स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८४
सर्वैः स्मर्येत । स्मरणाभावे च कौतस्कुती प्रत्यभिज्ञाप्रसूतिः, तस्याः स्मरणानुभवोभयसंभव-
त्वात् । पदार्थप्रेक्षणप्रबुद्धप्राक्तनसंस्कारस्य हि प्रमातुः स एवायमित्याकारेण इयमुत्पद्यते ।
अथ स्यादयं दोषः, यद्यविशेषेणान्यदृष्टमन्यः स्मरतीत्युच्यते; किन्तु अन्यत्वेऽपि कार्य-
कारणभावाद्¹ एव च स्मृतिः । भिन्नसंतानबुद्धीनां तु कार्यकारणभावो नास्ति । तेन संताना-
न्तराणां स्मृतिर्न भवति । न चैकसान्तानिकीनामपि बुद्धीनां कार्यकारणभावो नास्ति, येन
पूर्वबुद्ध्यनुभूतेऽर्थे तदुत्तरबुद्धीनां स्मृतिर्न स्यात् । तदप्यनवदातम्, एवमपि अन्यत्वस्य तद-
वस्थत्वात् । न हि कार्यकारणभावाभिधानेऽपि तदपगतं, क्षणिकत्वेन सर्वासां भिन्नत्वात् ।
न हि कार्यकारणभावात् स्मृतिरित्यत्रोभयप्रसिद्धोऽस्ति दृष्टान्तः ॥
अथ— “यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना ।
फलं तत्रैव संधत्ते कर्पासे रक्तता यथा” ॥
होना संभव नहीं। यदि अन्य पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका किसी अन्य पुरुषके द्वारा स्मरण किया जाता हो तो
एक पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका ( जिन्होंने इस पदार्थको कभी नहीं देखा ऐसे ) अन्य सभी पुरुषोंको स्मरण हो
जानेका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। यदि पूर्वज्ञानके द्वारा अनुभूत पदार्थका उत्तरबुद्धियोंको स्मरण न हुआ
तो प्रत्यभिज्ञान कहाँसे बन सकता है ? क्योंकि प्रत्यभिज्ञान स्मरण और अनुभव इन दोनोंसे उत्पन्न होता है।
पदार्थके दर्शनसे जिसका संस्कार प्रबुद्ध हो जाता है, ऐसे प्रमाताको ही 'यह वही है' इस रूपसे प्रत्यभि-
ज्ञान होता है ।
शंका—यदि सामान्यरूपसे अन्य विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका अन्य विज्ञानक्षण स्मरण करता
है—ऐसा हमने कहा होता तो स्मृतिभंग नामका दोष आ सकता था। किन्तु पूर्वोत्तर विज्ञानक्षणोंमें भेद
होनेपर भी उनमें कार्यकारण भाव होनेसे ही स्मरण होता है—अर्थात् पूर्व विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका
उत्तर विज्ञानक्षणको स्मरण होता है । अन्योन्यभिन्न संतानोंकी बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता ।
इससे एक संतानकी बुद्धिके द्वारा दृष्ट पदार्थका उससे भिन्न संतानकी बुद्धिको स्मरण नहीं होता । तथा,
एक संतानकी भी ( भिन्न-भिन्न ) बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता—ऐसी बात नहीं है, जिससे
पूर्वबुद्धिके द्वारा जो पदार्थ अनुभूत है, उस पदार्थका स्मरण उसकी उत्तरकालीन बुद्धियोंको न होगा।
समाधान—यह कथन भी ठीक नहीं। पूर्वोत्तर बुद्धियोंमें कार्य-कारण भाव होनेपर भी उन
दोनोंमें होनेवाला भिन्नत्व जैसेका तैसा बना रहता है। पूर्वोत्तरकालीन बुद्धियोंमें कार्य-कारण माननेपर
भी उनमें होनेवाले भेदका अभाव नहीं होता। क्योंकि सभी बुद्धियोंके क्षणिक होनेसे वे अन्योन्यभिन्न
होती हैं। 'उनमें परस्पर भेद होनेपर भी दोनोंमें कार्यकारण भाव होनेसे स्मृति उत्पन्न होती है'—इस
विषयमें वादी-प्रतिवादी-प्रसिद्ध दृष्टान्तका सद्भाव नहीं है। ( अतएव पूर्वोत्तरकालवर्ती दो भिन्न बुद्धियोंमें
कार्य-कारण भावकी, उभयमान्य दृष्टांतके अभावके कारण सिद्धि न होने और उनमें भेद होनेसे, स्मृतिका
प्रादुर्भाव असम्भव होनेके कारण स्मृतिभंग नामक दोष आता ही है ) ।
शंका—“जिस प्रकार जिस कपासमें लाल रंग द्वारा संस्कार किया जाता है, उसीमें ललाई होती है,
उसी प्रकार जिस संतानमें कर्मवासना उत्पादित की गई होती है, उसी ( संतान ) में कर्मवासनाका
फल रहता है” ।
इस प्रकार कपासमें रक्तताका दृष्टांत विद्यमान है।
१. कार्यकारणभावप्रतिनियमादेव स्मृत्यभावोऽपि निरस्तः । न स्मर्त्ता कश्चिदिह विद्यते । किं तर्हि स्मरणमेव
केवलमारोपवशात् । अनुभूते हि वस्तुनि विज्ञानसंताने स्मृतिबीजाधानात्कालान्तरेण संततिपरिपाकहेतोः
स्मरणं नाम कार्यमुत्पद्यते । बोधिचर्यावतारपञ्जिकायां पृ. ४१५ ।
१८४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १८
इति । कर्पासे रक्तादृष्टान्तोऽस्तीति चेत्, तदसाधीयः, साधनदूषणयोरसम्भवात् । तथाहि—
अन्वयाद्यसम्भवान्न साधनम् । न हि कार्यकारणभावो यत्र तत्र स्मृतिः कर्पासे रक्ततावदित्य-
न्वयः सम्भवति । नापि यत्र न स्मृतिस्तत्र न कार्यकारणभाव इति व्यतिरेकोऽपि । असिद्ध-
त्वाद्यनुद्भावनाच्च न दूषणम् । न हि ततोऽन्यत्वात् इत्यस्य हेतोः कर्पासे रक्ततावत् इत्यनेन
