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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

अयोगव्यवच्छेदिका २७७
अर्थ—हे वीर ! केवल श्रद्धाके कारण न आपके प्रति हमारा कोई पक्षपात है, और न द्वेषके कारण
अन्य देवताओंमें अविश्वास, किन्तु यथार्थ रीतिसे आपकी परीक्षा करके ही हमने आपका आश्रय
ग्रहण किया है ।
भगवान्‌की वाणीकी महत्ता—
तमःस्पृशामप्रतिभासभाजं भवन्तमप्याशु विविन्दते याः ।
महेम चन्द्रांशुदृशावदातास्तास्तर्कपुण्या जगदीश वाचः¹॥३०॥
अर्थ—हे जगदीश ! जो वाणी अज्ञान-अंधकारमें फिरनेवाले पुरुषोंके अगोचर ऐसे आपको प्रगट
करती है, उस चन्द्रमाकी किरणोंके समान स्वच्छ और तर्कसे पवित्र आपकी वाणीकी हम पूजा करते हैं ।
भगवान्‌के वीतराग गुणकी सर्वोत्कृष्टता—
यत्र तत्र समये यथा तथा योऽसि सोऽस्यभिधया यया तया ।
वीतदोषकलुषः स चेद्भवानेक एव भगवन्नमोस्तु ते ॥३१॥
अर्थ—भगवन् ! जिस किसी शास्त्रमें, जिस किसी रूपमें, और जिस किसी नामसे जिस वीतराग-
देवका वर्णन किया गया है, वह आप एक ही हैं, अतएव आपको नमस्कार है !
उपसंहार—
इदं श्रद्धामात्रं तदथ परनिन्दां मृदुधियो
विगाहन्तां हन्त प्रकृतिपरवादव्यसनिनः ।
अरक्तद्विष्टानां जिनवर परीक्षाक्षमधिया-
मयं तत्त्वालोकः स्तुतिमयमुपाधिं² विधृतवान् ॥३२॥
अर्थ—कोमल बुद्धिवाले पुरुष इस स्तोत्रको श्रद्धासे बनाया हुआ समझें, वादशील पुरुष इसे
परनिन्दा करनेके लिये रचा हुआ मानें, परन्तु हे जिनवर ! परीक्षा करनेमें समर्थ राग-द्वेषसे रहित
पुरुषोंको तत्त्वोंके प्रकाश करनेवाला यह स्तोत्र स्तुतिरूप धर्मके चिंतनमें कारण है ।
॥ समाप्त ॥
१. सत्त्वोपघातनिरनुग्रहराक्षसानि वक्तृप्रमाणरचितान्यहितानि पीत्वा ।
अद्वारकं जिन समस्तमसो विशन्ति येषां न भान्ति तव वाग्युतयो मनस्सु ॥
द्वा. द्वात्रिंशिका २. १७ ।
२. उपाधिर्धर्मचिन्तनम् । अभिधानचिन्तामणि ६. १७ ।

७८२
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
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[अस्पष्ट...] ॥१०६॥ [अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
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[अस्पष्ट...] ॥१०७॥ [अस्पष्ट...]
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[अस्पष्ट...] ॥१०८॥ [अस्पष्ट...]
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[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]
[अस्पष्ट...]

(टिप्पणी: यह पृष्ठ अत्यधिक धुंधला (faded/washed out) होने के कारण देवनागरी पाठ प्रायः अपाठ्य है। केवल कुछ श्लोक संख्याएं एवं धुंधले अक्षर ही आभासित होते हैं।)

परिशिष्ट
जैन परिशिष्ट ( क )
बौद्ध परिशिष्ट—श्लोक १६ से १९ ( ख )
न्याय-वैशेषिक परिशिष्ट—श्लोक ४ से १० ( ग )
सांख्य-योग परिशिष्ट—श्लोक २५ ( घ )
मीमांसक परिशिष्ट—श्लोक ११-१२ ( ङ )
वेदान्त परिशिष्ट—श्लोक १३ ( च )
चार्वाक परिशिष्ट—श्लोक २० ( छ )
विविध परिशिष्ट ( ज )

ज्ञानपीठ
( क ) ज्ञानपीठ चित्र
( ख ) १६ से ३२ फलक—ज्ञानपीठ छवि
( ग ) ०१ ई x फलक—ज्ञानपीठ कार्नेलि-स्थान
( घ ) ४६ फलक—ज्ञानपीठ अर्ध-स्थान
( ङ ) २१-३१ फलक—ज्ञानपीठ कलाकृति
( च ) ६५ फलक—ज्ञानपीठ रथचक्र
( छ ) ७२ फलक—ज्ञानपीठ शीर्षक
( ज ) ज्ञानपीठ प्रकीर्ण

जैन परिशिष्ट ( क )
अवतरणिका पृष्ठ २, पंक्ति ६ : दुःषमार—
पंचमकाल। जैन धर्मके अनुसार कालचक्र उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दो विभागोंमें विभक्त
है। उत्सर्पिणी कालमें जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी वृद्धि होती है। अवसर्पिणी कालमें
जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी हानि होती है। उत्सर्पिणीके छह भेद—१ दुःषमदुःषमा,
२ दुःषमा, ३ दुःषमसुषमा, ४ सुषमदुःषमा, ५ सुषमा, ६ सुषमसुषमा। अवसर्पिणीके छह भेद—१ सुषम-
सुषमा, २ सुषमा, ३ सुषमदुःषमा, ४ दुःषमसुषमा, ५ दुःषमा, ६ दुःषमदुःषमा।
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी-कालचक्र

अवसर्पिणी कालके छह आरेस्थितिजीवोंकी आयुशरीरकी ऊँचाईवर्णआहारका अंतर
१ सुषमसुषमा४ कोडाकोडी सागर३ पल्यसे २ पल्य३ कोशसे २ कोशसूर्यके समानआठ वेला ( ३ दिन )
२ सुषमा३ कोडाकोडी सागर२ पल्यसे १ पल्य२ कोशसे १ कोशचन्द्रमाके समानछह वेला
३ सुषमदुःषमा२ कोडाकोडि सागर१ पल्यसे कोटी पूर्व वर्ष१ कोशसे ५०० धनुषप्रियंगुचार वेला
४ दुःषमसुषमा४२००० वर्ष कम १ कोडा-कोडि सागरकोटी पूर्व वर्षसे १२० वर्ष५०० धनुषसे ७ हाथपांचों वर्णप्रतिदिन एक बार
५ दुःषमा२१००० वर्ष१२० वर्षसे २० वर्ष७ हाथसे २ हाथरूक्षअनेक वार
६ दुःषमदुःषमा२१००० वर्ष२० वर्षसे १५ वर्ष२ हाथसे १ हाथश्यामबार बार

३६

२८२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
सुषमसुषमा आदि प्रथमके तीन कालोंमें भोगभूमि रहती है। भोगभूमिकी भूमि दर्पणके समान
मणिमय, और चार अंगुल ऊँचे स्वादु और सुगंधित कोमल तृणोंसे युक्त होती है। यहाँ दूध, इक्षु, जल,
मधु और घृतसे परिपूर्ण बावड़ी और तालाब बने हुए हैं। भोगभूमिमें स्त्री और पुरुषके युगल पैदा होते हैं।
ये युगुलिये ४९ दिनमें पूर्ण यौवनको प्राप्त होकर परस्पर विवाह करते हैं। मरनेके पहले पुरुषको छींक और
स्त्रीको जंभाई आती है। सुपमदुःषमा नामके तीसरे कालमें पल्यका आठवां भाग समय बाकी रहनेपर
क्षत्रिय कुलमें चौदह कुलकर उत्पन्न होते हैं। चौथे कालमें चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ नारायण,
नौ प्रतिनारायण, और नौ बलभद्र—ये त्रेसठ शलाकापुरुष जन्म लेते हैं। दुःषमा नामका पाँचवाँ काल
महावीरका तीर्थकाल कहा जाता है। इस कालमें कल्की नामका राजा उत्पन्न होता है। कल्की उन्मार्गगामी
होकर जैनधर्मका नाश करता है। पंचम कालके इक्कीस हजार वर्षके समयमें एक-एक हजार वर्ष बाद
इक्कीस कल्की पैदा होते हैं। अंतिम जलमंथन नामक कल्की जैनधर्मका समूल नाश करनेवाला होगा। धर्मका
नाश होनेपर सब लोग धर्मसे विमुख हो जायेंगे। दुःषमदुःषमा नामके छठे कालमें संवर्तक नामकी वायु
पर्वत, वृक्ष, पृथ्वी आदिको चूर्ण करेगी। इस वायुसे समस्त जीव मूर्च्छित होकर मरेंगे। इस समय पवन,
अत्यंत शीत, क्षाररस, विष, कठोर अग्नि, धूल और धूँएकी ४९ दिन तक वर्षा होगी, तथा विष और
अग्निकी वर्षासे पृथ्वी भस्म हो जायेगी। इस समय दयावान विद्याधर अथवा देव, मनुष्य आदि जीवोंके
युगलोंको निर्बाध स्थानमें ले जाकर रख देंगे। उत्सर्पिणी कालके आनेपर फिरसे इन जीवोंसे सृष्टिकी
परम्परा चलेगी।¹
ब्राह्मण ग्रंथोंमें सत्य (कृत), त्रेता, द्वापर, और कलि ये चार युग बताये गये हैं। इन युगोंका
प्रमाण क्रमसे १७२८००० वर्ष, १२९६०० वर्ष, ८६४००० वर्ष और ४३२००० वर्ष है। कृतयुगमें ध्यान,
त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें दानकी श्रेष्ठता होती है। इन युगोंमें क्रमसे ब्रह्मा, रवि, विष्णु,
और रुद्रका आधिपत्य रहता है। सत्ययुगमें धर्मके चार पैर होते हैं। इनमें मत्स्य, कूर्म, वराह, और
नृसिंह ये चार अवतार होते हैं। इस युगमें मनुष्य अपने धर्ममें तत्पर रहते हुए शोक, व्याधि, हिंसा, और
दंभसे रहित होते हैं। यहाँ इक्कीस हाथ-परिमाण मनुष्यकी देह और एक लाख वर्षकी उत्कृष्ट आयु होती
है। इस युगके निवासियोंकी इच्छा-मृत्यु होती है। इस युगमें लोग सोनेके पात्र काममें लाते हैं।
त्रेतामें धर्म तीन पैरोंसे चलता है। इस समय वामन, परशुराम और रामचन्द्र ये तीन अवतार होते हैं।
यहाँ चौदह हाथ-परिणाम मनुष्यकी देह और दस हजार वर्षकी उत्कृष्ट आयु होती है। इस युगमें चाँदीके
पात्रोंसे काम चलता है। इस समय लोगोंका कुछ क्लेश बढ़ जाता है। ब्राह्मण लोग वेद वेदांगके परगामी
होते हैं। स्त्री पतिव्रता और पुत्र पिताकी सेवा करनेवाले होते हैं। द्वापरयुगमें धर्मके केवल दो पैर रह
जाते हैं। इस युगमें कुछ लोग पुण्यात्मा और कुछ लोग पापात्मा होते हैं। कोई बहुत दुखी होते हैं और
कोई बहुत धनी होते हैं। इस युगमें कृष्ण और बुद्ध अवतार लेते हैं। मनुष्योंका देह सात हाथका और एक
हजार वर्षकी उत्कृष्ट आयु होती है। लोग ताँबेके पात्रोंमें भोजन करते हैं। कलियुगके आनेपर धर्म केवल
एक पैरसे चलने लगता है। इस युगमें सब लोग पापी हो जाते हैं। ब्राह्मण अत्यन्त कामी और क्रूर हो
जाते हैं। तथा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्तव्यसे च्युत होकर पाप करने लगते हैं। कलियुगमें कल्कि का
अवतार होता है। मनुष्यका शरीर साढ़े तीन हाथका और उत्कृष्ट आयु एकसौ पाँच वर्षकी होती है।²
बौद्ध लोगोंने अन्तरकल्प, संवर्तकल्प, विवर्तकल्प, महाकल्प आदि कल्पोंके अनेक भेद माने हैं।
आदिके कल्पमें मनुष्य देवोंके समान थे। धीरे-धीरे मनुष्योंमें लोभ और आलस्यकी वृद्धि होती है, लोग
वनकी औषध और धान्य आदिका संग्रह करने लगते हैं। बादमें मनुष्योंमें हिंसा, चोरी आदि पापोंकी
१. त्रिलोकसार ७७९-८६७; तथा लोकप्रकाश २८ वां सर्ग इत्यादि ।
२. कूर्मपु. अ. २८; मत्स्यपु. अ. ११८; गरुडपु. अ. २२७ ।

