र लोकवर्ती
हैं; ( ग ) काल एक और लोकव्यापी है; ( घ ) काल असंख्य हैं, और सब परमाणुमात्र हैं ।

व्यवहारकाल मनुष्य क्षेत्रमें ही होता है। निश्चयकाल द्रव्य रूप होनेसे नित्य है, और व्यवहारकाल
क्षण-क्षणमें नष्ट होनेके कारण पर्यायरूप होनेसे अनित्य कहा जाता है। कालद्रव्य अणुरूप है। पुद्गल द्रव्यकी
तरह कालद्रव्यके स्कंध नहीं होते। जितने लोकाकाशके प्रदेश होते हैं, उतने ही कालाणु होते हैं। ये एक-एक
कालाणु गति रहित होनेसे लोकाकाशके एक-एक प्रदेशके ऊपर रत्नोंकी राशिकी तरह अवस्थित हैं। काल-
द्रव्यके अणु होनेसे कालमें एक ही प्रदेश रहता है, इसलिये काल द्रव्यमें तिर्यक्-प्रचय न होनेसे कालको पांच
अस्तिकायोंमें नहीं गिना^१। आकाशके एक स्थानमें मन्द गतिसे चलनेवाला परमाणु लोकाकाशके एक प्रदेशसे
दूसरे प्रदेश तक जितने कालमें पहुँचता है, उसे समय कहते हैं। यह समय बहुत सूक्ष्म होता है, और प्रतिक्षण
उत्पन्न और नष्ट होनेके कारण इसे पर्याय कहते हैं। एक-एक कालाणुमें अनंत समय होते हैं। ये कालाणुके
अनंत समय व्यवहार नयकी अपेक्षा समझने चाहिये, वास्तवमें कालद्रव्य (निश्चयकाल) लोकाकाशके बराबर
असंख्य प्रदेशोंका धारक^२ है, उसे आकाश आदिकी तरह एक और पुद्गलकी तरह अनंत नहीं मान सकते।
यह मत दिगम्बर ग्रन्थोंमें और हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें^३ मिलता है।
१. प्रो. ए. चक्रवर्तीने काल द्रव्यकी इस मान्यताकी आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तसे तुलना की है—
The author differentiates between relative time and absolute time. The
distinction is quite identical with Newtonian distinction between relative and
absolute time........The author not only admits the reality of time but also reco-
gnises its potency. In this respect one is reminded of the great French philoso-
pher Bergson. Bergson has revealed to the world that time is a potent factor
in the evolution of Cosmos............It is also worth noticing that modern realist
led by the mathematical Philosophers admits the doctrine that time is real and
is made up of instants or moments. Panchastikayasara पृ० १०५, १०९, २२।
२. श्वेताम्बर सम्प्रदायमें कालाणुके असंख्य प्रदेश नहीं माने गये हैं। कालाणुओंके असंख्यात प्रदेशोंका खंडन
युक्तिप्रबोध आदिमें किया गया है—
यत्तु कालाणूनामसंख्यातत्वं मतान्तरीयाः प्रपन्नं तदनुपपन्नं। द्रव्यत्वव्याहतेः। यद् यद् द्रव्यं तदेकमनन्तं
वा। यदुक्तमुत्तराध्ययनसूत्रे—
'धम्मो अहम्मो आगासं दव्वं एक्केक्कमाहियं ।
अणंताणि य दव्वाणि कालो पोग्गलजंतुणो ॥'
प्रत्याकाशप्रदेशं तन्मते कालाणुस्वीकारे शेषद्रव्याणामिवैतदीयस्तिर्यक्प्रचयोऽपि स्यात् । स चानिष्टः। यतो
गोम्मटसारवृत्तौ सूत्रे च—
दव्वच्छक्कमकालं पंचत्थिकायसण्णियं होई ।
काले पदेसए चउ जम्मा णत्थित्ति णिद्दिट्ठं ॥ ६०६ ॥
कालद्रव्ये प्रदेशप्रचयो नास्तीत्यर्थः। न च अप्रदेशत्वान्न तिर्यक्प्रचय इति वाच्यं। पुद्गलस्यापि तदभावप्रसं-
गात्। प्रदेशमात्रत्वं अप्रदेशमिति तल्लक्षणस्य तत्रापि विद्यमानत्वात् । अथ पुद्गलस्यास्ति अप्रदेशत्वं द्रव्येण
परं पर्यायेण तु अनेकप्रदेशत्वमप्यस्ति। कालस्य तु नैतदिति चेत् । न। अनेनापि प्रसंगापराकरणात् । न हि
निर्धूमत्वेन पर्वतेऽग्निमत्त्वे प्रसज्यमाने यत्किंचिद्धर्माभावे तदभावः प्रतीयते इति स्थितं तिर्यक्प्रचयप्रसंगेन । न
चैतत् समयद्रव्याणामानन्त्येऽपि तुल्यं। तदानन्त्यस्य अतीतानागतापेक्षया स्वीकारात् । यदुक्तमुत्तराध्यने—
'एमेव संतइं पप्प' इति। तद्वृत्तौ वादिवेतालापरनामधेयाः श्रीशांतिसूरयोऽप्याहुः—'कालस्यानन्त्यमतीताना-
गतापेक्षया' इति। श्रीभगवतीवृत्तौ श्रीअभयदेवसूरयोऽपि—एको धर्मास्तिकायप्रदेशोऽद्धासमयैः स्पृष्टश्चेन्नियम्यमाद-
नन्तः अनादित्वादाद्धासमयानाम्' इति। मेघविजयगणि-युक्तिप्रबोध गा. २३ पृ. १८९।
३. मेघधविजयगणि योगशास्त्रमें वर्णन किये हुए काल द्रव्यके सिद्धांतसे श्वेताम्बर मान्यताका समन्वय करते हैं-

२९६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
एतेन योगशास्त्रावान्तरश्लोकेषु—"लोकाकाशप्रदेशस्था भिन्नाः कालाणवस्तु ये ।
शंका—समय रूप ही निश्चयकाल है, इसको छोड़कर कालाणु द्रव्यरूप कोई निश्चय काल नहीं देखा
जाता । समाधान—समय कालकी ही पर्याय है, क्योंकि वह उत्पन्न और नाश होनेवाला है। जो पर्याय
होता है, वह द्रव्यके बिना नहीं होता। जिस प्रकार घट रूप पर्यायका कारण मिट्टी है, उसी तरह समय,
मिनिट, घंटा आदि पर्यायोंके कारण कालाणु रूप निश्चय कालको मानना चाहिये। १
शंका—समय, मिनिट आदि पर्यायोंका कारण द्रव्य नहीं है, किन्तु समयकी उत्पत्तिमें मन्दगतिसे जाने
वाले पुद्गल-परमाणु ही समय आदिका कारण हैं। जिस प्रकार निमेषरूप काल पर्यायकी उत्पत्तिमें आंखोंके
पलकोंका खुलना और बन्द होना कारण है, इसी तरह दिनरूप पर्यायकी उत्पत्तिमें सूर्य कारण है ।
समाधान—हमेशा कारणके समान ही कार्य हुआ करता है । यदि आंखोंका खुलना और बन्द होना तथा
सूर्य आदि निमेष तथा दिन आदिके उपादान कारण होते, तो जिस प्रकार मिट्टीके बने हुए घड़ेमें मिट्टीके
रूप, रस आदि गुण आ जाते हैं, उसी तरह आंखोंका खुलना, बन्द होना आदि पुद्गल परमाणुओंके गुण
निमेष आदिमें आ जाने चाहिये। परन्तु निमेष आदिमें पुद्गलके गुण नहीं पाये जाते । इसलिये समय
आदिका कारण निश्चयकालको मानना चाहिये ।
शंका—यदि आप कालाणु द्रव्योंको लोकाकाशव्यापी मानकर उन्हें लोकाकाशके बाहर अलोका-
काशमें व्याप्त नहीं मानते, तो आकाश द्रव्यमें किस प्रकार परिवर्तन होता है ? समाधान—लोकाकाश और
अलोकाकाश दो अलग अलग द्रव्य नहीं हैं। वास्तवमें आकाश एक अखंड द्रव्य है, केवल उपचारसे लोकाकाश
और अलोकाकाशका व्यवहार होता है। अतएव जिस प्रकार एक स्पर्शन इंद्रियको विषयसुखका अनुभव
होनेसे वह अनुभव सम्पूर्ण शरीरमें होता है, उसी तरह कालाणु द्रव्यके लोकाकाशमें एक स्थानपर रहकर
सम्पूर्ण आकाशमें परिणमन होता है, इसलिये काल द्रव्यसे आलोकाकाशमें भी परिणमन सिद्ध होता है । २
शंका—कालद्रव्य धर्म, अधर्म आदि द्रव्योंकी तरह निरवयव अखंड क्यों नहीं ? कालद्रव्यको अणु रूप
क्यों माना है ? समाधान—काल दो प्रकारका है—व्यवहार और मुख्य । मुख्यकाल अनेक हैं, कारण कि
आकाशके प्रत्येक प्रदेशोंमें व्यवहारकाल भिन्न भिन्न रूपसे होता है। यदि व्यवहारकालको आकाशके प्रत्येक
भावानां परिवर्तय मुख्यः कालः स उच्यते ॥
ज्योतिःशास्त्रे यस्य मानमुच्यते समयादिकम् ।
स व्यावहारिकः कालः कालवेदिभिरादृतः ॥
नवजीर्णादिभेदेन यदमी भुवनोदरे ।
पदार्थाः परिवर्तन्ते तत्कालस्यैव चेष्टितम् ॥
वर्तमाना अतीतत्वं भाविनो वर्तमानतां ।
पदार्थाः प्रतिपद्यन्ते कालक्रीडाविडम्बिताः ॥”
इत्यादिना कालाणवः परस्परं विविक्ताः प्रतिपादितास्ते पर्यायरूपा इत्युक्तं । न तु तेषां द्रव्यरूपत्वं । अनंत-
समयस्वरूपत्वेन तद्विशेषणस्य सूत्रणात् । आगमेऽपि अनंतद्रव्यत्वेन कथनाच्च । यद्यनंतसमयाः द्रव्यसमया इत्यर्थः
तदा व्याहृतिः स्पष्टैव, कालाणूनां द्रव्यत्वे तेषामसंख्यातत्वात् । युक्तिप्रबोध गा. २३ पृ. १९५; द्रव्यानुयोगत-
र्कणा ११-१५।
१. द्रव्यतस्तु लोकाकाशप्रदेशपरिमाणकोऽसंख्येय एव कालो मुनिभिः प्रो

