स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 351, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसमें पहले दोके चौदह-चौदह, और बादके पांचके ग्यारह-ग्यारह अवान्तर भेद होनेसे परिकर्मके ८३ भेद
होते हैं । दिगम्बर सम्प्रदायमें परिकर्मके पांच भेद किये गये हैं—चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति,
द्वीपसमुद्रप्रज्ञप्ति और व्याख्याप्रज्ञप्ति । सूत्र बाईस हैं । बाईस सूत्रोंके चार-चार भेद होनेसे सब सूत्र अठासी
होते हैं । पूर्वगतके चौदह भेद हैं—उत्पाद, अग्रायणी, वीर्यप्रवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्य-
प्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद, प्रत्याख्यान, विद्यानुवाद, कल्याणवाद, प्राणवाद, क्रियाविशाल और लोक-
बिन्दुसार । अनुयोगके दो भेद हैं—मूल प्रथमानुयोग और गण्डिकानुयोग । अनुयोगको दिगंबर ग्रंथोंमें
प्रथमानुयोगके नामसे कहा है । चूलिका—श्वेतांबरोंके अनुसार चौदह पूर्वोंमें ही चूलिका है । पहले पूर्वकी
चार, दूसरे पूर्वकी बारह, तीसरेकी आठ और चौथे पूर्वकी दस चूलिकायें हैं । दिगम्बर ग्रंथोंमें चूलिकाके
पाँच भेद मिलते हैं—जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता । स्त्रियोंको दृष्टिवाद पढ़नेका
निषेध है ।
अंगबाह्य—गणधरोंके बादमें होनेवाले आचार्य अल्प शक्तिवाले शिष्योंके लिये अंगबाह्यकी¹ रचना
करते हैं । अंगवाह्य अनेक प्रकारका है । श्वेताम्बर ग्रंथोंमें अंगवाह्यके दो भेद हैं—आवश्यक और
आवश्यकव्यतिरिक्त । आवश्यकके छह भेद हैं—सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग
और प्रत्याख्यान । आवश्यकव्यतिरिक्तके दो भेद हैं—कालिक और उत्कालिक । उत्तराध्ययन आदि छत्तीस
ग्रंथ कालिक, और दशवैकालिक आदि अट्ठाइस ग्रंथ उत्कालिक हैं । दिगम्बर ग्रंथोंमें अंगवाह्यके चौदह भेद
हैं—सामायिक चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्प-
व्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुंडरीक, महापुंडरीक और निषिद्धिका ।
श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार सर्वप्रथम इन आगम-ग्रंथों का संग्रह महावीर-निर्वाण (ई० पू० ५२७) के
लगभग १६० वर्ष पश्चात् ( ईसवी सन् के पूर्व ३६७ ), स्थूलभद्रके अधिपतित्वमें पाटलिपुत्रमें होनेवाली
परिषद्में किया गया था । उसके बाद लगभग ईसाकी छठी शताब्दिके आरंभमें देवर्द्धिगणिने वलभीमें
इन्हें व्यवस्थित कर लिपिबद्ध किया । आगम-ग्रंथ एक समयमें नहीं लिखे गये हैं ; भिन्न-भिन्न आगमोंका
भिन्न-भिन्न समय है । इसलिये आगमका प्राचीनतम भाग महावीर-निर्वाण के लगभग डेढ़-सौ वरस बाद—
ईसाके पूर्व चौथी शताब्दिके आरम्भमें, तथा आगमका सबसे अर्वाचीन भाग ईसाकी छठी शतान्दीके आरंभमें
देवर्द्धिगणि क्षमाश्रमणके कालमें व्यवस्थित किया गया है ।²
श्लोक २७ पृ० २४०, पं० ५ : प्राण—
प्राण शब्द वैदिक शास्त्रोंमें विविध अर्थोंमें प्रयुक्त किया गया है—कहीं प्राण शब्द का प्रयोग आत्माके
अर्थमें, कहीं इन्द्रके अर्थमें, कहीं सूर्यके अर्थमें, और कहीं सामके अर्थमें । एक जगह उपनिषदोंमें प्राणको
आत्माका कार्य कहा है, दूसरी जगह आत्मासे प्राणकी उत्पत्ति बताई गई है । कहीं प्राणको प्रज्ञा कहा गया
है, और कहीं प्राण शब्दको मृत्युके पश्चात् जानेवाले सूक्ष्म शरीरका पर्यायवाची बताया है । वेदान्ती
लोगोंने प्राणको ब्रह्मका पर्यायवाची माना है ।
जैन सिद्धान्तमें 'प्राण' पारिभाषिक शब्द है । गोम्मटसार जीवकाण्डमें 'प्राण' अधिकार
अलग है । जिसके द्वारा जीव जीता है, उसे प्राण कहा जाता है । प्राणके दो भेद हैं—द्रव्यप्राण और
भावप्राण । आँखोंका खोलना, बंद करना, श्वासोच्छ्वास लेना, काय-व्यापार आदि बाह्य द्रव्यइन्द्रियोंके
व्यापारको द्रव्यप्राण कहते हैं । तथा इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे होनेवाली चैतन्य रूप आत्माकी प्रवृत्तिको
भावप्राण कहते हैं । प्राण दस होते हैं—पाँच इंद्रिय, मन, वचन और कायबल, श्वासोच्छ्वास और आयु ।
१. तत्त्वार्थभाष्यमें ऋषियोंके कहे हुए कपिल आदि प्रणीत ग्रंथोंको भी अंगबाह्य कहा गया है ।
१. देखिये जगदीशचन्द्र जैन, प्राकृत साहित्य का इतिहास, पृ० ३३–१०४ ।