स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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जैन परिशिष्ट ( क )
अवतरणिका पृष्ठ २, पंक्ति ६ : दुःषमार—
पंचमकाल। जैन धर्मके अनुसार कालचक्र उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दो विभागोंमें विभक्त
है। उत्सर्पिणी कालमें जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी वृद्धि होती है। अवसर्पिणी कालमें
जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी हानि होती है। उत्सर्पिणीके छह भेद—१ दुःषमदुःषमा,
२ दुःषमा, ३ दुःषमसुषमा, ४ सुषमदुःषमा, ५ सुषमा, ६ सुषमसुषमा। अवसर्पिणीके छह भेद—१ सुषम-
सुषमा, २ सुषमा, ३ सुषमदुःषमा, ४ दुःषमसुषमा, ५ दुःषमा, ६ दुःषमदुःषमा।
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी-कालचक्र
| अवसर्पिणी कालके छह आरे | स्थिति | जीवोंकी आयु | शरीरकी ऊँचाई | वर्ण | आहारका अंतर |
|---|---|---|---|---|---|
| १ सुषमसुषमा | ४ कोडाकोडी सागर | ३ पल्यसे २ पल्य | ३ कोशसे २ कोश | सूर्यके समान | आठ वेला ( ३ दिन ) |
| २ सुषमा | ३ कोडाकोडी सागर | २ पल्यसे १ पल्य | २ कोशसे १ कोश | चन्द्रमाके समान | छह वेला |
| ३ सुषमदुःषमा | २ कोडाकोडि सागर | १ पल्यसे कोटी पूर्व वर्ष | १ कोशसे ५०० धनुष | प्रियंगु | चार वेला |
| ४ दुःषमसुषमा | ४२००० वर्ष कम १ कोडा-कोडि सागर | कोटी पूर्व वर्षसे १२० वर्ष | ५०० धनुषसे ७ हाथ | पांचों वर्ण | प्रतिदिन एक बार |
| ५ दुःषमा | २१००० वर्ष | १२० वर्षसे २० वर्ष | ७ हाथसे २ हाथ | रूक्ष | अनेक वार |
| ६ दुःषमदुःषमा | २१००० वर्ष | २० वर्षसे १५ वर्ष | २ हाथसे १ हाथ | श्याम | बार बार |
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