कश्चिद्दोषः प्रतिपाद्यते ॥
किञ्च, यद्यनन्वयत्वेऽपि कार्यकारणभावेन स्मृतेरुत्पत्तिरिष्यते, तदा शिष्याचार्यादि-
बुद्धीनामपि कार्यकारणभावसद्भावेन स्मृत्यादिः स्यात् । अथ नायं प्रसङ्गः, एकसंतानत्वे
सतीतिविशेषणादिति चेत्, तदप्युक्तं, भेदाभेदपक्षाभ्यां तस्योपक्षीणत्वात् । क्षणपरम्परातस्त-
स्याभेदे हि क्षणपरम्परैव सा । तथा च संतान इति न किञ्चिदतिरिक्तमुक्तं स्यात् । भेदे तु
पारमार्थिकः अपारमार्थिको वासौ स्यात् ? अपारमार्थिकत्वेऽस्य दूषणं, अकिंचित्करत्वात् ।
पारमार्थिकत्वे स्थिरो वा स्यात् क्षणिको वा ? क्षणिकत्वे संताननिर्विशेष एवायम्, इति किम-
नेन स्तेनभीतस्य स्तेनान्तरशरणस्वीकरणानुकरिणा । स्थिरश्चेत् आत्मैव संज्ञाभेदतिरोहितः
प्रतिपन्नः । इति न स्मृतिर्घटते क्षणक्षयवादिनाम् ॥
समाधान—यह ठीक नहीं है । क्योंकि पूर्वोत्तर बुद्धिक्षणोंमें (बौद्धों द्वारा मान्य ) कार्य-कारण
भाव रूप हेतुसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी, न इस दृष्टांतसे सिद्धि होती है और न वह साध्य
दूषित ही होता है । तथाहि—बुद्धिके पूर्वोत्तरक्षणोंमें होनेवाला कार्य-कारण भाव रूप हेतु और स्मृति इनमें
अन्वय-व्यतिरेक संभव न होनेसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'जहाँ कार्य-कारण
भाव होता है, वहाँ स्मृतिका सद्भाव होता है, जैसे कपासमें रक्तता,' तथा 'जहाँ स्मृति नहीं होती, वहाँ
कार्य-कारण भाव भी नहीं होता' इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक सम्बन्ध नहीं बनते । इस प्रकार
स्मृतिरूप साध्य और कार्य-कारण भाव रूप हेतु इनमें अन्वय-व्यतिरेक न बननेसे उस हेतुसे स्मृतिरूप
साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'उससे अर्थात् पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके असिद्धत्व आदि
दोषोंका प्रकटीकरण न होनेसे यह हेतु दूषित नहीं है । 'पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके विषयमें
'जैसे कपासमें रक्तता' इस दृष्टांतके द्वारा किसी दोषका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।
तथा, 'जहाँ कार्य-कारण भाव होता है वहाँ स्मृति होती है'—इस प्रकार कार्य-कारण भावमें और
स्मृतिमें अन्वयका अभाव होनेपर भी, यदि उत्तर बुद्धिक्षण और पूर्व बुद्धिक्षणमें कार्य-कारण भाव होनेसे
स्मृतिकी उत्पत्तिका इष्ट होना माना गया, तो शिष्यबुद्धि और आचार्यबुद्धिमें, आचार्यबुद्धिके कारण और शिष्य-
बुद्धिके कार्य होनेसे, कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृतिका सद्भाव हो जायेगा । 'शिष्यबुद्धिमें और आचार्यबुद्धिमें
अन्वयका अभाव होनेपर भी उनमें कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृति आदिके सद्भाव होनेका प्रसंग उपस्थित
नहीं होता; क्योंकि शिष्य और आचार्य ये दो भिन्न संतान हैं, और हमने 'एक संतानत्व' ( एक संतानत्वे
सति ) विशेषणका प्रयोग किया है ।' यह भी ठीक नहीं । क्योंकि भेदपक्ष औरअ भेदपक्षके द्वारा 'एक-
संतानत्व' विशेषण क्षीण हो जाता है—अकिंचित्कर बन जाता है । क्षण परंपरासे उस 'एकसंतानत्व' को
अभिन्न माननेपर वह क्षणपरंपरारूप ही होगा । इस प्रकार संतानके क्षणपरंपरारूप होनेसे, संतानको
क्षणपरंपरा ( संतानी ) ही कहना चाहिये, संतान नहीं । यदि संतान और क्षणपरंपराको भिन्न मानो, तो
यह संतान वास्तविक है, या अवास्तविक ? यदि यह अवास्तविक है, तो वह अकिंचित्कर होनेसे दूषित
है। यदि संतान वास्तविक है, तो वह स्थिर है, या क्षणिक ? यदि क्षणपरंपरासे भिन्न संतान क्षणिक है,
तो यह संतान क्षणपरंपरासे अभिन्न ही है । इस प्रकार क्षणपरंपराको छोड़कर संतानका आश्रय लेना,
एक चोरके भयसे दूसरे चोरके आश्रय लेनेके समान है। यदि वास्तविक संतानको स्थिर मानो, तो फिर
संतान-संज्ञासे तिरोहित आत्मा स्वीकार करनेमें ही क्या दोष है ? अतएव क्षणिकवादियोंके मतमें स्मृति
भी नहीं बनती ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८५
तद्भावे च अनुमानस्यानुत्थानमित्युक्तम् प्रागेव । अपि च, स्मृतेरभावे निहित-
प्रत्युन्मार्गणप्रत्यर्पणादिव्यवहारा विशीर्येरन् ।
“इत्येकोनवते कल्पे शक्त्या मे पुरुषो हतः ।
तेन कर्मविपाकेन पादे विद्धोऽस्मि भिक्षवः ॥”
इति वचनस्य का गतिः। एवमुत्पत्तिरुत्पादयति, स्थितिः स्थापयति, जरा जर्जरंयति,
विनाशो नाशयतीति चतुःक्षणिकं१ वस्तु प्रतिजानाना अपि प्रतिक्षेप्याः । क्षणचतुष्कानन्तर-
