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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 458 में से

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पृष्ठ 333

जैन परिशिष्ट ( क )
अवतरणिका पृष्ठ २, पंक्ति ६ : दुःषमार—
पंचमकाल। जैन धर्मके अनुसार कालचक्र उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दो विभागोंमें विभक्त
है। उत्सर्पिणी कालमें जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी वृद्धि होती है। अवसर्पिणी कालमें
जीवोंके शरीरकी ऊँचाई, आयु और शरीरके बलकी हानि होती है। उत्सर्पिणीके छह भेद—१ दुःषमदुःषमा,
२ दुःषमा, ३ दुःषमसुषमा, ४ सुषमदुःषमा, ५ सुषमा, ६ सुषमसुषमा। अवसर्पिणीके छह भेद—१ सुषम-
सुषमा, २ सुषमा, ३ सुषमदुःषमा, ४ दुःषमसुषमा, ५ दुःषमा, ६ दुःषमदुःषमा।
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी-कालचक्र

अवसर्पिणी कालके छह आरेस्थितिजीवोंकी आयुशरीरकी ऊँचाईवर्णआहारका अंतर
१ सुषमसुषमा४ कोडाकोडी सागर३ पल्यसे २ पल्य३ कोशसे २ कोशसूर्यके समानआठ वेला ( ३ दिन )
२ सुषमा३ कोडाकोडी सागर२ पल्यसे १ पल्य२ कोशसे १ कोशचन्द्रमाके समानछह वेला
३ सुषमदुःषमा२ कोडाकोडि सागर१ पल्यसे कोटी पूर्व वर्ष१ कोशसे ५०० धनुषप्रियंगुचार वेला
४ दुःषमसुषमा४२००० वर्ष कम १ कोडा-कोडि सागरकोटी पूर्व वर्षसे १२० वर्ष५०० धनुषसे ७ हाथपांचों वर्णप्रतिदिन एक बार
५ दुःषमा२१००० वर्ष१२० वर्षसे २० वर्ष७ हाथसे २ हाथरूक्षअनेक वार
६ दुःषमदुःषमा२१००० वर्ष२० वर्षसे १५ वर्ष२ हाथसे १ हाथश्यामबार बार

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