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) २८३
वृद्धि होती है, और मनुष्योंकी आयु घटकर केवल दस वर्षकी रह जाती है। कल्पके अन्तमें सात दिन तक
युद्ध, सात महीने तक रोग, तथा सात वर्ष तक दुर्भिक्ष पड़नेके बाद कल्पकी समाप्ति हो जाती हैं। इस
समय अग्नि, जल और महावायुसे प्रलय (संवर्तनी) होती है। प्रलयके समय देवता लोग पुण्यात्मा
प्राणियोंको निर्बाध स्थानमें ले जाकर रख देते हैं १।
ग्रीक और रोमन लोगोंके यहाँ भी सुवर्ण, रजत, पीतल और लौह इस प्रकारसे चार युगोंकी
कल्पना पायी जाती है।
श्लो. १ पृ. ५ पं. ६ : केवली
चार घातिया कर्मोंके अत्यंत क्षय होनेपर जो केवलज्ञानके द्वारा इन्द्रिय, क्रम, और व्यवधान रहित
तीनों लोकोंके सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंको साक्षात् जानते हैं, उन्हें केवली कहते हैं। जैन शास्त्रोंमें अनेक
तरहके केवलियोंका उल्लेख पाया जाता है—
१ तीर्थंकर—जो चतुर्विध संघ अथवा प्रथम गणधरकी स्थापनापूर्वक जीवोंको संसार-समुद्रसे पार
उतारते हैं, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। तीर्थंकर संसारी जीवोंको उपदेश देकर उनका उपकार करते हैं।
तीर्थंकर स्वयंबुद्ध होते हैं। तीर्थंकर चौबीस हैं।
२ गणधर—तीर्थंकरके साक्षात् शिष्य और संघके मूल नायक होते हैं। गणधर श्रुतकेवली होते
हैं। ये अन्य केवलियोंके भूतपूर्व गुरु होते हैं, और अन्तमें स्वयं भी केवली हो जाते हैं। महावीर भगवान्‌के
ग्यारह गणधर थे। इन ग्यारह गणधरोंमें अकम्पित और अचल, तथा मेतार्य और प्रभास नामक गणधरोंकी
भिन्न-भिन्न वाचना न होनेसे भगवान्‌के नौ गणधर कहे जाते हैं।
३ सामान्य केवली—तीर्थंकर और गणधरोंको छोड़कर बाकी केवली सामान्यकेवली कहे
जाते हैं।
४ स्वयंबुद्ध—जो बाह्य कारणोंके बिना स्वयं ज्ञानी होते हैं, वे स्वयंबुद्ध हैं। तीर्थंकर भी स्वयं-
बुद्धोंमें गर्भित हैं। इनके अतिरिक्त भी स्वयंबुद्ध होते हैं। ये संघमें रहते हैं और नहीं भी रहते। ये पूर्वमें
श्रुतकेवली होते हैं और नहीं भी होते। जिनको श्रुत नहीं होता, वे नियमसे संघसे बाह्य रहते हैं।
५ प्रत्येकबुद्ध—प्रत्येकबुद्ध परोपदेशके बिना अपनी शक्तिसे बाह्य निमित्तोंके मिलनेपर ज्ञान प्राप्त
करते हैं, और एकल विहार करते हैं। प्रत्येकबुद्धको कमसे कम ग्यारह अंग और अधिकसे अधिक कुछ कम
दस पूर्वोंका ज्ञान होता है।
६ बोधितबुद्ध—गुरुके उपदेशसे ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये अनेक तरहके होते हैं।
७ मुण्डकेवली—ये मूक और अन्तकृत् केवलीके भेदसे दो प्रकारके हैं। मूक केवली अपना ही
उद्धार कर सकते हैं, परन्तु किसी शारीरिक दोषके कारण उपदेश नहीं दे सकते, इसलिये मौन रहते हैं।
ये केवली बाह्य अतिशयोंसे रहित होते हैं, और किसी सिद्धांतकी रचना नहीं कर सकते। अन्तकृत्केवलीको
मुक्त होनेके कुछ समय पहले ही -केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है, इसलिये ये भी सिद्धांतकी रचना करनेमें
असमर्थ होते हैं।
८ श्रुतकेवली—श्रुतकेवली शास्त्रोंके पूर्ण ज्ञाता होते हैं। श्रुतकेवली और केवली (केवलज्ञानी)
ज्ञानकी दृष्टिसे दोनों समान हैं। अन्तर इतना ही है कि श्रुतज्ञान परोक्ष और केवलज्ञान प्रत्यक्ष होता है।
केवली (केवलज्ञानी) जितना जानते हैं, उसका अनंतवां भाग वे कह सकते हैं, और जितना वे कहते हैं,
उसका अनन्तवां भाग शास्त्रोंमें लिखा जाता है। इसलिये केवलज्ञानकी अपेक्षा श्रुतज्ञान अनन्तवें भागका
भी अनन्तवां भाग है। सामान्यतः श्रुतकेवली छठे, सातवें गुणस्थानवर्ती और केवली तेरहवें गुणस्थानवर्ती
१. अभिधर्मकोश ३.९७ के आगे; विसुद्धिमग्ग अ. १३; हार्डी का Mannual of Buddhism अ. १ ।