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) २९७
प्रदेशमें भिन्न-भिन्न न माना जाय, तो कुरुक्षेत्र, लंका आदिके आकाश-प्रदेशोंमें दिन आदिका व्यवहार नहीं
हो सकता । इसलिये व्यवहारकालके आकाशके प्रदेशोंमें भिन्न-भिन्न होनेसे निश्चयकाल भी कालाणु रूपसे
भिन्न-भिन्न सिद्ध होता है । क्योंकि निश्चयकालके बिना व्यवहारकाल नहीं होता ।१
श्लोक. २३ पृ. २०६, पं. ७ द्वादशांग—
श्रुतके दो भेद हैं—अंगप्रविष्ट और अंगबाह्य । सर्वज्ञ भगवान्के कहे हुए प्रवचनके गणधरों द्वारा
शास्त्र रूपमें लिखे जानेको अंगप्रविष्ट कहते हैं । इसके बारह भेद हैं । इसे ही द्वादशांग२ कहते हैं । द्वादशांगको
गणिपिटक भी कहा जाता है । जैन द्वादशांगके मूल उपदेष्टा ऋषभदेव माने जाते हैं । द्वादशांग—आचारांग,
सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, भगवती ( व्याख्याप्रज्ञप्ति ), ज्ञातृधर्मकथा, उपासकदशा, अन्तकृद्दशा,
अनुत्तरोपपादिकदशा, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र और दृष्टिवाद । दिगम्बरोंकी मान्यताके अनुसार आगम-
साहित्य लुप्त हो गया है । श्वेताम्बर आम्नायमें दृष्टिवादको छोड़कर ग्यारह अंग आजकल भी उपलब्ध हैं ।
आचारांग—इसे सामयिक नामसे भी कहा गया है । इसमें निर्ग्रंथ एवं निर्ग्रंथिनियोंके आचारका
वर्णन है । इसमें दो श्रुतस्कंध हैं । प्रथम श्रुतस्कंधमें आठ और द्वितीय श्रुतस्कंधमें सोलह अध्ययन हैं । द्वितीय
श्रुतस्कंधमें महावीरका जीवनचरित्र है । आचारांग सूत्र सब सूत्रोंसे प्राचीन है । इस अंगको प्रवचनका
सार भी

२९८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
छत्तीस अध्ययन तथा नन्दिसूत्रका उल्लेख जान पड़ता है। कि यह सूत्र द्वादशांगके सूत्रवद्ध होनेके वाद
लिखा गया है। इसपर अभयदेवसूरिकी टीका है। दिगम्बरोंके अनुसार इसमें द्रव्य, क्षेत्र, काल और
भावके अनुसार पदार्थोंके सादृश्यका ( समवाय ) कथन है ।
भगवती—इसे व्याख्याप्रज्ञप्ति भी कहते हैं। इस सूत्रमें ४१ शतक हैं। इसमें श्रमण भगवान् महावीर
और गौतम इन्द्रभूतिके बीच होनेवाले प्रश्नोत्तरोंका वर्णन है । इस अंगमें महावीरका जीवन, उनकी प्रवृत्ति,
उनके शिष्य, उनके अतिशय आदि विषयोंका विशद वर्णन है। भगवतीमें पार्श्वनाथ, जामालि और गोशाल
मक्खलिपुत्तके शिष्योंका वर्णन है। षोडश जनपदोंका यहाँ उल्लेख है। इसपर अभयदेवसूरिकी टीका है।
दिगम्बरोंके अनुसार इसमें जीव है या नहीं, वह अवक्तव्य है अथवा वक्तव्य, आदि साठ हजार प्रश्नोंके
उत्तर हैं।
ज्ञातृधर्मकथा—इसे संस्कृतमें ज्ञातृधर्मकथा, नाथधर्मकथा, तथा प्राकृतमें णायाधम्मकहा,
णाणधम्मकहा और णाहधम्मकहा भी कहते हैं। इसमें उन्नीस अध्ययन और दो श्रुतस्कंध हैं। इसमें ज्ञातुपुत्र
महावीरकी कथाओंका उदाहरण सहित वर्णन है। प्रथम श्रुतस्कंधके सातवें अध्यायमें पन्द्रहवें तीर्थंकर मल्लि-
कुमारीकी और सोलहवेंअध्यायमें द्रोपदीकी कथा है। इसपर अभयदेवसूरिने टीका लिखी है। दिगम्बरोंके
अनुसार इसमें तीर्थंकरोंकी कथायें अथवा आख्यान-उपाख्यानोंका वर्णन है ।
उपासकदशा—इसके दस अध्ययनोंमें महावीरके दस उपासकों (श्रावकोंके) के आचारका वर्णन
है। ये कथायें सुधर्मा जम्बूस्वामीसे कहते हैं। सातवें अध्यायमें गोशाल मक्खलिपुत्तके अनुयायी सद्दालपुत्तकी
कथा आती है। सद्दालपुत्त आगे चलकर महावीरका अनुयायी हो गया था। उपासकदशामें अजातशत्रु
राजाका उल्लेख आता है। इसपर अभयदेवकी टीका है। दिगम्बर ग्रन्थोंमें इसे उपासकाध्ययन कहा
गया है।
अन्तकृद्दशा—इसमें दस अध्यायोंमें मोक्षगामी साधु और साध्वियोंका वर्णन है। इसपर अभयदेवने
टीका लिखी है। दिगम्बर ग्रन्थोंमें इस अंगमें प्रत्येक तीर्थंकरके तीर्थमें दारुण उपसर्ग सहकर मोक्ष प्राप्त
करनेवाले दस मुनियोंका वर्णन है ।
अनुत्तरोपपादिकदशा—इसमें अनुत्तर विमानोंको प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन है। यहाँ
कृष्णकी कथा मिलती है। इसपर भी अभयदेवकी टीका है ।
प्रश्नव्यकरण—इसे प्रश्नव्याकरणदशा भी कहते हैं। इसमें दस अध्याय हैं। यहाँ पाँच
आश्रवद्वार और पाँच संवरद्वारका वर्णन है। टीकाकार अभयदेवसूरि हैं। स्थानांग और नंदिसूत्रमें
जो इस आगमका विषयवर्णन दिया गया है, उससे प्रस्तुत विषयवर्णन बिलकुल भिन्न है। दिगम्बरोंके
अनुसार इसमें आक्षेप और विक्षेपसे हेतु-न्यायाश्रित प्रश्नोंका स्पष्टीकरण है ।
विपाकसूत्र—इसे कम्मविवायदसाओ भी कहा गया है। इसमें बीस अध्ययन है। बहुतसे दुखी
मनुष्योंको देखकर इन्द्रभूति महावीरसे उन मनुष्योंके पूर्वभवोंको पूछते हैं। महावीर मनुष्योंके सुख-दुखके
विपाकका वर्णन करते है। इसमें दस कथा पुण्यफलकी, और दस कथायें पापफलकी पायी जाती हैं । इसपर
अभयदेवसूरिकी टीका हैं।
दृष्टिवाद—इसमें अन्य दर्शनोंके ३६३ मतोंका वर्णन था। यह सूत्र लुप्त हो गया है। इसके संबंधमें
अनेक परम्परायें जैन आगमोंमें उपलब्ध होती हैं। दिगम्बर परम्पराके अनुसार, इस अंगके कुछ अंशोंका
उद्धार षट्खंडागम और कषायप्राभृतमें उपलब्ध है। चौदह पूर्व इसीमें गर्भित हैं। इसके पांच भेद
हैं—परिकर्म, सूत्र, पूर्वगत, अनुयोग और चूलिका। श्वेताम्बरोंके अनुसार परिकर्मके सात भेद हैं—सिद्ध-
सेणिआ, मणुस्ससेणिआ, पुट्ठसेणिआ, ओगाढ़सेणिआ, उपसंपज्जणसेणिआ, विप्पजहणसेणिआ, चुआचुअसेणिआ ।

इसमें पहले दोके चौदह-चौदह, और बादके पांचके ग्यारह-ग्यारह अवान्तर भेद होनेसे परिकर्मके ८३ भेद
होते हैं । दिगम्बर सम्प्रदायमें परिकर्मके पांच भेद किये गये हैं—चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति,
द्वीपसमुद्रप्रज्ञप्ति और व्याख्याप्रज्ञप्ति । सूत्र बाईस हैं । बाईस सूत्रोंके चार-चार भेद होनेसे सब सूत्र अठासी
होते हैं । पूर्वगतके चौदह भेद हैं—उत्पाद, अग्रायणी, वीर्यप्रवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्य-
प्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद, प्रत्याख्यान, विद्यानुवाद, कल्याणवाद, प्राणवाद, क्रियाविशाल और लोक-
बिन्दुसार । अनुयोगके दो भेद हैं—मूल प्रथमानुयोग और गण्डिकानुयोग । अनुयोगको दिगंबर ग्रंथोंमें
प्रथमानुयोगके नामसे कहा है । चूलिका—श्वेतांबरोंके अनुसार चौदह पूर्वोंमें ही चूलिका है । पहले पूर्वकी
चार, दूसरे पूर्वकी बारह, तीसरेकी आठ और चौथे पूर्वकी दस चूलिकायें हैं । दिगम्बर ग्रंथोंमें चूलिकाके
पाँच भेद मिलते हैं—जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता । स्त्रियोंको दृष्टिवाद पढ़नेका
निषेध है ।
अंगबाह्य—गणधरोंके बादमें होनेवाले आचार्य अल्प शक्तिवाले शिष्योंके लिये अंगबाह्यकी¹ रचना
करते हैं । अंगवाह्य अनेक प्रकारका है । श्वेताम्बर ग्रंथोंमें अंगवाह्यके दो भेद हैं—आवश्यक और
आवश्यकव्यतिरिक्त । आवश्यकके छह भेद हैं—सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग
और प्रत्याख्यान । आवश्यकव्यतिरिक्तके दो भेद हैं—कालिक और उत्कालिक । उत्तराध्ययन आदि छत्तीस
ग्रंथ कालिक, और दशवैकालिक आदि अट्ठाइस ग्रंथ उत्कालिक हैं । दिगम्बर ग्रंथोंमें अंगवाह्यके चौदह भेद
हैं—सामायिक चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्प-
व्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुंडरीक, महापुंडरीक और निषिद्धिका ।
श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार सर्वप्रथम इन आगम-ग्रंथों का संग्रह महावीर-निर्वाण (ई० पू० ५२७) के
लगभग १६० वर्ष पश्चात् ( ईसवी सन् के पूर्व ३६७ ), स्थूलभद्रके अधिपतित्वमें पाटलिपुत्रमें होनेवाली
परिषद्में किया गया था । उसके बाद लगभग ईसाकी छठी शताब्दिके आरंभमें देवर्द्धिगणिने वलभीमें
इन्हें व्यवस्थित कर लिपिबद्ध किया । आगम-ग्रंथ एक समयमें नहीं लिखे गये हैं ; भिन्न-भिन्न आगमोंका
भिन्न-भिन्न समय है । इसलिये आगमका प्राचीनतम भाग महावीर-निर्वाण के लगभग डेढ़-सौ वरस बाद—
ईसाके पूर्व चौथी शताब्दिके आरम्भमें, तथा आगमका सबसे अर्वाचीन भाग ईसाकी छठी शतान्दीके आरंभमें
देवर्द्धिगणि क्षमाश्रमणके कालमें व्यवस्थित किया गया है ।²
श्लोक २७ पृ० २४०, पं० ५ : प्राण—
प्राण शब्द वैदिक शास्त्रोंमें विविध अर्थोंमें प्रयुक्त किया गया है—कहीं प्राण शब्द का प्रयोग आत्माके
अर्थमें, कहीं इन्द्रके अर्थमें, कहीं सूर्यके अर्थमें, और कहीं सामके अर्थमें । एक जगह उपनिषदोंमें प्राणको
आत्माका कार्य कहा है, दूसरी जगह आत्मासे प्राणकी उत्पत्ति बताई गई है । कहीं प्राणको प्रज्ञा कहा गया
है, और कहीं प्राण शब्दको मृत्युके पश्चात् जानेवाले सूक्ष्म शरीरका पर्यायवाची बताया है । वेदान्ती
लोगोंने प्राणको ब्रह्मका पर्यायवाची माना है ।
जैन सिद्धान्तमें 'प्राण' पारिभाषिक शब्द है । गोम्मटसार जीवकाण्डमें 'प्राण' अधिकार
अलग है । जिसके द्वारा जीव जीता है, उसे प्राण कहा जाता है । प्राणके दो भेद हैं—द्रव्यप्राण और
भावप्राण । आँखोंका खोलना, बंद करना, श्वासोच्छ्वास लेना, काय-व्यापार आदि बाह्य द्रव्यइन्द्रियोंके
व्यापारको द्रव्यप्राण कहते हैं । तथा इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे होनेवाली चैतन्य रूप आत्माकी प्रवृत्तिको
भावप्राण कहते हैं । प्राण दस होते हैं—पाँच इंद्रिय, मन, वचन और कायबल, श्वासोच्छ्वास और आयु ।
१. तत्त्वार्थभाष्यमें ऋषियोंके कहे हुए कपिल आदि प्रणीत ग्रंथोंको भी अंगबाह्य कहा गया है ।
१. देखिये जगदीशचन्द्र जैन, प्राकृत साहित्य का इतिहास, पृ० ३३–१०४ ।

