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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 458 में से

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पृष्ठ 294

२४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
वस्थितवस्तुदर्शी । तीर्थान्तरशास्तारस्तु रागादिदोषकालुष्यकलङ्कितत्वेन तथाविधज्ञानाभावाद्
न यथार्थदर्शिनः । ततः कथं नाम दुर्नयपथमथने प्रगल्भन्ते ते तपस्विनः । न हि स्वयमनयप्रवृत्तः
परेषामनयं निषेद्धुमुद्धरतां धत्ते । इदमुक्तं भवति । यथा कश्चित् सन्मार्गवेदी परोपकार-
दुर्ललितः पुरुषश्चौरश्वापादकण्टकाद्याकीर्णं मार्गं परित्यज्य पथिकानां गुणदोषोभयविकलं
दोषास्पृष्टं गुणयुक्तं च मार्गमुपदर्शयति, एवं जगन्नाथोऽपि दुर्नयतिरस्करणेन भव्येभ्यो नय-
प्रमाणमार्गं प्ररूपयतीति । आस्थः इति अस्यतेरद्यतन्यां “शास्त्यसूवक्तिख्यातेरङ्” इत्याङि
“श्वयत्यसूवचपतः श्वास्थवोचपप्तम्” इति अस्थादेशे “स्वरादेस्तासु” इति वृद्धौ रूपम् ॥
मुख्यवृत्त्या च प्रमाणस्यैव प्रामाण्यम् । अत्र नयानां प्रमाणतुल्यकक्षताख्यापनं तत्
तेषामनुयोगद्वारभूततया प्रज्ञापनाङ्गत्वाज्ञापनार्थम् । चत्वारि हि प्रवचनानुयोगमहानगरस्य
द्वाराणि उपक्रमः निक्षेपः अनुगमः नयश्चेति । एतेषां च स्वरूपमावश्यकभाष्योदैर्निरूपणीयम् ।
इह तु नोच्यते ग्रन्थगौरवभयात् । अत्र चैकत्र कृतसमासान्तः पथिन्शब्दः । अन्यत्र चाव्युत्पन्नः
पथशब्दोऽदन्त इति पथशब्दस्य द्विःप्रयोगो न दुष्यति ॥
अथ दुर्नयनयप्रमाणस्वरूपं किञ्चिन्निरूप्यते । तत्रापि प्रथमं नयस्वरूपं । तदनधिगमे
दुर्नयस्वरूपस्य दुष्परिज्ञानत्वात् । अत्र च आचार्येण प्रथमं दुर्नयनिर्देशो यथोत्तरं प्राधान्याव-
बोधनार्थः कृतः । तत्र प्रमाणप्रतिपन्नार्थैकदेशपरामर्शी नयः । अनन्तधर्माध्यासितं वस्तु स्वाभि-
पड़े हुए हैं, वे दूसरोंको अनीतिसे नहीं निकाल सकते । अतएव जिस प्रकार यथार्थ मार्गका जाननेवाला कोई
परोपकारी पुरुष पथिकोंको कुमार्गसे बचानेकी इच्छासे चोर, व्याघ्र, कण्टक आदिसे आकीर्ण मार्गसे छुड़ा कर
उन्हें निर्दोष ठीक-ठीक मार्गका प्रदर्शन करता है, इसी प्रकार त्रिलोकके स्वामी अरहंत भगवान् भी भव्योंके
लिए नय और प्रमाणका उपदेश देते हैं । श्लोकमें ‘आस्थः’ पद निराकरण करने के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ।
अस् धातुसे अद्यतन ( लुङ् लकार ) में “शास्त्यसूवक्तिख्यातेरङ्” सूत्रसे अङ् प्रत्यय होकर “श्वयत्यसूवचपतः
श्वास्थवोचपप्तम्” सूत्रसे अस्के स्थानमें अस्थ्य आदेश होकर “स्वरादेस्तासु” सूत्रसे ‘अ’ के स्थानमें वृद्धि होकर
‘आस्थः’ रूप बनता है ।
वास्तवमें केवल प्रमाणको ही सत्य कहा जा सकता है । नयोंसे वस्तुके सम्पूर्ण अंशोंका ज्ञान नहीं
होता, इसलिये नयको सत्य नहीं कह सकते । अनुयोगद्वारसे प्रज्ञापना तक पहुँचनेके लिये नय अनु-
योगके द्वार हैं, इसलिये नयोंको प्रमाणके समान कहा गया है। उपक्रम, निक्षेप, अनुगम और नय ये चार
अनुयोग-महानगरमें पहुँचनेके दरवाजे हैं । इनका स्वरूप विशेषावश्यकभाष्य ( गाथा ९११-४; १५०५के
आगे ) आदि ग्रन्थोंसे जानना चाहिये । यहाँ ग्रन्थके बढ़ जानेके भयसे सबका स्वरूप नहीं लिखा जाता ।
एक जगह श्लोकमें ‘पथिन्’ शब्द समासान्त है, और दूसरी जगह अव्युत्पन्न अकारांत है, इसलिये ‘पथ’
शब्दका दो बार प्रयोग करनेमें दोष नहीं है ।
दुर्नय, नय और प्रमाणमेंसे पहले नयका स्वरूप कहा जाता है। क्योंकि नयको बिना जाने दुर्नयका ज्ञान
नहीं हो सकता । प्रमाणसे निश्चित किये हुए पदार्थोंके एक अंश ज्ञान करनेको नय कहते हैं । प्रत्येक वस्तुमें
अनन्त धर्म पाये जाते हैं, इन अनन्त धर्मोंमें अपने इष्ट धर्मको जाननेको नय कहते हैं । वस्तुका प्रमाण द्वारा
१. हैमसूत्रे ३-४-६० ।
२. हैमसूत्रे ४-३-१०३ ।
३. हैमसूत्रे ४-४-३१ ।
४. अणुओगदाराइं महापुरस्सेव तस्स चत्तारि ।
५. विशेषावश्यकभाष्ये ९११, ९१२, ९१३, ९१४, १५०५ ततः परम् ।