स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
२३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
उदाहरण—चंद्रकान्तमणि रूप दाहके प्रतिबंधका सद्भाव होनेपर अग्निसे पदार्थमें दहन क्रिया उत्पन्न नहीं
होती इसलिये चंद्रकांतमणि और पदार्थगत अग्निजन्य दहनक्रियामें प्रतिबध्य-प्रतिबंधक भावरूप विरोधका
होना युक्त है । जिस प्रकार चंद्रकांतमणिके अस्तित्वकालमें पदार्थगत अग्निजन्य दहनक्रियाका प्रतिबंध होता
है, उसी प्रकार पदार्थके स्वरूपसे अस्तिरूप होनेके कालमें पररूपसे नास्तिरूप होनेमें प्रतिबंध नहीं होता ।
क्योंकि स्वरूपसे अस्तित्वकालमें भी पररूप आदिसे नास्तित्व अनुभवसिद्ध .है । एक पदार्थमें अस्तित्व धर्म
और नास्तित्व धर्म नहीं रहते इसकी सिद्धि करते हुए शीत और उष्ण इन धर्मोंके एक पदार्थमें न रहनेका
जो दृष्टांत दिया है, वह ठीक नहीं है । क्योंकि एक धूपपात्र आदिमें अवच्छेदकके भेदसे शीत और उष्णका
उपलम्भ होनेसे शीत और उष्णमें विरोधकी सिद्धि नहीं होती । [ धूप जलानेसे गर्म बना हुआ धूपपात्र बर्फकी
दृष्टिसे गर्म होता है और प्रखर अग्निकी दृष्टिसे शीत होता है । अतः धूपपात्रमें एक साथ शीत धर्मकी और
उष्ण धर्मकी प्राप्ति होनेसे उन दोनों धर्मोंमें विरोध नहीं हो सकता । ] जिस प्रकार एक वृक्ष आदिमें
चलत्व और अचलत्वकी, एक घट आदिमें रक्तत्व और अरक्तत्वकी और एक शरीर आदिमें आवृतत्व और
अनावृतत्वकी उपलब्धि होनेसे, उन युगलधर्मोंमें विरोधका अभाव होता है, उसी प्रकार सत्त्व (अस्तित्व )
और असत्त्व ( नास्तित्व ) इन दोनों धर्मोंके एक पदार्थमें पाये जानेसे उनमें भी विरोधका अभाव होता है ।
( २ ) इस पूर्वोक्त युक्तिसिद्ध कथनसे सत्त्व धर्मके और असत्त्व धर्मके भिन्नाधिकरणत्वका—अर्थात् उनके
अधिकरण भिन्न भिन्न होते हैं, इस कथनका--परिहार हो गया; क्योंकि सत्त्व धर्म और असत्त्व धर्मकी
एकाधिकरणता अनुभवसे सिद्ध है । ( ३ ) जो अनवस्था नामक दोष स्याद्वादमें बताया गया है, वह दोष भी
अनेकान्तवादियोंके नहीं है । क्योंकि पदार्थका अनन्तधर्मात्मकत्व प्रमाणोंसे ज्ञात होनेके कारण, अनंतधर्मात्मक
पदार्थको स्वयं स्वीकार करनेसे अप्रामाणिक पदार्थपरंपराकी परिकल्पनाका अभाव होता है । कहनेका
अभिप्राय यह है : स्वरूपसे अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका पदार्थके साथ जब कथंचित्-
तादात्म्य है, तब अस्तित्व धर्म स्वरूपसे अस्तिरूप है और पररूपसे नास्तिरूप है । तथा पररूपसे नास्तित्व अपने
रूपसे अस्तिरूप है और पररूपसे नास्तिरूप हैं, यह कहनेकी, और ये दोनों स्वरूप भी स्वरूपसे अस्तिरूप
और पररूपसे नास्तिरूप हैं, यह कहनेकी आवश्यकता न होनेसे अप्रामाणिक पदार्थपरंपराकी परिकल्पना करनेकी
आवश्यकता नहीं है । (४) स्वरूपसे अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका एक पदार्थके साथ कथंचित्ता-
दात्म्यसंबंध होनेसे पदार्थका अस्तित्व जिस रूपसे होता है, उसी रूपसे नास्तित्वके होनेका, और नास्तित्व जिस
रूपसे होता है उसी रूपसे अस्तित्वके होनेका प्रसंग उपस्थित न होनेसे संकर दोष नहीं आता । ( ५ ) स्वरूपसे
अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका एक पदार्थके साथ कथंचित्तादात्म्यसंबंध होनेसे पदार्थका
अस्तित्व धर्म जिस रूपसे होता है उस रूपसे नास्तित्व ही होगा, अस्तित्व नहीं, और नास्तित्व धर्म जिस रूपसे
होता है उस रूपसे अस्तित्व ही होगा, नास्तित्व नहीं, इस प्रकारसे व्यतिरेक दोष नहीं आता । ( ६ ) स्वरूपसे
अस्तित्वका और पररूपसे नास्तित्वका एक ही पदार्थमें सद्भाव होनेके कारण वस्तु सदसदात्मक होनेसे पदार्थ
सद्रूप है या असद्रूप है ? इस प्रकार उभयकोटिक ज्ञानका अभाव होनेसे अनेकान्तवादमें संशय नामक दोष
भी नहीं आता । ( ७ ) संशयका अभाव होनेसे अर्थात् पदार्थ सदसदात्मक ही हैं इस प्रकारके निश्चयका
सद्भाव होनेसे अनिश्चयरूप अप्रतिपत्ति नामक दोष भी नहीं होता, और ( ८ ) अप्रतिपत्ति नामक दोषका
अभाव होनेसे अर्थात् वस्तुके सदसदात्मकत्वरूप स्वरूपके निश्चयके सद्भावसे अनेकांतवादमें वस्तुव्यवस्थाहानि
नामक दोष भी नहीं आता । जिस पदार्थकी अनुभवसे सिद्धि होती है उसके विषयमें कोई भी दोष नहीं
आता । जिस पदार्थकी सिद्धि अनुभवसे नहीं होती; उसमें दोष आते हैं । )१
एकान्तवादकी जातिसे स्याद्वादकी जाति भिन्न है, अतएव स्याद्वादमें इन दोषोंके लिये स्थान नहीं
है, अतः स्याद्वादके मर्मज्ञोंको उन उपपत्तियोंके द्वारा उन दोषोंको दूर कर देना चाहिये । क्योंकि स्वतन्त्र
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २५ ] स्याद्वादमञ्जरी २३१
अथानेकान्तवादस्य सर्वद्रव्यपर्यायव्यापित्वेऽपि मूलभेदापेक्षया चातुर्विध्याभिधानद्वारेण
भगवतस्तत्त्वामृतरसास्वादसौहित्यमुपवर्णयन्नाह—
स्यान्नाशि नित्यं सदृशं विरूपं वाच्यं न वाच्यं सदसत्तदेव ।
विपश्चितां नाथ निपीततत्त्वसुधोद्गतोद्गारपरम्परेयम् ॥२५॥
स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकमष्टास्वपि पदेषु योज्यम् । तदेव अधिकृतमेवैकं वस्तु
स्यात् कथञ्चिद् नाशि विनशनशीलमनित्यमित्यर्थः । स्यान्नित्यम् अविनाशिधर्मीत्यर्थः ।
एतावता नित्यानित्यलक्षणमेकं विधानम् । तथा स्यात् सदृशमनुवृत्तिहेतुसामान्यरूपम् । स्याद्
विरूपं विविधरूपम् विसदृशपरिणामात्मकं व्यावृत्तिहेतुविशेषरूपमित्यर्थः । अनेन सामान्य-
होनेके कारण निरपेक्ष विधिरूप सामान्य तथा प्रतिषेध रूप विशेषमें ही उन दोषोंको स्थान मिलता है । अथवा
‘विरोध’ शब्द यहाँ दोषका वाचक है । जैसे, विरुद्ध आचरण करता है; यहाँ ‘विरुद्ध’ शब्दका अर्थ ‘दुष्ट’ है ।
अतएव विरोधों—विरोध, वैयधिकरण्य आदि दोषों–से भयभीत, यह अर्थ करना चाहिये । इस प्रकार ‘विरोध’
इस सामान्य शब्दसे सभी दोषोंका ग्रहण हो जाता है । यह श्लोकका अर्थ है ॥ २४ ॥
भावार्थ—प्रत्येक वस्तुमें अनंत धर्म मौजूद हैं । प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा सत् रूप, और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा असत् रूप है । वस्तुके अस्तित्व और
नास्तित्व धर्मोंका एक साथ कथन नहीं कहा जा सकता, इसलिये प्रत्येक वस्तु किसी अपेक्षासे अवक्तव्य भी
है । किसी वस्तुमें अविरोध भावसे अस्तित्व और नास्तित्वकी कल्पना करनेको सप्तभंगी कहते हैं ( प्रश्नवशा-
देकस्मिन् वस्तुनि अविरोधेन विधिप्रतिषेधकल्पना सप्तभंगी¹ ) । वस्तुमें अस्तित्व और नास्तित्व परस्पर विरुद्ध
धर्मोंकी कल्पना किसी अपेक्षाको लेकर ही की जाती है । अतएव स्वद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित्
अस्ति है, और परद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित् नास्ति है । इसीलिये सप्तभंगीवादमें विरोध, वैयधि-
करण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति और अभाव नामक दोषोंके लिये कोई अवकाश नहीं
है । विरोध आदि दोषोंके निराकरण करनेसे शांकरभाष्य और सर्वदर्शनसंग्रहमें शंकर और माधव
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विरोध, संशय आदि दोषोंका भी परिहार हो जाता है । क्योंकि वस्तुमें अस्तित्व
और नास्तित्व धर्म भिन्न-भिन्न अपेक्षाओंको लेकर ही माने गये हैं । कारण कि जिस अपेक्षासे वस्तु अस्ति है,
उसी अपेक्षासे स्याद्वादियोंने वस्तुको नास्ति स्वीकार नहीं किया है ।
अनेकान्तवाद सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंमें रहता है, परन्तु मुख्य भेदोंकी अपेक्षा स्यात् नित्य, स्यात्
अनित्य; स्यात् सामान्य, स्यात् विशेष; स्यात् वाच्य, स्यात् अवाच्य; स्यात् सत्, स्यात् असत्के भेदसे
अनेकांतके चार भेद बताये गये हैं—
श्लोकार्थ—हे विद्वानोंके शिरोमणि ! अपने अनेकान्त रूपी अमृतको पीकर प्रत्येक वस्तुको कथंचित्
अनित्य, कथंचित् नित्य; कथंचित् सामान्य, कथंचित् विशेष; कथंचित् वाच्य, कथंचित् अवाच्य; कथंचित्
सत् और कथंचित् असत् प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—‘स्यात्’ शब्द अनेकांतका सूचक है । उसे नित्य, अनित्य आदि आठों वचनोंके साथ