३०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
एकेन्द्रिय जीवके चार, और संज्ञी पंचेंद्रियके बारहवें गुणस्थान तक दसों प्राण होते हैं । तेरहवें गुणस्थानमें
वचन, श्वासोच्छ्वास, आयु और कायबल ये चार प्राण होते हैं। आगे चलकर इसी गुणस्थानमें वचनबलका
अभाव होनेसे तीन, और श्वासोच्छ्वासका अभाव होनेसे दो प्राण रह जाते हैं। चौदहवें गुणस्थानमें काय-
बलका भी अभाव होनेसे केवल एक आयु प्राण अवशेष रह जाता है। सिद्ध जीवोंके मोक्षावस्थामें शरीर
नहीं रहता, अतएव सिद्धोंके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आदि भावप्राण माने गये हैं। अतएव
संसारी जीव द्रव्यप्राणोंकी अपेक्षा, और सिद्ध जीव भावप्राणोंकी अपेक्षासे जीव कहे जाते हैं।
श्लोक २८ पृ० २५१, पं० ८ : ज्ञानके भेद—
ज्ञानके दो भेद हैं—सम्यग्ज्ञान और मिथ्याज्ञान । सम्यग्ज्ञानके दो भेद हैं—प्रत्यक्ष और परोक्ष ।
इन्द्रिय आदि सहायता के बिना केवल आत्माके अवलम्बनसे पदार्थोंके स्पष्ट जाननेको प्रत्यक्ष और इन्द्रिय
आदिकी सहायता से पदार्थोंके अस्पष्ट ज्ञान करनेको परोक्ष ज्ञान कहते हैं¹ । प्रत्यक्ष ज्ञानके दो भेद हैं²—
सांव्यवहारिक और पारमार्थिक । बाह्य इन्द्रिय आदिकी सहायता से उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको सांव्यवहारिक
प्रत्यक्ष³ कहते हैं । सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष दो प्रकारका है—इन्द्रियोंसे होनेवाला और मनसे होनेवाला ।
इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष⁴ और अनिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष दोनोंके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार-चार भेद
हैं ।⁵ इन्द्रिय और मनके निमित्तसे दर्शनके बाद होनेवाले ज्ञानको अवग्रह कहते हैं। अवग्रह के जाने हुए
पदार्थमें विशेष इच्छा रूप ज्ञानको ईहा कहते हैं; जैसे बगुलोंकी पंक्ति और पताकाको देखकर यह ज्ञान
होना कि यह पताका होनी चाहिये । ईहाके बाद विशेष चिह्नोंसे पताकाका ठीक-ठीक निश्चितरूप ज्ञान
होना अवाय ( अपाय ) है । तथा जाने हुए पदार्थको कालान्तरमें नहीं भूलना, धारणा है। अवग्रहके दो
१. जैनेतर दार्शनिकारोंने इन्द्रियजनित ज्ञानको प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय ज्ञानको परोक्ष कहा है ।
२. नन्दिसूत्रमें प्रत्यक्षके इन्द्रिय प्रत्यक्ष और नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष ये दो भेद किये गये हैं। यहाँ पहले तो मति-
ज्ञानको इन्द्रिय प्रत्यक्ष और अवधि आदि तीनको नोईंद्रिय प्रत्यक्षमें शामिल किया गया है, लेकिन आगे
चलकर मतिज्ञानको श्रुतज्ञानकी तरह परोक्ष कहा गया है। अनुयोगद्वारसूत्रमें प्रत्यक्षके दो भेद करकेएक
भागमें मतिज्ञानको और दूसरेमें अवधि आदि तीनको गर्भित किया गया है। देखिये पं० सुखलालजी-
न्यायावतार-भूमिका ( गुजराती ) । तथा तुलनीय—अत्राह शिष्यः—"आद्ये परोक्षम्" इति
तत्त्वार्थसूत्रे मतिश्रुतद्वयं परोक्षं भणितं तिष्ठति कथं प्रत्यक्षं भवति । परिहारमाह—तदुत्सर्गव्याख्यानम् ।
इदं पुनरपवादव्याख्यानम् । यदि तदुत्सर्गव्याख्यानम् न भवति तर्हि मतिज्ञानं कथं तत्त्वार्थे परोक्षं भणितं
तिष्ठति । तर्कशास्त्रे सां व्यावहारिकं प्रत्यक्षं कथं जातं । यथा अपवादव्याख्यानेन मतिज्ञानं परोक्षमपि
प्रत्यक्षज्ञानं तथा स्वात्माभिमुखं भावश्रुतज्ञानमपि परोक्षं सत्प्रत्यक्षं भण्यते । ब्रह्मदेव-द्रव्यसंग्रहवृत्ति ५ ।
३. सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष वास्तवमें परोक्ष ही है—तद्धीन्द्रियानिन्द्रियव्यवहितात्मव्यापारसंपादत्वात्परमार्थतः
परोक्षमेव धूमादग्निज्ञानवद् व्यवधानाविशेषात् । किं चासिद्धयनैकान्तिकविरुद्धानुमानाभासवत्संशयवि-
पर्ययानध्यवसायसंभवात्तदनुमानवत्संकेतस्मरणादिपूर्वकनिश्चयसंभवाच्च परमार्थः परोक्षमेवैतत् । यशो-
विजय—जैनतर्कपरिभाषा पृ० ११४, भावनगर ।
४. यहाँ यशोविजयजीने इन्द्रिय प्रत्यक्ष और अनिन्द्रिय प्रत्यक्षके मति और श्रुत दो भेद करके मतिज्ञानके
अवग्रह आदि चार और श्रुतज्ञानके चौदह भेद किये हैं—तदेवं सप्रभेदं सांव्यवहारिकं मतिश्रुतलक्षणं
प्रत्यक्षं निरूपितम् । जैनतर्कपरिभाषा ।
५. उमास्वाति, पूज्यपाद, अकलंक आदि आचायोंने मतिज्ञानके इन्द्रियजन्य और अनिन्द्रियजन्य ज्ञानके दो
भेद करके मतिज्ञानके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद किये हैं।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३०१
भेद हैं—व्यंजनावग्रह और अर्थावग्रह। दर्शनके बाद अव्यक्त ग्रहणको व्यंजनावग्रह और व्यक्त ग्रहणको
अर्थावग्रह कहते हैं। व्यंजनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता, इसलिये वह शेष चार इन्द्रियोंसे ही होता
है। अर्थावग्रह पाँच इन्द्रिय और मनसे होता है, इसलिये अर्थावग्रहके छह भेद, और व्यंजनावग्रहके चक्षु
और मनको निकाल देनेसे चार भेद होते हैं। छह प्रकारके अर्थावग्रहकी तरह ईहा, अवाय और धारणाके
भी छह-छह भेद हैं। इस प्रकार इन चौबीस भेदोंमें चार प्रकारका व्यंजनावग्रह मिला देनेसे मतिज्ञानके
अठाईस भेद होते हैं। यह अठाईस प्रकारका मतिज्ञान बहु, एक, बहुविध, क्षिप्र, अक्षिप्र, अनिस्सुत, निस्सुत,
अनुक्त, उक्त, ध्रुव और अध्रुवके भेदसे बारह बारह प्रकारका है। अतएव अठाईसको बारहसे गुणा करनेसे
इन्द्रिय और अनिन्द्रिय प्रत्यक्षके कुल ३३६ भेद होते हैं।
जो ज्ञान केवल आत्माकी सहायतासे हो, उसे पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं। पारमार्थिक प्रत्यक्ष
क्षायोपशमिक ( विकल ) और क्षायिक ( सकल ) के भेदसे दो प्रकारका है। जो ज्ञान कर्मोंके क्षय और
उपशमसे उत्पन्न होकर सम्पूर्ण पदार्थोंको जाननेमें असमर्थ हो, उसे क्षायोपशमिक कहते हैं। यह ज्ञान अवधि
और मनपर्ययके भेदसे दो प्रकारका है। अवधिज्ञानावरणके क्षयोपशम होनेपर इन्द्रिय और मनकी सहायताके
बिना सम्पूर्ण रूपी पदार्थोंको जाननेको अवधिज्ञान कहते हैं। अवधिज्ञानका विषय तीन लोक है। इसके
दो भेद हैं—भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय। अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अन-
वस्थितके भेदसे अवधिज्ञानके छह भेद भी होते हैं। मनपर्ययज्ञानावरणके क्षयोपशम होनेपर इन्द्रिय और मनके
बिना मानुष क्षेत्रवर्ती जीवोंके मनकी बात जाननेको मनपर्यय ज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान मुनियोंके ही होता
है। इसके दो भेद हैं—ऋजुमति और विपुलमति। क्षायिक अथवा सकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष सम्पूर्ण
कर्मोंके सर्वथा क्षयसे उत्पन्न होता है। इसे केवलज्ञान कहते हैं। केवलज्ञानके दो भेद हैं—भवत्थ केवलज्ञान
और सिद्धत्थ केवलज्ञान। भवत्थ केवलज्ञानके दो भेद हैं—सयोग और अयोग। सिद्धत्थ केवलज्ञानके दो
भेद हैं—अनंतरसिद्ध और परंपरासिद्ध।
इन्द्रिय और मनकी सहायतासे होनेवाले अस्पष्ट ज्ञानको परोक्ष कहते हैं। परोक्ष ज्ञानके पाँच भेद
हैं—स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान, और आगम१।
श्लोक २९ पृ० २४९, पं० ७ : निगोद—
जिन जीवोंके एक ही शरीरके आश्रय अनन्तानन्त जीव रहते हों, उसे निगोद कहते हैं२। निगोद
जीवोंका आहार और श्वासोच्छ्वास एक साथ ही होता है, तथा एक निगोद जीवके मरनेपर अनन्त निगोद
जीवोंका मरण और एक निगोद जीवके उत्पन्न होनेपर अनन्त निगोद जीवोंकी उत्पत्ति होती है। निगोद
जीव एक श्वासमें अठारह बार जन्म और मरण करते हैं, और अति कठोर यातनाको भोगते हैं। ये निगोद
जीव पृथिवी, अप्, तेज, वायु, देव, नारकी, आहारक और केवलियोंके शरीरको छोड़कर समस्त लोकमें
भरे हुए हैं। असंख्य निगोद जीवोंका एक गोलक होता है। इस प्रकारके असंख्य निगोद जीवों के असंख्य
गोलकोंसे तीनों लोक व्याप्त हैं। ये सूक्ष्म निगोदिया जीव व्यावहारिक और अव्यावहारिक भेदोंसे३
दो प्रकारके हैं। जिन जीवोंने अनादि निगोदसे एक बार भी निकलकर उस पर्यायको प्राप्त किया है, उन्हें
व्यावहारिक निगोद जीव कहा गया है। तथा जो जीव कभी भी सूक्ष्म निगोदसे बाहर निकल कर नहीं
आये, उन्हें अव्यावहारिक निगोद कहते हैं। जितने जीव अब तक मोक्ष गये हैं, अथवा भविष्यमें जायेंगे,
वे सम्पूर्ण जीव निगोद जीवोंके अनन्तवें भाग भी नहीं हैं। अतएव जितने जीव व्यवहारराशिसे निकलकर
१. स्मृति आदिके लक्षणके लिये देखिये, प्रस्तुत पुस्तकका पृ० २५१-२।
२. णि नियतां गां भूमि क्षेत्रं निवासं अनंतानंतजीवानां ददाति इति निगोदं। गोम्मटसार जीव० १९१ टीका।
३. गोम्मटसार जीव० आदि दिगम्बर ग्रन्थोंमें इन भेदोंको इतर और नित्य निगोदके नामसे कहा गया है।