मपि निहितप्रत्युन्मार्गणादिव्यवहाराणां दर्शनात् । तदेवमनेकदोषापातेऽपि यः क्षणभङ्गमभि-
प्रैति तस्य महत् साहसम् ॥ इति काव्यार्थः ॥ १८ ॥
स्मृतिके अभाव होनेपर अनुमान भी नहीं बन सकता, यह पहले ही कहा जा चुका है तथा
स्मृतिके अभावमें धरोहर आदि रख कर भूल जाना, धरोहरको लौटानेकी याद न रहना आदि व्यवहारका भी
लोप हो जायगा । तथा—
“अबसे इक्यानवॅवें भवमें मैने एक पुषपको बलात्कारसे मार डाला, उस कर्मके खोटेफ लसे मेरा
पैर छिद गया है ।”
आदि वचनोंके लिए भी कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति, जरा और विनाश इन
चार क्षण पर्यंत जो वस्तुकी स्थिति मानी है ( क्षणिकवादका परिवर्तित रूप ), वह भी नहीं बन सकती ।
क्योंकि चार क्षणोंके बाद भी धरोहर आदिको रखकर भूल जाने और उसे लौटानेकी याद न रहने आदिका
व्यवहार देखा जाता है । इसलिए अनेक दोषोंके आनेपर भी क्षणभंगको मानना बौद्धोंका महान् साहस है ॥
यह श्लोकका अर्थ है ॥१८॥
भावार्थ—इस श्लोकमें बौद्धोंके 'क्षणभंग' वादपर विचार किया गया है। जैन लोगोंका कहना है
कि प्रत्येक वस्तु क्षणस्थायी माननेपर बौद्धोंके मतमें आत्मा कोई पृथक् पदार्थ नहीं बन सकता । तथा, आत्माके
न माननेपर ( १ ) संसार नहीं बनता, क्योंकि क्षणिकवादियोंके मतमें पूर्व और अपर क्षणोंमें कोई संबंध न
हो सकनेसे पूर्व जन्मके कर्मोंका जन्मांतरमें फल नहीं मिल सकता । बौद्ध लोग संतानको वस्तु मानते हैं ।
उनके मतानुसार संतानका एक क्षण दूसरे क्षणसे संबद्ध होता है, मरणके समय रहनेवाला ज्ञानक्षण भी
दूसरे विचारसे संबद्ध होता है, इसीलिये संसारकी परम्परा सिद्ध होती है । परन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि
संतानक्षणोंका परस्पर संबंध करनेवाला कोई पदार्थ नहीं है, जिससे दोनों क्षणोंका परस्पर संबंध हो सके ।
( २ ) आत्माके न माननेपर मोक्ष भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि संसारी आत्माका अभाव होनेसे मोक्ष
किसको मिलेगा । बौद्ध लोग सम्पूर्ण वासनाओंके नष्ट होजाने पर भावनाचतुष्टयसे होनेवाले विशुद्ध ज्ञानको
मोक्ष कहते हैं । परन्तु क्षणिकवादियोंके मतमें कार्य-कारण भाव नहीं सिद्ध होता । तथा, अशुद्ध ज्ञानसे
अशुद्ध ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है, विशुद्ध ज्ञान नहीं । तथा, जिस पुरुषके बंध हो, उसे ही मोक्ष मिलना
चाहिये । परन्तु क्षणिकवादियोंके मतमें बंधके क्षणसे मोक्षका क्षण दूसरा है, अतएव बद्ध पुरुषको मोक्ष नहीं
हो सकता । ( ३ ) अनात्मवादी बौद्धोंके मतमें स्मृतिज्ञान भी नहीं बन सकता । क्योंकि एक बुद्धिसे अनुभव
किये हुए पदार्थोंका दूसरी बुद्धिसे स्मरण नहीं हो सकता । स्मृतिके स्थानमें संतानको एक अलग पदार्थ मान
कर एक संतानका दूसरी संतानके साथ कार्य-कारण भाव माननेपर भी संतानक्षणोंकी परस्पर भिन्नता नहीं
मिट सकती, क्योंकि बौद्ध मतमें सम्पूर्ण क्षण परस्पर भिन्न हैं ।
१. लक्षणानि तथा जातिर्जरास्थितिरनित्यता ।
जाति जात्यादयस्तेषां तेऽष्टधर्मैकवृत्तयः ।
वसुबन्धुविरचिताभिधर्मकोशे २-४५,४६ ।
२४
१८६ श्रीमद्द्वाजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १९
अथ ताथागताः क्षणक्षयपक्षे सर्वव्यवहारानुपपत्तिं परैरुद्भावितामाकर्ण्य इत्थं प्रतिपाद-
यन्ति—यत् सर्वपदार्थानां क्षणिकत्वेऽपि वासनावललब्धजन्मना ऐक्याध्यवसायेन ऐहिका-
मुष्मिकव्यवहारप्रवृत्तेः कृतप्रणाशादिदोषा निरवकाशा एव इति । तदाकूतं परिहर्तुकामस्तत्क-
ल्पितवासनायाः क्षणपरम्परातो भेदाभेदानुभयलक्षणे पक्षत्रयेऽप्यघटमानत्वं दर्शयन् स्वाभि-
प्रेतभेदाभेदस्याद्वादमकामयमानानपि तानङ्गीकारयितुमाह—
सा वासना सा क्षणसन्ततिश्च नामेदभेदानुभयैर्घटेते ।
ततस्तदादर्शिशकुन्तपोतन्यायात्त्वदुक्तानि परे श्रयन्तु ॥१९॥
सा शाक्यपरिकल्पिता त्रुटितमुक्तावलीकल्पानां परस्परविशकलितानां क्षणानामन्योन्या-
नुस्यूतप्रत्ययजनिका एकसूत्रस्थानीया सन्तानापरपर्याया वासना । वासनेति पूर्वज्ञानजनिता-
मुत्तरज्ञाने शक्तिमाहुः । सा च क्षणसन्ततिस्तद्दर्शनप्रसिद्धा प्रदीपकलिकावत् नवनवोत्पद्यमाना-
परापरसदृशक्षणपरम्परा । एते द्वे अपि अभेदभेदानुभयैर्न घटेते ॥
न तावदभेदेन तादात्म्येन ते घटेते । तयोर्हि अभेदे वासना वा स्यात् क्षणपरम्परा वा,
बौद्ध—पदार्थोंके क्षणस्थायी होनेपर भी वासनासे उत्पन्न होनेवाले अभेद ज्ञानसे इस लोक और
परलोक संबंधी व्यवहार चल सकता है, अतएव 'कृतकर्मप्रणाश' आदि दोष हमारे सिद्धांतमें नहीं आ सकते ।