लगाना चाहिये । ( १ ) प्रत्येक वस्तु विनाशी होनेके कारण कथंचित् अनित्य, और अविनाशो होनेके कारण
कथंचित् नित्य है । ( २ ) प्रत्येक वस्तु सामान्य रूप होनेसे कथंचित् सामान्य, और विशेष रूप होनेसे
कथंचित् विशेष है । ( ३ ) प्रत्येक पदार्थ वक्तव्य होनेसे कथंचित् वाच्य, और अवक्तव्य होनेसे कथंचित्
१ तत्त्वार्थराजवार्तिक पृ० २४ ।
२३२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २५
विशेषरूपो द्वितीयः प्रकारः । तथा स्याद् वाच्यं वक्तव्यम् । स्याद् न वाच्यमवक्तव्यमित्यर्थः ।
अत्र च समासेऽवाच्यमिति युक्तम्, तथाप्यवाच्यपदं योन्यादौ रूढ़मित्यसभ्यतापरिहारार्थं
न वाच्यमित्यसमस्तं चकार स्तुतिकारः । एतेनाभिलाप्यानभिलाप्यस्वरूपस्तृतीयो भेदः । तथा
स्यात्सद् विद्यमानमस्तिरूपमित्यर्थः । स्याद् असत् तद्विलक्षणमिति । अनेन सदसद्वाख्या
चतुर्थी विधा ॥
हे विपश्चितां नाथ संख्यावतां मुख्य इयमनन्तरोक्ता निपीततत्त्वसुधोद्गारपरम्परा ।
तवेति प्रकरणात् सामर्थ्याद्वा गम्यते । तत्त्वं यथावस्थितवस्तुस्वरूपपरिच्छेदः । तदेव जरा-
मरणापहारित्वाद् विबुधोपभोग्यत्वाद् मिथ्यात्वविषोर्मिनिराकरिष्णुत्वाद् आन्तराह्लाद-
कारित्वाच्च सुधा पीयूषं तत्त्वसुधा । नितरामनन्यसामान्यतया पीता आस्वादिता या तत्त्वसुधा
तस्या उद्गता प्रादुर्भूता तत्कारणिका उद्गारपरम्परा उद्गारश्रेणिरिवेत्यर्थः । यथा हि
कश्चिदाकण्ठं पीयूषरसमापीय तदनुविधायिनीमुद्गारपरम्परां मुञ्चति, तथा भगवानपि
जरामरणापहारि तत्त्वामृतं स्वैरमास्वाद्य तद्रसानुविधायिनीं प्रस्तुतानेकान्तवादभेदचतुष्टयी-
लक्षणा मुद्गारपरम्परां देशनामुखेनोद्गीर्णवानित्याशयः ॥
अथवा यैरेकान्तवादिभिर्मिथ्यात्वगरलभोजनमातृप्ति भक्षितं तेषां तत्तद्वचनरूपा
उद्गारप्रकाराः प्राक् प्रदर्शिताः । यैस्तु पचेलिमप्राचीनपुण्यप्राग्भारानुग्रहीतैर्जगद्गुरुवदनेन्दुनिः-
स्यन्दि तत्त्वामृतं मनोहृत्य पीतम्, तेषां विपश्चितां यथार्थवाद्विदुषां हे नाथ इयं पूर्वदल-
दर्शितोल्लेखशेखरा उद्गारपरम्परेति व्याख्येयम् । एते च चत्वारोऽपि वादास्तेषु तेषु स्थानेषु
प्रागेव चर्चिताः । तथाहि—'आद्योपमाम्योम समस्वभावम्' इति वृत्ते नित्यानित्यवादः
प्रदर्शितः । 'अनेकमेकात्मकमवेव वाच्यम्' इति काव्ये सामान्यविशेषवादः संसूचितः । सप्त-
भङ्ग्यामभिलाप्यवादः सदसद्वादश्च चर्चितः । इति न भूयः प्रयासः ॥ इति काव्यार्थः ॥ २५ ॥
अवाच्य है । लोकमें अवाच्य शब्द योनि आदिके अर्थ में प्रयुक्त होता है, अतएव स्तुतिकार हेमचन्द्र आचार्यने
श्लोकमें 'अवाच्य' शब्द न कह कर 'न वाच्यं' पद प्रयोग किया है । ( ४ ) तथा प्रत्येक पदार्थ अस्ति रूप
है, इसलिये कथंचित् 'सत्' नास्ति रूप है, इसलिये कथंचित् असत् है ।
हे विद्वानोंके शिरोमणि ! जिस प्रकार कोई मनुष्य अमृतका खूब पान करके पीछेसे बार बार डकार
लेता है, उसी प्रकार आपने जन्म और मरणके नाश करनेवाली, विद्वानोंके उपभोग्य, मिथ्यात्व-विषको
निर्विष करनेवाली, और आह्लाद उत्पन्न करनेवाली तत्त्व-सुधाका असाधारण रूपसे पान करके अनेकान्तवादके
चार मुख्य भेदोंकी उद्गारपरम्पराको उपदेशके द्वारा प्रगट किया है ।
अथवा, जिन एकान्तवादियोंने मिथ्यात्वरूपी विष-भोजनका खूब तृप्त होकर भक्षण किया है, उनके
वचनरूपी उद्गारोंका वर्णन कर चुके हैं । जिन पुण्यात्मा लोगोंने संसारके स्वामी आपके मुख-चन्द्रसे झरते
हुए अमृतका तृप्त होने तक पान किया है, उन यथार्थ वक्ता विद्वानोंके मुखसे अनेकान्तवादके चार मुख्य भेदोंकी
उद्गारपरम्परा प्रगट हुई है । इन चार वादोंमें 'आद्योपमाम्योम समस्वभावं' श्लोकमें नित्यानित्यवाद,
'अनेकमेकात्मकमवेव वाच्यम्' श्लोकमें सामान्य-विशेषवाद, तथा सप्तभंगीवादमें वाच्य-अवाच्य और सत्-असत्
वादका वर्णन किया गया है । यह श्लोकका अर्थ है ॥ २५ ॥
भावार्थ—स्याद्वादियोंके मतमें प्रत्येक वस्तु किसी अपेक्षासे नित्य-अनित्य, किसी अपेक्षासे वाच्य-
अवाच्य, और किसी अपेक्षासे सत्-असत् है । इन चारों वादोंका स्याद्वादमें समावेश हो जाता है । अतएव
प्रत्येक पदार्थको द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा नित्य, सामान्य, अवाच्य और सत्, तथा पर्यायार्थिक नयसे अनित्य,
विशेष, वाच्य और असत् मानना ही न्यायसंगत है । वस्तुमें एकान्त रूपसे नित्य, अनित्य आदि धर्मोंके
माननेसे विरोध आता है । अतएव प्रत्येक वस्तुको अनेकांतात्मक मानना चाहिये ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २६ ] स्याद्वादमञ्जरी २३३
इदानीं नित्यानित्यपक्षयोः परस्परदूषणप्रकाशनबद्धलक्षतया वैरायमाणयोरितरेतरोदी-
रितविविधहेतुहेतिसंनिपातसंजातविनिपातयोर्यत्नसिद्धप्रतिपक्षप्रतिक्षेपस्य सर्वोत्कर्षमाह—
य एव दोषाः किल नित्यवादे विनाशवादेऽपि समास्त एव ।
परस्परध्वंसिषु कण्टकेषु जयत्यधृष्यं जिनशासनं ते ॥ २६ ॥
किलेति निश्चये । य एव नित्यवादे नित्यैकान्तवादे दोषा अनित्यैकान्तवादिभिः
प्रसञ्जिताः क्रमयौगपद्याभ्यामर्थक्रियानुपपत्त्यादयः, त एव विनाशवादेऽपि क्षणिकैकान्तवादेऽपि
समाः तुल्याः, नित्यैकान्तवादिभिः प्रसज्यमाना अन्यूनाधिकाः ॥
तथाहि—नित्यवादी प्रमाणयति । सर्वं नित्यं सत्त्वात् । क्षणिके सदसत्कालयोरर्थ-
क्रियाविरोधात् तल्लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातोति ततो निवर्त मानमनन्यशरणतया नित्यत्वेऽ-
वतिष्ठते । तथाहि—क्षणिकोऽर्थः सन्वा कार्यं कुर्याद् असन्वा ? गत्यन्तराभावात् । न
तावदाद्यः पक्षः, समसमयवर्तिनि व्यापारायोगात् सकलभावानां परस्परं कार्यकारणभाव-
प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच्च । नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्यकारणशक्तिविकलत्वात् ;
अन्यथा शशविषाणादयोऽपि कार्यकरणायोत्सहेरन् , विशेषाभावात् इति ॥
अनित्यवादी नित्यवादिनं प्रति पुनरेवं प्रमाणयति । सर्वं क्षणिकं सत्त्वात् । अक्षणिके
एकान्त नित्य और एकान्त अनित्यवादके माननेवाले एक दूसरेके दोष दिखाकर परस्पर लड़ते हैं,
और एक दूसरेके सिद्धांतोंका खंडन करनेके लिये नाना प्रकारके हेतुरूपी शस्त्रोंके प्रहारसे गिर पड़ते हैं,
अतएव प्रयत्नके विना ही भगवान्के शासनकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है—
श्लोकार्थ—नित्य एकान्तवादमें जो दोष आते हैं, वे ही दोष अनित्य एकांतवादमें समान रूपसे
आते हैं। जब क्षुद्र शत्रु एक दूसरेका विध्वंस करनेमें लगे रहते हैं तब जिनेन्द्र भगवान्का अजेय शासन
विजयी होता है।
व्याख्यार्थ—यहाँ 'किल' शब्द निश्चय अर्थमें है। 'नित्यवादियोंके मतमें क्रमसे अथवा एक साथ
अर्थक्रिया नहीं हो सकती' इस प्रकार जो अनित्यवादियोंने एकान्त नित्य पक्षमें दूषण दिये थे, वे सब दोष
अनित्यवादियोंके पक्षमें भी आते हैं ।
नित्यवादी—'समस्त पदार्थ नित्य हैं, सद्रूप होनेसे ।' क्षणिक पदार्थोंकी भूत, भविष्य और वर्तमान
काल में कोई अर्थक्रिया नहीं हो सकती, क्योंकि अपने प्रयोजन ( कार्य ) की उत्पत्ति करनेमें विरोध उपस्थित
होनेसे, क्षणिक पदार्थ ( कार्यकी उत्पत्तिके लिये ) स्थिरत्वको—एक क्षणसे अधिक काल तककी स्थितिको—
धारण नहीं करता । अतः वह क्षणिकत्वसे निवृत्त होता हुआ, अन्य किसीकी शरण प्राप्ति न होनेसे नित्यत्वमें
आकर मिल जाता है । तथाहि—प्रश्न होता है कि क्षणिक पदार्थ अस्तिरूप होता हुआ अपना कार्य करता है
या अपना अभाव होनेपर अपना कार्य करता है ? 'क्षण मात्र रूप अपने अस्तित्व कालमें वह अपना कार्य
करता है', यह प्रथम पक्ष ठीक नहीं । क्योंकि जिस कालमें क्षणिक पदार्थ उत्पन्न होने जाता है', उसी कालमें
उत्पन्न होनेवाले कार्यकी उत्पत्तिके लिये क्षणिक पदार्थमें उत्पत्ति क्रियाका होना घटित नहीं होता; तथा
एक-एक कालमें होनेवाले पदार्थोंमें कार्यकारण भाव होनेसे, समकालवर्ती सभी पदार्थोंमें परस्पर कार्यकारण
भाव होनेका अतिप्रसंग उपस्थित हो जाता है । 'क्षणिक पदार्थका अभाव होनेपर वह पदार्थ अपना कार्य
करता है', यह दूसरा पक्ष भी खरा नहीं उतरता । क्योंकि जिसका सद्भाव नहीं होता उसमें अपना कार्य
करनेकी शक्तिका अभाव होता है । यदि ऐसी बात न हो तो शशविषाण आदि भी कार्य करनेके लिये