२८४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
होते हैं। श्रुतकेवलीको केवली पद पानेके लिये आठवें गुणस्थानसे बारहवें गुणस्थान तक एक श्रेणी चढ़ना
पड़ती है। श्रुतकेवली चौदह पूर्वके पाठी होते हैं। १
योग सहित केवलियोंको सयोगकेवली, और योगरहित केवलियोंको अयोगकेवली कहते हैं।
सयोगकेवली तेरहवें और अयोगकेवली चौदहवें गुणस्थानवर्ती होते हैं। सिद्धोंको भी केवली कहा जाता है। २
जैनेतर शास्त्रोंमें भी केवलीकी कल्पना पायी जाती है। जिन्होंने बन्धनसे मुक्त होकर कैवल्यको
प्राप्त किया है, उन्हें योगसूत्रोंके भाष्यकार व्यासने केवली कहा है। ३ ऐसे केवली अनेक हुए हैं। बुद्धि आदि
गुणोंसे रहित ये निर्मल ज्योतिवाले केवली आत्मस्वरूपमें स्थित रहते हैं। महाभारत, गीता आदि वैदिक
ग्रंथोंमें भी जीवन्मुक्त पुरुषोंका उल्लेख आता है। ये शुक, जनक प्रभृति जीवन्मुक्त संसारमें जलमें कमलकी
नाईं रहते हुए मुक्त जीवोंकी तरह निर्लेप जीवन यापन करते हैं इसीलिये इन्हें जीवन्मुक्त कहा जाता है।
बौद्ध ग्रंथोंमें बुद्धके बत्तीस महापुरुषके ४ लक्षण, अस्सी अनुव्यंजन और दोसौ सोलह मांगल्य लक्षण
बताये गये हैं। बुद्ध भगवान् अपने दिव्य नेत्रोंसे प्रति दिन संसारको छह बार देखते हैं। वे दश बल,
ग्यारह बुद्धधर्म, और चार वैशारद्य सहित होते हैं। वर्तमान बुद्ध चौबीस ५ होते हैं। इन बुद्धोंके अलग-अलग
बोधिवृक्ष रहते हैं। बुद्ध दो प्रकारके होते हैं—प्रत्येकबुद्ध और सम्यक्संबुद्ध। सम्यक्संबुद्ध अपने पुरुषार्थ
द्वारा बोधि प्राप्त करके उसका संसारको उपदेश देते हैं। गौतम सम्यक्संबुद्ध थे। प्रत्येकबुद्ध भी अपने पुरुषार्थसे
बोधि प्राप्त करते हैं, परन्तु वे संसारमें बोधिका उपदेश नहीं करते, वन आदि किसी एकांत
स्थानमें रहकर मुक्तिसुखका अनुभव करते हैं। प्रत्येकबुद्ध बुद्धसे हरेक बातमें छोटे होते हैं, और वे बुद्धके
समय नहीं रहते। जो पटिसंभिदा, अभिज्ञा, प्रज्ञा आदिसे विभूषित होते हैं, उन्हें अर्हत् कहते हैं। अर्हत्को
खीणासव (क्षीणाश्रव) कहा है। अर्हत् फिरसे संसारमें जन्म नहीं लेते। गौतम स्वयं अर्हत् थे। बुद्ध
स्वयं अपने पुरुषार्थसे निर्वाण प्राप्त करते हैं, और अर्हत् बुद्धके पास शिक्षण ग्रहण करके निर्वाण जाते हैं,
यहीं दोनोंमें अन्तर है। जो अनेक जन्मोंके पुण्य-प्रतापसे आगे चलकर बुद्ध होनेवाले हैं, उन्हें बोधिसत्व
कहते हैं। अर्हत् वीतराग होते हैं, और बोधिसत्वका हृदय करुणासे परिपूर्ण रहता है। बोधिसत्व प्रत्येक
प्राणीके निर्वाणके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, और जब तक सम्पूर्ण जीवोंको निर्वाण नहीं मिल जाता,
तब तक उनकी प्रवृत्ति जारी रहती है। बोधिसत्व जीवोंके प्रति करुणाका प्रदर्शन करनेके लिए पाप
करनेमें भी नहीं हिचकते, और नरकमें जाकर नारकी जीवोंका उद्धार करते हैं। ६
१. महावीर भगवान्‌के निर्वाणके बाद गौतम, सुधर्मा और जम्बूस्वामी ये तीन केवली हुए। जम्बूस्वामीके
बाद दिगम्बर परम्पराके अनुसार विष्णु, नन्दि, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु ये पाँच, तथा श्वेता-
म्बर परम्पराके अनुसार प्रभव, शय्यंभव, यशोभद्र, सम्भूतविजय, भद्रबाहु और स्थूलभद्र ये छह श्रुत-
केवली माने जाते हैं स्थूलभद्रको श्रुतकेवलियोंमें नहीं गिननेसे श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार भी पाँच
श्रुतकेवली माने गये हैं। देखिये जगदीशचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० १७-२० ।
२. गोम्मटसार जीव. १० टीका ।
३. पातंजल योगसूत्र १-२४,५१ भाष्य ।
४. मज्झिमनिकाय ब्रह्मायुसुत्त ।
५. दीपंकर, कोण्ड, मंगल, सुमनस, रेवत, सोभित, अनोमदस्सिन्, पदुम, नारद, पदुमुत्तर, सुमेध, सुजात,
पियदस्सिन्, अत्यदस्सिन्, धम्मदस्सिन्, सिद्धत्थ, तिस्स, पुस्स, विपस्सिन्, सिखिन्, वेस्सभू, ककुसंध,
कोणागमन और कस्सप ।
६. देखिये कर्न (Kern) की Mannual of Buddhism अ. ३ पृ. ६०; तथा सद्धर्मपुण्डरीक
अ. २४; बोधिचर्यावतार, बोधिचित्तपरिग्रह नामक तृतीय परिच्छेद ।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) २८५
श्लो. १ पृ. ६ पं. ६ : अतिशय—
सहज अतिशय, कर्मक्षयज अतिशय और देवकृत अतिशय—ये भगवान्‌के तीन मूल अतिशय माने
गये हैं। इन तीन अतिशयोंके उत्तरभेद मिलाकर अतिशयोंके कुल चौंतीस¹ भेद होते हैं। श्वेताम्बर मान्यता-
के अनुसार सहज अतिशयके चार, कर्मक्षयज अतिशयके ग्यारह, और देवकृत अतिशयके उन्नीस भेद स्वीकार
किये गये हैं—
सहज अतिशय कर्मक्षयज अतिशय देवकृत अतिशय
१ सुन्दर रूपवाला, सुगन्धित, १ योजन मात्र समवशरणमें कोडा- १ आकाशमें धर्मचक्रका होना ।
नीरोग, पसीना और मल कोडि मनुष्य, देव और तिर्यंचों- २ आकाशमें चमरोंका होना ।
रहित शरीर । का समा जाना । ३ आकाशमें पादपीठ सहित
२ कमलके समान सुगन्धित २ एक योजन तक फैलनेवाली उज्ज्वल सिंहासन ।
श्वासोच्छ्वास । भगवान्‌की अर्धमागधी वाणीका ४ आकाशमें तीन छत्र ।
३ गौके दूधके समान स्वच्छ और मनुष्य, तिर्यञ्च और देवताओं- ५ आकाशमें रत्नमय धर्मध्वज ।
दुर्गन्ध रहित मांस और रुधिर। द्वारा अपनी-अपनी भाषामें ६ सुवर्ण-कमलोंपर चलना ।
४ चर्मचक्षुओंसे आहार और समझ लेना । ७ समवशरणमें रत्न, सुवर्ण और
नीहारका न दिखना । ३ सूर्यप्रभासे भी तेज सिरके पीछे चाँदीके तीन परकोट ।
भामंडलका होना । ८ चतुर्मुख उपदेश ।
४ सौ योजन तक रोगका न ९ चैत्य अशोक वृक्ष ।
रहना । १० कण्टकोंका अधोमुख होना ।
५ वैरका न रहना । ११ वृक्षोंका झुकना ।
६ ईति अर्थात् धान्य आदिको नाश १२ दुन्दुभि बजना ।
करनेवाले चूहों आदिका अभाव । १३ अनुकूल वायु ।
७ महामारी आदिका न होना । १४ पक्षियोंका प्रदक्षिणा देना ।
८ अतिवृष्टि न होना । १५ गंधोदककी वृष्टि ।
९ अनावृष्टि न होना । १६ पांच वर्णोंके पुष्पोंकी वृष्टि ।
१० दुर्भिक्ष न पड़ना । १७ नख और केशोंका नहीं बढ़ना ।
११ स्वचक्र और परचक्रका भय न १८ कमसे कम एक कोटि देवोंका
होना । पासमें रहना ।
१९ ऋतुओंका अनुकूल होना ।
दिगम्बर मान्यताके अनुसार दस सहज अतिशय, दस कर्मक्षयज अतिशय और चौदह देवकृत अतिशय
माने गये हैं। अतिशयोंकी मान्यतामें दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके अनुसार पाठभेद पाया
जाता है ।
जैनेतर ग्रन्थोंमें भी इस प्रकारके विचार मिलते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद्में² लघुता, आरोग्य,
स्थिरता, वर्णप्रसाद, स्वरकी सुन्दरता, शुभ गन्ध तथा मूत्र और मलका अल्प मात्रामें होना, यह
१. समवायांग सूत्र और कुन्दकुन्दके नियमसारमें चौंतीस अतिशयोंके नाम आते हैं। तथा देखिये जगदीश-
चन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० ३४३ आदि ।
२. श्वेताश्वतर उ० २-१३ ।

२८६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
योगकी प्रथम अवस्था कही गई है। पतंजलिके योगसूत्र और व्यासभाष्यमें भूत-भविष्यत् पदार्थोंको जानना,
अदृश्य हो जाना, योगी पुरुषकी निकटतामें क्रूर प्राणियोंका वैर भाव छोड़ देना, हाथीके समान बल, सम्पूर्ण
भुवनका ज्ञान, भूख और प्यासका अभाव, एक शरीरका दूसरे शरीरमें प्रवेश, आकाशमें विहार, वज्रसंहनन,
अजरामरता आदि अनेक प्रकारकी विभूतियाँ बताई गई हैं ।¹
बौद्ध ग्रन्थोंमें आकाशमें पक्षीकी तरह उड़ना, संकल्पमात्रसे दूरकी वस्तुओंको पासमें ले आना, मनके
वेगके समान गति होना, दिव्य नेत्र और दिव्य चक्षुओंसे सूक्ष्म और दूरवर्ती पदार्थोंको जानना आदि ऋद्धियों-
का वर्णन मिलता है ।² जिस समय बोधिसत्व तुषित लोकसे च्युत होकर माताके गर्भमें आते हैं, उस समय
लोकमें महान प्रकाश होता है, और दससाहस्री लोकधातु कंपित होती है। बोधिसत्वके माताके गर्भमें
रहनेके समय चार देवपुत्र उपस्थित होकर चारों दिशाओंमें बोधिसत्त्व और बोधिसत्वकी माताकी रक्षा करते
हैं। बोधिसत्वकी माताको गर्भावस्था में कोई रोग नहीं रहता। माता बोधिसत्वको अंग-प्रत्यंग सहित देखती
है, और बोधिसत्वको खड़े-खड़े जन्म देती है। जिस समय श्लेष्म, रुधिर आदिसे अलिप्त बोधिसत्व गर्भसे
बाहर निकलते हैं, उस समय उन्हें पहले देव लोग ग्रहण करते हैं। बोधिसत्वके उत्पन्न होनेके समय आकाशसे
गर्म और शीतल जलकी धाराएँ गिरती हैं, जिनसे बोधिसत्त्व और उनकी माताका प्रक्षालन किया जाता है।
उस समय आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होती है और मन्द, सुगन्ध वायु बहती है ।³
ईसामसीहके जन्मके समय भी सम्पूर्ण प्रकृतिका स्तब्ध होना, देवोंका आगमन आदि वर्णन
बाइबिलमें आता है।
श्लोक ५ पृ. १८ पं. ६ : एवं व्योमापि उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकः
जैनदर्शनके अनुसार जो वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त हो, उसे सत् अथवा द्रव्य कहते हैं।
इसीलिए जैनदर्शनकारोंने 'अप्रच्युत, अनुत्पन्न और स्थिर रूप' नित्यका लक्षण स्वीकार न कर 'पदार्थके
स्वरूपका नाश नहीं होना' (तद्भावाव्ययं नित्यं) नित्यका लक्षण माना है। इस लक्षणके अनुसार
जैन आचार्योंके मतसे प्रत्येक द्रव्यमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य पाये जाते हैं। आत्मा पूर्व भवको छोड़कर
उत्तर भव धारण करती है, और दोनों अवस्थाओंमें वह समान रूपसे रहती है, इसलिए आत्मामें उत्पाद,
व्यय और ध्रौव्य सिद्ध हो जाते हैं। पुद्गल और काल द्रव्यमें भी उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यका होना स्पष्ट
है। जीव, पुद्गल और कालकी तरह जैन सिद्धान्तके अनुसार धर्म, अधर्म और आकाश जैसे अमूर्त द्रव्योंमें
भी स्वप्रत्यय और परप्रत्ययसे उत्पाद और व्यय माना गया है। स्वप्रत्यय उत्पादको समझनेके पहले कुछ जैन
पारिभाषिक शब्दोंका ज्ञान आवश्यक है।
१ प्रत्येक पदार्थमें अनंत गुण हैं। इन अनन्त गुणोंमें प्रत्येक गुणमें अनन्त अनन्त अविभागी गुणांश
हैं। यदि द्रव्यमें गुणांश नहीं माने जाँय, तो द्रव्यमें छोटापन, बड़ापन आदि विभाग नहीं किया जा सकता । इन
अविभागी गुणांशोंको अविभागी प्रतिच्छेद कहते हैं। २ द्रव्यमें जो अनन्त गुण पाये जाते हैं, इन अनंत गुणोंमें
अस्तित्व, द्रव्यत्व, वस्तुत्व, अगुरुलघुत्व, प्रमेयत्व, प्रदेशत्व-ये छह सामान्य गुण मुख्य हैं। जिस शक्तिके निमित्तसे
एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूपमें अथवा एक शक्ति दूसरी शक्तिरूपमें नहीं बदलती, उसे अगुरुलघु गुण कहते हैं।
३ अविभागी प्रतिच्छेदोंके छह प्रकारसे कम होने और बढ़नेको छहगुणी हानिवृद्धि कहते हैं। अनंत
१. पतंजलि-योगसूत्र विभूतिपाद; तथा देखिये यशोविजय-योगमाहात्म्यद्वात्रिंशिका ।
२. अभिधर्मकोश ७-४० से आगे ।
३. मज्झिमनिकाय-अच्छरियधम्मसुत्त, पृ० ५१० राहुल सांकृत्यायन; अश्वघोष-बुद्धचरित सर्ग १; तथा
देखिये निदानकथा; ललितविस्तर आदि ।