जैन—आप लोग जिस वासनाको स्वीकार करते हैं, वह कल्पित वासना क्षणपरम्परासे भिन्न, अभिन्न,
अथवा न भिन्न और न अभिन्न, ( अनुभय ) किसी भी तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव हमारे द्वारा
अभिप्रेत स्याद्वादके भेदाभेदको ही स्वीकार करना चाहिये—
श्लोकार्थ—वासना और क्षणसंतति परस्पर भिन्न, अभिन्न, और अनुभय—तीनों प्रकारसे किसी भी
तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव जिस प्रकार समुद्रमें, जहाजसे उड़ा हुआ पक्षी समुद्रका किनारा न देखकर
पीछे जहाजपर ही लौट आता है, उसी तरह उपायान्तर न होनेसे हे भगवन् ! बौद्ध लोगोंको आपके ही सिद्धा-
न्तोंका आश्रय लेना चाहिये ।
व्याख्यार्थ—जिसका अपर नाम संतान है, ऐसी बौद्धों द्वारा कल्पित वासना, त्रुटित मुक्तावलिके
भिन्न-भिन्न मोतियोंके समान, परस्पर भिन्न क्षण एक दूसरेसे अनुस्यूत हुए हैं, इस प्रकारका ज्ञान उत्पन्न
करनेवाली—एक सूत्रके समान होती है। पूर्व ज्ञानक्षणसे उत्तर ज्ञानक्षणमें उत्पन्न की हुई शक्तिको वासना
कहते हैं। दीपककी लौके समान नये नये उत्पन्न होनेवाले अपर अपर सदृश पूर्व और उत्तर क्षणोंकी परम्परा-
को क्षणसंतति कहते हैं । ( जिस प्रकार दीपककी लौके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहने पर भी लौके पूर्व और
उत्तर क्षणोंमें परस्पर सदृश ज्ञान होनेके कारण, यह वही लौ है, ऐसा ज्ञान होता है; उसी तरह पदार्थोंके
प्रत्येक क्षणमें बदलते रहनेपर भी पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सदृश ज्ञान होनेके कारण यह वही पदार्थ
है, ऐसा ज्ञान होता है । इसे ही बौद्ध मतमें क्षणसंतति कहा है । ) यह वासना और क्षणसंतति परस्पर
भिन्न, अभिन्न, अथवा अनुभय रूपसे किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती ।
(१) वासना ( संतति ) और क्षणसंततिको परस्पर अभिन्न मानना ठीक नहीं । क्योंकि वासना
१. यथा बीजादिष्वात्मानमन्तरेणापि प्रतिनियमेन कार्यं तदुत्पत्तिश्च क्रमेण भवति, तथा प्रकृतेऽपि परलोक-
गामिनमेकं विनापि कार्यकारणभावस्य नियामकत्वात्प्रतिनियतमेव फलं । क्लेशकर्माभिसंस्कृतस्य संतान-
स्याविच्छेदेन प्रवर्तनात् परलोके फलप्रतिलम्भोऽभिधीयते । इति नाकृताभ्यागमो न कृतविप्रणाशो बाधकं ।
बोधिचर्यावतारपंजिका पृ. ४७३ । अत्र शान्तरक्षितकृततत्त्वसंग्रहे कर्मफलसम्बन्धपरीक्षोनामप्रकरणम्
अवलोकयितव्यम् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १९ ] स्याद्वादमञ्जरी १८७
न द्वयम्। यद्धि यस्मादभिन्नं न तत् ततः पृथगुपलभ्यते, तथा घटाद् घटस्वरूपम्। केवलायां
वासनायामन्वयिस्वीकारः। वास्याभावे च किं तया वासनीयमस्तु। इति तस्या अपि न
स्वरूपमवतिष्ठते। क्षणपरम्परामात्राङ्गीकरणे च प्राञ्च एव दोषाः॥
न च भेदेन ते युज्येते। सा हि भिन्ना वासना क्षणिका वा स्यात् अक्षणिका वा?
क्षणिका चेत्, तर्हि क्षणेभ्यस्तस्याः पृथक्कल्पनं व्यर्थम्। अक्षणिका चेत्, अन्वयिपदार्थाभ्यु-
पगमेनागमबाधः। तथा च पदार्थान्तराणां क्षणिकत्वकल्पनाप्रयासो व्यसनमात्रम् ॥
अनुभयपक्षेणापि न घटते। स हि कदाचित् एवं ब्रूयात्, नाहं वासनायाः क्षण-
श्रेणितोऽभेदं प्रतिपद्ये, न च भेदं किंत्वनुभयमिति। तदप्यनुचितम्। भेदाभेदयोर्विधिनिषेध-
रूपयोरेकतरप्रतिषेधेऽन्यतरस्यावश्यं विधिभावात् अन्यतरपक्षाभ्युपगमः। तत्र च प्रागुक्त एव
दोषः। अथवाऽनुभयरूपत्वेऽवस्तुत्वप्रसङ्गः। भेदाभेदलक्षणपक्षद्वयव्यतिरिक्तस्य मार्गान्तरस्य
नास्तित्वात्। अनार्हतानां हि वस्तुना भिन्नेन वा भाव्यम् अभिन्नेन वा? तदुभयातीतस्य
वन्ध्यास्तनन्धयप्रायत्वात्। एवं विकल्पत्रयेऽपि क्षणपरम्परावासनयोरनुपपत्तौ पारिशेष्याद्
भेदाभेदपक्ष एव कक्षीकरणीयः। न च “प्रत्येकं यो भवेद् दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः।”
इति वचनादत्रापि दोषतादवस्थ्यमिति वाच्यम्। कुक्कुटसर्पनरसिंहादिवद् १ जात्यन्तरत्वाद-
नेकान्तपक्षस्य ॥
और क्षणसंततिके अभिन्न होनेसे वासना और क्षणसंतति दोनोंमेंसे किसी एकको ही मानना चाहिए दोनोंको
नहीं। जो पदार्थ जिससे अभिन्न होता है, वह उससे अलग नहीं पाया जाता। जैसे घटस्वरूप घटसे अभिन्न है,
इसलिये घटस्वरूप घटसे अलग नहीं पाया जाता। अतएव केवल वासनाको स्वीकार करना नित्य पदार्थको
स्वीकार करनेके समान है। तथा, वास्य (क्षणसंतति) को स्वीकार न करके केवल वासनाको स्वीकार करना
निष्प्रयोजन है। यदि केवल क्षणपरम्परा स्वीकार करो तो पूर्वोक्त दोष आते हैं।
(२) यदि वासना और क्षणसंततिको परस्पर भिन्न मानो तो वासना क्षणिक है, अथवा अक्षणिक ?