उत्साही हो जायेंगे क्योंकि असत् पदार्थ और शशविषाणमें भेद नहीं है ।
अनित्यवादी—( नित्य एकांतवादीका खंडन करते हुए ) 'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं; सद्रूप होनेसे ।'
३०
२३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २६
क्रमयौगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधाद् अर्थक्रियाकारित्वस्य च भावलक्षणत्वात्, ततोऽर्थक्रिया
व्यावर्तमाना स्वक्रोडीकृतां सत्तां व्यावर्तयेदिति क्षणिकसिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थक्रियां
क्रमेण प्रवर्तयितुमुत्सहते, पूर्वार्थक्रियाकरणस्वभावोपमर्द्दद्वारेणोत्तरक्रियायां क्रमेण प्रवृत्तेः,
अन्यथा पूर्वक्रियाकरणाविरामप्रसङ्गात् । तत्स्वभावप्रच्यवे च नित्यता प्रयाति, अतादवस्थ्य-
स्यानित्यता लक्षणत्वात् । अथ नित्योऽपि क्रमवर्तिनं सहकारिकारणमर्थमुदीक्षमाणस्तावदासीत्,
पश्चात् तमासाद्य क्रमेण कार्यं कुर्यादिति चेत्। न। सहकारिकारणस्य नित्येऽकिञ्चित्करस्यापि
प्रतीक्षणेऽनवस्थाप्रसङ्गात् । नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थक्रियाः कुरुते अध्यक्षविरोधात् । न
ह्येककालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिदुपलभ्यते। करोतु वा। तथाप्याद्यक्षण एव सकल-
क्रियापरिसमाप्तेर्द्वितीयादिक्षणेषु अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोरेकस्मिन्
विरोधाद् इति ॥
तदेवमेकान्तद्वयेऽपि ये हेतवस्ते युक्तिसाम्याद् विरुद्धं न व्यभिचरन्तीत्यविचारि-
तरमणीयतया मुग्धजनस्य ध्यान्ध्यं¹ चोत्पादयन्तीति विरुद्धा व्यभिचारिणोऽनैकान्तिका
अर्थक्रियाकारित्व (प्रयोजनभूतता) ही सत्का लक्षण है। पदार्थोंको अक्षणिक-कूटस्थ नित्य-माननेमें उनमें
क्रमसे अथवा एक साथ अर्थक्रिया होनेमें विरोध उपस्थित होनेसे; तथा अर्थक्रियाका कर्ता होना, पदार्थका
स्वरूप होनेसे, उस नित्य पदार्थसे पृथक् होनेवाली अर्थक्रिया अपने द्वारा व्याप्त नित्य पदार्थकी सत्ताको उस
पदार्थसे पृथक् कर देगी-अर्थक्रियाका पदार्थमें अभाव हो जानेसे पदार्थका अस्तित्व ही न रहेगा। इस प्रकार
क्षणिक पदार्थके-पदार्थके क्षणिकत्वके-अनित्यत्वकी सिद्धि होती है। नित्य पदार्थ अपनी अर्थक्रियाको
क्रमसे करनेमें समर्थ नहीं होता। क्योंकि पदार्थके प्रयोजनभूत पूर्वकालवर्ती कार्यको करनेके स्वभावके विनाश
द्वारा पदार्थके प्रयोजनभूत उत्तरकालवर्ती कार्यको उत्पन्न करनेकी क्रिया करनेकी पदार्थकी प्रवृत्ति होती है।
पूर्व कार्योत्पादन क्रिया करनेके स्वभावका यदि विनाश न किया गया तो पूर्वकालवर्ती कार्य करनेकी क्रियाका
अंत न होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। पूर्व कार्योत्पादन क्रिया करनेके स्वभावका नाश होनेपर पदार्थकी
नित्यता नष्ट हो जाती है, क्योंकि पदार्थकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंका क्रमसे अभाव होते रहना ही अनित्यताका
लक्षण है। यदि कहो कि 'पदार्थ नित्य होनेपर भी क्रमवर्ती सहकारिकारणभूत अर्थकी अपेक्षा करता हुआ
रहता है और बादमें उस सहकारिकारणभूत पदार्थको प्राप्त करके क्रमसे कार्य करता है'-तो यह कहना
भी ठीक नहीं। क्योंकि नित्य पदार्थके विषयमें-नित्य पदार्थको अपनी अर्थक्रिया करनेमें प्रवृत्त करनेके
विषयमें -सहकारिकारणभूत पदार्थकी अपेक्षा करने पर, वह सहकारिकारणभूत पदार्थ भी नित्य होनेसे
अकिंचित्कर होनेके कारण, उसे किंचित्कर बनानेके लिये, अन्य सहकारिकारणभूत पदार्थकी अपेक्षा करनी
होगी। इस प्रकार अन्य-अन्य सहकारिकारणभूत पदार्थोंकी अपेक्षा करनेसे अनवस्था नामक दोष
आता है। नित्य पदार्थ एक साथ (युगपत्) भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध आता है।
कारण कि अर्थक्रिया सदा क्रमसे होती है, कभी एक समयमें होती हुई नहीं देखी जाती। यदि सम्पूर्ण
अर्थक्रियाओंका एक क्षणमें होना स्वीकार करो तो सम्पूर्ण क्रियाओंके प्रथम क्षणमें समाप्त हो जानेसे द्वितीय
क्षण आदिमें न करनेवाली अनित्यता जबरन आकर उपस्थित हो जायेगी; क्योंकि क्रिया और अक्रिया दोनों
एक नित्य पदार्थमें नहीं रह सकते।
इस प्रकार उक्त दोनों पक्षोंमें नित्य और अनित्यवादको सिद्ध करनेके लिये जो 'सत्त्व' हेतु दिया गया है,
वह विरुद्ध हेतु है। इस प्रकारके हेतु, जब तक उनका विचार नहीं किया जाता, तभी तक सुन्दर मालूम होते हैं,
इसलिये ये हेतु भोले लोगोंकी बुद्धिमें जड़ता पैदा करनेवाले होनेसे अनैकान्तिक हेतु हैं। यहाँ नित्य और
१. धियः मान्द्यम् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २६ ] स्याद्वादमञ्जरी २३५
इति । अत्र च नित्यानित्यैकान्तपक्षप्रतिक्षेप एवोक्तः । उपलक्षणत्वाच्च सामान्यविशेषाद्येकान्त-
वादा अपि मिथस्तुल्यदोषतया विरुद्धा व्यभिचारिण एव हेतूनुपस्पृशन्तीति परिभावनीयम् ।।
अथोत्तराद्धं व्याख्यायते । परस्परेत्यादि । एवं च कण्टकेषु क्षुद्रशत्रुष्वेकान्तवादिषु
परस्परध्वंसिषु सत्सु परस्परस्मात् ध्वंसन्ते विनाशमुपयान्तीत्येवंशीलाः सुन्दोपसुन्दवदिति१
परस्परध्वंसिनः । तेषु हे जिन ते तव शासनं स्याद्वादप्ररूपणनिपुणं द्वादशाङ्गीरूपं प्रवचनं
पराभिभावुकानां कण्टकानां स्वयमुच्छिन्नत्वेनैवाभावाद् अधृष्यमपराभवनीयम् । "शक्तार्हे
कृत्याश्च२" इति कृत्यविधानाद् धर्षितुमशक्यम् धर्षितुमनर्हं वा । जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते ।
यथा कश्चिन्महाराजः पीवरपुण्यपरीपाकः परस्परं विगृह्य स्वयमेव क्षयमुपेयिवत्सु द्विषत्सु
अयत्नसिद्धनिष्कण्टकत्वं समृद्धं राज्यमुपभुञ्जानः सर्वोत्कृष्टो भवति एवं त्वच्छासनमपि ।।
इति काव्यार्थः ॥ २६ ॥
अनन्तरकाव्ये नित्यानित्याद्येकान्तवादे दोषसामान्यमभिहितम् । इदानीं कतिपय-
तद्विशेषान् नामग्राहं दर्शयंस्तत्प्ररूपकाणामसद्भूतोद्भावकतयोद्वृत्ततथाविधरिपुजनजनितोप-
अनित्य पक्षका ही खंडन किया गया है। सामान्य-विशेष, वाच्य-अवाच्य और सत्-असत् वादी भी परस्पर
एक जैसे दोष देते हैं, इसलिये इन एकान्तवादोंको भी विरुद्ध समझना चाहिये ।
एक दूसरेका नाश करनेवाले सुन्द और उपसुन्द नामके दो राक्षस भाइयोंके समान क्षुद्र शत्रु
एकान्तवादी रूप कण्टकोंका परस्पर नाश हो जानेपर स्याद्वादका प्ररूपण करनेवाला आपका द्वादशांग प्रवचन
किसीके द्वारा भी पराभूत नहीं किया जा सकता । (सुन्द और उपसुन्द नामके दो राक्षस भाई थे । उनको
ब्रह्माका वरदान था कि उनकी मृत्यु एक दूसरेके द्वारा होगी । इस वरदानसे मस्त होकर दोनों भाइयों ने
प्रजाको पीडा देना आरम्भ कर दिया । यह देखकर देवोंने स्वर्गसे तिलोत्तमाको भेजा । तिलोत्तमाको
देखकर दोनों भाई अपनी सुध भूलकर उसे अपनी स्त्री बनानेकी चेष्टा करने लगे । दोनोंमें परस्पर लड़ाई
हुई, और अन्तमें दोनों भाई एक दूसरेके हाथसे मारे गये ) । यहाँ "शक्तार्हे कृत्याश्च" सूत्रसे क्यप् प्रत्यय
होनेपर 'अधृष्य' का अर्थ होता है कि जिसका किसीसे पराभव न किया जा सके । जिस प्रकार कोई
पुण्यशाली महाराजा अपने शत्रुओंके परस्पर लड़कर मर जानेपर विना प्रयत्नके ही निष्कंटक राज्यका
उपभोग करता है, उसी प्रकार आपका शासन एकान्तवादियोंके परस्पर लड़कर नष्ट हो जानेपर विजयी
होता है ।। यह श्लोकका अर्थ है ॥२६॥
भावार्थ—जिस प्रकार कोई पुण्यशाली राजा अपनेशत्रुओंके आपसमें लड़कर नष्ट हो जानेपर
अखण्ड राज्यका उपभोग करता है, उसी तरह एकान्तवादी लोग एक दूसरेके सिद्धांतोंमें दोष देकर एक
दूसरेके मतोंका खण्डन कर देते हैं, इसलिये मिथ्यादर्शन रूप समस्त एकान्तवादोंका समन्वय करनेवाला जैन
शासन ही सर्वमान्य हो सकता है ।
ऊपरके श्लोकोंमें सामान्य रूपसे नित्य, अनित्य आदि एकान्तवादोंमें दोष दिखाये गये हैं । अब
एकान्तवादियोंके कुछ विशेष दोषोंका दिग्दर्शन कराते हैं । जिस प्रकार प्रजाको पीड़ित करनेवाले शत्रुओंसे
१. सुन्दोपसुन्दनामानौ राक्षसौ द्वौ भ्रातरौ ब्रह्मणः सकाशात् वरं लब्धवन्तौ यत् आवयोर्मृत्युः परस्परादस्तु
नान्यस्मात् । तथेत्युक्ते ब्रह्मणा मत्तौ तौ त्रिलोकीं पीडयामासतुः । अथ देवप्रेषितां तिलोत्तमामुपलभ्य
तदर्थं मिथो युध्यमानावम्रियताम् । एवमेकान्तवादिनः स्वतत्त्वसिद्धयर्थं परस्परं विवदमाना विनश्यन्ति ।
