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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 458 में से

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पृष्ठ 289

अन्य. यो. व्य. श्लोक २७ ] स्याद्वादमञ्जरी २३७
क्रमेण अक्रमेण वा नोपपद्यत इत्युक्तप्रायम् । अत एवोक्तं न पुण्यपापे इति । पुण्यं दानादि-
क्रियोपार्जनीयं शुभं च र्म, पापं हिंसादिक्रियासाध्यमशुभं कर्म । ते अपि न घटते, प्रागुक्तनीतेः ॥
तथा न बन्धमोक्षौ । बन्धः कर्मपुद्गलैः सह प्रतिप्रदेशमात्मनो वह्नययःपिण्डवद्
अन्योऽन्यसंश्लेषः । मोक्षः कृत्स्नकर्मक्षयः । तावप्येकान्तनित्ये न स्याताम् । बन्धो हि संयोग-
विशेषः । स च “अप्राप्तानां प्राप्तिः” इतिलक्षणः । प्राक्कालभाविनी अप्राप्तिरन्यावस्था, उत्तर-
कालभाविनी प्राप्तिश्चान्या । तदनयोरप्यवस्थाभेददोषो दुस्तरः । कथं चैकरूपत्वे सति
तस्याकस्मिको बन्धनसंयोगः । वन्धनसंयोगाच्च प्राक् किं नायं मुक्तोऽभवत् । किंच तेन
बन्धनेनासौ विकृतिमनुभवति न वा ? अनुभवति चेत्, चर्मादिवदनित्यः । नानुभवति चेत्,
निर्विकारत्वे सता असता वा तेन गगनस्येव न कोऽप्यस्य विशेष इति वन्धवैफल्याद् नित्यमुक्त
एव स्यात् । ततश्च विशीर्णा जगति वन्धमोक्षव्यवस्था । तथा च पठन्ति—
“वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः” ॥
बन्धानुपपत्तौ मोक्षस्याप्यनुपपत्तिर्वन्धनविच्छेदपर्यायत्वाद् मुक्तिशब्दस्येति ॥
एवमनित्यैकान्तवादेऽपि सुखदुःखाद्यनुपपत्तिः । अनित्यं हि अत्यन्तोच्छेदधर्मकम् ।
तथाभूते चात्मनि पुण्योपादानक्रियाकारिणो निरन्वयं विनष्टत्वात् कस्य नाम तत्फलभूत-
हो सकती । पदार्थोंके नित्य माननेमें उनमें क्रम-क्रमसे अथवा एक साथ अर्थक्रिया नहीं हो सकती, यह
पहले कहा जा चुका है । इसीलिये कहा है कि दान आदिसे होनेवाले शुभ कर्म रूप पुण्य, और हिंसा
आदिसे होनेवाले अशुभ कर्म रूप पाप—दोनों एकान्त नित्य पक्षमें नहीं बन सकते ।
( ३ ) अग्नि और लोहेकी तरह आत्माके प्रदेशोंके कर्म पुद्गलोंके साथ परस्पर सम्मिश्रण हो
जानेको बंध और सम्पूर्ण कर्मोंके क्षय हो जानेको मोक्ष कहते हैं । यह बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था भी एकान्त
नित्यवादमें नहीं बन सकती । संयोगविशेषको बन्ध कहते हैं । “अप्राप्त पदार्थोंकी प्राप्तिको” संयोग कहते हैं ।
यह संयोग एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थाको प्राप्त करनेमें ही संभव हो सकता है । अतएव नित्य
आत्मामें अवस्था भेद होनेसे बंध और मोक्ष नहीं बन सकते । तथा, एकान्त नित्य माननेपर उसके साथ
बंधक कर्मोंका बंध नहीं हो सकता । अतएव बंधक कर्मोंके साथ होनेवाले संयोगके पहले आत्माको मुक्त मानना
चाहिये । तथा बंधक कर्मके कारण आत्मामें कोई विकार होता है, या नहीं ? यदि बंध होनेसे आत्मामें
कोई विकार होता है, तो आत्माको चमड़ेकी तरह अनित्य मानना चाहिये । यदि बंध होनेपर भी आत्मा
अविकृत रहती है, तो निर्विकार आकाशकी तरह बंधके होने अथवा न होनेसे आत्मामें कोई भी विकार नहीं
आ सकता, अतएव बंधके निष्फल होनेके कारण आत्माको सदा मुक्त मानना चाहिये । अतएव सर्वथा
एकान्तवादमें बंध और मोक्षकी व्यवस्था नहीं बन सकती । कहा भी है—
“वर्षा और गरमीके कारण चमड़ेमें ही परिवर्तन होता है, आकाशमें कोई परिवर्तन नहीं देखा
जाता । अतएव यदि आत्मा चमड़ेके समान है, तो उसे अनित्य मानना चाहिये; यदि आत्मा आकाशकी
तरह है, तो उसमें बंध नहीं मानना चाहिये ।”
आत्माके बन्ध न होनेसे आत्माके मोक्ष भी नहीं हो सकता । क्योंकि बन्धनके नष्ट होनेको ही मोक्ष
कहते हैं ।
( १ ) एकान्त अनित्यवाद माननेसे भी सुख-दुख नहीं बन सकते । सर्वथा रूपसे नष्ट होनेको
अनित्य कहते हैं । अनित्य आत्मामें पुण्योपार्जन करनेवाली क्रिया करनेवाले आत्माका निरन्वय नाश होनेसे