यदि वासना क्षणिक है तो वासनाको क्षणोंसे भिन्न मानना निरर्थक है। यदि वासना अक्षणिक है तो वासना
को नित्य माननेसे आपके आगमसे विरोध आता है, इसलिये पदार्थोंके क्षणिकत्वकी कल्पनाका प्रयास
व्यसनमात्र है।
(३) वासना और क्षणसंततिमें भेद और अभेदसे विलक्षण भेदाभेदका अभाव (अनुभय) भी
नहीं बन सकता। क्योंकि भेद विधिरूप है, और अभेद निषेधरूप, इसलिये एकके निषेध करनेपर दूसरेको
स्वीकार करना पड़ता है—भेद न माननेसे अभेद, और अभेद न मानसे, भेद मानना पड़ता है। यह ठीक
नहीं है। अलग-अलग भेद और अभेद पक्ष स्वीकार करनेमें दोष दिये जा चुके हैं। तथा, वासना और क्षण-
संततिका संबंध परस्पर भेदाभेदके अभावरूप मानने पर क्षणसंतति और वासनाको अवस्तु अर्थात् कल्पित ही
कहना चाहिये, क्योंकि बौद्धोंके मतमें भेद और अभेदसे विलक्षण तीसरा पक्ष नहीं बन सकता। अनेकांत-
वादियोंको छोड़कर अन्य वादियोंके मतमें पदार्थोंके परस्पर भेद और अभेदसे विलक्षण तीसरा पक्ष वंध्यापुत्रके
समान, संभव नहीं है। अतएव भेद, अभेद और अनुभय तीनों विकल्पोंसे वासना और क्षणपरम्परा
सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये वासना और क्षणपरम्परामें भेदाभेद ही स्वीकार करना चाहिये। यदि
कहो कि “भेद और अभेद पक्ष स्वीकार करनेमें जो दोष आते हैं, वे सब दोष भेदाभेद माननेमें भी आते हैं”
तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जैसे कुक्कुटसर्पमें कुक्कुट और सर्प दोनोंसे विलक्षण, और नरसिंहमें नर और
१. यथा नरसिंहे नरत्वसिंहत्वोभयजातिव्यतिरिक्तं नरसिंहत्वाख्यं जात्यन्तरम्, तद्वदित्यर्थः। कुक्कुटसर्पोऽपि
कश्चन कुक्कुटत्वसर्पत्वेत्युभयजातिव्यतिरिक्तः कुक्कुटसर्पत्वजातिमान् प्राणिविशेषः स्यात्।
१८८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १९
ननु आर्हतानां वासनाक्षणपरस्परयोरङ्गीकार एव नास्ति तत्कथं तदाश्रयभेदाभेदचिन्ता
चरितार्था इति चेत्, नैवम् । स्याद्वादवादिनामपि हि प्रतिक्षणं नवनवपर्यायपरम्परोत्पत्तिर-
भिमतैव । तथा च क्षणिकत्वम् । अतीतानागतवर्तमानपर्यायपरम्परानुसंधायकं चान्वयि-
द्रव्यम् । तच्च वासनेति संज्ञान्तरभागप्यभिमतमेव । न खलु नामभेदाद् वादः कोऽपि कोवि-
दानाम् । सा च प्रतिक्षणोत्पदिष्णुपर्यायपरम्परा अन्वयिद्रव्यात् कथंचिद् भिन्ना कथंचिद-
भिन्ना । तथा तदपि तस्याः स्याद् भिन्नं स्यादभिन्नम् । इति पृथक्प्रत्ययव्यपदेशविषयत्वाद्
भेदः, द्रव्यस्यैव च तथा तथा परिणमनादभेदः । एतच्च सकलादेशविकलादेशव्याख्याने पुरस्तात्
प्रपञ्चयिष्यामः ॥
अपि च, बौद्धमते वासनापि तावन्न घटते, इति निर्विषया तत्र भेदादिविकल्पचिन्ता ।
तल्लक्षणं हि पूर्वक्षणेनोत्तरक्षणस्य वास्यता । न चास्थिराणां भिन्नकालतयान्योन्यासंबद्धानां
च तेषां वास्यवासकभावो युज्यते । स्थिरस्य संबद्धस्य च वस्त्रादेर्मृगमदादिना वास्यत्वं
दृष्टमिति ॥
अथ पूर्वचित्तसहजात् चेतनाविशेषात् पूर्वशक्तिविशिष्टं चित्तमुत्पद्यते, सोऽस्य शक्ति-
विशिष्टचित्तोत्पादो वासना । तथाहि । पूर्वचित्तं रूपादिविषयं प्रवृत्तिविज्ञानं यत्तत् षड्विधं ।
सिंह दोनोंसे विलक्षण तीसरा रूप पाया जाता है, उसी तरह अनेकांत पक्षमें भेद और अभेद दोनोंसे भिन्न
तीसरा पक्ष स्वीकार किया गया है ।
शंका—जैन लोगोंने वासना और क्षणपरम्पराको स्वीकार ही नहीं किया, फिर वासना और क्षण
परम्परामें भेद, अभेद आदिके विकल्प करना असंगत है । समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि स्याद्वादी
लोगोंने प्रत्येक द्रव्यमें क्षण-क्षणमें नयी-नयी पर्यायोंकी परम्पराकी उत्पत्ति स्वीकार की है। इसीको जैन लोग
क्षणपरम्परा कहते हैं । इसी प्रकार अतीत, अनागत, और वर्तमान पर्यायोंका संबंध करानेवाला नित्य द्रव्य
भी जैन लोगोंने माना है । इस नित्य द्रव्यको वासना भी कह सकते हैं । अतएव पर्याय और क्षण-परम्परा,
तथा द्रव्य और वासनामें नाम मात्रका अन्तर है । तथा, पर्याय परंपरा नित्य द्रव्यसे कथंचित् भिन्न है और
कथंचित् अभिन्न । नित्य द्रव्य भी प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली पर्यायपरम्परासे कथंचित् भिन्न है और कथंचित्
अभिन्न है । इस प्रकार अन्वयिद्रव्य और पर्यायके भिन्न ज्ञान और भिन्न संज्ञाका विषय होनेके कारण, दोनोंमें
भेद है; तथा द्रव्य और पर्याय अभिन्न हैं, क्योंकि एक ही द्रव्य भिन्न-भिन्न रूप पर्यायोंको धारण करता है ।
अतएव वासना और क्षणसंततिको भी भिन्नाभिन्न ही स्वीकार करना चाहिये । द्रव्य और पर्यायके कथंचित्
भेदाभेद का खुलासा सकलादेश और विकलादेशका स्वरूप वर्णन करनेके अवसरपर ( २३ वें श्लोकमें )
किया जायेगा ।