ततश्चानेकान्तवादो जयति ।
२. हैमसूत्रे ५-४-३५ ।
२३६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २७
एवमिव परित्रातुर्धरित्रीपतेस्त्रिजगत्पतेः पुरतो भुवनत्रयं प्रत्युपकारकारितामाविष्करोति—
नैकान्तवादे सुखदुःखभोगौ न पुण्यपापे न च बन्धमोक्षौ ।
दुर्नीतिवादव्यसनासिनैवं परैर्विलुप्तं जगदप्यशेषम् ॥ २७ ॥
एकान्तवादे नित्यानित्यैकान्तपक्षाभ्युपगमे न सुखदुःखभोगौ घटते । न च पुण्यपापे
घटेते । न च बन्धमोक्षौ घटेते । पुनः पुनर्नञः प्रयोगोऽत्यन्ताघटमानतादर्शनार्थः । तथाहि—
एकान्तनित्ये आत्मनि तावत् सुखदुःखभोगौ नोपपद्येते । नित्यस्य हि लक्षणम् अप्रच्युतानु-
त्पन्नस्थिरैकरूपत्वम् । ततो यदा आत्मा सुखमनुभूय स्वकारणकलापसामग्रीवशाद् दुःखमुप-
भुङ्क्ते, तदा स्वभावभेदाद् अनित्यत्वापत्त्या स्थिरैकरूपताहानिप्रसङ्गः । एवं दुःखमनुभूय
सुखमुपभुञ्जानस्यापि वक्तव्यम् । अथ अवस्थाभेदाद् अयं व्यवहारः । न चावस्थासु भिद्य-
मानास्वपि तद्वतो भेदः । सर्पस्येव कुण्डलार्जवाद्यवस्थासु इति चेत् । न । तास्ततो व्यतिरिक्ता
अव्यतिरिक्ता वा ? व्यतिरेके, तास्तस्येति संबन्धाभावः, अतिप्रसङ्गात् । अव्यतिरेके तु,
तद्भानेवेति तदवस्थितैव स्थिरैकरूपताहानिः । कथं च तदेकान्तैकरूपत्वेऽवस्थाभेदोऽपि
भवेदिति ॥
किंच, सुखदुःखभोगौ पुण्यपापनिर्वर्त्यौ। तन्निर्वर्तनं चार्थक्रिया । सा च कूटस्थनित्यस्य
प्रजाकी रक्षा करनेवाला राजा महान् उपकारक कहा जाता है, उसी प्रकार एकान्तवादियोंके उपद्रवसे तीनों
लोकोंकी रक्षा करनेवाले जिनेन्द्र भगवान् संसारके महान् उपकारक हैं—
श्लोकार्थ—एकान्तवादमें सुख-दुखका उपभोग, पुण्य-पाप, और बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था नहीं बन
सकती । इस प्रकार परतीर्थिक लोग नयाभासोंके द्वारा प्रतिपादित करनेवाले आग्रह रूप खड्गसे सम्पूर्ण
जगत्का नाश करते हैं ।
व्याख्यार्थ—( १ ) वस्तुको एकान्त नित्य माननेसे आत्मामें सुख और दुखकी उत्पत्ति नहीं हो
सकती । अप्रच्युत, अनुत्पन्न, स्थिर और एक रूपको नित्य कहते हैं । अतएव यदि आत्मा अपनी कारण
सामग्रीसे सुखको भोग कर दुखका उपभोग करने लगे, अथवा दुखका उपभोग करके सुखको भोगने लगे,
तो अपने नित्य और एक स्वभावको छोड़नेके कारण आत्मामें स्वभावभेद होनेसे आत्माको अनित्य मानना
पड़ेगा । शंका—वास्तवमें आत्माकी अवस्थाओंमें भेद होता है, स्वयं आत्मामें भेद नहीं होता । जिस प्रकार
सर्पकी सरल अथवा कुण्डलाकार अवस्थाओंमें भेद होनेसे सर्पमें भेद होना कहा जाता है, उसी प्रकार सुख
और दुख रूप आत्माकी अवस्थाओंमें भेद होनेसे यह भेद आत्माका कहा जाता है । समाधान—यह ठीक
नहीं । आप लोग आत्माकी अवस्थाको आत्मासे भिन्न मानते हैं, या अभिन्न ? यदि सुख-दुख अवस्थायें
आत्मासे भिन्न हैं, तो इन अवस्थाओं और आत्मामें कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि इन अवस्थाओंको
आत्मासे अभिन्न मानो, तो सुख-दुख अवस्थाओंको ही आत्मा मानना चाहिये । अतएव सुख-दुखका भोग
करते समय अपने नित्य स्वभावको छोड़नेके कारण आत्माको अनित्य मानना पड़ेगा । अतएव एकान्तवादमें
आत्माका अवस्था-भेद भी नहीं बन सकता ।
( २ ) पुण्य-पापसे होनेवाले सुख-दुख भी नित्य एकान्तवादमें नहीं बन सकते । सुखानुभव रूप
क्रियात्मक परिणाम पुण्य कर्मके निमित्तसे तथा दुःखानुभव रूप क्रियात्मक परिणाम पाप कर्मके निमित्तसे
उत्पादित किया जाता है । इन दोनों परिणामोंकी उत्पत्ति करना ही—इन दोनों परिणामोंके रूपसे परिणत
होना ही—क्रमबद्ध आत्माकी अर्थक्रिया है । यह पुण्य-पापसे होनेवाली अर्थक्रिया कूटस्थ नित्य आत्मामें नहीं
अन्य. यो. व्य. श्लोक २७ ] स्याद्वादमञ्जरी २३७
क्रमेण अक्रमेण वा नोपपद्यत इत्युक्तप्रायम् । अत एवोक्तं न पुण्यपापे इति । पुण्यं दानादि-
क्रियोपार्जनीयं शुभं च र्म, पापं हिंसादिक्रियासाध्यमशुभं कर्म । ते अपि न घटते, प्रागुक्तनीतेः ॥
तथा न बन्धमोक्षौ । बन्धः कर्मपुद्गलैः सह प्रतिप्रदेशमात्मनो वह्नययःपिण्डवद्
अन्योऽन्यसंश्लेषः । मोक्षः कृत्स्नकर्मक्षयः । तावप्येकान्तनित्ये न स्याताम् । बन्धो हि संयोग-
विशेषः । स च “अप्राप्तानां प्राप्तिः” इतिलक्षणः । प्राक्कालभाविनी अप्राप्तिरन्यावस्था, उत्तर-
कालभाविनी प्राप्तिश्चान्या । तदनयोरप्यवस्थाभेददोषो दुस्तरः । कथं चैकरूपत्वे सति
तस्याकस्मिको बन्धनसंयोगः । वन्धनसंयोगाच्च प्राक् किं नायं मुक्तोऽभवत् । किंच तेन
बन्धनेनासौ विकृतिमनुभवति न वा ? अनुभवति चेत्, चर्मादिवदनित्यः । नानुभवति चेत्,
निर्विकारत्वे सता असता वा तेन गगनस्येव न कोऽप्यस्य विशेष इति वन्धवैफल्याद् नित्यमुक्त
एव स्यात् । ततश्च विशीर्णा जगति वन्धमोक्षव्यवस्था । तथा च पठन्ति—
“वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः” ॥
बन्धानुपपत्तौ मोक्षस्याप्यनुपपत्तिर्वन्धनविच्छेदपर्यायत्वाद् मुक्तिशब्दस्येति ॥
एवमनित्यैकान्तवादेऽपि सुखदुःखाद्यनुपपत्तिः । अनित्यं हि अत्यन्तोच्छेदधर्मकम् ।
तथाभूते चात्मनि पुण्योपादानक्रियाकारिणो निरन्वयं विनष्टत्वात् कस्य नाम तत्फलभूत-
हो सकती । पदार्थोंके नित्य माननेमें उनमें क्रम-क्रमसे अथवा एक साथ अर्थक्रिया नहीं हो सकती, यह
पहले कहा जा चुका है । इसीलिये कहा है कि दान आदिसे होनेवाले शुभ कर्म रूप पुण्य, और हिंसा
आदिसे होनेवाले अशुभ कर्म रूप पाप—दोनों एकान्त नित्य पक्षमें नहीं बन सकते ।
( ३ ) अग्नि और लोहेकी तरह आत्माके प्रदेशोंके कर्म पुद्गलोंके साथ परस्पर सम्मिश्रण हो
जानेको बंध और सम्पूर्ण कर्मोंके क्षय हो जानेको मोक्ष कहते हैं । यह बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था भी एकान्त
नित्यवादमें नहीं बन सकती । संयोगविशेषको बन्ध कहते हैं । “अप्राप्त पदार्थोंकी प्राप्तिको” संयोग कहते हैं ।
यह संयोग एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थाको प्राप्त करनेमें ही संभव हो सकता है । अतएव नित्य
आत्मामें अवस्था भेद होनेसे बंध और मोक्ष नहीं बन सकते । तथा, एकान्त नित्य माननेपर उसके साथ
बंधक कर्मोंका बंध नहीं हो सकता । अतएव बंधक कर्मोंके साथ होनेवाले संयोगके पहले आत्माको मुक्त मानना
चाहिये । तथा बंधक कर्मके कारण आत्मामें कोई विकार होता है, या नहीं ? यदि बंध होनेसे आत्मामें
कोई विकार होता है, तो आत्माको चमड़ेकी तरह अनित्य मानना चाहिये । यदि बंध होनेपर भी आत्मा
अविकृत रहती है, तो निर्विकार आकाशकी तरह बंधके होने अथवा न होनेसे आत्मामें कोई भी विकार नहीं
आ सकता, अतएव बंधके निष्फल होनेके कारण आत्माको सदा मुक्त मानना चाहिये । अतएव सर्वथा
एकान्तवादमें बंध और मोक्षकी व्यवस्था नहीं बन सकती । कहा भी है—
“वर्षा और गरमीके कारण चमड़ेमें ही परिवर्तन होता है, आकाशमें कोई परिवर्तन नहीं देखा
जाता । अतएव यदि आत्मा चमड़ेके समान है, तो उसे अनित्य मानना चाहिये; यदि आत्मा आकाशकी
तरह है, तो उसमें बंध नहीं मानना चाहिये ।”
आत्माके बन्ध न होनेसे आत्माके मोक्ष भी नहीं हो सकता । क्योंकि बन्धनके नष्ट होनेको ही मोक्ष
कहते हैं ।
( १ ) एकान्त अनित्यवाद माननेसे भी सुख-दुख नहीं बन सकते । सर्वथा रूपसे नष्ट होनेको
अनित्य कहते हैं । अनित्य आत्मामें पुण्योपार्जन करनेवाली क्रिया करनेवाले आत्माका निरन्वय नाश होनेसे
२३८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २७
सुखानुभवः। एवं पापोपादानक्रियाकारिणोऽपि निरन्वयविनाशे कस्य दुःखसंवेदनमस्तु। एवं
चान्यः क्रियाकारी अन्यश्च तत्फलभोक्ता इति असमञ्जसमापद्यते।
अथ— “यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना।
फलं तत्रैव सन्धत्ते कर्पासे रक्तता यथा”॥
इति वचनाद् नासमञ्जसमित्यपि वाङ्मात्रम्, सन्तानवासनयोरवास्तवत्वेन प्रागेव निर्लोठि-
तत्वात्॥
तथा पुण्यपापे अपि न घटेते। तयोर्हि अर्थक्रिया सुखदुःखोपभोगः। तदनुपपत्तिश्चा-
नन्तरमेवोक्ता। ततोऽर्थक्रियाकारित्वाभावात् तयोरप्यघटमानत्वम्। किंचानित्यः क्षणमात्र-
स्थायी। तस्मिंश्च क्षणे उत्पत्तिमात्रव्यग्रत्वात् तस्य कुतः पुण्यपापोपादानक्रियार्जनम् ?