३०२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
मोक्ष जाते हैं, उतने जीव अनादि निगोदसे निकलकर व्यवहारराशिमें आ जाते हैं। इसलिये यह संसार
कभी भव्य जीवोंसे खाली नहीं होता । जिस प्रकार निगोद राशि अक्षयानंत है, उसी प्रकार भव्य जीव
राशि भी अक्षयानंत है¹।
‘सब जीवोंके एक एक करके मोक्ष जानेसे एक दिन संसारका उच्छेद हो जाना चाहिये'—यह प्रश्न
भाष्यकार व्यासके सामने भी था। भाष्यकार इस प्रश्नको अवचनीय कोटिमें रक्खा है² ।
१. विशेष जाननेके लिये देखिये लोकप्रकाश ४-१-१०१; प्रज्ञापना १८ पद मलयागिरि वृत्ति तथा प्रस्तुत
पुस्तकके २९ श्लोकका व्याख्यार्थ और भावार्थ ।
२. अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्तमानस्यास्ति क्रमसमाप्तिर्न वेति । अवचनीयमेतत् । कथम् ।
अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः सर्वो जातो मरिष्यति मृत्वा जनिष्यत इति । ओं भो इति ।
अथ सर्वो जातो मरिष्यतीति मृत्वा जनिष्यत इति । विभज्य वचनीयमेतत् । प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः
कुशलो न जनिष्यत इतरस्तु जनिष्यते । तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसीत्येवं परिपृष्टे विभज्य
वचनीयः प्रश्नः पशूनधिकृत्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति । अयं तु अवचनीयः प्रश्नः संसारोऽयमन्त-
वानथानन्त इति । पातंजल योगसूत्र भाष्य ४-३३ ।
तुलनीय—ननु अष्टसमयाधिकषण्मासाभ्यंतरे अष्टोत्तरशतजीवेषु कर्मक्षयं कृत्वा सिद्धेषु सत्सु
सिद्धराशेर्वृद्धिदर्शनात् संसारिजीवराशेश्च हानिदर्शनात् कथं सर्वदा सिद्धेभ्योऽनंतगुणत्वं एकशरीर-
निगोदजीवानां सर्वजीवराश्यनंतगुणकालसमयसमूहस्य तद्योग्यानंतभागे गते सति संसारिजीवराशि-
क्षयस्य सिद्धराशिबहुत्वस्य च सुघटत्वान् इति चेत् । तन्न । केवलज्ञानदृष्ट्या केवलिभिः श्रुतज्ञानदृष्ट्या
श्रुतकेवलिभिश्च सदा दृष्टस्य भव्यसंसारिजीवराश्यक्षयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तर्कविषयत्वाभावात् । गोम्मटसार
जीव० गा० १९६ केशववर्णी टीका ।

बौद्ध परिशिष्ट (ख)
( श्लोक १६ से १९ तक )
बौद्ध दर्शन
"बौद्ध दर्शनको सुगत दर्शन भी कहते हैं। बौद्ध लोगोंने विपश्यी, शिखी, विश्वभू, क्रकुच्छन्द, काञ्चन,
काश्यप और शाक्यसिंह ये सात सुगत माने हैं।¹ सुगतको तीर्थंकर, बुद्ध अथवा धर्मधातु नामसे भी कहा जाता
है । बुद्धोंके कण्ठ तीन रेखाओंसे चिह्नित होते हैं। अन्तिम बुद्धने मगध देशमें कपिलवस्तु नामक ग्राममें जन्म
लिया था । इनकी माताका नाम मायादेवी और पिताका नाम शुद्धोदन था । बौद्ध लोग बुद्ध भगवान्‌को सर्वज्ञ
कहते हैं । बुद्धने दुःख, समुदाय ( दुःखका कारण ), मार्ग और निरोध ( मोक्ष ) इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है । बौद्ध मतमें पांच इन्द्रियां और शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श ये पांच विषय, मन और धर्मा-
यतन ( शरीर ) ये सब मिलाकर बारह आयतन माने गये हैं । बौद्ध प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाणोंको
मानते हैं । बौद्ध लोग आत्माको न मानकरं ज्ञानको ही स्वीकार करते हैं । इनके मतमें क्षण-क्षणमें नाश
होनेवाली संतानको ही एक भवसे दूसरे भवमें जानेवाली मान गया है । बौद्ध साधु चमर रखते हैं, मुण्डन
कराते हैं, चमड़ेका आसन और कमण्डलु रखते हैं, तथा घुंटी तक गेरुआ रंगका वस्त्र पहिनते हैं । ये लोग
स्नान आदि शौच क्रिया विशेष करते हैं । बौद्ध साधु भिक्षा पात्रमें आये हुए मांसको भी शुद्ध समझकर भक्षण
कर लेते हैं । ये लोग जीवोंकी दया पालनेके लिये भूमिको बुहारकर चलते हैं, और ब्रह्मचर्य आदि
क्रियामें खूब दृढ़ होते हैं । बौद्ध मतमें धर्म, बुद्ध और संघ ये तीन रत्न, और सम्पूर्ण विघ्नोंको नाश करने-
वाली ताराको देवी स्वीकार किया गया है । वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचार और माध्यमिक ये बौद्धोंके
चार भेद हैं ।²"
बौद्धोंके मुख्य सम्प्रदाय
बुद्धके निर्वाण जानेके बाद संघमें कलहका आरम्भ हुआ, और बुद्ध-निर्वाणके सौ वर्ष पश्चात् ईसवी
सन् पूर्व ४०० में वैशालीमें एक परिषद्की आयोजना की गई । इस परिषद्में महासंघिक मूल महा-
संघिक, एकव्यवहारिक, लोकोत्तरवादी, कुकुल्लिक, बहुश्रुतीय, प्रज्ञप्तिवादी, चैत्तिक, अपरशैल और उत्तरशैल
इन नौ शाखाओंमें विभक्त हो गये । इधर थेरवादी भी निम्न ग्यारह मुख्य शाखाओंमें बंट गये—हैमवत,
सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तिक, महीशासक, काश्यपीय, सोत्रांतिक, वात्सीपुत्रीय, धर्मोत्तरीय, भद्रयानीय, सम्मितीय,
और छन्नागरिक³ । थेरवादियों और महासंघिकोंके उक्त सम्प्रदायोंके सिद्धांतोंके विषयमें बहुत कम ज्ञातव्य
१. पाली ग्रन्थोंमें कहीं आठ, कहीं सोलह, और कहीं पच्चीस बुद्धोंके नाम आते हैं । देखिये राजवाड़े-
दीघनिकाय भाग २, मराठी भाषांतर, पृ० ४६ ।
२. देखिये गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका और राजशेखरका षड्दर्शनसमुच्चय ।
३. वसुमित्रने इन बीस भेदोंको हीनयान सम्प्रदायकी शाखा कहकर उल्लेख किया है । परन्तु आगे चलकर
ये महासंघिक और थेरवाद सम्प्रदाय क्रमसे हीनयान और महायान कहे जाने लगे । हीनयानी केवल
अपने ही निर्वाणके लिये प्रयत्न करते हैं और यहां अन्य मनुष्योंकी तरह बुद्धको भी मनुष्य ही माना
गया है । यहां 'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं, पंच स्कंधोंका क्षय हो जाना निर्वाण है,' इसके आगे सिद्धान्तों-
का दार्शनिक विकास दृष्टिगोचर नहीं होता । महायान सम्प्रदायके अनुयायी अनन्त काल तक प्राणियोंके
मोक्षके लिये प्रयत्नशील रहते हैं। निर्वाणके बाद भी बुद्धकी प्रवृत्ति संसारके निर्वाणके लिये बराबर
जारी रहती है । यहाँ गृहस्थमें रहकर भी बिना किसी वर्णभेदके प्राणीमात्रके लिये निर्वाणका द्वार सदा