बौद्धोंके मतमें 'वासना' ही सिद्ध नहीं होती, अतएव वासना और क्षणपरम्परामें भेद आदिकी
कल्पना निरर्थक है । ( वासना और क्षणसंतति इन दोनोंका सद्भाव होनेपर ही भेद आदि विकल्पका
अवकाश हो सकता है । भेद आदि विकल्पोंके द्वारा तब विचार किया जा सकता है जब दोनोंका सद्भाव
हो । वासनाका अभाव होनेपर एकमात्र क्षणसंततिका सद्भाव रहनेसे भेद आदि विकल्पोंके द्वारा विचार नहीं
किया जा सकता ) । पूर्वक्षणके द्वारा उत्तरक्षणकी वास्यता-पूर्वक्षणके द्वारा उत्तरक्षणमें शक्तिकी उत्पाद्यता-
ही वासनाका लक्षण है । परन्तु बौद्धोंके मतमें क्षण स्वयं अस्थिर हैं, इसलिये परस्पर भिन्न और असंबद्ध
क्षणोंमें वास्य-वासक सम्बन्ध नहीं बन सकता । क्योंकि नित्य और कस्तूरीसे सम्बद्ध नित्य वस्त्रमें ही
कस्तूरीसे वासना उत्पन्न हो सकती है ।
शंका—रूप आदिको विषय बनानेवाले प्रवृत्तिविज्ञान रूप पूर्व चित्तके साथ उत्पन्न आलयविज्ञान
रूप चेतनाविशेषसे पूर्वचित्तकी शक्तिसे युक्त चित्त ( ज्ञान ) उत्पन्न होता है । इस शक्तिविशिष्ट
पञ्च रूपादिज्ञानान्यविकल्पकानि षष्ठं च विकल्पविज्ञानम्¹ । तेन सह जातः समानकाल-
श्चेतनाविशेषोऽहङ्कारास्पदमहालयविज्ञानम्² । तस्मात् पूर्वशक्तिविशिष्टचित्तोत्पादो वासनेति ॥
तदपि न । अस्थिरत्वाद्वासकेनासंबन्धाच्च । यश्चासौ चेतनाविशेषः पूर्वचित्तसहभावी,
स न वर्तमाने चेतस्युपकारं करोति । वर्तमानस्याशक्यापनेयोपनेयतवेनाविकार्यत्वात् । तद्धि
यथाभूतं जायते तथाभूतं विनश्यतीति । नाप्यनागते उपकारं करोति । तेन सहासंबद्धत्वात् ।
चित्तका उत्पन्न होना ही वासना है। तथाहि-रूप आदिको अपना विषय बनानेवाला प्रवृत्तिविज्ञान
संज्ञा वाला जो पूर्व चित्त है, वह छह प्रकारका है—पाँच अविकल्पक रूप आदि विज्ञान और छठा विकल्प-
विज्ञान । इस प्रवृत्तिविज्ञान रूप पूर्व चित्तके साथ उत्पन्न अतएव समानकाल वाला, अहंकारका कारणभूत
चेतनाविशेष आलयविज्ञान है। इस आलयविज्ञान रूप चेतनाविशेषसे पूर्व चित्तकी—पूर्व चित्त द्वारा
जनित शक्तिविशिष्ट चित्तको—उत्पत्ति होना वासना है। (प्रवृत्तिविज्ञान और आलयविज्ञान दोनों एक साथ
उत्पन्न होते हैं। आलयविज्ञानसे प्रवृत्तिविज्ञानकी शक्तिविशिष्ट जिस चित्त (ज्ञान) की उत्पत्ति होती
है, वही वासना है। जिस प्रकार पवनके द्वारा समुद्रमें लहरें उठती हैं, उसी तरह अहंकारसंयुक्त चेतना
(आलयविज्ञान) में आलम्बन, समनन्तर, सहकारी और अधिपति प्रत्ययोंद्वारा प्रवृत्तिविज्ञान रूप धर्म
उत्पन्न होता है। शब्द आदि ग्रहण करनेवाले पूर्व चित्तको प्रवृत्तिविज्ञान कहते हैं। यह प्रवृत्तिविज्ञान
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और विकल्पविज्ञानके भेदसे छह प्रकारका है। शब्द, स्पर्श आदिको ग्रहण
करनेवाले पाँच विज्ञानोंको निर्विकल्प (जिस ज्ञानमें विशेषाकार रूप नाना प्रकारके भिन्न-भिन्न पदार्थ
प्रतिभासित हों) और विकल्पविज्ञानको सविकल्प (जिस ज्ञानमें सब पदार्थ विज्ञान रूप प्रतिभासित हों)
कहा गया है। इन्हीं ज्ञानोंको बौद्ध लोग चित्त कहते हैं। सौत्रान्तिक बौद्धोंके मतमें प्रत्येक वस्तुके बाह्य और
आन्तर दो भेद हैं। बाह्य भूत और भौतिकके भेदसे दो प्रकारका है। पृथ्वी आदि चार परमाणु भूत हैं, और
रूप आदि और चक्षु आदि भौतिक हैं। आन्तर चित्त और चैत्तिकके भेदसे दो प्रकारका है। विज्ञानको चित्त
अथवा चैत्तिक, और बाकीके रूप, वेदना, संज्ञा और संस्कार स्कन्धोंको चैत्त कहते हैं। प्रवृत्तिविज्ञानके साथ
एक कालमें उत्पन्न होनेवाले अहंकारसे युक्त चेतनाको आलयविज्ञान कहते हैं। इस आलयविज्ञानसे पूर्वक्षणसे
उत्पन्न चेतनाकी शक्तिविशिष्ट उत्तर चित्त उत्पन्न होता है। इसी आलयविज्ञानको वासना कहा है)।
समाधान—यह ठीक नहीं है। क्योंकि प्रत्येक चित्तक्षण क्षणिक होनेके कारण अस्थिर होता है—
अन्वयी नहीं होता, तथा वासक-वासनाजन्य आलयविज्ञान रूप चित्तक्षणके साथ उसके सम्बन्धका अभाव
रहता है। तथा पूर्वचित्तके (प्रवृत्तिविज्ञानके) साथ उत्पन्न होनेवाली चेतनाविशेष (आलयविज्ञान) वर्तमान
(क्षणिक) चित्तक्षणमें विशेषको उत्पन्न नहीं कर सकती। क्योंकि बौद्धोंके मतमें वर्तमान चित्तक्षणके क्षणिक
होनेसे, उसकी उत्पत्ति और विनाश असंभव होनेके कारण, उसमें विकार नहीं होता। वह चित्तक्षण जिस
रूपसे, उत्पन्न होता है उसी रूपसे विनाशको प्राप्त हो जाता है। आलयविज्ञान भविष्यकालीन चित्तक्षणमें भी
विशेष की उत्पत्ति नहीं करता, क्योंकि अनागत (भविष्य) चित्तक्षणके साथ वासक चित्तक्षणका—वासनाजनक
आलयविज्ञान रूप चित्तक्षणका—सम्बन्ध नहीं होता। जो असंबद्ध रहता है वह विशेषरूप विकारको उत्पन्न
नहीं कर सकता (जब आलयविज्ञान ही घटित नहीं होता तो फिर वासनाकी उत्पत्ति किससे होगी ?)