द्वितीयादिक्षणेषु चावस्थातुमेव न लभते। पुण्यपापोपादानक्रियाभावे च पुण्यपापे कुतः,
निर्मूलत्वात् ? तदसत्त्वे च कुतस्तनः सुखदुःखभोगः। आस्तां वा कथंचिदेतत्। तथापि पूर्व-
क्षणसदृशेनोत्तरक्षणेन भवितव्यम्, उपादानानुसूपत्वाद् उपादेयस्य। ततः पूर्वक्षणाद् दुःखितात्
उत्तरक्षणः कथं सुखित उत्पद्यते, कथं च सुखितात् ततः स दुःखितः स्यात्, विसदृश-
भागतापत्तेः ? एवं पुण्यपापादावपि। तस्माद्यत्किञ्चिदेतत्॥
फल रूप सुखका अनुभव, तथा पापोपार्जन करनेवाली क्रिया करनेवाले आत्माका निरन्वय विनाश होनेसे
दुखका अनुभव नहीं हो सकता। तथा पदार्थोंका निरन्वय विनाश माननेसे एकको कर्ता और दूसरेको भोक्ता
मानना पड़ेगा।
शंका—“जिस प्रकार कपासके बीजमें लाल रंग लगानेसे बीजका फल भी लाल रंगका होता है,
उसो तरह जिस संतानमें कर्मवासना रहती है, उसी सन्तानमें कर्मवासनाका फल रहता है।”
अतएव सन्तानके प्रवाह माननेसे काम चल जाता है, इस तरह आत्माके माननेकी आवश्यकता
नहीं रहती। समाधान—यह ठीक नहीं। सन्तान और वासना अवास्तविक हैं, यह हम ( १८ वें श्लोककी
व्याख्यामें ) प्रतिपादन कर चुके हैं।
(२) एकान्त अनित्यवादमें पुण्य-पाप भी नहीं बन सकते। सुख और दुखका भोग क्रमसे पुण्य
और पापकी अर्थक्रियायें हैं। यह पुण्य-पापकी अर्थक्रिया एकान्त क्षणिक पक्षमें नहीं बन सकती, यह हम
पहले कह आये हैं। अतएव क्षणिकवादमें अर्थक्रियाकारित्वके अभावमें पुण्य-पाप भी सिद्ध नहीं होते। तथा,
क्षणिकवादियोंके मतमें प्रत्येक पदार्थ केवल एक क्षणके लिये ठहरता है। इस क्षणमें पदार्थ अपनी उत्पत्तिमें
लगे रहते हैं, इसलिये 'पुण्य और पापको उपार्जन नहीं कर सकते। यदि दूसरे, तीसरे आदि क्षणमें पुण्य
और पापका उपार्जन स्वीकार करो, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि क्षणिकवादियोंके मतमें प्रथम क्षणके बाद
पदार्थोंका स्थित रहना ही संभव नहीं। अतएव, पुण्य कर्म और पाप कर्मके उपार्जन करनेकी शुभ और
अशुभ परिणति रूप क्रियाओंके अभावमें पुण्यरूप और पापरूप द्रव्यकर्मोंका सद्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि
शुभाशुभ परिणामरूप निमित्तोंका अभाव होता है, और पापरूप द्रव्यकर्मके अभावमें सुख-दुःखका अनुभव
कैसे हो सकता है? यदि किसी प्रकार क्षणिकवादियोंके मतमें सुख-दुखके अनुभवका सद्भाव मान भी लिया
जाय, फिर भी ( उनके मतमें पूर्वक्षण उत्तरक्षणका उपादान कारण होनेसे ) उत्तरक्षण उपादानभूत पूर्वक्षण-
के सदृश होना चाहिये, क्योंकि उपादेय-परिणाम-उपादान-परिणामी-के सदृश होता है। उपादेयके उपादानके
सदृश होनेसे दुखी आत्मरूप पूर्वक्षणसे सुखी आत्मरूप उत्तरक्षणकी, तथा सुखी आत्मरूप पूर्वक्षणसे दुखी
आत्मरूप उत्तरक्षणकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि उत्तरक्षणरूप परिणामका अपने उपादानसे
विसदृश होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २७ ] स्याद्वादमञ्जरी २३९
एवं बन्धमोक्षयोरप्यसंभवः । लोकेऽपि हि य एव बद्धः स एव मुच्यते । निरन्वय-
नाशाभ्युपगमे चैकाधिकरणत्वाभावात् सन्तानस्य चावास्तवत्वात् कुतस्तयोः संभावना-
मात्रमपि ? ॥
परिणामिनि चात्मनि स्वीक्रियमाणे सर्वं निर्वाधमुपपद्यते ।
“परिणामोऽवस्थान्तरगमनं न च सर्वथा ह्यवस्थानम् ।
न च सर्वथा विनाशः परिणामस्तद्विदादिष्टः ॥”
इति वचनात् । पातञ्जलटीकाकारोऽप्याह-“अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः
परिणामः¹” इति । एवं सामान्यविशेषसदसद्भिलाप्यानभिलाप्यैकान्तवादेष्वपि सुखदुःखाद्य-
भावः स्वयमभियुक्तैरभ्यूह्यः ॥
अथोत्तरार्द्धव्याख्या । एवमनुपपद्यमानेऽपि सुखदुःखभोगादिव्यवहारे परैः परतीर्थिकैरथ
च परमार्थतः
- hook at bottom?
Look at: १ in "१.": line going down with loop at top.
Look at: २ in "२.": round top, loop at bottom, horizontal baseline.
In L36:
It has round top, loop, stroke... wait, no!
Is it "१-६"?
Wait, look at the second digit:
It has a loop on the left and a tail on the right: looks like '६' or '३'?
Wait, the first digit has a vertical-ish stroke with curve at left: that's '१'!
Wait, look at "२-३" vs "१-६":
Wait, does it say: १-६ ?
Wait, Tattvartha Sutra chapter 1, sutra 6 is "प्रमाणनयैरधिगमः"!
"सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः" (1.1)
"तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्" (1.2)
"तन्निसर्गादधिगमाद्वा" (1.3)
"जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्" (1.4)
"नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः" (1.5)
"प्रमाणनयैरधिगमः" (1.6)!
Indeed! Sutra 1.6 is universally "प्रमाणनयैरधि
of the line:
No, wait, let's look at L11:
स्यात्स्रदिति - wait, look at L11 again:
अ ला ञ्छि त त्वा त् ।
स् या त् स्र दि ति
Wait, is that स्र?
Look at स्र in सहस्र... wait, in Sanskrit, स्यात्सद् + इति is स्यात्सद् इति.
In Hindi translation, L30:
( ३ ) वस्तुके नाना दृष्टियोंकी अपेक्षा कथंचित् सत् रूप विवेचन करनेको प्रमाण कहते हैं
And in Hindi L28:
नयमें 'स्यात्' शब्दका प्रयोग न होनेसे इसे प्रमाण भी नहीं कह सकते।
Wait, why not just transcribe स्यात्स्रदिति if that's what's printed, or स्यात्सदिति?
Wait, is it possible that it's स्यात्सदिति and the diagonal line is just part of how the font renders त्स?
Wait! Let's check other occurrences of त्स!
Occurrence 1: L4: स्यात्सद् - wait, look at त्स in स्यात्सद् in L4:
Does it have that diagonal line?
२४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
वस्थितवस्तुदर्शी । तीर्थान्तरशास्तारस्तु रागादिदोषकालुष्यकलङ्कितत्वेन तथाविधज्ञानाभावाद्
न यथार्थदर्शिनः । ततः कथं नाम दुर्नयपथमथने प्रगल्भन्ते ते तपस्विनः । न हि स्वयमनयप्रवृत्तः
परेषामनयं निषेद्धुमुद्धरतां धत्ते । इदमुक्तं भवति । यथा कश्चित् सन्मार्गवेदी परोपकार-
दुर्ललितः पुरुषश्चौरश्वापादकण्टकाद्याकीर्णं मार्गं परित्यज्य पथिकानां गुणदोषोभयविकलं
दोषास्पृष्टं गुणयुक्तं च मार्गमुपदर्शयति, एवं जगन्नाथोऽपि दुर्नयतिरस्करणेन भव्येभ्यो नय-
प्रमाणमार्गं प्ररूपयतीति । आस्थः इति अस्यतेरद्यतन्यां “शास्त्यसूवक्तिख्यातेरङ्” इत्याङि
“श्वयत्यसूवचपतः श्वास्थवोचपप्तम्” इति अस्थादेशे “स्वरादेस्तासु” इति वृद्धौ रूपम् ॥
मुख्यवृत्त्या च प्रमाणस्यैव प्रामाण्यम् । अत्र नयानां प्रमाणतुल्यकक्षताख्यापनं तत्
तेषामनुयोगद्वारभूततया प्रज्ञापनाङ्गत्वाज्ञापनार्थम् । चत्वारि हि प्रवचनानुयोगमहानगरस्य
द्वाराणि उपक्रमः निक्षेपः अनुगमः नयश्चेति । एतेषां च स्वरूपमावश्यकभाष्योदैर्निरूपणीयम् ।
इह तु नोच्यते ग्रन्थगौरवभयात् । अत्र चैकत्र कृतसमासान्तः पथिन्शब्दः । अन्यत्र चाव्युत्पन्नः
पथशब्दोऽदन्त इति पथशब्दस्य द्विःप्रयोगो न दुष्यति ॥
अथ दुर्नयनयप्रमाणस्वरूपं किञ्चिन्निरूप्यते । तत्रापि प्रथमं नयस्वरूपं । तदनधिगमे
दुर्नयस्वरूपस्य दुष्परिज्ञानत्वात् । अत्र च आचार्येण प्रथमं दुर्नयनिर्देशो यथोत्तरं प्राधान्याव-
बोधनार्थः कृतः । तत्र प्रमाणप्रतिपन्नार्थैकदेशपरामर्शी नयः । अनन्तधर्माध्यासितं वस्तु स्वाभि-
पड़े हुए हैं, वे दूसरोंको अनीतिसे नहीं निकाल सकते । अतएव जिस प्रकार यथार्थ मार्गका जाननेवाला कोई
परोपकारी पुरुष पथिकोंको कुमार्गसे बचानेकी इच्छासे चोर, व्याघ्र, कण्टक आदिसे आकीर्ण मार्गसे छुड़ा कर
उन्हें निर्दोष ठीक-ठीक मार्गका प्रदर्शन करता है, इसी प्रकार त्रिलोकके स्वामी अरहंत भगवान् भी भव्योंके
लिए नय और प्रमाणका उपदेश देते हैं । श्लोकमें ‘आस्थः’ पद निराकरण करने के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ।
अस् धातुसे अद्यतन ( लुङ् लकार ) में “शास्त्यसूवक्तिख्यातेरङ्” सूत्रसे अङ् प्रत्यय होकर “श्वयत्यसूवचपतः
श्वास्थवोचपप्तम्” सूत्रसे अस्के स्थानमें अस्थ्य आदेश होकर “स्वरादेस्तासु” सूत्रसे ‘अ’ के स्थानमें वृद्धि होकर
‘आस्थः’ रूप बनता है ।
वास्तवमें केवल प्रमाणको ही सत्य कहा जा सकता है । नयोंसे वस्तुके सम्पूर्ण अंशोंका ज्ञान नहीं
होता, इसलिये नयको सत्य नहीं कह सकते । अनुयोगद्वारसे प्रज्ञापना तक पहुँचनेके लिये नय अनु-
योगके द्वार हैं, इसलिये नयोंको प्रमाणके समान कहा गया है। उपक्रम, निक्षेप, अनुगम और नय ये चार
अनुयोग-महानगरमें पहुँचनेके दरवाजे हैं । इनका स्वरूप विशेषावश्यकभाष्य ( गाथा ९११-४; १५०५के
आगे ) आदि ग्रन्थोंसे जानना चाहिये । यहाँ ग्रन्थके बढ़ जानेके भयसे सबका स्वरूप नहीं लिखा जाता ।
एक जगह श्लोकमें ‘पथिन्’ शब्द समासान्त है, और दूसरी जगह अव्युत्पन्न अकारांत है, इसलिये ‘पथ’
