स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) २८५
श्लो. १ पृ. ६ पं. ६ : अतिशय—
सहज अतिशय, कर्मक्षयज अतिशय और देवकृत अतिशय—ये भगवान्के तीन मूल अतिशय माने
गये हैं। इन तीन अतिशयोंके उत्तरभेद मिलाकर अतिशयोंके कुल चौंतीस¹ भेद होते हैं। श्वेताम्बर मान्यता-
के अनुसार सहज अतिशयके चार, कर्मक्षयज अतिशयके ग्यारह, और देवकृत अतिशयके उन्नीस भेद स्वीकार
किये गये हैं—
सहज अतिशय कर्मक्षयज अतिशय देवकृत अतिशय
१ सुन्दर रूपवाला, सुगन्धित, १ योजन मात्र समवशरणमें कोडा- १ आकाशमें धर्मचक्रका होना ।
नीरोग, पसीना और मल कोडि मनुष्य, देव और तिर्यंचों- २ आकाशमें चमरोंका होना ।
रहित शरीर । का समा जाना । ३ आकाशमें पादपीठ सहित
२ कमलके समान सुगन्धित २ एक योजन तक फैलनेवाली उज्ज्वल सिंहासन ।
श्वासोच्छ्वास । भगवान्की अर्धमागधी वाणीका ४ आकाशमें तीन छत्र ।
३ गौके दूधके समान स्वच्छ और मनुष्य, तिर्यञ्च और देवताओं- ५ आकाशमें रत्नमय धर्मध्वज ।
दुर्गन्ध रहित मांस और रुधिर। द्वारा अपनी-अपनी भाषामें ६ सुवर्ण-कमलोंपर चलना ।
४ चर्मचक्षुओंसे आहार और समझ लेना । ७ समवशरणमें रत्न, सुवर्ण और
नीहारका न दिखना । ३ सूर्यप्रभासे भी तेज सिरके पीछे चाँदीके तीन परकोट ।
भामंडलका होना । ८ चतुर्मुख उपदेश ।
४ सौ योजन तक रोगका न ९ चैत्य अशोक वृक्ष ।
रहना । १० कण्टकोंका अधोमुख होना ।
५ वैरका न रहना । ११ वृक्षोंका झुकना ।
६ ईति अर्थात् धान्य आदिको नाश १२ दुन्दुभि बजना ।
करनेवाले चूहों आदिका अभाव । १३ अनुकूल वायु ।
७ महामारी आदिका न होना । १४ पक्षियोंका प्रदक्षिणा देना ।
८ अतिवृष्टि न होना । १५ गंधोदककी वृष्टि ।
९ अनावृष्टि न होना । १६ पांच वर्णोंके पुष्पोंकी वृष्टि ।
१० दुर्भिक्ष न पड़ना । १७ नख और केशोंका नहीं बढ़ना ।
११ स्वचक्र और परचक्रका भय न १८ कमसे कम एक कोटि देवोंका
होना । पासमें रहना ।
१९ ऋतुओंका अनुकूल होना ।
दिगम्बर मान्यताके अनुसार दस सहज अतिशय, दस कर्मक्षयज अतिशय और चौदह देवकृत अतिशय
माने गये हैं। अतिशयोंकी मान्यतामें दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके अनुसार पाठभेद पाया
जाता है ।
जैनेतर ग्रन्थोंमें भी इस प्रकारके विचार मिलते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद्में² लघुता, आरोग्य,
स्थिरता, वर्णप्रसाद, स्वरकी सुन्दरता, शुभ गन्ध तथा मूत्र और मलका अल्प मात्रामें होना, यह
१. समवायांग सूत्र और कुन्दकुन्दके नियमसारमें चौंतीस अतिशयोंके नाम आते हैं। तथा देखिये जगदीश-
चन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० ३४३ आदि ।
२. श्वेताश्वतर उ० २-१३ ।