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) २८७
भागवृद्धि, असंख्यात भागवृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि, और अनंत गुणवृद्धि;
तथा अनंत भागहानि, असंख्यात भागहानि, संख्यात भागहानि, संख्यात गुणहानि, असंख्यात गुणहानि और
अनंत गुणहानि-यह षट्स्थानपतित हानिवृद्धि१ कही जाती है।
जिस समय धर्म, अधर्म और आकाशमें अपने-अपने अगुरुलघु गुणके अविभागी प्रतिच्छेदोंमें उक्त
छह प्रकारकी हानि-वृद्धिके द्वारा परिणमन होता है, उस समय धर्म, अधर्म और आकाशमें उत्पाद और
व्यय होता है । जिस समय धर्म, अधर्म और आकाशमें अगुरुलघु गुणकी पूर्व अवस्थाका त्याग होता है, उस
समय व्यय, और जिस समय उत्तर अवस्थाकी उत्पत्ति होती है, उस समय उत्पाद होता है।२ तथा
द्रव्यकी अपेक्षा धर्म, अधर्म और आकाश सदा निष्क्रिय और नित्य हैं, इसलिये इनमें ध्रौव्य रहता है। धर्म
आदि द्रव्योंमें उत्पाद और व्यय अपने-अपने अगुरुलघु गुणके परिणमनसे होता है, इसलिये इसे स्वप्रत्यय
उत्पाद कहते हैं। जिस समय स्वयं अथवा किसी दूसरेके निमित्तसे जीव और पुद्गल धर्म, अधर्म और
आकाशके एक प्रदेशको छोड़कर दूसरे प्रदेशके साथ संबद्ध होते हैं, उस समय धर्म आदि द्रव्योंमें परप्रत्यय
उत्पाद और व्यय कहा जाता है ।
सिद्धसेन दिवाकरने सन्मतितर्कमें उत्पाद और व्ययके प्रायोगिक ( प्रयत्नजन्य ) और वैस्रसिक
( स्वाभाविक ) दो भेद किये हैं । प्रयत्नजन्य उत्पादमें भिन्न-भिन्न अवयवोंके मिलनेसे पदार्थोंका समुदाय
रूप उत्पाद होता है, इसलिये इसे समुदायवाद कहते हैं। यह उत्पाद किसी एक द्रव्यके आश्रयसे नहीं होता,
इसलिये यह अपरिसुद्ध नामसे भी कहा जाता है । सामुदायिक उत्पादकी तरह व्यय भी सामुदायिक होता है।
सामुदायिक उत्पाद और व्यय मूर्त द्रव्योंमें ही होते हैं। वैस्रसिक उत्पाद और व्ययके दो भेद हैं—सामुदायिक
और ऐकत्विक । बादल आदिमें जो बिना प्रयत्नके उत्पत्ति और नाश होता है, उसे वैस्रसिक समुदयकृत
उत्पाद-व्यय कहते हैं। तथा धर्म, अधर्म और आकाश अमूर्त द्रव्योंमें दूसरे द्रव्योंके साथ मिलकर स्कंध रूप
धारण किये बिना जो उत्पाद और व्यय होता है, उसे वैस्रसिक ऐकत्विक उत्पाद-व्यय कहते हैं। धर्म, अधर्म
और आकाशमें यह उत्पाद-व्यय अनेकांतसे परनिमित्तक होता है ।३
श्लोक ६ पृ. ३१ पं. १२ : अपुनर्बन्ध—
“जो जीव मिथ्यात्वको छोड़नेने लिये तत्पर और सम्यक्त्वकी प्राप्तिके लिये अभिमुख होता है,”
उसे अपुनर्बंधक कहते हैं। अपुनर्बंधकके कृपणता, लोभ, याच्ञा, दीनता, मात्सर्य, भय, माया और मूर्खता—
इन भवानन्दी दोषोंके नष्ट होनेपर शुक्ल पक्षके चन्द्रमाके समान औदार्य, दाक्षिण्य आदि गुणोंमें वृद्धि होती
जाती है। अपुनर्बंधकके गुरु, देव आदिका पूजन, सदाचार, तप और मुक्तिसे अद्वेष रूप 'पूर्वसेवा' मुख्य
रूपसे होती है। अपुनर्बंधक जीव, शान्तचित्त और क्रोध आदिसे रहित होते हैं, तथा जिस तरह भोगी
पुरुष सदा अपनी स्त्रीका चिन्तन करता रहता है, उसी तरह वे सतत संसारके स्वभावका विचार करते
रहते हैं। उसके कुटुम्ब आदिमें प्रवृत्ति करते रहनेपर भी उसकी प्रवृत्तियां बंधका कारण नहीं होतीं।
१. षट्स्थानपतित हानिवृद्धिके स्पष्टीकरणके लिये गोम्मटसार जीवकांड; प्रवचनसारोद्धार गा. ४३२ द्वा.
२६०; पं. गोपालदासजी कृत जैनसिद्धांतदर्पण आदि ग्रन्थ देखने चाहिये ।
२. क्रियानिमित्तोत्पादाभावेऽपि एषां धर्मादीनामन्यथोत्पादः कल्प्यते । तद्यथा द्विविधः उत्पादः स्वनिमित्तः
परप्रत्ययश्च। स्वनिमित्तस्तावत् अनंतानामगुरुलघुगुणानामागमप्रामाण्यादभ्युपगम्यमानानां षट्स्थानपतितया
वृद्ध्या हान्या च वर्तमानानां स्वभावादेवामुत्पादो व्ययश्च । सर्वार्थसिद्धि पृ० १५१ ।
३. देखिये सन्मतितर्क ३-३२,३३; द्रव्यानुयोगतर्कणा ९-२४,२५; शास्त्रवार्तासमुच्चय ७-१ यशोविजय-
: टीका; तत्त्वार्थभाष्य ५-२९ टीका पृ. ३८३-५ ।

२८८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
अपुनर्बंधक वितर्कप्रधान होता है, और इसके क्रमसे कर्म और आत्माका वियोग होकर इसे मोक्ष
मिलता है । १
श्लो० ९ पृ० ७१ पं० १० : प्रदेश—
पुद्गलके सबसे छोटे अविभागी हिस्सेको परमाणु कहते हैं। यह परमाणु कारणरूप २ अंत्यद्रव्य कहा
जाता है। परमाणु नित्य, सूक्ष्म और किसी एक रस, गंध, वर्ण और दो स्पर्शोंसे सहित होता है। परमाणु
आकाशके जितने प्रदेशको घेरता है, उसे जैन शास्त्रोंमें प्रदेश कहा गया है। प्रदेशके दूसरे अंशोंकी कल्पना
नहीं हो सकती। जैन सिद्धांतमें धर्म, अधर्म और जीव द्रव्योंमें असंख्यात, कालमें अनन्त, पुद्गलमें संख्यात,
असंख्यात, अनंत और कालमें एक प्रदेश माने गये हैं। पुद्गल द्रव्यके प्रदेश पुद्गल-स्कंधसे अलग हो सकते हैं,
इसलिये पुद्गलके सूक्ष्म अंशोंको अवयव कहा जाता है। पुद्गल द्रव्यके अतिरिक्त अन्य द्रव्योंके सूक्ष्म अंश अपने-
अपने स्कंधोंसे पृथक् नहीं हो सकते, इसलिये अन्य द्रव्योंके सूक्ष्म अंशोंको प्रदेश नामसे कहा गया है। ३ धर्म,
अधर्म, आकाश, काल और मुक्त जीव सदा एक समान अवस्थित रहते हैं, इसलिये इनके प्रदेशोंमें अस्थिरता
नहीं होतो । पुद्गल द्रव्यके परमाणु और स्कंध अस्थिर, तथा अंतिम महास्कंध स्थिर और अस्थिर दोनों
होते हैं।
यद्यपि जीव द्रव्य अखंड है, फिर भी वह असंख्यात प्रदेशी है। जैन दर्शनकी मान्यता है कि जिस
प्रकार गुड़के ऊपर बहुत-सी धूल आकर इकट्ठी हो जाती है, उसी प्रकार एक-एक आत्माके प्रदेशके साथ
अनंतानंत ज्ञानावरण आदि कर्मोंके प्रदेशोंका संबंध होता है। संसारी जीवोंके प्रदेश चलायमान रहते
हैं। ये प्रदेश तीन प्रकारके होते हैं। विग्रह गतिवाले जीवोंके प्रदेश सदा चल होते हैं, अयोगकेवलीके प्रदेश
सदा अचल होते हैं, और शेष जीवोंके आठ प्रदेश अचल और बाकी प्रदेश चल होते हैं। यदि जीवमें प्रदेशोंकी
कल्पना न की जाय, तो जिस तरह निरंश परमाणुका किसी मूर्त्तमान द्रव्यके साथ संबंध नहीं हो सकता,
उसी तरह आत्माका भी मूर्त्तिमान शरीरसे संबंध नहीं हो सकता। अतएव जिस समय अमूर्त आत्मा
लोकाकाशके प्रदेशोंके बराबर होकर भी मूर्त कर्मोंके संबंधसे कार्माण शरीरके निमित्तसे सूक्ष्म शरीरको धारण
करता है, उस समय सूखे चमड़ेकी ४ तरह आत्माके प्रदेशोंमें संकोच होता है, और जिस समय यह आत्मा
सूक्ष्म शरीरसे स्थूल शरीरको प्राप्त करता है, उस समय जलमें तेलकी तरह आत्माके प्रदेशोंमें विस्तार होता
है। अतएव आत्मा अमूर्त होकर भी संकोच और विस्तार होनेकी अपेक्षा शरीरके परिमाण ५ माना जाता है।
यदि आत्माको अचेतन द्रव्योंके विकारसे रहित सर्वथा अमूर्त माना जाय, तो आत्मामें ध्यान, ध्येय आदिका
व्यवहार नहीं हो सकता, तथा आत्माको मोक्ष भी नहीं मिल सकता । अतएव शक्तिकी अपेक्षा आत्माको
१. देखिये हरिभद्रकृत योगविन्दु ११५ से आगे; तथा यशोविजय—अपुनर्बन्धद्वात्रिंशिका ।
२. अकलंक आदि दिगम्बर विद्वानोंने परमाणुको कथंचित् कार्यरूप भी माना है। देखिये तत्त्वार्थराजवार्तिक
५-२५-५ ।
३. अतएव च भेदः प्रदेशानामवयवानां च, ये न जातुचिद् वस्तुव्यतिरेकेणोपलभ्यन्ते ते प्रदेशाः । ये तु
विशकलिताः परिकलितमूर्त्तयः प्रज्ञापथमवतरन्ति तेऽवयवा इति । तत्त्वार्थभाष्यवृत्ति ५-६, पृ० ३२८ ।
४. शुष्कचर्मवत् प्रदेशानां संहारः । तस्यैव बादरशरीरमधितिष्ठतो जले तैलवद्विसर्पणम् विसर्पः । तत्त्वार्थ-
श्लोकवार्तिक ५-१६ ।
५. तुलनीय — यथा क्षुरः क्षुरधाने हितः स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाये ।
एवमेवैष प्राज्ञ आत्मेदं शरीरमनुप्रविष्ट आलोमेभ्यः आनखेभ्यः—
अर्थात् जिस प्रकार छुरा अपने घर (क्षुराधान) और अग्नि चूल्हा, अंगीठी आदि अपने स्थानमें व्याप्त
होकर रहते हैं, उसी तरह नखोंसे लगाकर बालों तक यह आत्मा शरीरमें व्याप्त है ! कौषीतकी उ० ४-१९ ।