शब्दका दो बार प्रयोग करनेमें दोष नहीं है ।
दुर्नय, नय और प्रमाणमेंसे पहले नयका स्वरूप कहा जाता है। क्योंकि नयको बिना जाने दुर्नयका ज्ञान
नहीं हो सकता । प्रमाणसे निश्चित किये हुए पदार्थोंके एक अंश ज्ञान करनेको नय कहते हैं । प्रत्येक वस्तुमें
अनन्त धर्म पाये जाते हैं, इन अनन्त धर्मोंमें अपने इष्ट धर्मको जाननेको नय कहते हैं । वस्तुका प्रमाण द्वारा
१. हैमसूत्रे ३-४-६० ।
२. हैमसूत्रे ४-३-१०३ ।
३. हैमसूत्रे ४-४-३१ ।
४. अणुओगदाराइं महापुरस्सेव तस्स चत्तारि ।
५. विशेषावश्यकभाष्ये ९११, ९१२, ९१३, ९१४, १५०५ ततः परम् ।
प्रेतैकधर्मविशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनकोटिमारोहयति इति नयः । प्रमाणप्रवृत्तेरुत्तरकाल-
भावी परामर्श इत्यर्थः । नयाश्चानन्ताः, अनन्तधर्मत्वात् वस्तुनः तदेकधर्मपर्यवसितानां वक्तुर-
भिप्रायणां च नयत्वात् । तथा च वृद्धाः—"जाइआ वयणपहा तावइया चेव हुंति नय-
वाया" इति । तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्वसंग्राहिसप्ताभिप्रायपरिकल्पनाद्वारेण सप्त नयाः
प्रतिपादिताः । तद्यथा—नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता इति । कथमेषां सर्व-
संग्राहकत्वमिति चेत् । उच्यते । अभिप्रायास्तावद् अर्थद्वारेण शब्दद्वारेण वा प्रवर्तंते, गत्यन्तरा-
भावात् । तत्र ये केचनार्थनिरूपणप्रवणाः प्रमात्रभिप्रायास्ते सर्वेऽपि आद्ये नयचतुष्टयेऽन्तर्भव-
न्ति । ये च शब्दविचारचतुरास्ते शब्दादिनयत्रये इति ॥
तत्र नैगमः सत्तालक्षणं महासामान्यम्, अवान्तरसामान्यानि च द्रव्यत्वगुणत्वकर्म-
त्वादीनि, तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारणरूपलक्षणान्, अवान्तरविशेषांश्चापेक्षया
पररूपव्यावर्त्तनक्षमान् सामान्यान् अत्यन्तविनिर्लुंठितस्वरूपानभिप्रैति । इदं च स्वतन्त्रसामा-
न्यविशेषवादे क्षुण्णमिति न पृथक्प्रयत्नः प्रवचनप्रसिद्धनिलयनप्रस्थदृष्टान्तद्वयैर्गम्यश्चायम् ।
निश्चय होनेपर उसका नयसे ज्ञान होता है । वस्तुओंमें अनन्त धर्म होते हैं, अतएव नय भी अनन्त होते हैं।
वस्तुके अनन्त धर्मोंमेंसे वक्ताके अभिप्रायके अनुसार एक धर्मके कथन करनेको नय कहते हैं। वृद्धोंने कहा भी
है—"जितनेप्रकारसे वचन बोले जा सकते हैं, उतने ही नय होते हैं।" फिर भी पूर्व आचार्योंने सबका संग्रह
करनेवाले सात वचनोंकी कल्पना करके नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत
इन सात नयोंका ही प्रतिपादन किया है । अर्थ अथवा शब्दसे अपने अभिप्राय प्रगट किये जा सकते हैं।
नैगम, संग्रह, व्यवहार ऋजुसूत्र ये चार अर्थका निरूपण करते हैं, इसलिये अर्थनय कहे जाते हैं, तथा
शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नय शब्दका प्ररूपण करते हैं, इसलिये शब्दनय कहे जाते हैं, अतएव ये सात
नय सर्वसंग्राहक हैं।
( १ ) नैगम नय सत्तारूप महा सामान्यको; द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्व रूप अवान्तर सामान्यको; असा-
धारण रूप विशेषको; तथा पररूपसे व्यावृत्त और सामान्यसे भिन्न अवान्तर विशेषोंको जानता है। यह
नय सामान्य-विशेषको ग्रहण करता है। नैगम नयका स्वरूप ( चौदहवें श्लोकमें ) सामान्य-विशेषका निरूपण
करते समय बताया गया है, अतएव यहाँ अलग नहीं लिखा जाता । निलयन और प्रस्थ ये नैगम नयके
दृष्टांत शास्त्रोंमें प्रसिद्ध हैं। ( निलयन शब्दका अर्थ निवास स्थान होता है। जैसे किसीने किसीसे पूछा,
'आप कहाँ रहते हैं।' उसने जवाब दिया, कि 'मैं लोकमें रहता हूँ।' लोकमें भी जम्बूद्वीप—भरतक्षेत्र—
मध्यखण्ड—अमुक देश—अमुक नगर—अमुक घरमें रहता हूँ। नैगम नय इन सब विकल्पोंको जानता है ।
दूसरा दृष्टांत प्रस्थका है। धान्यको मापनेके पांच सेरके परिमाणको प्रस्थ कहते हैं। किसीने किसी आदमीको
कुठार ले कर जंगलमें जाते हुए देखकर पूछा, 'आप कहाँ जाते हैं?' उस आदमीने जवाब दिया, कि 'मैं
प्रस्थ लेने जाता हूँ।' ये दोनों नैगम नयके उदाहरण हैं। )
१. छाया-यावन्तो वचनपथास्तावन्त एव भवन्ति नयवादाः । सन्मतितर्कप्रकरणे ३-४७ ।
२. तत्र निलयनं वसनमित्यनर्थान्तरम् । तद्दृष्टान्तो यथा—कश्चित् केनचित् पृष्टः क्व वसति भवान् ? स
प्राह—लोके । तत्रापि जम्बूद्वीपे, तत्रापि भरतक्षेत्रे, तत्रापि मध्यखण्डे, तत्राप्येकस्मिन् जनपदे नगरे गृहे
इत्यादीन् सर्वानपि विकल्पान् नैगम इच्छति ॥ प्रस्थको धान्यमानविशेषः । तद्दृष्टान्तो यथा—तद्योग्यं काष्ठं
वृक्षावस्थायामपि तदनुकीर्तिकं स्कन्धे कृतं गृह्मानीतमित्यादि सर्वास्वप्यवस्थासु नैगमः प्रस्थकमिच्छति ।
हरिभद्रीयावश्यकटिप्पणे नयाधिकारः ।
२४४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
संग्रहस्तु अशेषविशेषतिरोधानद्वारेण सामान्यरूपतया विश्वमुपादत्ते । एकच्च सामान्यैकान्तवादे
प्राक् प्रपञ्चितम् ॥
व्यवहारस्त्वेवमाह यथा—लोकग्राह्यमेव वस्तु अस्तु, किमनया अदृष्टान्यवह्रियमाणवस्तु-
परिकल्पनकष्टसृष्टिकया । यदेव च लोकव्यवहारपथमवतरति तस्यैवानुग्राहकं प्रमाणमुपलभ्यते
नेतरस्य । न हि सामान्यमनादिनिधनमेकं संग्रहाभिमतं प्रमाणभूमिः, तथानुभवाभावात् ।
सर्वस्य सर्वदर्शित्वप्रसङ्गाच्च । नापि विशेषाः परमाणुलक्षणाः क्षणक्षयिणः प्रमाणगोचराः,
तथा प्रवृत्तेरभावात् । तस्माद् इदमेव निखिललोकाबाधितं प्रमाणप्रसिद्धं कियत्कालभाविस्थू-
लतामाबिभ्राणमुदकाद्याहरणार्थक्रियानिर्वर्तनक्षमं घटादिकं वस्तुरूपं पारमार्थिकम् ।
पूर्वोत्तरकालभावितत्पर्यायपर्यालोचना पुनरज्यायसी, तत्र प्रमाणप्रसराभावात् । प्रमाणमन्तरेण
विचारस्य कर्तुमशक्यत्वात् । अवस्तुत्वाच्च तेषां किं तद्गोचरपर्यालोचनेन । तथाहि—पूर्वोत्तर-
कालभाविनो द्रव्यविवर्ताः क्षणक्षयिपरमाणुलक्षणा वा विशेषा न कथंचन लोकव्यवहारमुपर-
चयन्ति । तन्न ते वस्तुरूपाः । लोकव्यवहारोपयोगिनामेव वस्तुत्वात् । अत एव पन्था
गच्छति, कुण्डिका स्रवति, गिरिर्दह्यते, मञ्चाः क्रोशन्ति इत्यादिव्यवहाराणां प्रामाण्यम् । तथा
च वाचमुख्यः—"लौकिकसम उपचारप्रायो विस्तृतार्थो व्यवहारः" १इति ॥
ऋजुसूत्रः पुनरिदं मन्यते—वर्तमानक्षणविवर्त्येव वस्तुरूपम् । नातीतमनागतं च ।
अतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्मलाभत्वात् खरविषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया
(२) विशेषोंकी अपेक्षा न करके वस्तुको सामान्यसे जाननेको संग्रह नय कहते हैं। इसका निरूपण
(चौथे, पाँचवें श्लोकमें) सामान्य एकान्तका प्ररूपण करते समय किया जा चुका है।
(३) जितनी वस्तु लोकमें प्रसिद्ध हैं, अथवा लोकव्यवहारमें आती हैं, उन्हींको मानना, और
अदृष्ट और अव्यवहार्य वस्तुओंकी कल्पना निष्प्रयोजन है। संग्रह नयसे जाना हुआ अनादि निधन रूप
सामान्य व्यवहार नयका विषय नहीं हो सकता, क्योंकि इस सामान्यका सर्व साधारणको अनुभव
नहीं होता। यदि इस सामान्यका सब लोगोंको अनुभव होने लगे, तो सब लोग सर्वज्ञ हो जायें।
इसी प्रकार क्षण-क्षणमें नष्ट होने वाले परमाणु रूप विशेष भी प्रमाणके विषय नहीं हो सकते,
क्योंकि परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थ हमारे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणके बाह्य होनेसे हमारी प्रवृत्तिके विषय नहीं
हैं। अतएव व्यवहार नयकी अपेक्षा कुछ समयके तक रहनेवाली स्थूल पर्यायको धारण करनेवाला और जल-
धारण आदि क्रियाओंके करनेमें समर्थ घट आदि वस्तु ही पारमार्थिक और प्रमाणसे सिद्ध हैं, क्योंकि इनके
माननेमें कोई लोक विरोध नहीं आता। इसलिये घटका ज्ञान करते समय घटकी पूर्व और उत्तर कालकी
पर्यायोंका विचार करना व्यर्थ है, क्योंकि सूक्ष्म पर्याय प्रमाणसे नहीं जानी जाती। तथा, ये पूर्वोत्तर पर्याय
अवस्तु हैं। पूर्व और उत्तर कालमें होनेवाली द्रव्यकी पर्याय अथवा क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले विशेष रूप
परमाणु लोकव्यवहारमें उपयोगी न होनेसे अवस्तु हैं। क्योंकि जो लोकव्यवहारमें उपयोगी होता है, उसे
ही वस्तु कहते हैं। अतएव 'रास्ता जाता है, कुंड बहता है, पहाड़ जलता है, मंच रोते हैं' आदि व्यवहार
भी लोकपयोगी होनेसे प्रमाण हैं। वाचकमुख्यने कहा भी है—"लोकव्यवहारके अनुसार उपचारित अर्थको
बतानेवाले विस्तृत अर्थको व्यवहार कहते हैं।"
(४) वस्तुकी अतीत और अनागत पर्यायोंको छोड़कर वर्तमान क्षणकी पर्यायोंको जानना ऋजुसूत्र
नयका विषय है। वस्तुकी अतीत पर्याय नष्ट हो जाती है, और अनागत पर्याय उत्पन्न नहीं होती, इसलिये
अतीत और अनागत पर्याय खरविषाणकी तरह सम्पूर्ण सामर्थ्यसे रहित होकर कोई अर्थक्रिया नहीं कर
१. तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये १-३५ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४५
सकलशक्तिविरहरूपत्वात् नार्थक्रियानिर्वर्तनक्षमत्वम् तदभावाच्च न वस्तुत्वं । “यदेवार्थ-