३०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
बातें मिलती हैं । वैदिक और जैन शास्त्रोंमें भी उक्त सम्प्रदायोंमें सर्वास्तिवादी, सौत्रांतिक और आर्यसमितीय
( वैभाषिक ) नामके बौद्ध सम्प्रदायोंको छोड़कर अन्य सम्प्रदायोंका उल्लेख नहीं मिलता ।
सौत्रान्तिक
ये लोग टीकाओंकी अपेक्षा बुद्धके सूत्रोंको अधिक महत्त्व देनेके कारण सौत्रांतिक कहे जाते हैं । सौत्रां-
तिक लोग सर्वास्तिवादियों ( वैभाषिकों ) की तरह बाह्य जगतके अस्तित्वको मानते हैं और समस्त पदार्थोंको
बाह्य और अन्तरके भेदसे दो विभागोंमें विभक्त करते हैं । बाह्य पदार्थ भौतिक रूप, और आन्तर पदार्थ
चित्त-चैत्त रूप होते हैं । "सौत्रांतिकोंके मतमें पांच स्कन्धोंको छोड़कर आत्मा कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है ।
पाँच स्कंध ही परलोक जाते हैं । अतीत, अनागत, सहेतुक विनाश, आकाश और पुद्गल ( नित्य और व्यापक
आत्मा ) ये पाँच संज्ञामात्र, प्रतिज्ञामात्र, संवृतिमात्र, और व्यवहारमात्र हैं । सौत्रान्तिकोंके मतमें पदार्थोंका
ज्ञान प्रत्यक्षसे न होकर ज्ञानके आकारकी अन्यथानुपपत्ति रूप अनुमानसे होता है । साकार ज्ञान प्रमाण होता
है । सम्पूर्ण संस्कार क्षणिक होते हैं । रूप, रस, गंध और स्पर्शके परमाणु तथा ज्ञान प्रत्येक क्षण नष्ट होते
हैं । अन्यापोह ( अन्य व्यावृत्ति ) ही शब्दका अर्थ है । तदुत्पत्ति और तदाकारतासे पदार्थोंका ज्ञान होता है ।
नैरात्म्य भावनासे जिस समय ज्ञान-सन्तानका उच्छेद हो जाता है, उस समय निर्वाण होता है ।"¹ वसुबंधुके
अभिधर्मकोशके² अनुसार सौत्रांतिक लोग वर्तमान, और जिनसे अभी फल उत्पन्न नहीं हुआ, ऐसी भूत वस्तुको
अस्ति रूप, तथा भविष्य और जिनसे फल उत्पन्न हो चुका है, ऐसी भूत वस्तुको नास्ति रूप मानते हैं । सौत्रां-
तिक लोगोंके इस सिद्धांतको माननेवाले धर्मत्राता, घोष, वसुमित्र और बुद्धदेव ये चार विद्वान मुख्य
समझे जाते हैं । ये लोग क्रमसे भावपरिणाम, लक्षणपरिणाम, अवस्थापरिणाम और अपेक्षापरिणामको
मानते हैं ।
धर्मत्राता (.१०० ई.)—भाव-परिणामवादी धर्मत्राताका मत है कि जिस प्रकार सुवर्णके
कटक, कुण्डल आदि गुणोंमें ही परिवर्तन होता है, स्वयं सुवर्ण द्रव्यमें कोई परिवर्तन नहीं होता, इसी तरह
वस्तुका धर्म भविष्य पर्यायको छोड़कर वर्तमान रूप होता है, और वर्तमान भावको छोड़कर अतीत रूप
होता है, परन्तु वास्तवमें स्वयं द्रव्यमें कोई परिवर्तन नहीं होता³ । धर्मत्राताको कनिष्ककी परिषद्के मुख्य
सदस्य वसुमित्रका मामा कहा जाता है । धर्मत्राताने बुद्ध भगवानके मुखसे कहे हुए एक हज़ार श्लोकोंका
खुला रहता है । इस सम्प्रदायके अनुयायी बुद्धको देवाधिदेव मानकर बुद्धकी भक्ति करते हैं । महायान
सम्प्रदायमें प्रत्येक पदार्थको निःस्वभाव और अनिर्वाच्य कहकर तत्त्वोंका दार्शनिक रीतिसे तलस्पर्शी
विचार किया गया है । सौत्रांतिक और वैभाषिक हीनयान, और विज्ञानवाद और शून्यवाद महायान
सम्प्रदायकी शाखायें हैं ।
जापानी विद्वान् यामाकामी सोगेन ( Yamakami Sogen ) के मतानुसार बुद्धके निर्वाणके
तीन सौ वरस बाद वैभाषिक, चार सौ वरस बाद सौत्रान्तिक, तथा पाँच सौ वरस बाद माध्यमिक और
ईसाकी तीसरी शताब्दिमें विज्ञानवाद सिद्धान्तोंकी स्थापना हुई । प्रो. ध्रुवका मत है, कि असंग और
वसुबंधुके पूर्व भी विज्ञानवादका सिद्धान्त मौजूद था, इसलिये मध्यमवादके पहले विज्ञानवादको मानकर
बादमें माध्यमिकवादकी उत्पत्ति मानना चाहिये । देखिये प्रोफेसर ध्रुव—स्याद्वादमञ्जरी पृ० ७०-२५ ।
१. गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका ।
२. इसका रशियन विद्वान प्रो. शर्बाट्सकी ( Stchertatsky ) ने अंग्रेजीमें अनुवाद किया है ।
३. धर्मस्याध्वसु वर्तमानस्य भावान्यथात्वमेव केवलं न तु द्रव्यस्येति । यथा सुवर्णद्रव्यस्य कटककेयूर-
कुण्डलाद्यभिधाननिमित्तस्य गुणस्यान्यथात्वं न सुवर्णस्य, तथा धर्मस्यानागतादिभावान्यथात्वम् ।
तत्त्वसंग्रहपंजिका पृ० ५०४ ।

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३०५
धम्मपदमैं तैंतीस अध्ययनोंमें संग्रह किया था । धम्मपदका चीनी अनुवाद मिलता है । धर्मत्राताको पंच-
वस्तुविभाषाशास्त्र संयुक्ताभिधर्महृदयशास्त्र, अवदानसूत्र और धर्मत्रातध्यानसूत्र इन ग्रंथोंका प्रणेता कहा
जाता है¹ ।
घोष ( १५० ई. )—लक्षण-परिणामवादी घोषका सिद्धांत है कि जिस प्रकार किसी एक स्त्रीमें
आसक्ति करनेवाला पुरुष दूसरी स्त्रियोंमें आसक्तिको नहीं छोड़ देता, उसी तरह भूत धर्म भूत धर्मसे संबद्ध
होता हुआ वर्तमान और भविष्य धर्मोंसे संबंध नहीं छोड़ता, तथा वर्तमान धर्म वर्तमान धर्मसे संबद्ध होता हुआ
भूत और भविष्य धर्मसे संबंध नहीं छोड़ता² । घोषने अभिधर्मामृतशास्त्रकी रचना की है । इस ग्रंथका चीनी
अनुवाद उपलब्ध है ।
बुद्धदेव ( २०० ई ) —अपेक्षा-परिणामवादी बुद्धदेवका कहना है कि जैसे एक ही स्त्री पुत्री,
माता आदि कही जाती है, उसी तरह एक ही धर्ममें नाना अपेक्षाओंसे भूत, भविष्य और वर्तमानका
व्यवहार होता है । जिसके केवल पूर्व पर्याय है, उसे भविष्य, जिसके केवल उत्तर पर्याय है, उसे भूत,
और जिसने पूर्व पर्यायको प्राप्त कर लिया है और जो उत्तर पर्यायको धारण करनेवाला है, उसे वर्तमान
कहते हैं³ ।
वसुमित्र ( १०० ई० ) —अवस्था-परिणामवादी वसुमित्रका कहना है कि धर्म भिन्न-भिन्न
अवस्थाओंकी अपेक्षा ही भूत, भविष्य और वर्तमान कहा जाता है । वास्तवमें द्रव्यमें परिवर्तन नहीं होता ।
इसलिये जिस समय किसी धर्ममें कार्य करनेकी शक्ति बन्द हो जाती हैं, उस समय उसे भूत, जिस समय
धर्ममें क्रिया होती रहती है, उस समय वर्तमान, और जिस समय धर्ममें क्रिया होनेवाली हो, उस समय
उसे भविष्य कहते हैं⁴ । वसुमित्र कनिष्ककी परिषद्में उपस्थित होनेवाले पाँचसौ अर्हतोंमेंसे थे । वसुमित्रने
अभिधर्मप्रकरणपाद, अभिधर्मधातुकायपाद, अष्टादशनिकायशास्त्र, तथा आर्यवसुमित्रबोधिसत्त्वसंगीतिशास्त्र
ग्रंथोंकी रचना की है ।
धर्मत्राता, घोष, बुद्धदेव और वसुमित्रके सिद्धांतोंका प्रतिपादन और खण्डन तत्त्वसंग्रहमें त्रैकाल्य-
परीक्षा नामक प्रकरणमें किया गया है । वसुबंधुने अभिधर्मकोश ( ५-२४-६ )⁵ में आदिके तीन विद्वानोंके
मतोंका खण्डन करके वसुमित्रके अवस्था-परिणामको स्वीकार किया है ।
वैभाषिक
वैभाषिक लोग अभिधर्मकी टीका विभाषाको सबसे अधिक महत्त्व देनेके कारण वैभाषिक कहे
जाते हैं । ये लोग भूत, भविष्य और वर्तमानको अस्तिरूपसे मानते हैं । इनके मतमें ज्ञान और ज्ञेय दोनों
वास्तविक हैं । वैभाषिक लोग प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानते हैं । "इनके मतमें प्रत्येक
१. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका, पृ० ५६ ।
२. धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽतीतोऽतीतलक्षणयुक्तोऽनागतप्रत्युत्पन्नाभ्यां लक्षणाभ्यां अवियुक्तः । यथा पुरुष एकास्यां
स्त्रियां रक्तः शेषास्वविरक्त एवमनागतप्रत्युत्पन्नास्वपि वाच्ये । तत्त्वसंग्रहपंजिका ।
३. धर्मोऽध्वसु वर्तमानः पूर्वापरमपेक्ष्यान्योन्य उच्यते इति । यथैका स्त्री माता चोच्यते दुहिता चेति ।
त० संग्रहपंजिका ।
४. धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽवस्थामवस्थां प्राप्यान्योऽन्यो निर्दिश्यतेऽवस्थान्तरतो, न द्रव्यतः, द्रव्यस्य त्रिष्वपि
कालेष्वभिन्नत्वात् । तत्त्वसंग्रहपंजिका ।
५. देखिये प्रोफेसर शेर्वाट्स्कोका The Central Conception of Buddhism, परिशिष्ट १,
पृ. ७६-९१ ।
३९