अमूर्त मानकर भी व्यक्तिको अपेक्षा आत्माको मूर्त ही मानना चाहिये।१ इसलिये निश्चयनयसे आत्मा
लोकके बराबर असंख्यात प्रदेशोंका धारक है, और व्यवहार नयकी अपेक्षा संकोच और विस्तारवाला है।
इस विषयका स्पष्टीकरण करते हुए अन्य स्थलोंपर जैनशास्त्रोंमें आत्माको नैयायिक, मीमांसक आदि
दर्शनोंकी तरह प्रदेशोंकी अपेक्षा व्यापक न मान ज्ञानकी अपेक्षा व्यवहार नयसे व्यापक² माना गया है।
इस सिद्धांतकी रामानुजके सिद्धांतसे तुलना की जा सकती है। रामानुज आचार्यके सिद्धान्तमें भी आत्माको
ज्ञानकी अपेक्षा संकोच और विकासशील माना गया है। इस मतमें वास्तवमें अणु-परिमाण³ आत्मामें
संकोच-विकास नहीं होता, किन्तु आत्माके कर्मबंधकी अवस्थामें संकोच और विकास होता है। विकासकी
उत्कृष्ट सीमा कर्मबंधसे रहित मोक्ष अवस्थामें ही हो सकती है। न्यायकन्दलीकार श्रीधर आचार्यने भी
आत्माको सर्वव्यापक मानकर आत्माके बुद्धि आदि गुणोंका शरीरमें ही अस्तित्व माना है।४
श्लो. ९ पृ. ७५ पं. १ : केवलिसमुद्घात—
वेदनीय, नाम और गोत्र कर्मकी स्थितिसे आयु कर्मकी स्थिति कम रह जानेपर वेदनीय आदि और
[L

२९० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
मन, वचन, कायका निरोध करके शैलेशीकरण करता हुआ अयोगी होकर पाँच ह्रस्व अक्षरोंके उच्चारण
करनेके समय मात्रमें मोक्ष प्राप्त करता है ।
हेमचन्द्र¹, यशोविजय आदि विद्वानोंने उपनिषद, गीता आदि वैदिक ग्रन्थोंमें आत्मव्यापकताका अपने
सिद्धांतसे समन्वय करके इसे आत्मगौरवका सूचक कहकर सम्मानित किया है ।²
कर्मोंकी स्थितिको शीघ्र भोगनेके लिये जैनसिद्धांतमें समुद्घात क्रियासे मिलती जुलती पातंजल योग-
दर्शनमें³ सोपक्रम आयुके विपाकमें बहुकायनिर्माण क्रिया मानी गई है। यद्यपि सामान्य नियमके अनुसार, बिना
भोगे हुए कर्म करोड़ों कल्पोंमें भी क्षय नहीं हो सकते⁴, परन्तु जिस प्रकार गीले वस्त्रको फैलाकर सुखानेमें
वस्त्र बहुत जल्दी सूख जाता है, अथवा जिस प्रकार सूखे हुए घासमें अग्नि डालनेसे हवाके अनुकूल होनेपर
घास बहुत जल्दी जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार जिस समय योगी एक शरीरसे कर्मके फलको भोगनेमें
असमर्थ होता है, उस समय.वह संकल्प मात्रसे बहुतसे शरीरोंका निर्माण कर ज्ञान-अग्निसे कर्मोंका नाश
करता है। इसीको योगशास्त्रमें बहुकायनिर्माणद्वारा सोपक्रम आयुका विपाक कहा है। इन बहुतसे शरीरोंमें
कभी योगी लोग एक ही अन्तःकरणसे प्रवृत्ति करते हैं। वायुपुराणमें भी जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणोंको
वापिस खींच लेता है, उसी प्रकार एक शरीरसे एक, दो, तीन आदि अनेक शरीरोंको उत्पन्न करके इन
शरीरोंको पीछे खींचनेका उल्लेख है।⁵
श्लो. ९ पृ. ७५ पं. २ : लोक—
जैनधर्मके अनुसार ऊर्ध्व, मध्य और अधोलोक ये लोकके तीन विभाग किये गये हैं। यह लोक चौदह
राजू ऊंचा है। मूलसे सात राजूकी ऊंचाई तक अधोलोक, और एक लाख चालीस योजन सुमेरु पर्वतकी ऊंचाईके
समान ऊंचा मध्यलोक है। मेरुकी जड़के नीचेसे अधोलोक आरंभ होता है। अधोलोकमें रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा,
वालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमोप्रभा, महातमप्रभा नामके सात नरक हैं। इन नरकोंमें नारकी जीव
रहते हैं। इनमें ४९ पटल हैं। नरकोंमें छेदन, भेदन आदि महान् भयंकर कष्ट सहने पड़ते हैं। नरकमें अकाल
मृत्यु नहीं होती। अधोलोकसे ऊपर एक राजू लम्बा, एक राजू चौड़ा और एक लाख चालीस योजन ऊंचा
मध्यलोक है। मध्यलोकके बीचमें एक लाख योजनके विस्तारवाला जम्बूद्वीप है। जम्बूद्वीपको चारों ओरसे
१. देखिये योगशास्त्र । तथा, लोकपूरणश्रवणादेव हि परेषामात्मविभुत्ववादः समुद्भूतः । तथा चार्यवादः- "विश्वत-
श्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतः पात्" इत्यादि । तथा चासौ भवति समीकृतभवोपग्राहि-
कर्मा विरलीकृतादं्रशाटिकादिज्ञातेन क्षिप्रं तच्छोपोपपत्तेः । शास्त्रवार्तासमुच्चय ९-२१ टीका ।
२. देखिए पं. सुखलालजी—चौथा कर्मग्रन्थ पृ. १५६ ।
३. पाद ४ सू. २२, तथा पाद ४ सू. ४, ५ का भाष्य और टीका; पं. सुखलालजी—चौथा कर्मग्रन्थ पृ.
१५६ । तथा तुलनीय—तत्त्वार्थभाष्य २-१५ ।
४. तुलनीय यशोविजय—क्लेशहानोपाय-द्वात्रिंशिका; तथा—समाधिसमृद्धिमाहात्म्यात्प्रारब्धकर्मव्यतिरिक्तमा-
नानां कृत्स्नामेव कर्मणां विभिन्नविपाकसमयानामपि कायव्यूहेष्वेकदा भोगेन जीवात्ममहत्त्वं साधयता
क्षयाभ्युपगमेनैव व्याकुप्येत यतो निरुक्ता भगवती श्रुतिः "अचिन्त्यो हि समाधिप्रभावः" । पं. बालकृष्ण
मिश्र प्रणीत न्यायसूत्रवृत्ति पर विषमस्थल तात्पर्यविवृति पृ. २१-२२ ।
५. एकस्तु प्रभुशक्त्या वै बहुधा भवतीश्वरः ।
भूत्वा यस्मात्तु बहुधा भवत्येकः पुनस्तु सः ॥
तस्माच्च मनसो भेदा जायन्ते चैत एव हि । वायुपु. ६६-१४३ ।
एकदा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः ॥
योगीश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ।
प्राप्नुयाद्विषयान्कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ॥
संहरेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव । वायुपु. ६६-१५२ ।

