स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) २९७
प्रदेशमें भिन्न-भिन्न न माना जाय, तो कुरुक्षेत्र, लंका आदिके आकाश-प्रदेशोंमें दिन आदिका व्यवहार नहीं
हो सकता । इसलिये व्यवहारकालके आकाशके प्रदेशोंमें भिन्न-भिन्न होनेसे निश्चयकाल भी कालाणु रूपसे
भिन्न-भिन्न सिद्ध होता है । क्योंकि निश्चयकालके बिना व्यवहारकाल नहीं होता ।१
श्लोक. २३ पृ. २०६, पं. ७ द्वादशांग—
श्रुतके दो भेद हैं—अंगप्रविष्ट और अंगबाह्य । सर्वज्ञ भगवान्के कहे हुए प्रवचनके गणधरों द्वारा
शास्त्र रूपमें लिखे जानेको अंगप्रविष्ट कहते हैं । इसके बारह भेद हैं । इसे ही द्वादशांग२ कहते हैं । द्वादशांगको
गणिपिटक भी कहा जाता है । जैन द्वादशांगके मूल उपदेष्टा ऋषभदेव माने जाते हैं । द्वादशांग—आचारांग,
सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, भगवती ( व्याख्याप्रज्ञप्ति ), ज्ञातृधर्मकथा, उपासकदशा, अन्तकृद्दशा,
अनुत्तरोपपादिकदशा, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र और दृष्टिवाद । दिगम्बरोंकी मान्यताके अनुसार आगम-
साहित्य लुप्त हो गया है । श्वेताम्बर आम्नायमें दृष्टिवादको छोड़कर ग्यारह अंग आजकल भी उपलब्ध हैं ।
आचारांग—इसे सामयिक नामसे भी कहा गया है । इसमें निर्ग्रंथ एवं निर्ग्रंथिनियोंके आचारका
वर्णन है । इसमें दो श्रुतस्कंध हैं । प्रथम श्रुतस्कंधमें आठ और द्वितीय श्रुतस्कंधमें सोलह अध्ययन हैं । द्वितीय
श्रुतस्कंधमें महावीरका जीवनचरित्र है । आचारांग सूत्र सब सूत्रोंसे प्राचीन है । इस अंगको प्रवचनका
सार भी