स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोगव्यवच्छेदिका २७७
अर्थ—हे वीर ! केवल श्रद्धाके कारण न आपके प्रति हमारा कोई पक्षपात है, और न द्वेषके कारण
अन्य देवताओंमें अविश्वास, किन्तु यथार्थ रीतिसे आपकी परीक्षा करके ही हमने आपका आश्रय
ग्रहण किया है ।
भगवान्की वाणीकी महत्ता—
तमःस्पृशामप्रतिभासभाजं भवन्तमप्याशु विविन्दते याः ।
महेम चन्द्रांशुदृशावदातास्तास्तर्कपुण्या जगदीश वाचः¹॥३०॥
अर्थ—हे जगदीश ! जो वाणी अज्ञान-अंधकारमें फिरनेवाले पुरुषोंके अगोचर ऐसे आपको प्रगट
करती है, उस चन्द्रमाकी किरणोंके समान स्वच्छ और तर्कसे पवित्र आपकी वाणीकी हम पूजा करते हैं ।
भगवान्के वीतराग गुणकी सर्वोत्कृष्टता—
यत्र तत्र समये यथा तथा योऽसि सोऽस्यभिधया यया तया ।
वीतदोषकलुषः स चेद्भवानेक एव भगवन्नमोस्तु ते ॥३१॥
अर्थ—भगवन् ! जिस किसी शास्त्रमें, जिस किसी रूपमें, और जिस किसी नामसे जिस वीतराग-
देवका वर्णन किया गया है, वह आप एक ही हैं, अतएव आपको नमस्कार है !
उपसंहार—
इदं श्रद्धामात्रं तदथ परनिन्दां मृदुधियो
विगाहन्तां हन्त प्रकृतिपरवादव्यसनिनः ।
अरक्तद्विष्टानां जिनवर परीक्षाक्षमधिया-
मयं तत्त्वालोकः स्तुतिमयमुपाधिं² विधृतवान् ॥३२॥
अर्थ—कोमल बुद्धिवाले पुरुष इस स्तोत्रको श्रद्धासे बनाया हुआ समझें, वादशील पुरुष इसे
परनिन्दा करनेके लिये रचा हुआ मानें, परन्तु हे जिनवर ! परीक्षा करनेमें समर्थ राग-द्वेषसे रहित
पुरुषोंको तत्त्वोंके प्रकाश करनेवाला यह स्तोत्र स्तुतिरूप धर्मके चिंतनमें कारण है ।
॥ समाप्त ॥
१. सत्त्वोपघातनिरनुग्रहराक्षसानि वक्तृप्रमाणरचितान्यहितानि पीत्वा ।
अद्वारकं जिन समस्तमसो विशन्ति येषां न भान्ति तव वाग्युतयो मनस्सु ॥
द्वा. द्वात्रिंशिका २. १७ ।
२. उपाधिर्धर्मचिन्तनम् । अभिधानचिन्तामणि ६. १७ ।