३०६ श्रीमदराजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
पदार्थ उत्पत्ति, स्थिति, जरा और मरण इन चार क्षणों तक अवस्थित रहता है । पुद्गल ( आत्मा ) में भी
ये गुण रहते हैं । ज्ञान निराकार होता है, और यह पदार्थके साथ एक हो सामग्रीसे उत्पन्न होता है ।
वैभाषिक आर्यसमितीय नामसे भी कहे जाते हैं ।'१"
वैभाषिक ( सर्वास्तिवादी ) लोंगोंका साहित्य आजकल चीनी भाषामें उपलब्ध है । मुख्य साहित्य
निम्न प्रकारसे है—१. कात्यायनीपुत्रका ज्ञानप्रस्थानशास्त्र । इसे महाविभाषा भी कहते हैं । २. सारीपुत्रका
धर्मस्कंध । ३. पूर्णका धातुकाय । ४. मौद्गलायनका प्रज्ञप्तिशास्त्र । ५. देवक्षेमका विज्ञानकाय । ६. सारी-
पुत्रका संगीतिपर्याय और वसुमित्रका प्रकरणपाद । इसके अतिरिक्त, ईसवी सन् ४२०-५०० में वसुबंधुने
अभिधर्मकोश ( वैभाषिककारिका ) ग्रंथ लिखा और इस ग्रंथपर स्वयं ही अभिधर्मकोशभाष्य रचा । इसमें
सौत्रांतिकोंके सिद्धांतोंका खण्डन किया गया है। आगे चलकर सौत्रांतिक विद्वान यशोमित्रने इस ग्रंथपर
अभिधर्मकोशव्याख्या नामकी टीका लिखी । इसके अलावा, वैभाषिक विद्वान संघभद्रने समयप्रदीप और
न्यायानुसार ( इनका चीनीमें भाषांतर है ) नामक ग्रन्थ लिखे । धर्मत्राता, घोष, वसुमित्र, आदिने भी
वैभाषिक सम्प्रदायके अनेक ग्रन्थ लिखे हैं । प्रसिद्ध तार्किक दिङ्नाग ने भी प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश, हेतु-
चक्रडमरु, प्रमाणसमुच्चयवृत्ति, आलम्बनपरीक्षा, त्रिकालपरीक्षा आदि न्याय ग्रंथोंकी रचना की है ।
सौत्रांतिक और वैभाषिक दोनों सम्प्रदायोंका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । इसीलिये वैदिक ग्रन्थ-
कार इन दोनों सम्प्रदायोंके भिन्न-भिन्न सिद्धान्तोंमें२ में कोई भेद न समझकर सौत्रांतिक और वैभाषिकोंका
सर्वास्तिवादीके नामसे उल्लेख करते हैं । परन्तु सौत्रांतिकोंने कभी अपने आपको सर्वास्तिवादी नहीं कहा
कारण कि सर्वास्तिवादी और सौत्रांतिक दोनोंके ग्रंथ अलग-अलग थे ३ । सौत्रान्तिक और वैभाषिक ( सर्वा-
स्तिवादी ) दोनों बाह्य पदार्थोंके अस्तित्वको मानते हैं । ये लोग अठारह धातुओंको स्वीकार करते हैं । इन
सम्प्रदायोंकी रुचि विशेष रूपसे क्षणिकवाद, प्रत्यक्ष और अनुमानकी परिभाषा, पदार्थोंका अर्थक्रियाकारित्व,
अपोहवाद, अवयववाद, विशेषवाद आदि विषयोंको प्रतिपादन करनेकी ओर अधिक रही है । ये न्याय-
वैशेषिक, सांख्य आदि वैदिक दर्शनकारोंके सिद्धांतोंका खण्डन करते थे । वसुबन्धु, यशोमित्र, धर्मकीर्ति
( लगभग ६३५ ई. ), विनीतदेव, शान्तभद्र, धर्मोत्तर ( ८४१ ई. ), रत्नकीर्ति, पण्डित अशोक, रत्नाकर
शान्ति आदि विद्वान इन सम्प्रदायोंके उल्लेखनीय विद्वान हैं ।
सौत्रान्तिक-वैभाषिकोंके सिद्धांत
१. प्रमाण और प्रमाणका फल भिन्न नहीं है—जिस समय किसी प्रमाणके द्वारा पदार्थका ज्ञान
होनेपर उस पदार्थ सम्बन्धी अज्ञानकी निवृत्ति होती है, उस समय उस पदार्थके प्रति हेय अथवा उपादेयकी
बुद्धि होती है । इसी बुद्धिका होना प्रमाणका फल ( प्रमिति ) कहा जाता है । नैयायिक, मीमांसक और
सांख्य लोगोंकी मान्यता है कि जिस प्रकार काटनेकी क्रियाके बिना कुठारको करण नहीं कहा जा सकता,
उसी तरह प्रमिति क्रियाके बिना प्रमाणको करण नहीं कह सकते । अतएव जिस प्रकार कुठारसे वृक्षको
काटनेपर वृक्षके दो टुकड़े हो जाना रूप फल कुठारसे भिन्न है, उसी तरह इन्द्रिय और पदार्थोंका ज्ञान
होनेसे जो पदार्थोंका ज्ञान होना रूप फल होता है, उसे भी प्रमाणसे सर्वथा भिन्न मानना चाहिये । प्रत्यक्ष,
१. देखिये गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका, पृ. ४६, ४७ । सर्वास्तिवादके सिद्धान्तोंके विशेष जाननेके
लिये यामाकामी सोगेनका Systems of Buddhistic Thought देखना चाहिये ।
२. सर्वदर्शनसंग्रहकार आदि विद्वानोंके अनुसार वैभाषिक पदार्थोंका ज्ञान प्रत्यक्षसे और सौत्रांतिक
पदार्थोंका ज्ञान अनुमानसे मानते हैं ।
३. देखिये यामाकामी सोगेन का Systems of Buddhistic Thought, अध्याय ३ ।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३०७
अनुमान आदि प्रमाण साधकतम होनेसे करण हैं, और पदार्थोंका हेय-उपादेय रूप ज्ञान होना साध्य होनेसे
क्रियारूप है, अतएव प्रमाणका फल प्रमाणसे सर्वथा भिन्न है। बौद्ध इस सिद्धान्तका खण्डन करते हैं।
उनका कथन है कि प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका स्वरूप पदार्थोंका जानना है, अतएव पदार्थोंको जाननेके
सिवाय प्रमाणका कोई दूसरा फल नहीं कहा जा सकता, इसलिये प्रमाण और प्रमाणके फलको सर्वथा अभिन्न
मानना चाहिये । जिस समय ज्ञान पदार्थोंको जानता है, उस समय ज्ञान पदार्थोंके आकारका होता है; यही
ज्ञानकी प्रमाणता है ! तथा ज्ञान पदार्थोंके आकारका होकर पदार्थोंको जानता है, यह ज्ञानका फल है।
अतएव एक ही ज्ञानको प्रमाण और प्रमाणका फल स्वीकार करना चाहिये । व्यवहारमें भी देखा जाता है
कि जो आत्मा प्रमाणसे पदार्थोंका ज्ञान करती है, उसे ही फल मिलता है। इसलिये प्रमाण और प्रमाणका
फल सर्वथा अभिन्न हैं।
२. क्षणिकवाद-बौद्ध लोग प्रत्येक पदार्थको क्षणिक स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि संसार-
में कोई भी वस्तु नित्य नहीं है। प्रत्येक वस्तु अपने उत्पन्न होनेके दूसरे क्षणमें ही नष्ट हो जाती है, क्योंकि
नष्ट होना पदार्थोंका स्वभाव है। यदि पदार्थोंका स्वभाव नष्ट होना न माना जाय, तो घड़े और लाठीका
संघर्ष होनेपर भी घड़ेका नाश नहीं होना चाहिये । हमें पदार्थ नित्य दिखाई पड़ते हैं, परन्तु यह हमारा
भ्रम मात्र है। वास्तवमें प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षणमें नाश हो रही है। जिस प्रकार दीपककी ज्योतिके प्रतिक्षण
बदलते रहनेपर भी समान आकारकी ज्ञान-परम्परासे 'यह वही दीपक है' इस प्रकारका ज्ञान होता है, उसी
प्रकार प्रत्येक वस्तुके क्षण-क्षणमें नष्ट होनेपर भी पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सदृशता होनेके कारण वस्तुका
प्रत्यभिज्ञान होता है। १ यदि वस्तुको नित्य माना जाय तो कूटस्थ नित्य वस्तुमें अर्थक्रिया नहीं हो सकती२,
और वस्तुमें अर्थक्रिया न होनेसे उसे सत् भी नहीं कहा जा सकता। दसवीं शताब्दिके बौद्ध विद्वान रत्न-
कीर्तिने क्षणिकवादकी सिद्धिके लिये 'क्षणभंगसिद्धि' नामक स्वतन्त्र ग्रंथ लिखा है। ३ इस ग्रंथमें रत्नकीर्तिने
शंकर, त्रिलोचन, न्यायभूषण, वाचस्पति आदि विद्वानोंके मतका खण्डन करते हुए अन्वयव्याप्ति और व्यति-
रेकव्याप्तिसे क्षणभंगवादकी सिद्धि की है। शान्तरक्षित आचार्यने तत्त्वसंग्रहमें स्थिरभावपरीक्षा नामक
प्रकरणमें भी नित्यवादकी मीमांसा करते हुए क्षणिकवादको सिद्ध किया है। इसके अतिरिक्त, जैन४ ओर
वैदिक५ ग्रंथोंमें भी क्षणिकवादका प्रतिपादन मिलता है ६ ।
३. अवयववाद- नैयायिक लोग अवयवीको अवयवोंसे भिन्न मानकर उन दोनोंका सम्बन्ध सम-
वायसे स्वीकार करते हैं। परन्तु बौद्धोंका कहना है कि अवयवोंको छोड़कर अवयवी कोई भिन्न वस्तु नहीं
है । भ्रमके कारण अवयव ही अवयवी रूप प्रतीत होते हैं। अवयव रूप परमाणु उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न
होते ही नष्ट हो जाते हैं, इसलिये अवयवोंको छोड़कर अवयवी पृथक् वस्तु नहीं है। जिस समय परस्पर मिश्रित
परमाणु ज्ञानसे जाने जाते हैं, उस समय ये परमाणु विस्तृत प्रदेशमें रहनेके कारण स्थूल कहे जाते हैं।७
१. जैन लोग भी पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा क्षणिकवाद स्वीकार करते हैं-स्याद्वादिनामपि हि प्रतिक्षणं
नवनवपर्यायपरंपरोत्पत्तिरभिमतैव । तथा च क्षणिकत्वम् । देखिये पीछे, पृ. १८८
२. देखिये पीछे पृ. २३४
३. पंडित हरप्रसाद शास्त्री द्वारा बिब्लिओथिका इन्डिका कलकत्तामें सम्पादित ।
४. देखिये षड्दर्शनसमुच्चय, गुणरत्नकी टीका, पृ. २९,३०,४०; चन्द्रप्रभसूरि, प्रमेयरत्नकोष पृ०. ३० ।
५. न्यायमंजरी; न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका आदि ।
६. बौद्धोंके क्षणिकवादकी तुलना फ्रांसके दार्शनिक वर्गासाँ ( Bergson ) के क्षणिकवादके साथ की
जा सकती है ।
७. परमाणव एव पररूपदेशपरिहारेणोत्पन्नाः परस्परसहिता अवभासमाना देशवितानवन्तो भासन्ते, वितत-
देशत्वञ्च स्थूलत्वम् । पंडित अशोक, अवयविनिराकरण, पृ. ७९ ।