बेड़े हुए लवणसमुद्र, लवणसमुद्रको धातकीखंड, धातकीखंडको कालोदधिसमुद्र, और कालोदधिको बेड़े हुए
पुष्करद्वीप है । इसी प्रकार आगे आगे एक दूसरेको बेड़े हुए दूने-दूने विस्तारवाले असंख्यात द्वीप और समुद्र
हैं । अंतमें स्वयंभूरमण समुद्र है। जम्बूद्वीपमें भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये
सात क्षेत्र हैं । इन क्षेत्रोंमें गंगा, सिन्धू आदि चौदह नदियां बहती हैं। मनुष्यलोकमें पन्द्रह कर्मभूमि और तीस
भोगभूमि हैं । ज्योतिष्क देव भी मध्य लोकमें ही निवास करते हैं। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, और तारे ये
ज्योतिष्क देवों के पाँच भेद हैं। मेरुसे ऊर्ध्वलोकके अन्त तक के क्षेत्रको ऊर्ध्वलोक कहते हैं । ऊर्ध्वलोकमें
बारह स्वर्ग ( दिगम्बरों की प्रचलित मान्यताके अनुसार सोलह स्वर्ग ) होते हैं । इन स्वर्गोंके ऊपर नव ग्रैवेयक,
नव अनुदिश¹ और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि ये पांच अनुत्तर विमान हैं । सर्वार्थ-
सिद्धिके ऊपर लोकके अंतमें एक राजू चौड़ी, सात राजू लम्बी, आठ योजन मोटी ईषत्प्राग्भार नामक पृथिवी
है । इस पृथिवीके बीचमें पैंतालीस लाख योजन चौड़ी, मध्यमें आठ योजन मोटी सिद्धशिला है । इस सिद्ध-
शिलाके ऊपर तनुवातवलयमें मुक्त जीव निवास करते हैं ।
ब्राह्मण पुराणोंमें भूलोक, अन्तरिक्षलोक और स्वर्गलोक ये तीन मुख्य लोक माने गये हैं । इनमें
स्वर्गलोकके महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक ये चार भेद मिलानेसे सात लोक होते हैं । अवीचि
नामके नरकसे लगाकर मेरुके पृष्ठभाग तक भूलोक कहा जाता है । अवीचि नरकके ऊपर महाकाल, अम्बरीष,
रौरव, महारौरव, कालसूत्र, अंधतामिस्र ये छह नरक हैं ।² इन नरकोंके ऊपर महातल, रसातल, अतल,
सुतल, वितल, तलातल, और पाताल ये सात पाताल हैं ।³ इस आठवों भूमिपर जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश,
क्रौञ्च, शाक और पुष्कर ये सात द्वीप हैं। ये सात द्वीप लवण, सुरा, सर्पि, दधि, दुग्ध, और स्वच्छ जल नामक
सात समुद्रोंसे परिवेष्टित हैं । मेरुके पृष्ठसे लेकर ध्रुव तक ग्रह, नक्षत्र और तारोंसे युक्त अन्तरिक्षलोक है ।
इसके ऊपर पांच स्वर्गलोक हैं। पहला माहेन्द्र स्वर्ग है। इस स्वर्गमें त्रिदश, अग्निष्वात्त, याम्य, तुषित, अपरि-
निर्मित, वशवर्ती ये छह प्रकारके देव रहते हैं, जो औपपातिक देहको धारण करते हैं। इसके ऊपर महर्लोक
नामके दूसरे स्वर्गमें पांच प्रकारके देव रहते हैं, जो ध्यान मात्रसे तृप्त हो जाते हैं और जिनकी हजार कल्पकी
आयु होती है। तीसरा स्वर्ग ब्राह्म स्वर्ग कहा जाता है। इस स्वर्गके जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक तीन
विभाग हैं। जनलोकमें चार प्रकारके, तपोलोकमें तीन प्रकारके, और सत्यलोकमें चार प्रकारके देव रहते हैं ।⁵
बौद्धोंके शास्त्रोंमें नरकलोक, प्रेतलोक, तिर्यक्लोक, मानुषलोक, असुरलोक और देवलोक ये छह
लोक माने गये हैं । ये लोक कामधातु, रूपधातु और अरूपधातु इन तीन विभागोंमें विभक्त हैं । सबसे नीचे
नरकलोक है । संजीव, कालसूत्र, संघात, रौरव, महारौरव, तपन, प्रतापन और अवीचि ये आठ मुख्य नरक
हैं । इन नरकोंकी लंबाई, चौड़ाई और उँचाई दस हजार योजन है । अवीचि नामका नरक सबसे भयंकर
है । इस नरकमें अन्तकल्पकी आयु होती है । नरकोंमें गाढ़ अन्धकार रहता है, और वहांके जीवोंको नाना
प्रकारके दारुण दुख सहने पड़ते हैं। मानुषलोकमें जम्बू, पूर्वविदेह, अवरगोदानीय और उत्तरकुरु ये चार
महाद्वीप हैं। ये महाद्वीप मेरु, युगन्धर आदि आठ पर्वतोंको परिक्षेपण करते हैं, और इन पर्वतोंके बीचमें सात
१. तत्त्वार्थभाष्य आदि ग्रंथोंमें अनुदिशोंका उल्लेख नहीं ।
२. नरकोंके विस्तृत वर्णनके लिए देखिये मार्कण्डेयपु. १२-३-३९ । मार्कण्डेयपुराणमें सात नरकोंके नाम
निम्न प्रकारसे हैं-रौरव, महारौरव, तम, निकृन्तन, अप्रतिष्ठ, असिपत्रवन और तप्तकुंभ ।
३. पातालोंके वर्णनके लिये देखिये पद्मपु. पातालखण्ड १, २, ३; विष्णुपुराण अ. २, ५ ।
४. द्वीप-समुद्रोंके विशेष वर्णनके लिये देखिये भागवत ५-६, १७, १८; तथा पद्मपु. भूमिखण्ड, भूगोलवर्णन
अ. १२८ ।
५. स्वर्गके वर्णनके लिये देखिये नृसिंहपु. अ. ३०; पद्मपु. स्वर्गखण्ड । कौषीतकी उपनिषद्में बताया गया है
कि जीव अग्निलोक, वायुलोक, वरुणलोक आदित्यलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोकमें से होकर ब्रह्मलोकमें
जाता है । ब्रह्मलोकके वर्णन के लिये देखिये १-२ से आगे ।

२९२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
नदियां बहती हैं। कामधातुमें चातुर्महाराजिक, त्रयस्त्रिंश, याम, तुषित, निर्माणरति, परिनिर्मित और वश-
वर्ती ये छह प्रकारके देव रहते हैं। इन देवोंमें पहले और दूसरे प्रकारके देव परस्परके संयोगसे और बाकीके
देव क्रमसे आलिंगन, हाथका संयोग, हास्य और अवलोकन करनेसे कामका भोग करते हैं। रूपधातुके देवोंमें
अहोरात्रिका व्यवहार नहीं होता। अरूपधातुके देव चार प्रकारके होते १ हैं।
श्लो. ११ पृ. ९० पं. ५ : भवतामपि जिनायतनादिविधाने—
राग-द्वेष युक्त असावधान प्रवृत्तिके द्वारा प्राणोंके नाश करनेको जैन शास्त्रोंमें हिंसा कहा है। संक्षेपमें
हिंसाके द्रव्यहिंसा और भावहिंसा ये दो भेद हैं। किसी जीवके अत्यन्त यत्नाचार पूर्वक प्रवृत्ति करने-
पर भी यदि उससे सूक्ष्म प्राणियोंका घात हो जाता है, तो वह जीव द्रव्यहिंसा करके भी हिंसक नहीं
कहा जा सकता। तथा यदि कोई जीव कषाय आदिके वशीभूत होकर जीवोंको मारनेका संकल्प करता है,
परन्तु वह जीवोंको द्रव्य रूपसे नहीं मारता तो भी उसे हिंसक कहा गया है। इसीलिये कहा है कि
“यह जीव दूसरे जीवोंके प्राणोंको नाश करके भी पापसे युक्त नहीं होता,” “तथा जीवोंका नाश हो, अथवा
नहीं, लेकिन अयत्नाचारसे प्रवृत्ति करता हुआ यह जीव अवश्य ही हिंसक कहा जाता है।”२ अतएव जैन
शास्त्रोंमें गृहस्थको केवल संकल्पसे होनेवाली हिंसाको छोड़नेका उपदेश दिया है। इसलिये पाक्षिक श्रावकको
अपनी श्रद्धाके अनुसार जिनमंदिर, जिनविहार आदि बनानेका विधान है। यद्यपि जिनमंदिर आदिके
बनानेमें आरंभजन्य हिंसा होती है, परन्तु इससे महान पुण्य का ही बंध होता है३। जिस प्रकार कोई वैद्य
रोगीकी चिकित्सा करते समय रोगीको होनेवाले दुखके कारण पापका उपार्जन न करता हुआ पुण्यका ही
भागी होता है, इसीतरह जैन मंदिर, जैन मठ, जैन धर्मशाला, जैन वाटिकागृह आदि बनानेसे जीवोंका महान
कल्याण होता है, इसलिये जैन मंदिर आदिके निर्माण करानेमें शास्त्रीय दृष्टिसे दोष नहीं है।
श्लो. ११ पृ. ९९ पं. १२ : आधाकर्म—
जैन शास्त्रोंमें मुनियोंके लिये निर्दोष आहार ग्रहण करनेका विधान किया गया है। साधारणतः यह
आहार छियालीस प्रकारके दोषोंसे और आधाकर्म (अधःकर्म) से रहित होना चाहिए। आहार ग्रहण करनेके
समय आधाकर्मको महान दोष कहा गया है। आधाकर्ममें प्राणियोंकी विराधना होती है, इसलिये अधोगतिका
कारण होनेसे इसे आधाकर्म कहा जाता है। अथवा मुनिके निमित्तसे बनाये हुए भोजनमें पांच सूनाओंसे
१. विस्तृत विवरणके लिये देखिये अभिधर्मकोश 'लोकधातुनिर्देश' नामक तृतीय कोशस्थान; अभिधम्मत्य
संगहो, परि. ५।
२. (अ) वियोजयति चासुभिर्न च वधेन संयुज्यते
शिवं च न परोपमर्दपुरुपेमृतेर्विद्यते ।
वधाय न यमभ्युपैति च परांन्न निघ्नन्नपि ।
त्वयायमतिदुर्गमः प्रथमहेतुरुद्योतितः ॥ सिद्धसेन—द्वा. द्वात्रिंशिका ३-१६ ।
(आ) मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा ।
पयदस्स णत्थि बन्धो हिंसामित्तेण समिदस्स ॥ सर्वार्थसिद्धि पृ २०५ ।
(इ) यलतो जीवरक्षार्थं तत्पीडापि न दोषकृत् ।
अपीडनेऽपि पीडैव भवेदयतनावतः ॥ यशोविजय—धर्मव्यवस्था द्वात्रिंशिका २९ ।
३. यद्यप्यारम्भतो हिंसा हिंसाया पापसंभवः ।
तथाप्यत्र कृतारंभो महत्पुण्यं समश्नुते ॥
निरालम्बनधर्मस्य स्थित्यर्थस्मात्ततः सताम् ।
मुक्तिप्रासादसोपानमाप्तैरुक्तो जिनालयः ॥ आशाधर—सागारधर्मामृत २-३५ टिप्पणी ।