क्रियाकारि तदेव परमार्थसत्” इति वचनात् । वर्तमानक्षणालिङ्गितं पुनर्वस्तुरूपं समस्तार्थ-
क्रियासु व्यापियत इति तदेव पारमार्थिकम् । तदपि च निरंशमभ्युपगन्तव्यम् अंशव्याप्तेर्युक्ति-
रिक्तत्वात् । एकस्य अनेकस्वभावतामन्तरेण अनेकस्यावयवव्यापनायोगात् अनेकस्वभावता
एवास्तु इति चेत् । न । विरोधव्याप्तान्नाप्तत्वात् । तथाहि—यदि एकः स्वभावः कथमनेकः
अनेकश्चेत्कथमेकः एकानेकयोः परस्परपरिहारेणावस्थानात् । तस्मात् स्वरूपनिमग्नाः परमाणव
एव परस्परोपसर्पणद्वारेण कथंचिन्निचयरूपतामापन्ना निखिलकार्येषु व्यापारभाज इति त एव
स्वलक्षणं न स्थूलतां धारयत् पारमार्थिकमिति । एवमस्याभिप्रायेण यदेव स्वकीयं तदेव वस्तु
न परकीयम्, अनुपयोगित्वादिति ॥
शब्दस्तु रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिदर्थे प्रवर्तन्ते, यथा इन्द्रशक्रपुरन्दरादयः
सुरपतौ तेषां सर्वेषामप्येक मर्थमभिप्रैति किल, प्रतितिवशाद् । यथा शब्दादन्यतिरेकोऽर्थस्य
प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वमनेकत्वं वा प्रतिपादनीयम् । न च इन्द्रशक्रपुरन्दरादयः पर्यायशब्दा
विभिन्नार्थवाचितया कदाचन प्रतीयन्ते । तेभ्यः सर्वदा एकाकारपरामर्शोत्पत्तेरस्खलितवृत्तितया
तथैव व्यवहारदर्शनात् । तस्माद् एक एव पर्यायशब्दाना मर्थ इति शब्द्यते आहूयतेऽनेनाभि-
प्रायेणार्थः इति निरुक्तात् एकार्थप्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्यायध्वनीनां प्रयोगात् । यथा चायं
पर्यायशब्दानामेकमर्थमभिप्रैति तथा तटस्तटी तटम् इति विरुद्धलिङ्गलक्षणधर्माभिसम्बन्धाद्
वस्तुनो भेदं चाभिधत्ते । न हि विरुद्धधर्मकृतं भेदमनुभवतो वस्तुनो विरुद्धधर्मायोगो युक्तः ।
एवं सङ्ख्याकालकारकपुरुषादिभेदाद् अपि भेदोऽभ्युपगन्तव्यः । तत्र सङ्ख्या एकत्वादिः कालो-
ऽतीतादिः कारकं कत्र्रादि पुरुषः प्रथमपुरुषादिः ॥
सकती, इसलिये अवस्तु है। क्योंकि “अर्थक्रिया करनेवाला ही वास्तवमें सत् कहा जाता है।” वर्तमान
क्षणमें विद्यमान वस्तुसे ही समस्त अर्थक्रिया हो सकती है, इसलिये यथार्थमें वही सत् है। अतएव वस्तुका
स्वरूप निरंश मानना चाहिये, क्योंकि वस्तुको अंश सहित मानना युक्तिसे सिद्ध नहीं होता। शंका—एक
वस्तुके अनेक स्वभाव माने विना वह अनेक अवयवोंमें नहीं रह सकती, इसलिये वस्तुमें अनेक स्वभाव मानने
चाहिये। समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि यह माननेमें विरोध आता है। तथाहि—एक ओर अनेकमें
परस्पर विरोध होनेसे एक स्वभाववाली वस्तुमें अनेक स्वभाव, और अनेक स्वभाववाली वस्तुमें एक स्वभाव
नहीं बन सकते। अतएव अपने स्वरूपमें स्थित परमाणु ही परस्परके संयोगसे कथंचित् समूह रूप होकर
सम्पूर्ण कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा स्थूल रूपको धारण न करनेवाले स्वरूपमें
स्थित परमाणु ही यथार्थमें सत् कहे जा सकते हैं। अतएव ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा निज स्वरूप ही वस्तु है,
पर स्वरूपको अनुपयोगी होनेके कारण वस्तु नहीं कह सकते ।
(५) रूढिसे सम्पूर्ण शब्दोंके एक अर्थमें प्रयुक्त होनेको शब्द नय कहते हैं। जैसे शक्र, पुरन्दर—इन्द्र,
आदि सब शब्द एक अर्थके द्योतक हैं। जैसे, शब्द और अर्थका अभेद होता है, वैसे ही उसके एकत्व और
अनेकत्वका भी प्रतिपादन करना चाहिये। इन्द्र, शक्र और पुरन्दर आदि पर्यायवाची शब्द कभी भिन्न अर्थका
प्रतिपादन नहीं करते, क्योंकि उनसे एक ही अर्थका ज्ञान होता है। अतएव इन्द्र आदि पर्यायवाची शब्दोंका
एक ही अर्थ है। जिस अभिप्रायसे अर्थ कहा जाय, उसे शब्द कहते हैं। अतएव सम्पूर्ण पर्यायवाची शब्दोंसे
एक ही अर्थका ज्ञान होता है। जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर परस्पर पर्यायवाची शब्द एक अर्थको द्योतित
करते हैं, वैसे ही 'तट, तटी, तटम्' परस्पर विरुद्ध लिंगवाले शब्दोंसे पदार्थोंके भेदका ज्ञान होता है। इसी
प्रकार संख्या—एकत्व आदि, काल—अतीत आदि, कारक—कर्ता आदि, और पुरुष—प्रथम पुरुष आदिके
भेदसे शब्द और अर्थमें भेद समझना चाहिए।
२४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
समभिरूढस्तु पर्यायशब्दानां प्रविभक्तमेवार्थमभिमन्यते । तथ्यथा इन्दनात् इन्द्रः ।
पारमैश्वर्यम् इन्द्रशब्दवाच्यं परमार्थतस्तद्वत्यर्थे, अतद्वत्यर्थे पुनरुपचारतो वर्तते । न वा कश्चित्
तद्वान्, सर्वशब्दानां परस्परविभक्तार्थप्रतिपादितया आश्रयाश्रयिभावेन प्रवृत्त्यसिद्धेः । एवं
शकनात् शक्रः पूर्दारणात् पुरन्दर इत्यादिभिन्नार्थत्वं सर्वशब्दानां दर्शयति । प्रमाणयति च—
पर्यायशब्दा अपि भिन्नार्थाः, प्रविभक्तव्युत्पत्तिनिमित्तकत्वात् । इह ये ये प्रविभक्तव्युत्पत्ति-
निमित्तकास्ते ते भिन्नार्थकाः, यथा इन्द्रपशुरुषशब्दाः । विभिन्नव्युत्पत्तिनिमित्तकाश्च पर्याय-
शब्दा अपि । अतो भिन्नार्था इति ॥
एवम्भूतः पुनरेवं भाषते—यस्मिन् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्तिनिमित्तम् । अर्थो
यदैव प्रवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानमभिप्रैति, न सामान्येन । यथा उदकाद्याहरणवेलायां
योषिदादिमस्तकारूढो विशिष्टचेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते न शेषः, घटशब्दव्युत्पत्तिनिमित्त-
शून्यत्वात्, पटादिवद् इति । अतीतां भाविनीं वा चेष्टामङ्गीकृत्य सामान्यैनैवोच्यत इति चेत् ।
न । तयोर्विनष्टानुत्पन्नतया शशविषाणकल्पत्वात् तथापि तद्वारेण शब्दप्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्त-
यितव्यः, विशेषाभावात् । किंच यदि अतीतवर्त्स्यैच्चेष्टापेक्षया घटशब्दोऽचेष्टावत्यपि प्रयुज्येत
( ६ ) समभिरूढ़ नय पर्यायवाची शब्दोंमें भिन्न अर्थको द्योतित करता है। जैसे इन्द्र शक्र और
पुरन्दर शब्दोंके पर्यायवाची होनेपर भी इन्द्रसे परम ऐश्वर्यवान ( इन्दनात् इन्द्रः ), शक्रसे सामर्थ्यवान
( शकनात् शक्रः ) और पुरन्दरसे नगरोंको विदारण करनेवाले ( पूर्दारणात् पुरन्दरः ) भिन्न-भिन्न अर्थोंका
ज्ञान होता है। वास्तवमें इन्द्र शब्दके कहनेसे इन्द्र शब्दका वाच्य ( परम ऐश्वर्यवाले ) में ही मिल सकता
है। जिसमें परम ऐश्वर्य नहीं है, उसे केवल उपचारसे ही इन्द्र कहा जा सकता है। इसलिये वास्तवमें जो
परम ऐश्वर्यसे रहित है, उसे इन्द्र नहीं कह सकते । अतएव परस्पर भिन्न अर्थको प्रतिपादन करनेवाले
शब्दोंमें आश्रय और आश्रयी संबंध नहीं बन सकता । इसी तरह शक्र और पुरन्दर शब्द भी भिन्न अर्थको
द्योतित करते हैं। अतएव भिन्न व्युत्पत्ति होनेसे पर्यायवाची शब्द भिन्न भिन्न अर्थोंके द्योतक हैं। जिन
शब्दोंकी व्युत्पत्ति भिन्न भिन्न होती है, वे शब्द भिन्न भिन्न अर्थोंके द्योतक होते हैं, जैसे इन्द्र, पशु और पुरुष
शब्द । पर्यायवाची शब्द भी भिन्न व्युत्पत्ति होनेके कारण भिन्न अर्थको सूचित करते हैं।
( .७ ) एवंभूत नय ऐसा कहता है—जिस अर्थको लेकर शब्दकी व्युत्पत्ति की जाती है, वही अर्थ उस
शब्दकी व्युत्पत्ति—प्रवृत्ति—का निमित्त होता है। जिस समय अर्थ प्रवृत्त होता है, उस समय प्रवृत्त होता
हुआ उसे अभिप्रेत होता है, सामान्यतः नहीं। जैसे, जल लानेके समय स्त्रियोंके सिरपर रखे हुए विशिष्ट
क्रिया युक्त घड़ेको ही 'घट' कह सकते हैं, दूसरी अवस्थामें घड़ेको 'घट' नहीं कहा जा सकता । क्योंकि जिस
तरह पटको घट नहीं कहा जा सकता, उसी तरह घड़ा भी जल लाने आदिकी क्रिया रहित अवस्थामें घट
शब्दकी व्युत्पत्तिका निमित्त नहीं हो सकता । 'स्त्रियोंके सिर पर न रखे हुए और विशिष्ट क्रियासे रहित
पदार्थकी अतीत और अनागत विशिष्ट चेष्टा—क्रिया—को स्वीकार कर, वह दूसरा पदार्थ सामान्यतः घट कहा
जाता है'—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि उस दूसरे पदार्थकी अतीतकालीन चेष्टा नाश होने अथवा
अनागतकालीन चेष्टाके अनुत्पन्न होनेसे, ये चेष्टाएँ शशविषाणके सदृश होती हैं, अर्थात् उनका अभाव होता
है। दूसरे पदार्थकी अतीत चेष्टाका नाश अथवा अनागतकालीन चेष्टाकी अनुत्पत्ति होनेसे, उन चेष्टाओंका
अभाव होनेपर भी यदि उन चेष्टाओंके द्वारा उस दूसरे पदार्थको लेकर घट शब्द प्रवृत्त किया गया तो सभी
पदार्थोंको लेकर घट शब्दका व्यवहार करना चाहिये—सभी पदार्थोंको घट कहना चाहिये । क्योंकि जिस
प्रकार उस दूसरे पदार्थकी अतीत या अनागत चेष्टाओंका ( शब्दप्रवर्तन कालमें ) अभाव होता है, उसी
प्रकार ( शब्दप्रवर्तन कालमें ) अन्य सभी पदार्थोंकी अतीत या अनागत चेष्टाओंका अभाव होता है।
( तात्पर्य यह है कि जब प्रवृत्तिनिमित्तका अभाव होनेपर भी एक पदार्थको लेकर घट शब्दका व्यवहार
अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४७
तदा कपालमृत्पिण्डादावपि तत्प्रवर्तनं दुर्निवारं स्याद्, विशेषाभावात् । तस्माद् यत्र क्षणे
