स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
एकेन्द्रिय जीवके चार, और संज्ञी पंचेंद्रियके बारहवें गुणस्थान तक दसों प्राण होते हैं । तेरहवें गुणस्थानमें
वचन, श्वासोच्छ्वास, आयु और कायबल ये चार प्राण होते हैं। आगे चलकर इसी गुणस्थानमें वचनबलका
अभाव होनेसे तीन, और श्वासोच्छ्वासका अभाव होनेसे दो प्राण रह जाते हैं। चौदहवें गुणस्थानमें काय-
बलका भी अभाव होनेसे केवल एक आयु प्राण अवशेष रह जाता है। सिद्ध जीवोंके मोक्षावस्थामें शरीर
नहीं रहता, अतएव सिद्धोंके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आदि भावप्राण माने गये हैं। अतएव
संसारी जीव द्रव्यप्राणोंकी अपेक्षा, और सिद्ध जीव भावप्राणोंकी अपेक्षासे जीव कहे जाते हैं।
श्लोक २८ पृ० २५१, पं० ८ : ज्ञानके भेद—
ज्ञानके दो भेद हैं—सम्यग्ज्ञान और मिथ्याज्ञान । सम्यग्ज्ञानके दो भेद हैं—प्रत्यक्ष और परोक्ष ।
इन्द्रिय आदि सहायता के बिना केवल आत्माके अवलम्बनसे पदार्थोंके स्पष्ट जाननेको प्रत्यक्ष और इन्द्रिय
आदिकी सहायता से पदार्थोंके अस्पष्ट ज्ञान करनेको परोक्ष ज्ञान कहते हैं¹ । प्रत्यक्ष ज्ञानके दो भेद हैं²—
सांव्यवहारिक और पारमार्थिक । बाह्य इन्द्रिय आदिकी सहायता से उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको सांव्यवहारिक
प्रत्यक्ष³ कहते हैं । सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष दो प्रकारका है—इन्द्रियोंसे होनेवाला और मनसे होनेवाला ।
इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष⁴ और अनिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष दोनोंके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार-चार भेद
हैं ।⁵ इन्द्रिय और मनके निमित्तसे दर्शनके बाद होनेवाले ज्ञानको अवग्रह कहते हैं। अवग्रह के जाने हुए
पदार्थमें विशेष इच्छा रूप ज्ञानको ईहा कहते हैं; जैसे बगुलोंकी पंक्ति और पताकाको देखकर यह ज्ञान
होना कि यह पताका होनी चाहिये । ईहाके बाद विशेष चिह्नोंसे पताकाका ठीक-ठीक निश्चितरूप ज्ञान
होना अवाय ( अपाय ) है । तथा जाने हुए पदार्थको कालान्तरमें नहीं भूलना, धारणा है। अवग्रहके दो
१. जैनेतर दार्शनिकारोंने इन्द्रियजनित ज्ञानको प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय ज्ञानको परोक्ष कहा है ।
२. नन्दिसूत्रमें प्रत्यक्षके इन्द्रिय प्रत्यक्ष और नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष ये दो भेद किये गये हैं। यहाँ पहले तो मति-
ज्ञानको इन्द्रिय प्रत्यक्ष और अवधि आदि तीनको नोईंद्रिय प्रत्यक्षमें शामिल किया गया है, लेकिन आगे
चलकर मतिज्ञानको श्रुतज्ञानकी तरह परोक्ष कहा गया है। अनुयोगद्वारसूत्रमें प्रत्यक्षके दो भेद करकेएक
भागमें मतिज्ञानको और दूसरेमें अवधि आदि तीनको गर्भित किया गया है। देखिये पं० सुखलालजी-
न्यायावतार-भूमिका ( गुजराती ) । तथा तुलनीय—अत्राह शिष्यः—"आद्ये परोक्षम्" इति
तत्त्वार्थसूत्रे मतिश्रुतद्वयं परोक्षं भणितं तिष्ठति कथं प्रत्यक्षं भवति । परिहारमाह—तदुत्सर्गव्याख्यानम् ।
इदं पुनरपवादव्याख्यानम् । यदि तदुत्सर्गव्याख्यानम् न भवति तर्हि मतिज्ञानं कथं तत्त्वार्थे परोक्षं भणितं
तिष्ठति । तर्कशास्त्रे सां व्यावहारिकं प्रत्यक्षं कथं जातं । यथा अपवादव्याख्यानेन मतिज्ञानं परोक्षमपि
प्रत्यक्षज्ञानं तथा स्वात्माभिमुखं भावश्रुतज्ञानमपि परोक्षं सत्प्रत्यक्षं भण्यते । ब्रह्मदेव-द्रव्यसंग्रहवृत्ति ५ ।
३. सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष वास्तवमें परोक्ष ही है—तद्धीन्द्रियानिन्द्रियव्यवहितात्मव्यापारसंपादत्वात्परमार्थतः
परोक्षमेव धूमादग्निज्ञानवद् व्यवधानाविशेषात् । किं चासिद्धयनैकान्तिकविरुद्धानुमानाभासवत्संशयवि-
पर्ययानध्यवसायसंभवात्तदनुमानवत्संकेतस्मरणादिपूर्वकनिश्चयसंभवाच्च परमार्थः परोक्षमेवैतत् । यशो-
विजय—जैनतर्कपरिभाषा पृ० ११४, भावनगर ।
४. यहाँ यशोविजयजीने इन्द्रिय प्रत्यक्ष और अनिन्द्रिय प्रत्यक्षके मति और श्रुत दो भेद करके मतिज्ञानके
अवग्रह आदि चार और श्रुतज्ञानके चौदह भेद किये हैं—तदेवं सप्रभेदं सांव्यवहारिकं मतिश्रुतलक्षणं
प्रत्यक्षं निरूपितम् । जैनतर्कपरिभाषा ।
५. उमास्वाति, पूज्यपाद, अकलंक आदि आचायोंने मतिज्ञानके इन्द्रियजन्य और अनिन्द्रियजन्य ज्ञानके दो
भेद करके मतिज्ञानके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद किये हैं।