१. तत्रालयविज्ञानं नामाहंमास्पदं विज्ञानं । नीलाद्युल्लेखि च विज्ञानं प्रवृत्तिविज्ञानम् ।
२. तरंगा ह्युदधेर्यद्वत् पवनः प्रययेरिताः । नृत्यमानाः प्रवर्तन्ते विच्छेदश्च न विद्यते ॥
आलयौघस्तथा नित्यं विषयपवनेरितः । चित्रैस्तरङ्गविज्ञानैः नृत्यमानः प्रवर्तते ॥
लंकावतारसूत्रे ११-९९, १०० ।
१९० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १९
असंयुक्तं च न भावयतीत्युक्तम् । तस्मात् सौगतमते वासनापि न घटते । अत्र च स्तुति-
कारेणाभ्युपेत्यापि ताम् अन्वयिद्रव्यस्थापनाय भेदाभेदादिचर्चा विरचितेति भावनीयम् ॥
अथोत्तरार्द्धव्याख्या । तत इति पक्षत्रयेऽपि दोषसद्भावात् त्वदुक्तानि भवद्वचनानि
भेदाभेदस्याद्वादसंवादपूतानि, परे कुतीर्थ्याः प्रकरणात् सायातनयाः श्रयन्तु आद्रियन्ताम् ।
अत्रोपमानमाह तटादर्शीत्यादि । तटं न पश्यतीति तटादर्शी । यः शकुन्तपोतः पक्षिशावकः
तस्य न्याय उदाहरणम् तस्मात् । यथा किल कथमप्यपारपारावारान्तःपतितः काकादिशकुनि-
शावको बहिर्निर्गमिषया प्रवहणकूपस्तम्भादेस्तटप्राप्तये सुग्धतयोड्डीनः, समन्ताज्जलैकार्णव-
मेवावलोकयंस्तटमदृष्ट्वैव निर्वेदात् व्यावृत्त्य त
अन्य. यो. व्य. श्लोक १९ ] स्याद्वादमञ्जरी १६१
पोतसमानं त्वच्छासनम्, कूपस्तम्भसंनिभः स्याद्वादः। पक्षिपोतोपमा वादिनः। ते च स्वाभि-
मतपक्षप्ररूपणोड्डयनेन मुक्तिलक्षणतटप्राप्तये कृतप्रयत्ना अपि तस्माद् इष्टार्थसिद्धिमपश्यन्तो
व्यावृत्त्य स्याद्वादरूपकूपस्तम्भालङ्कृततावकीनशासनप्रवहणोपसर्पणमेव यदि शरणीकुर्वते,
तदा तेषां भवार्णवाद् बहिर्निष्क्रमणमनोरथः सफलतां कलयति नापरथा ॥इति काव्यार्थः ॥१९॥
एवं क्रियावादिनां१ प्रावादुकानां कतिपयकुग्रहनिग्रहं विधाय सांप्रतमक्रियावादिनां
लौकायतिकानं२ मतं सर्वाधमत्वादन्ते उपन्यस्यन् तन्मतमूलस्य प्रत्यक्षप्रमाणस्यानुमानादि-
प्रमाणान्तरानङ्गीकारेऽकिंचित्करत्वप्रदर्शनेन तेषां प्रज्ञायाः प्रमादमादर्शयति—
क्षणमें नष्ट होता हैं, कोई भी वस्तु नित्य नहीं है । जिस प्रकार दीपककी लौके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहते
हुए भी लौके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें एकसा ज्ञान होनेके कारण यह वही लौ है, यह ज्ञान होता है, वैसे ही
पदार्थोंके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहनेपर भी पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें एकसा ज्ञान होनेसे पदार्थको
एकताका ज्ञान होता है । पदार्थोंके प्रत्येक क्षणमें नष्ट होते हुए भी परस्पर भिन्न क्षणोंको जोड़नेवाली शक्ति-
को वासना, अथवा सन्तान कहते हैं। यह नाना क्षणोंकी परम्परा ही वासना है। इसी वासनाकी उत्तरोत्तर
अनेक क्षणपरंपराके कार्य-कारण सम्बन्धसे कर्ता, भोक्ता आदिका व्यवहार होता है, वास्तवमें कर्ता और
भोक्ता कोई नित्य पदार्थ नहीं है। जैन—वासना और क्षणसंतति परस्पर अभिन्न हैं, भिन्न हैं, अथवा
अनुभय ? ( क ) यदि वासना और क्षणसंतति अभिन्न हैं, तो दोमेंसे एकको ही मानना चाहिये । ( ख )
यदि वासना और क्षणसंततिको भिन्न मानो, तो दोनोंमें कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता । ( ग ) भिन्न और
अभिन्न दोनों विकल्प स्वीकार न करके यदि वासना और क्षणसंतति भिन्न-अभिन्नके अभाव रूप मानो, तो
अनेकान्त मत छोड़ कर, दूसरे वादियोंके मतमें भेद और अभेदसे विलक्षण कोई तीसरा पक्ष नहीं बन सकता ।
विज्ञानवादी बौद्ध—हम लोग आलयविज्ञानको वासना कहते हैं। अहंकार-संयुक्त चेतनाको
आलयविज्ञान कहते हैं। आलयविज्ञानमें प्रवृत्तिविज्ञान रूप सम्पूर्ण धर्म कार्य रूपसे उत्पन्न होते हैं, इस
आलयविज्ञानसे पूर्व क्षणसे उत्पन्न चेतनाकी शक्तिसे युक्त उत्तर क्षण उत्पन्न होता है। इसी आलयविज्ञान
( वासना ) से परस्पर भिन्न पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सम्बन्ध होता है। जैन—क्षणिकवादी बौद्धोंके मतमें
स्वयं आलयविज्ञान भी नित्य नहीं कहा जा सकता । अतएव क्षणिक आलयविज्ञान परस्पर असंबद्ध पूर्व और
उत्तर क्षणोंको नहीं जोड़ सकता । इसलिये आलयविज्ञान द्वारा पूर्व क्षणसे उत्तरक्षणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
अतएव बौद्धोंको पदार्थोंको सर्वथा अनित्य न मान कर कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य ही मानना