व्युत्पत्तिनिमित्तमविकलमस्ति तस्मिन् एव सोऽर्थस्तच्छब्दवाच्य इति ॥
अत्र संग्रहश्लोकाः—
“अन्यदेव हि सामान्यभिन्नज्ञानकारणम् ।
विशेषोऽप्यन्य एवेति मन्यते नैगमो नयः ॥ १ ॥
सद्रूपतानतिक्रान्तं स्वस्वभावमिदं जगत् ।
सत्तारूपतया सर्वं संगृह्णन् संग्रहो मतः ॥ २ ॥
व्यवहारस्तु तामेव प्रतिवस्तु व्यवस्थिताम् ।
तथैव दृश्यमानत्वाद् व्यापारयति देहिनः ॥ ३ ॥
तत्रर्जुसूत्रनीतिः स्याद् शुद्धपर्यायसंश्रिता ।
नश्वरस्यैव भावस्य भावात् स्थितिवियोगतः ॥ ४ ॥
विरोधि लिङ्गसंख्यादिभेदाद् भिन्नस्वभावताम् ।
तस्यैव सन्मन्यानोऽयं प्रत्यवतिष्ठते ॥ ५ ॥
तथाविधस्य तस्यापि वस्तुनः क्षणवर्तिनः ।
ब्रूते समभिरूढस्तु संज्ञाभेदेन भिन्नताम् ॥ ६ ॥
एकस्यापि ध्वनेर्वाच्यं सदा तन्नोपपद्यते ।
क्रियाभेदेन भिन्नत्वाद् एवंभूतोऽभिमन्यते” ॥ ७ ॥
किया जाता है तो प्रवृत्तिनिमित्त का अभाव होनेपर अन्य सभी पदार्थोंको लेकर घट शब्दका व्यवहार क्यों
न किया जाये ?) यदि अतीत या अनागत चेष्टाओंकी अपेक्षासे वर्तमानकालीन चेष्टा रहित, उस दूसरे
पदार्थको लेकर घट शब्द प्रयुक्त किया जाता है तो कपाल और मृत्पिण्डमें भी घट शब्दका प्रयोग करना दुर्निवार
हो जायेगा । क्योंकि जिस प्रकार उस दूसरे पदार्थमें वर्तमानकालीन विशिष्ट चेष्टाका अभाव होता है तथा
भूत अथवा भविष्य कालमें चेष्टाका सद्भाव होता है, उसी प्रकार कपालमें भूतकालमें तथा मृत्पिण्डमें भविष्य
कालमें चेष्टाका सद्भाव और वर्तमानकालीन चेष्टाका अभाव होता है । अतएव जिस क्षणमें किसी शब्दकी
व्युत्पत्तिका निमित्त कारण भूत पदार्थ सम्पूर्ण रूपसे विद्यमान हो, उसी क्षणमें वह पदार्थके द्वारा वाच्य
होता है ।
यहाँ संग्रह श्लोक हैं—
“नैगम नयके अनुसार विशेष रहित सामान्य ज्ञानका कारणभूत (वस्तुगत) सामान्य भिन्न होता
है और विशेष भी भिन्न होता है ॥ १ ॥
अपने-अपने स्वभावमें स्थित सभी पदार्थ हैं अस्तित्व धर्मको नहीं छोड़ते हैं । इन सभी पदार्थोंका
सत्तारूपसे जो संग्रह करता है, उसे संग्रह नय कहते हैं ॥ २ ॥
सत्ताके समान दिखाई देनेवाली होनेके कारण प्रत्येक वस्तुमें विद्यमान रहनेवाली उस सत्ताके लिये—
अवान्तर सत्तावाले पदार्थोंके लिये—प्राणियोंको व्यवहार नय प्रवृत्त कराता है ॥ ३ ॥
स्थिति—ध्रौव्य—का अभाव (गौणत्व) होनेसे केवल नश्वर पर्यायका सद्भाव होनेके कारण, अर्थ-
क्रियाकारी होनेसे पारमार्थिक पर्यायका आश्रयी ऋजुसूत्र नय होता है ॥ ४ ॥
परस्पर विरोधी लिंग, संख्या आदिके भेदसे भिन्न-भिन्न धर्मोंको माननेवाला शब्द नय होता है ॥५॥
क्षणस्थायी वस्तुको भिन्न-भिन्न संज्ञाओंके भेदसे भिन्न मानना समभिरूढ नय है ॥ ६ ॥
वस्तु अमुक क्रिया करनेके समय ही अमुक नामसे कही जा सकती है, वह सदा एक शब्दका वाच्य
नहीं हो सकती, इसे एवंभूत नय कहते हैं ॥ ७ ॥”
२४८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
एत एव च परामर्शा अभिप्रेतधर्मावधारणात्मकतया शेषधर्मतिरस्कारेण प्रवर्तमाना दुर्नयसंज्ञा-
मश्नुवते । तद्बलप्रभावितसत्ताका हि खल्वेते परप्रवादाः । तथाहि—नैगमनयदर्शनानुसारिणौ
नैयायिकवैशेषिकौ । संग्रहाभिप्रायवृत्ताः सर्वेऽप्यद्वैतवादाः सांख्यदर्शनं च । व्यवहारनयानुपाति
प्रायश्चार्वाकदर्शनम् । ऋजुसूत्राकूतप्रवृत्तबुद्धयस्तथागताः शब्दादिनयावलम्बिनो
वैयाकरणादयः ॥
उक्तं च सोदाहरणं नयदुर्नयस्वरूपं श्रीदेवसूरिपादैः । तथा च तद्ग्रन्थेः— "नीयते येन
श्रुताख्यप्रमाणविषर्याकृतस्य अर्थस्य अंशस्तदितरांशौदासीन्यतः स प्रतिपत्तुर्भिप्रायविशेषो नयः
इति । स्वाभिप्रेताद् अंशाद् इतरांशपलावी पुनर्नयाभासः । स व्याससमासाभ्यां द्विप्रकारः ।
व्यासतोऽनेकविकल्पः २ । समासतस्तु द्विभेदो द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च ३ । आद्यो नैगमसंग्रह-
व्यवहारभेदात् त्रेधा । धर्मयोर्धर्मिणोर्धर्मधर्मिणोश्च प्रधानोपसर्जनभावेन यद्विवक्षणं स
नैकगमो नैगमः । सत् चैतन्यमात्मनीति धर्मयोः । वस्तुपर्यायवद्द्रव्यमिति धर्मिणोः । क्षणमेकं
सुखी विषयासक्तजीव इति धर्मधर्मिणोः धर्मद्वयादीनामैकान्तिकपार्थक्याभिसन्धिर्नैगमाभासः ।
यथा आत्मनि सत्त्वचैतन्ये परस्परमत्यन्तं पृथग्भूते इत्यादि । सामान्यमात्रग्राही परामर्शः
संग्रह
अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४९
मभिमन्यमानः परसंग्रहः । विश्वमेकं सद्विशेषादिति यथा । सत्ताद्वैतं स्वीकुर्वाणः सकल-
विशेषान् निराचक्षाणस्तदाभासः । यथा सत्तैव तत्त्वम् ततः पृथग्भूतानां विशेषाणामदर्शनात् ।
द्रव्यत्वादीनि अवान्तरसामान्यानि मन्वानस्तद्भेदेषु गजनिमीलिकामवलम्बमानः पुनरपरसंग्रहः।
धर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवद्रव्याणामैक्यं द्रव्यत्वाभेदात् इत्यादिर्यथा । तद्द्रव्यत्वादिकं
प्रतिजानानस्तद्विशेषान्निह्नुवानस्तदाभासः । यथा द्रव्यत्वमेव तत्त्वम् ततोऽर्थान्तरभूतानां
द्रव्याणामनुपलब्धेरित्यादिः । संग्रहेण गोचरीकृतानामर्थानां विधिपूर्वकंमवहरणं येनाभि-
सन्धिना क्रियते स व्यवहारः । यथा यत् सत् तद् द्रव्यं पर्यायो वेत्यादिः । यः पुनरपारमार्थि-
कद्रव्यपर्यायविभागमभिप्रैति स व्यवहाराभासः । यथा चार्वाकदर्शनम् ॥
पर्यायार्थिकश्चतुर्धा ऋजुसूत्रः शब्दः समभिरूढः एवंभूतश्च । ऋजु वर्तमानक्षणस्थायि
पर्यायमात्रं प्राधान्यतः सूत्रयन्नभिप्रायः ऋजुसूत्रः । यथा सुखविवर्त्तः सम्प्रति अस्तीत्यादिः ।
सर्वथा द्रव्यापलापी तदाभासः । यथा तथागतमतम् । कालादिभेदेन ध्वनेरर्थभेदं प्रतिपद्यमानः
शब्दः । यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादिः । तद्भेदेन तस्य तमेव समर्थयमानस्त-
दाभासः । यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादयो भिन्नकालाः शब्दा भिन्नमेव अर्थ-
मभिदधति भिन्नकालशब्दत्वात् तादृक्सिद्धान्यशब्दवद् इत्यादिः । पर्यायशब्देषु निरुक्तिभेदेन
हैं । ( ग ) सुख और जीव परस्पर भिन्न हैं । ( २ ) विशेष रहित सामान्य मात्र जाननेवालेको संग्रह नय
कहते हैं । पर और अपर सामान्यके भेदसे संग्रहके दो भेद हैं । सम्पूर्ण विशेषोंमें उदासीन भाव रखकर
शुद्ध सत् मात्रको जानना पर संग्रह हैं; जैसे सामान्यसे एक विश्व ही सत् है । सत्ताद्वैतको मानकर सम्पूर्ण
विशेषोंका निषेध करना परसंग्रहाभास है; जैसे सत्ता ही एक तत्त्व है, क्योंकि सत्तासे भिन्न विशेष पदार्थोंकी
उपलब्धि नहीं होती । द्रव्यत्व, पर्यायत्व आदि अवान्तर सामान्योंको मानकर उनके भेदोंमें मध्यस्थ भाव
रखना अपर संग्रह नय हैं; जैसे द्रव्यत्वकी अपेक्षा धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव एक हैं ।
( इसी प्रकार पर्यायत्वकी अपेक्षा चेतन और अचेतन पर्याय एक हैं ) । धर्म, अधर्म आदिको केवल द्रव्यत्व
रूपसे स्वीकार करके उनके विशेषोंके निषेध करनेको अपर संग्रहाभास कहते हैं; जैसे द्रव्यत्व ही तत्त्व है,
क्योंकि द्रव्यत्वसे भिन्न द्रव्योंका ज्ञान नहीं होता । ( ३ ) संग्रह नयसे जाने हुए पदार्थोंमें योग्य रीतिसे विभाग
करनेको व्यवहार नय कहते हैं । जैसे जो सत् हैं, वह द्रव्य या पर्याय है । ( यद्यपि संग्रह नयकी अपेक्षा द्रव्य
और पर्याय सत्से अभिन्न हैं, परन्तु व्यवहार नयकी दृष्टिसे द्रव्य और पर्यायको सत्से भिन्न माना गया है ) ।
अपारमार्थिक द्रव्य और पर्यायके एकान्त भेद प्रतिपादन करनेको व्यवहाराभास कहते हैं; जैसे चार्वाकदर्शन ।
( चार्वाक लोग जीव द्रव्यके पर्याय आदि न मानकर केवलभूत चतुष्टयको मानते हैं, अतएव उनको
व्यवहाराभास कहा गया है ) ।
ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये चार पर्यायार्थिक नयके भेद हैं । ( १ ) वर्तमान क्षणकी
पर्याय मात्रकी प्रधानतासे वस्तुका कथन करना ऋजुसूत्र है; जैसे इस समय मैं सुखकी पर्याय भोगता हूँ ।
द्रव्यके सर्वथा निषेध करनेको ऋजुसूत्र नयाभास कहते हैं, जैसे बौद्धमत । ( बौद्ध लोग क्षण क्षणमें नाश
होनेवाली पर्यायोंको ही वास्तविक मानकर पर्यायोंके आश्रित द्रव्यका निषेध करते हैं, इसलिये उनका मत
ऋजुसूत्र नयाभास है ) । ( २ ) काल, कारक, लिंग, संख्या, वचन और उपसर्गके भेदसे शब्दके अर्थमें भेद
माननेको शब्द नय कहते हैं; जैसे बभूव, भवति, भविष्यति ( काल ); करोति, क्रियते ( कारक ); तटः,
तटी, तटं ( लिंग ); दारा, कलत्रम् ( संख्या ); एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यसि यातस्ते पिता
( पुरुष ); सन्तिष्ठते, अवतिष्ठते ( उपसर्ग ) । काल आदिके भेदसे शब्द और अर्थको सर्वथा अलग माननेको
शब्दाभास कहते हैं; जैसे सुमेरु था, सुमेरु है ओर सुमेरु होगा, आदि भिन्न-भिन्न कालके शब्द भिन्न कालके
शब्द होनेसे भिन्न-भिन्न अर्थोंका ही प्रतिपादन करते हैं, जैसे अन्य भिन्न कालके शब्द । ( ३ ) पर्याय शब्दोंमें
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