प्राणियोंकी हिंसा होती है, इसलिये इसे आधाकर्म कहते हैं ।$^{१}$ यह सामान्य नियम है । परन्तु यदि कोई मुनि
रोग आदिके कारण अपने संयमका निर्वाह करनेमें असमर्थ हो गया है तो आपत्कालमें उस मुनिको शास्त्रमें
उद्दिष्ट भोजन ग्रहण करनेकी भी आज्ञा दी गई है । यदि आधाकर्मको सर्वथा अधोगतिका कारण मानकर
उससे एकान्त रूपसे कर्मबंध$^{२}$ माना जाय, तो मुनिको भोजन न मिलनेके कारण मुनिका आर्तध्यानके द्वारा
प्राणान्त होना संभव है । उदाहरणके लिये, जिस मुनिकी आंख दुख रही है, वह मुनि पृथ्वीको देखकर न
चल सकनेके कारण त्रस जीवोंकी हिंसा नहीं बचा सकता । वैसे ही यदि रोगादिके कारण साधु उद्दिष्ट
भोजनका त्याग नहीं कर सकता तो वह दोषका भागी नहीं है । यदि आपत्कालमें भी इस प्रकारका अपवाद
नियम न बनाया जाय तो क्लेशित परिणामोंसे आर्तध्यानसे मरकर साधुको दुर्गतिमें जाना पड़े, इससे और
भी अधिक पापका बंध हो । अतएव रोगादिके कारण असामान्य परिस्थितिके उत्पन्न होने पर साधुको आधा-
कर्म—उद्दिष्ट भोजन ग्रहण—करनेकी आज्ञा शास्त्रोंमें दी गई है ।$^{३}$ इसी प्रकार सामान्यतः शास्त्रोंमें मुनिके
लिये नवकोटिसे विशुद्ध आहार ग्रहण करनेकी आज्ञा है, लेकिन यदि मुनि किसी आपदासे ग्रस्त हो जाय तो
वह केवल पांच कोटिसे शुद्ध आहार ग्रहण करके अपना जीवन यापन कर सकता है ।
श्लो. २३ पृ०. २०४ पं० ४ : द्रव्यषट्कं
जैन दर्शनकारोंने जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छहं द्रव्यँ$^{४}$ स्वीकार किये हैं । इन
छह द्रव्योंमें काल द्रव्यको छोड़कर बाकीके पांच द्रव्योंको पंच अस्तिकायके नामसे कहा जाता है । कुछ श्वेता-
म्बर विद्वान् काल द्रव्यको द्रव्योंमें नहीं गिनते । इसलिये उनके मतमें पांच अस्तिकाय ही पांच द्रव्य माने गये हैं ।$^{५}$
काल शब्द बहुत प्राचीन है । वैदिक विद्वान् अघमर्षण ऋग्वेदमें$^{६}$ काल शब्दको 'संवत्सर' के अर्थमें
प्रयुक्त करते हैं । यहाँ कालको सृष्टिका संहार करनेवाला कहा गया है । अथर्ववेदमें कालको नित्य पदार्थ माना
है, और इस नित्य पदार्थसे प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति स्वीकार की गई है ।$^{८}$ बृहदारण्यक$^{९}$, मैत्रायण$^{९}$ आदि उप-
निषदोंमें भी काल शब्दको विविध अर्थोंमें प्रयुक्त किया है । महाभारतमें कालका विस्तृत वर्णन पाया जाता है ।$^{१०}$
यहां काल शब्दको दिष्ट, दैव, हठ, भव्य भवितव्य, विहित, भागधेय आदि अनेक अर्थोंमें प्रयुक्त किया गया है ।
वैदिक और बौद्ध दर्शनोंमें काल संबंधी दो प्रकारकी मान्यतायें दृष्टिगोचर होती हैं : (१) न्याय वैशे-
षिकोंका मत है कि काल एक सर्वव्यापी अखंड द्रव्य है । यह केवल उपाधिसे भिन्न-भिन्न क्षण, मुहूर्त आदिके
रूप में प्रतीत होता है । पूर्वमीमांसकोंने भी कालको व्यापक और नित्य स्वीकार किया है । इनके मतमें जिस
१ अतएवाधोगतिनिमित्तं कर्माधःकर्मेत्यन्वर्थोऽपि घटते । तदेतदधःकर्म गृहस्थ्याश्रितो निकृष्टव्यापारः । अथवा
सूनाभिरङ्गिहिंसनं यत्रोत्पाद्यमाने भक्तादौ तदधःकर्मेत्युच्यते । आशाधर-अनगारधर्मामृत ५-३ वृत्ति ।
२ आहाकम्माणि भुंजंति अण्णमण्णे सकम्मुणा ।
उवलित्तेत्ति जाणिज्जा णुवलित्तेत्ति वा पुणो ॥ अभिधानराजेन्द्रकोष, भाग २ पृ. २४२ ।
३ विशेषके लिये देखिए अभिधानराजेन्द्रकोष, भाग २ पृ. २१९–२४२ ।
४ वैशेषिकों द्वारा मान्य छह पदार्थ हैं—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ।
५ भगवती २५-४; उत्तराध्ययन २८-७,८; प्रज्ञापना आदि श्वेताम्बर आगम ग्रंथोंमें काल द्रव्य संबंधी
दोनों पक्ष मिलते हैं।
६ १०-१९० ।
७ १९-५३, ५४ ।
८ ४-४-१६ ।
९ ६-१५ ।१० देखिये ।
१० डा० सिद्धेश्वर शास्त्री का कालचक्र पृ. ३९-४८। काल संबंधी वैदिक मान्यताओंके विस्तृत विवेचनके
लिए देखिये प्रोफेसर बरुआकी Pre-Buddhist Philosophy भाग ३ अ. १३ । कालवादियोंके
मतके खण्डनके लिए माध्यमिककारिका, सन्मतिटीका आदि ग्रंथ देखने चाहिये ।

२९४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रकार वर्ण नित्य और व्यापक होकर भी दीर्घ, ह्रस्व आदिके रूपसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, उसी तरह
काल भी उपाधिके भेदसे भिन्न मालूम देता है । सर्वास्तिवादी बौद्ध भी भूत, भविष्य और वर्तमान कालका
अस्तित्व मानते हैं ( २ ) काल संबंधी दूसरी मान्यताको माननेवाले सांख्य, योग, वेदान्त, विज्ञानवाद और
शून्यवाद मतके अनुयायी हैं । इन लोगोंके अनुसार काल कोई स्वतंत्र द्रव्य नहीं है । सांख्य विद्वान् विज्ञान-
भिक्षुका कथन है कि नित्यकाल प्रकृतिका गुण है, और खण्डकाल आकाशकी उपाधियोंसे उत्पन्न होता है ।
योगशास्त्रमें कहा है कि काल कोई वास्तविक पदार्थ नहीं है, केवल लौकिक व्यवहारके लिये दिन, रात
आदिका विभाग किया जाता है। यहां केवल क्षणको काल नामसे कहा गया है। यह क्षण उत्पन्न होते ही
नाश हो जाता है, और फिर दूसरा क्षण उत्पन्न होता है । क्षणोंका समुदाय एक कालमें नहीं हो सकता, इस
लिये क्षणों के क्रमरूप जो काल माना जाता है, वह केवल कल्पित है । शांकर वेदान्ती केवल ब्रह्मको ही सत्य
मानते हैं इसलिये इनके मतमें काल भी काल्पनिक वस्तु है । शंकरकी तरह रामानुज, निम्बार्क, मध्व और
वल्लभ सम्प्रदायवालोंने भी कालको वास्तविक पदार्थ स्वीकार नहीं किया । शांतरक्षित१ आदि बौद्ध आचार्य
भी काल द्रव्यका पृथक् अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । पाश्चात्य विद्वान् भी उक्त काल संबंधी दोनों सिद्धांतों-
को मानते हैं ।
जैन ग्रन्थोंमें काल संबंधी उक्त दोनों प्रकारकी मान्यतायें उपलब्ध होती हैं : ( १ ) एक पक्षका कहना
है कि काल कोई स्वतंत्र द्रव्य नहीं है । जीव और अजीव द्रव्योंकी पर्यायके परिणमनको ही उपचारसे काल
कहा जाता है, इसलिये जीव, अजीव द्रव्योंमें ही काल द्रव्य गर्भित हो जाता है ।२ ( २ ) जैन विद्वानोंका
दूसरा मत है कि जीव और अजीवकी तरह काल भी एक स्वतंत्र द्रव्य है । इस पक्षका कहना है कि जिस
प्रकार जीव और अजीवमें गति और स्थितिका स्वभाव होनेपर भी धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायको
पृथक् द्रव्य माना जाता है, उसी प्रकार कालको भी स्वतंत्र द्रव्य मानना चाहिये । यह मान्यता श्वेताम्बर
तथा दिगम्बर दोनों ग्रंथोंमें मिलती है३ ।
जैन शास्त्रोंमें काल संबंधी मान्यता
सामान्य रूपसे जैन शास्त्रोंमें कालके दो भेद माने हैं—निश्चयकाल ( द्रव्य रूप ) और व्यवहार-
काल ( पर्यायरूप ) । जिसके कारण द्रव्योंमें वर्तना होती है, उसे निश्चयकाल कहते हैं । जिस प्रकार धर्म
और अधर्म पदार्थोंकी गति और स्थितिमें सहकारी कारण हैं, उसी प्रकार काल भी स्वयं प्रवर्तमान द्रव्योंको
वर्तनामें सहकारी कारण है । जिसके कारण जीव और पुद्गलमें परिणाम, क्रिया, छोटापन, वड़ापन आदि
व्यवहार हों, उसे व्यवहारकाल कहते हैं । समय, आवली, घड़ी, घंटा आदि सब व्यवहारकालका ही रूप है ।
व्यवहारकाल निश्चयकालकी पर्याय है, और यह जीव और पुद्गलके परिणामसे ही उत्पन्न होता है, इसलिये
व्यवहारकालको जीव और पुद्गलके आश्रित माना गया है ।
१. तत्त्वसंग्रह पृ. २०९ ।
२. अत्राहुः केऽपि जीवादिपर्याया वर्तनादयः ।
काल इत्युच्यते तज्ज्ञैः पृथग् द्रव्यं तु नास्त्यसौ ॥ लोकप्रकाश २८-५ ।
दिगम्बर ग्रंथोंमें काल द्रव्यको स्वीकार न करनेका पक्ष कहीं उपलब्ध नहीं होता । परन्तु ध्यान
देने योग्य है कि यहां व्यवहार कालको निश्चय कालकी पर्याय स्वीकार करके व्यवहार कालको जीव
और पुद्गलका परिणाम माननेका उल्लेख मिलता हैं—यस्तु निश्चयकालपर्यायरूपो व्यवहारकालः स जीव-
पुद्गलपरिणामेनाभिव्यज्यमानत्वात्तदायत्त एवाभिगम्यत इति । अमृतचन्द्र-पंचास्तिकाय टीका गा. २३ ।
३. इस पक्षकी चार मान्यताओंका उल्लेख पं० सुखलालजीने 'पुरातत्व' के किसी अंकमें किया है— ( क )
काल एक और अणुमात्र है; ( ख ) काल एक है, लेकिन वह अणुमात्र न होकर मनुष्य क्षेत्र लोकवर्ती
हैं; ( ग ) काल एक और लोकव्यापी है; ( घ ) काल असंख्य हैं, और सब परमाणुमात्र हैं ।