३०८ श्रीमदराजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
इसलिये परमाणुओंका छोड़कर अवयवीको भिन्न नहीं मानना चाहिये । पंडित अशोकने अवयववादकी पुष्टिके
लिये 'अवयविनिराकरण' नामक ग्रंथ लिखा है ।
४. विशेषवाद—नैयायिक सामान्यको एक, नित्य और व्यापी मानते हैं। बौद्धोंका मत है
कि विशेषको छोड़कर सामान्य कोई भिन्न वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण क्षणिक पदार्थोंका ज्ञान उनके असाधारण रूपसे
ही होता है, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ स्वलक्षण हैं, अर्थात् पदार्थोंका सामान्य रूपसे ज्ञान नहीं होता । जिस समय
हम पांच उंगलियोंका ज्ञान करते हैं, उस समय पांच उंगलियोंरूप विशेषको छोड़कर अंगुलित्व कोई भिन्न
जाति नहीं मालूम होती ।१ इसी प्रकार गौको जानते समय गौके वर्ण, आकार आदि विशेष ज्ञानको छोड़कर
गोत्व सामान्यका भिन्न ज्ञान नहीं होता, अतएव विशेषको छोड़कर सामान्यको भिन्न वस्तु नहीं मानना
चाहिये । क्योंकि विशेषमें ही वस्तुका अर्थक्रियाकारित्व लक्षण ठीक-ठीक घटता है ।२ वेदान्तियोंके मतमें भी
जातिका प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे ज्ञान नहीं माना गया, अतएव सामान्य भिन्न पदार्थ नहीं है ।
५. अपोहवाद—जिससे दूसरेकी व्यावृत्ति की जाय, उसे अपोह कहते हैं ( अन्योऽपोह्यते व्यावर्त्यते
अनेन ) । बौद्ध लोग अत्यन्त व्यावृत परस्पर विलक्षण स्वलक्षणोंमें अनुवृत्ति प्रत्यय करनेवाले सामान्यको
नहीं मानते, यह कहा जा चुका है । बौद्धोंकी मान्यता है कि जिस समय हमें किसी शब्दका ज्ञान होता है, उस
समय उस शब्दसे पदार्थोंका अस्ति और नास्ति दोनों रूपसे ज्ञान होता है । उदाहरणके लिये, जिस समय
हमें गौ शब्दका ज्ञान होता है, उस समय एक साथ ही गौके अस्तित्व और गौके अतिरिक्त अन्य पदार्थोंके
नास्तित्व रूपका ज्ञान होता है । इसलिये बौद्धोंके मतमें अतद्व्यावृत्ति ( अपोह ) ही शब्दार्थ माना जाता है ।
पंडित अशोकने अपोहवादपर 'अपोहसिद्धि' नामक स्वतंत्र ग्रंथ लिखा है । मीमांसाश्लोकवार्त्तिकमें भी
अपोहवादपर एक अध्याय है ।
शून्यवाद
शून्यवादको माध्यमिकवाद अथवा नैरात्म्यवाद भी कहते हैं । माध्यमिक लोगोंका कथन है कि
पदार्थोंका न निरोध होता है, न उत्पाद होता है, न पदार्थोंका उच्छेद होता है, न पदार्थ नित्य हैं, न पदार्थोंमें
अनेकता है, न एकता है, और न पदार्थोंमें गमन होता है, और न आगमन होता है३ । अतएव सम्पूर्ण
धर्म मायाके समान होनेसे निस्स्वभाव हैं। जो जिसका स्वभाव होता है, वह उससे कभी पृथक् नहीं होता,
और वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता । परन्तु हम जितने पदार्थ देखते हैं, वे सब अपनी-अपनी
हेतुप्रत्यय-सामग्रीसे४ उत्पन्न होते हैं, और अपनी योग्य सामग्रीके अभावमें नहीं होते । इसलिये जो लोग
स्वभावसे पदार्थोंको भावरूप मानते हैं, वे लोग अहेतु-प्रत्ययसे पदार्थोंकी उत्पत्ति स्वीकार करना चाहते हैं ।
अतएव सम्पूर्ण पदार्थ परस्पर सापेक्ष हैं, कोई भी पदार्थ सर्वथा निरपेक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता । अतएव हम
१. प्रत्यक्षभासि धर्म्सु न पंचस्वंगुलीषु स्थितं
सामान्यं प्रतिभासते न च विकल्पाकारबुद्धौ तथा ।
ता एव स्फुटमूर्तयोऽत्र हि विभासन्ते न जातिस्ततः
सादृश्यभ्रमकारणो पुनरिमावेकोपलब्धध्वनी ॥
पंडित अशोक, सामान्यदूषणदिक्प्रसारिता, पृ. १०२ ।
२. देखिये पीछे, पृ. १२३-१२४ ।
३. अनिरुद्धमनुत्पादमनुच्छेदमशाश्वतं ।
अनेकार्थमनानार्थमनागममनिर्गमम् ॥ माध्यमिकवृत्ति प्रत्ययपरीक्षा ।
४. हेतुप्रत्ययं अपेक्ष्य वस्तुनः स्वभावता न इतरथा ।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३०९
पदार्थोंका स्वभावकी अपेक्षा उत्पन्न होना नहीं मान सकते१। पदार्थ स्वभावसे भाव रूप नहीं हैं, इसलिये वे
परभावकी अपेक्षा भी उत्पन्न नहीं होते, अन्यथा सूर्यसे भी अन्धकारकी उत्पत्ति माननी चाहिये। पदार्थ
स्वभाव और परभावकी अपेक्षा उत्पन्न नहीं होते, इसलिये स्वभाव और परभाव दोनों ( उभय रूप ) से
भी उनकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। तथा भाव, अभाव और भावाभावसे पदार्थोंकी उत्पत्ति न होनेसे अनुभय
रूपसे भी पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते।२ अतएव जिस प्रकार असत् मायागज सत् रूपसे प्रतीत होता है,
जिस प्रकार अपारमार्थिक माया परमार्थ रूपसे ज्ञात होती है, उसी तरह सम्पूर्ण अतात्त्विक धर्म अविद्याके
कारण तत्त्व रूपसे दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तवमें न पदार्थ उत्पन्न होते हैं, न नष्ट होते हैं, न कहीं लाभ है, न
हानि है, न सत्कार है, न पराभव है, न सुख है, न दुख है, न प्रिय है, न अप्रिय है, न कहीं तृष्णा है, न कोई
जीवलोक है, न कोई मरनेवाला है, न कोई उत्पन्न होगा, न हुआ है, न कोई किसीका बन्धु है और न
कोई मित्र है।३ जो पदार्थ हमें भाव अथवा अभाव रूप प्रतीत होते हैं, वे केवल संवृति अथवा लोकसत्यकी
दृष्टिसे ही प्रतीत होते हैं। परमार्थ सत्यकी अपेक्षासे एक निर्वाण ही सत्य है, और बाकी सम्पूर्ण संस्कार
असत्य हैं। यह परमार्थ सत्य बुद्धिके अगोचर है, पूर्ण विकल्पोंसे रहित है, अनभिलाप्य है, अनक्षर है, और
अभिधेय-अभिधानसे रहित है। यद्यपि इस परमार्थ धर्मका उपदेश नहीं हो सकता, परन्तु जिस प्रकार
किसी म्लेच्छको कोई बात समझानेके लिए म्लेच्छकी ही भाषाका उपयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार
संसारके प्राणियोंको निर्वाणका मार्ग प्रदर्शन करनेके लिये संवृति सत्यका उपयोग करना पड़ता है, क्योंकि
१. यः प्रत्ययैर्जायति स ह्यजातो
न तस्य उत्पादु स्वभावतोऽस्ति ।
यः प्रत्ययाधीनु स शून्य उक्तो ।
यः शून्यतां जानति सोऽप्रमत्तः ॥ बोधिचर्यावतार पंजिका पृ. ३५५ ।
जैन दर्शनमें वस्तुको स्वभावसे अशून्य और परभावसे शून्य माना गया है—सर्वस्य वस्तुनः स्वरूपादिना
अशून्यत्वात्पररूपादिना शून्यत्वात्। अमृतचन्द्र-पंचास्तिकाय १४ टीका। परन्तु पंचाध्यायीकारने
वस्तुको सर्वविकल्पातीत कहकर द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे स्वभावसे भी अस्तिरूप और परभावसे भी
नास्तिरूप नहीं माना है—
द्रव्यार्थिकनयपक्षादस्ति न तत्त्वं स्वरूपतोऽपि ततः ।
न च नास्ति परस्वरूपात् सर्वविकल्पातिगं यतो वस्तु ॥ पंचाध्यायी १-७५८ ।
सिद्धसेन दिवाकर भगवान्को शून्यवादी कहकर स्तुति करते हैं—
त्वमेव परमास्तिकः परमशून्यवादी भवान् ।
त्वमुज्जवलविनिर्णयोऽप्यवचनीयवादः पुनः ॥
परस्परविरुद्धतत्त्वसमयश्च सुश्लिष्टवाक् ।
त्वमेव भगवन्नकंप्यसु ( मु ) नयो यथा कस्तथा ॥ द्वा. द्वात्रिंशिका ३-२१ ।
२. न सन्नासन्न सदसन्न चाप्यनुभयात्मकं । बोधिचर्यावतार पंजिका, पृ. २५९ ।
३. एवं शून्येषु धर्मेषु किं लब्धं किं हृतं भवेत् ।
सत्कृतः परिभूतो वा केन कः संभविष्यति ।
कुतः सुखं वा दुःखं वा किं प्रियम् वा किमप्रियम् ।
का तृष्णा कुत्र सा तृष्णा मृग्यमाणा स्वभावतः ॥
विचारे जीवलोकः कः को नामात्र मरिष्यति ।
को भविष्यति को भूतः को बन्धुः कस्य कः सुहृत् ॥ बोधिचर्यावतार ९-१५२,३,४ ।

३१० श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
संवृति सत्यका विना अवलम्बन लिये परमार्थका उपदेश नहीं किया जा सकता ।१ इसलिए सम्पूर्ण धर्मोंको
निस्स्वभाव—शून्य—ही मानना चाहिये । क्योंकि शून्यतासे ही पदार्थोंका होना संभव है ।२
शंका—यदि सम्पूर्ण पदार्थ शून्य हैं, और न किसी पदार्थका उत्पाद होता है और न निरोध होता
है,तो फिर चार आर्यसत्योंको, अच्छे और बुरे कर्मोंके फलको, बोधिसत्वकी प्रवृत्तिको और स्वयं बुद्धको भी
शून्य और मायाके समान मिथ्या मानना चाहिये । समाधान—बुद्धका उपदेश परमार्थ और संवृति इन
दो सत्योंके आधारसे हो होता है । जो इन दोनों सत्योंके भेदको नहीं समझता, वह बुद्धके उपदेशोंके ग्रहण
करनेका अधिकारी नहीं है। बौद्ध दर्शनमें बाह्य और आध्यात्मिक भावोंका प्रतिपादन, इन्हीं दो सत्योंके
आधारसे किया गया है ।३ साधारण लोग विपर्यासके कारण संवृति सत्यसे स्कंध, धातु, आयतन आदिको
तत्त्व रूपसे देखते हैं । परन्तु सम्यग्दर्शनके होनेपर तत्त्वज्ञ आर्य लोगोंको स्कंध आदि निस्स्वभाव प्रतीत होने
लगते हैं । इसलिये 'क्या अनन्त है, क्या अन्त-अनन्त ( उभय ) है, क्या अनुभय ( न अन्त और न अनन्त )
है, क्या अभिन्न है, क्या भिन्न है, क्या शाश्वत है, क्या अनित्य है, क्या नित्य-अनित्य है, और क्या अनुभय
( न नित्य और न अनित्य ) है'४, ये प्रश्न बुद्धिमानोंके मनमें नहीं उठते । स्वयं निर्वाण भी भाव रूप है,
या अभाव रूप, यह हम नहीं जान सकते । क्योंकि निर्वाण न उत्पन्न होता है, न निरुद्ध होता है, न वह
नित्य है, और न अनित्य है । निर्वाणमें न कुछ नष्ट होता है, और न कुछ उत्पन्न होता है५ । जो निर्वाण है,
वही संसार है और जो संसार है, वही निर्वाण है ।६ इसलिये भाव, अभाव, उभय, अनुभय इन चार कोटि-
योंसे रहित प्रपंचोपशमरूप निर्वाणको ही माध्यमिकोंने परमार्थ तत्त्व माना । है यद्यपि सर्व धर्मोंके निस्स्वभाव
होनेसे परमार्थ सत्य अनक्षर है, इसलिये तूष्णींभावको ही आर्योंने परमार्थ सत्य कहा७ है, परन्तु फिर भी
व्यवहार सत्य परमार्थ सत्यका उपायभूत है८ । जिस तरह संस्कृत धर्मोंसे असंस्कृत निर्वाणकी प्राप्ति होती है,
उसी तरह संवृति सत्यसे परमार्थ सत्यकी उपलब्धि होती है । वास्तवमें न प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंको प्रमाण
कहा जा सकता है, और न वास्तवमें पदार्थोंको क्षणिक ही कह सकते हैं । किन्तु जिस तरह कोई पुरुष
अपवित्र स्त्रीके शरीरमें पवित्र भावना रखता है, उसी तरह मूर्ख पुरुष मायारूप भावोंमें क्षणिक, अक्षणिक
१. तस्मात् सकलविकल्पाभिलापविकलत्वादनारोपितमसंवृतमनभिलाप्यं परमार्थतत्त्वं कथमिव प्रतिपादयितुं
शक्यते । तथापि भाजनश्रोतृजनानुग्रहार्थं ( परिकल्पमुपादाय ) संवृत्या निदर्शनोपदर्शनेन किंचिद-
भिधीयते । बोधिचयोवतार पंजिका, पृ. ३६३ ।
२. सर्वं च युज्यते तस्य शून्यता यस्य युज्यते ।
सर्वं न युज्यते तस्य शून्यता यस्य न युज्यते ॥ माध्यमिककारिका २४-१४ ।
३. द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
लोकसंवृतिसत्यं च सत्यं च परमार्थतः ॥ माध्यमिककारिका २४-८ ।
४. माध्यमिककारिका, निर्वाणपरीक्षा ।
५. अप्रहीणमसांप्राप्तमनुच्छिन्नमशाश्वतं ।
अनिरुद्धमनुत्पन्नमेतन्निर्वाणमिष्यते ॥ माध्यमिककारिका निर्वाणपरीक्षा ।
६. निर्वाणस्य च या कोटिः कोटिः संसरणस्य च
न तयोरन्तरं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते ॥ माध्यमिककारिका, निर्वाणपरीक्षा ।
७. परमार्थो हि आर्याणां तूष्णींभावः । चन्द्रकीर्ति, माध्यमिकवृत्ति ।
८. उपायभूतं व्यवहारसत्यं उपेयभूतं परमार्थसत्यं ।
तयोर्विभागोऽवगतो न येन मिथ्याविकल्पः स कुमार्गजातः ॥
चन्द्रकीर्ति, मध्यमिकावतार ७-८० ।