व्यवहारकाल मनुष्य क्षेत्रमें ही होता है। निश्चयकाल द्रव्य रूप होनेसे नित्य है, और व्यवहारकाल
क्षण-क्षणमें नष्ट होनेके कारण पर्यायरूप होनेसे अनित्य कहा जाता है। कालद्रव्य अणुरूप है। पुद्गल द्रव्यकी
तरह कालद्रव्यके स्कंध नहीं होते। जितने लोकाकाशके प्रदेश होते हैं, उतने ही कालाणु होते हैं। ये एक-एक
कालाणु गति रहित होनेसे लोकाकाशके एक-एक प्रदेशके ऊपर रत्नोंकी राशिकी तरह अवस्थित हैं। काल-
द्रव्यके अणु होनेसे कालमें एक ही प्रदेश रहता है, इसलिये काल द्रव्यमें तिर्यक्-प्रचय न होनेसे कालको पांच
अस्तिकायोंमें नहीं गिना^१। आकाशके एक स्थानमें मन्द गतिसे चलनेवाला परमाणु लोकाकाशके एक प्रदेशसे
दूसरे प्रदेश तक जितने कालमें पहुँचता है, उसे समय कहते हैं। यह समय बहुत सूक्ष्म होता है, और प्रतिक्षण
उत्पन्न और नष्ट होनेके कारण इसे पर्याय कहते हैं। एक-एक कालाणुमें अनंत समय होते हैं। ये कालाणुके
अनंत समय व्यवहार नयकी अपेक्षा समझने चाहिये, वास्तवमें कालद्रव्य (निश्चयकाल) लोकाकाशके बराबर
असंख्य प्रदेशोंका धारक^२ है, उसे आकाश आदिकी तरह एक और पुद्गलकी तरह अनंत नहीं मान सकते।
यह मत दिगम्बर ग्रन्थोंमें और हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें^३ मिलता है।
१. प्रो. ए. चक्रवर्तीने काल द्रव्यकी इस मान्यताकी आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तसे तुलना की है—
The author differentiates between relative time and absolute time. The
distinction is quite identical with Newtonian distinction between relative and
absolute time........The author not only admits the reality of time but also reco-
gnises its potency. In this respect one is reminded of the great French philoso-
pher Bergson. Bergson has revealed to the world that time is a potent factor
in the evolution of Cosmos............It is also worth noticing that modern realist
led by the mathematical Philosophers admits the doctrine that time is real and
is made up of instants or moments. Panchastikayasara पृ० १०५, १०९, २२।
२. श्वेताम्बर सम्प्रदायमें कालाणुके असंख्य प्रदेश नहीं माने गये हैं। कालाणुओंके असंख्यात प्रदेशोंका खंडन
युक्तिप्रबोध आदिमें किया गया है—
यत्तु कालाणूनामसंख्यातत्वं मतान्तरीयाः प्रपन्नं तदनुपपन्नं। द्रव्यत्वव्याहतेः। यद् यद् द्रव्यं तदेकमनन्तं
वा। यदुक्तमुत्तराध्ययनसूत्रे—
'धम्मो अहम्मो आगासं दव्वं एक्केक्कमाहियं ।
अणंताणि य दव्वाणि कालो पोग्गलजंतुणो ॥'
प्रत्याकाशप्रदेशं तन्मते कालाणुस्वीकारे शेषद्रव्याणामिवैतदीयस्तिर्यक्प्रचयोऽपि स्यात् । स चानिष्टः। यतो
गोम्मटसारवृत्तौ सूत्रे च—
दव्वच्छक्कमकालं पंचत्थिकायसण्णियं होई ।
काले पदेसए चउ जम्मा णत्थित्ति णिद्दिट्ठं ॥ ६०६ ॥
कालद्रव्ये प्रदेशप्रचयो नास्तीत्यर्थः। न च अप्रदेशत्वान्न तिर्यक्प्रचय इति वाच्यं। पुद्गलस्यापि तदभावप्रसं-
गात्। प्रदेशमात्रत्वं अप्रदेशमिति तल्लक्षणस्य तत्रापि विद्यमानत्वात् । अथ पुद्गलस्यास्ति अप्रदेशत्वं द्रव्येण
परं पर्यायेण तु अनेकप्रदेशत्वमप्यस्ति। कालस्य तु नैतदिति चेत् । न। अनेनापि प्रसंगापराकरणात् । न हि
निर्धूमत्वेन पर्वतेऽग्निमत्त्वे प्रसज्यमाने यत्किंचिद्धर्माभावे तदभावः प्रतीयते इति स्थितं तिर्यक्प्रचयप्रसंगेन । न
चैतत् समयद्रव्याणामानन्त्येऽपि तुल्यं। तदानन्त्यस्य अतीतानागतापेक्षया स्वीकारात् । यदुक्तमुत्तराध्यने—
'एमेव संतइं पप्प' इति। तद्वृत्तौ वादिवेतालापरनामधेयाः श्रीशांतिसूरयोऽप्याहुः—'कालस्यानन्त्यमतीताना-
गतापेक्षया' इति। श्रीभगवतीवृत्तौ श्रीअभयदेवसूरयोऽपि—एको धर्मास्तिकायप्रदेशोऽद्धासमयैः स्पृष्टश्चेन्नियम्यमाद-
नन्तः अनादित्वादाद्धासमयानाम्' इति। मेघविजयगणि-युक्तिप्रबोध गा. २३ पृ. १८९।
३. मेघधविजयगणि योगशास्त्रमें वर्णन किये हुए काल द्रव्यके सिद्धांतसे श्वेताम्बर मान्यताका समन्वय करते हैं-

२९६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
एतेन योगशास्त्रावान्तरश्लोकेषु—"लोकाकाशप्रदेशस्था भिन्नाः कालाणवस्तु ये ।
शंका—समय रूप ही निश्चयकाल है, इसको छोड़कर कालाणु द्रव्यरूप कोई निश्चय काल नहीं देखा
जाता । समाधान—समय कालकी ही पर्याय है, क्योंकि वह उत्पन्न और नाश होनेवाला है। जो पर्याय
होता है, वह द्रव्यके बिना नहीं होता। जिस प्रकार घट रूप पर्यायका कारण मिट्टी है, उसी तरह समय,
मिनिट, घंटा आदि पर्यायोंके कारण कालाणु रूप निश्चय कालको मानना चाहिये। १
शंका—समय, मिनिट आदि पर्यायोंका कारण द्रव्य नहीं है, किन्तु समयकी उत्पत्तिमें मन्दगतिसे जाने
वाले पुद्गल-परमाणु ही समय आदिका कारण हैं। जिस प्रकार निमेषरूप काल पर्यायकी उत्पत्तिमें आंखोंके
पलकोंका खुलना और बन्द होना कारण है, इसी तरह दिनरूप पर्यायकी उत्पत्तिमें सूर्य कारण है ।
समाधान—हमेशा कारणके समान ही कार्य हुआ करता है । यदि आंखोंका खुलना और बन्द होना तथा
सूर्य आदि निमेष तथा दिन आदिके उपादान कारण होते, तो जिस प्रकार मिट्टीके बने हुए घड़ेमें मिट्टीके
रूप, रस आदि गुण आ जाते हैं, उसी तरह आंखोंका खुलना, बन्द होना आदि पुद्गल परमाणुओंके गुण
निमेष आदिमें आ जाने चाहिये। परन्तु निमेष आदिमें पुद्गलके गुण नहीं पाये जाते । इसलिये समय
आदिका कारण निश्चयकालको मानना चाहिये ।
शंका—यदि आप कालाणु द्रव्योंको लोकाकाशव्यापी मानकर उन्हें लोकाकाशके बाहर अलोका-
काशमें व्याप्त नहीं मानते, तो आकाश द्रव्यमें किस प्रकार परिवर्तन होता है ? समाधान—लोकाकाश और
अलोकाकाश दो अलग अलग द्रव्य नहीं हैं। वास्तवमें आकाश एक अखंड द्रव्य है, केवल उपचारसे लोकाकाश
और अलोकाकाशका व्यवहार होता है। अतएव जिस प्रकार एक स्पर्शन इंद्रियको विषयसुखका अनुभव
होनेसे वह अनुभव सम्पूर्ण शरीरमें होता है, उसी तरह कालाणु द्रव्यके लोकाकाशमें एक स्थानपर रहकर
सम्पूर्ण आकाशमें परिणमन होता है, इसलिये काल द्रव्यसे आलोकाकाशमें भी परिणमन सिद्ध होता है । २
शंका—कालद्रव्य धर्म, अधर्म आदि द्रव्योंकी तरह निरवयव अखंड क्यों नहीं ? कालद्रव्यको अणु रूप
क्यों माना है ? समाधान—काल दो प्रकारका है—व्यवहार और मुख्य । मुख्यकाल अनेक हैं, कारण कि
आकाशके प्रत्येक प्रदेशोंमें व्यवहारकाल भिन्न भिन्न रूपसे होता है। यदि व्यवहारकालको आकाशके प्रत्येक
भावानां परिवर्तय मुख्यः कालः स उच्यते ॥
ज्योतिःशास्त्रे यस्य मानमुच्यते समयादिकम् ।
स व्यावहारिकः कालः कालवेदिभिरादृतः ॥
नवजीर्णादिभेदेन यदमी भुवनोदरे ।
पदार्थाः परिवर्तन्ते तत्कालस्यैव चेष्टितम् ॥
वर्तमाना अतीतत्वं भाविनो वर्तमानतां ।
पदार्थाः प्रतिपद्यन्ते कालक्रीडाविडम्बिताः ॥”
इत्यादिना कालाणवः परस्परं विविक्ताः प्रतिपादितास्ते पर्यायरूपा इत्युक्तं । न तु तेषां द्रव्यरूपत्वं । अनंत-
समयस्वरूपत्वेन तद्विशेषणस्य सूत्रणात् । आगमेऽपि अनंतद्रव्यत्वेन कथनाच्च । यद्यनंतसमयाः द्रव्यसमया इत्यर्थः
तदा व्याहृतिः स्पष्टैव, कालाणूनां द्रव्यत्वे तेषामसंख्यातत्वात् । युक्तिप्रबोध गा. २३ पृ. १९५; द्रव्यानुयोगत-
र्कणा ११-१५।
१. द्रव्यतस्तु लोकाकाशप्रदेशपरिमाणकोऽसंख्येय एव कालो मुनिभिः प्रो