आदि धर्मोंका प्रतिपादन करते हैं¹। और तो क्या परमार्थ सत्यसे बुद्ध और उसकी देशना भी मृगतृष्णाके
समान है। इसलिये धर्मोंके निस्स्वभाव होनेपर भी प्राणियोंकी प्रज्ञप्तिके लिये ही बुद्धने इनका उपदेश
किया है।²
शंका—शून्यवादियोंके मतमें सम्पूर्ण भाव शून्य हैं, इसलिये शून्यताको भी शून्य मानना चाहिये।
समाधान—वास्तवमें सम्पूर्ण पदार्थोंके निस्स्वभावत्वके साक्षात्कार करनेके लिये ही बुद्धने शून्यताका उपदेश
किया है। शून्यता भाव, अभाव, आदि चार कोटियोंसे रहित है, इसलिये शून्यताको अभाव (शून्य) रूप³,
नहीं कह सकते। हमारे मतमें भववासनाका नाश करनेके लिये ही शून्यताका उपदेश है, इसलिये शून्यतामें
भी शून्यता बुद्धि रखनेसे नैरात्म्यवादका साक्षात् अनुभव नहीं हो सकता। अतएव हमें भाव-अभिनिवेशकी
तरह शून्यतामें भी अभिनिवेश नहीं रखना चाहिये, अन्यथा भाव-अभिनिवेश और शून्यता-अभिनिवेश
दोनोंमें कोई अन्तर न रहेगा।⁴ जिस समय भाव, अभाव, शुद्धि, अशुद्धि रूप प्रपंचवृत्ति नहीं रहती उस
समय ईंधन रहित अग्निकी तरह सत् और असत्के आलम्बनसे रहित बुद्धि सम्पूर्ण विकल्पोंके उपशम होनेसे
शांत हो जाती है।
माध्यमिकवादके .प्रधान आचार्य नागार्जुन (१०० ई०) माने जाते हैं। नागार्जुनने शून्यवादके
स्थापन करनेके लिये चार सौ कारिकाओंमें माध्यमिककारिका नामक ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथके ऊपर नागा-
र्जुनने अकुतोभया नामकी टीका लिखी है। इसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिलता है। माध्यमिक-
कारिकापर बुद्धपालित और भावविवेकने भी टीकायें लिखी हैं, जो तिब्बती भाषामें हैं।
बुद्धपालित शून्यवादके अन्तर्गत प्रासंगिक सम्प्रदायके जन्मदाता कहे जाते हैं। बुद्धपालित शून्यवादके सिद्धांतों-
को स्थापित करके अन्य मतवालोंका खण्डनकर नागार्जुनके सिद्धांतोंकी रक्षा करना चाहते थे। भावविवेक
शून्यवादके दूसरे सम्प्रदाय स्वातंत्र्यिक मतके प्रतिष्ठाता हैं। ये आचार्य स्वतंत्र तर्कोंसे शून्यवादकी
सिद्धि करते थे। माध्यमिककारिकाके ऊपर चन्द्रकीर्तिने ( ५५० ई. ) प्रसन्नपदा नामकी संस्कृत टीका
लिखी है। यह टीका उपलब्ध है। नागार्जुनने सुहृल्लेख, युक्तिषष्टिका आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। शून्य-
वादके दूसरे महान् आचार्य आर्यदेव हैं। ये नागार्जुनके शिष्य थे। इन्होंने चतुःशतक, चित्तविशुद्धि-
प्रकरण आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं।
१. अशुच्यादिषु शुच्यादिप्रसिद्धिरिव सा मृषा ॥
लोकावतारणार्थं च भावा नाथेन देशिताः ।
तत्त्वतः क्षणिका नैते संवृत्या चेद् विरुध्यते ॥ बोधिचर्यावतार ९-६, ७ ।
२. शून्यं इति न वक्तव्यं अशून्यं इति वा भवेत् ।
उभयं नोभयं चेति प्रज्ञप्त्यर्थं तु कथ्यते ॥
माध्यमिककारिका. २२-११ ।
३. शून्यवादियोंके ग्रन्थोंमें शून्यताका अन्तद्वयरहितत्व, मध्यमप्रतिपदा, परस्परअपेक्षिता, धर्मधातु आदि
शब्दोंसे उल्लेख किया गया है। रशियन विद्वान प्रोफेसर शेर्वाट्स्की ‘शून्यता’ का अनुवाद
'Relativity'—अपेक्षिता शब्दसे करते हैं। उक्त विद्वान् लेखकने यूरोपके हेगेल ( Hegel ),
ब्रैडले ( Bradley ) आदि महान् विचारकोंके सिद्धान्तोंके साथ 'शून्यवाद' की तुलना की है, और
सिद्ध किया है कि इस सिद्धान्तको Nihilism ( सर्वथा अभाव रूप ) नहीं कहा जा सकता। देखिये
लेखककी Conception of Buddhist Nirvana, पृ. ४९ से आगे।
४. सर्वसंकल्पहानाय शून्यतामृतदेशना ।
यस्य तस्यामपि ग्राह्यस्त्वसाववसादितः ॥ बोधिचर्यावतारपंजिका, पृ. ३५९ ।

३१२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
विज्ञानवाद
इसे योगाचार भी कहते हैं। विज्ञानवादी भी शून्यवादियोंकी तरह सब धर्मोंको निस्स्वभाव२
मानते हैं। विज्ञानवादियोंके मतमें विज्ञानको छोड़कर बाह्य पदार्थ कोई वस्तु नहीं हैं। जिस प्रकार जलता
हुआ काष्ठ ( अलातचक्र ) चक्र रूपसे घूमता हुआ मालूम होता है, अथवा जिस प्रकार तैमिरिक पुरुषको
केशमें मच्छरका ज्ञान होता है, उसी तरह कुदृष्टिसे युक्त लोगोंको अनादि वासनाके कारण पदार्थोंका एकत्व,
अन्यत्व, उभयत्व और अनुभयत्व रूप ज्ञान होता है, वास्तवमें समस्त भाव स्वप्न-ज्ञान, माया और गन्धर्व
नगरकी तरह असत् रूप३ हैं। इसलिये परमार्थ सत्यसे स्वयंप्रकाशक विज्ञान ही सत्य है। यह सब दृश्य-
मान जगत विज्ञानका ही परिणाम है, और यह संवृति सत्यसे ही दृष्टिगोचर होता है।४ विज्ञानवादियोंके मतमें
चित्त ही हमारी वासनाका मूल कारण है। इस चित्तमें सम्पूर्ण धर्म कार्यरूपसे उपनिवद्ध होते हैं, अथवा यह
चित्त सम्पूर्ण धर्मोंमें कारणरूपसे उपनिबद्ध होता है, इसलिये इसे आलयविज्ञान कहते हैं। यह आलयविज्ञान
सम्पूर्ण क्लेशोंका बीज हैं५। जिस प्रकार जलका प्रवाह तृण, लकड़ी आदिको बहाकर ले जाता है, उसी
तरह यह आलयविज्ञान स्पर्श, मनस्कार आदि धर्मोंको आकर्षित करके अपने प्रवाहसे संसारको उत्पन्न
करता हैं६। जिस प्रकार समुद्रमें कल्लोलें उठा करती हैं, वैसे ही दृश्य पदार्थोंको स्वचित्तसे भिन्न समझनेसे,
१. विज्ञानवादियोंके मतमें जो योगकी साधना करके बोधिसत्वकी दशभूमिको प्राप्त करते हैं, उन्हींको
बोधिकी प्राप्ति होती है, इसलिये इस सम्प्रदायको योगाचार नामसे कहा जाता हैं। विद्वानोंका कहना
है कि असंगके योगाचारभूमिशास्त्र नामक ग्रंथके ऊपरसे ब्राह्मणोंने विज्ञानवादको योगाचार संज्ञा
दी है।
२. त्रिविधस्य स्वभावस्य त्रिविधां निस्स्वभावतां ।
संधाय सर्वधर्माणां देशिता निस्स्वभावता ॥ वसुबंधु-त्रिंशिका २६ ।

  • तात्विक दृष्टिसे विचार किया जाय तो विज्ञानवाद और शून्यवादमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों सम्पूर्ण
    पदार्थोंको निस्स्वभाव कहते हैं। अनन्तर इतना ही है कि विज्ञानवादी बाह्य पदार्थोंको मानकर उन्हें केवल
    विज्ञानका परिणाम कहते हैं, जब कि शून्यवादी बाह्य पदार्थोंको मायारूप मानकर निस्स्वभाव सिद्ध
    करनेमें सम्पूर्ण शक्ति लगा देते हैं। परन्तु जब उनसे पूछा जाता है कि यदि आप लोगोंके मतमें बाह्य
    पदार्थोंकी तरह माया स्वभावको ग्रहण करनेवाली कोई बुद्धि नहीं मानी गई, तो मायाकी उपलब्धि
    किस प्रकार होती है? तो विज्ञानवादी उत्तर देता है कि ये सम्पूर्ण पदार्थ चित्तके विकार हैं, जो
    अनादि वासनाके कारण उत्पन्न होते हैं। देखिये दासगुप्त, A History of Indian philosophy,
    पृ. १६६,७, तथा बोधिचर्यावतारपंजिका ६-१५ से आगे।
    ३. चित्तं केशोण्डुकं माया स्वप्नगंधर्वमेव च ।
    अलातं मृगतृष्णा च असन्तः ख्याति वै नृणाम् ॥
    नित्यानित्यं तयैकत्वभुभयं नोभयं तथा ।
    अनादिदोपसंबंधाः बालाः कल्पंति मोहिताः ॥ लंकावतार २-१५७,८ ।
    ४. द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
    बाह्योऽर्थः सांवृतं सत्यं चित्तमेकमसांवृतम् ॥
    ५. सर्वसांक्लेशिकधर्मबीजस्थानत्वात् आलयः । आलयः स्थानमिति पर्यायौ । अथवा लीयन्ते उपनिबध्यंतेऽ-
    स्मिन् सर्वधर्माः कार्यभावेन । तद्वा लीयते उपनिबध्यते कारणभावेन सर्वधर्मेषु इत्यालयः । विजानाति
    विज्ञानं । त्रिंशिका २, स्थिरमतिभाष्य पृ० १८ ।
    ६. यथा हि ओघः तृणकाष्ठगोमयादीनाकर्षयन् गच्छति एवं आलयविज्ञानमपि पुण्यापुण्यानेज्यकर्मवासना-