चाहिये । क्योंकि प्रत्येक वस्तु क्षणमें नयी-नयी उत्पन्न होनेकी अपेक्षा अनित्य है, तथा वस्तुकी क्षण-क्षणमें
पलटनेवाली भूत, भविष्य और वर्तमान पर्याय किसी नित्य द्रव्य ( वासना ) से परस्पर संबद्ध होती है, इस-
लिये अनित्य है ।
इस प्रकार क्रियावादियों ( आत्मवादी ) के सिद्धान्तोंका खंडन करके, अक्रियावादी ( अनात्मवादी )
लोकायत लोगोंके मतका खंडन करते हुए, अनुमान आदि प्रमाणोंके बिना प्रत्यक्ष प्रमाणकी असिद्धि बता कर
उनके ज्ञानकी मन्दता दिखाते हैं—
१. क्रियावादिनो नाम येषामात्मनोऽस्तित्वं प्रत्यविप्रतिपत्तिः । ये त्वक्रियावादिनस्तेऽस्तीति क्रियाविशिष्टमात्मानं
नेच्छन्त्येव, अस्तित्वे वा शरीरेण सहैकत्वान्यत्वाभ्यामवक्तव्यत्वमिच्छन्ति । उत्तराध्ययनसूत्रे २३, शीलांक-
टीकायां ।
२. लोकाः निर्विचाराः सामान्यलोकास्तद्वदाचरन्ति स्मेति लोकायता लोकायतिका इत्यपि । बृहस्पति-
प्रणीतमतत्वेन बार्हस्पत्याश्चेति । षड्दर्शनसमुच्चयोपरि गुणरत्नटीकायां पृ०.१२२.।
१९२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २०
विनानुमानेन पराभिसन्धिमसंविदानस्य तु नास्तिकस्य ।
न साम्प्रतं वक्तुमपि क्व चेष्टा क्व दृष्टमात्रं च दृहा प्रमादः ॥२०॥
प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमिति मन्यते चार्वाकः । तत्र सन्नह्यते । अनु पश्चाद् लिङ्गसंवन्ध-
ग्रहणस्मरणानन्तरम् मीयते परिच्छिद्यते देशकालस्वभावविप्रकृष्टोऽर्थोऽनेन ज्ञानविशेषेण
इत्यनुमानं । प्रस्तावात् स्वार्थानुमानम्' । तेनानुमानेन लैङ्गिकप्रामाणेन विना पराभिसन्धिं
पराभिप्रायम्, असंविदानस्य सम्यग् अजानानस्य । तुशब्दः पूर्ववादिभ्यो भेदद्योतनार्थः ।
पूर्वेषां वादिनामास्तिकतया विप्रतिपत्तिस्थानेषु क्षोदः कृतः, नास्तिकस्य तु वक्तुमपि नौचिती
कुत एव तेन सह क्षोद इति तुशब्दार्थः । नास्ति परलोकः पुण्यम् पापम् इति वा मतिरस्य ।
"नास्तिकास्तिकदैष्टिकम्" इति निपातनात् नास्तिकः । तस्य नास्तिकस्य लौकायतिकस्य,
वक्तुमपि न सांप्रतं वचनमप्युच्चारयितुं नोचितम् । ततस्तूष्णींभाव एवास्य श्रेयान्, दूरे प्रामा-
णिकपरिषदि प्रविश्य प्रमाणोपन्यासगोष्ठी ॥
वचनं हि परप्रत्यायनाय प्रतिपाद्यते । परेण चाप्रतिपित्सितमर्थं प्रतिपादयन् नासौ
सतामवधेयवचनो भवति, उन्मत्तवत् । ननु कथमिव तूष्णीकतैवास्य श्रेयसी यावता चेष्टा-
विशेषादिना प्रतिपाद्यस्याभिप्रायमनुमाय सुकरमेवानेन वचनोच्चारणम् इत्याशङ्कयाह क्व
चेष्टा क्व दृष्टमात्रं च इति । क्वेति बृहदन्तरे । चेष्टा इङ्गितम् । पराभिप्रायस्यानुमेयस्य
लिङ्गम् । क्व च दृष्टमात्रम् । दर्शनं दृष्टं । भावे क्तः । दृष्टमेव दृष्टमात्रम् प्रत्यक्षमात्रम्, तस्य
लिङ्गनिरपेक्षप्रवृत्तित्वात् । अत एव दूरमन्तरमेतयोः । न हि प्रत्यक्षेणातीन्द्रियाः परचेतोवृत्तयः
श्लोकार्थ- अनुमानके बिना चार्वाक लोग दूसरेका अभिप्राय नहीं समझ सकते । अतएव चार्वाक
लोगोंको बोलनेकी चेष्टा भी नहीं करनी चाहिये । क्योंकि चेष्टा और प्रत्यक्ष दोनोंमें बहुत अन्तर है । यह
कितना प्रमाद है !
व्याख्यार्थ- चार्वाक- केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । इसलिये पांच इन्द्रियोंके विषयके बाह्य
कोई वस्तु नहीं है । जैन - जिसके द्वारा अविनाभाव सम्बन्धके स्मरणपूर्वक देश, काल और स्वभाव सम्वन्धी
दूर पदार्थोंका ज्ञान हो, उसे स्वार्थानुमान कहते हैं (अनु पश्चात् मीयते परिच्छिद्यते) स्वार्थानुमान परोपदेशके
बिना होता है, और परार्थानुमानमें दूसरोंको समझानेके लिये पक्ष और हेतुका प्रयोग किया जाता है । अनु-
मान प्रमाणके बिना दूसरोंका अभिप्राय समझमें नहीं आ सकता । अब तकके श्लोकोंमें आस्तिक मतका खंडन
किया गया है । परलोक, पुण्य और पापको न माननेवाले नास्तिक चार्वाक लोग वचनोंका उच्चारण भी
नहीं कर सकते, अतएव नास्तिकोंके लिये प्रामाणिक पुरुषोंकी सभासे दूर रह कर मौन रहना ही श्रेयस्कर
है । "नास्तिकास्तिकदैष्टिकम्" इस निपात सूत्रसे नास्तिक शब्द बनता है ।
दूसरोंको ज्ञान करानेके लिये ही वचनोंका प्रयोग किया जाता है । दूसरेके द्वारा अप्रतिपित्सित
(जिसे जानने की इच्छा न हो ) अर्थको प्रतिपादन करनेवालेका वचन उन्मत्त पुरुषके वचनके समान आदर-
णीय नहीं हो सकते । 'इसका मौन रहना ही कैसे श्रेयस्कर हो सकता हैं ? दूसरेके अनुमानका विषय बने हुए
अभिप्रायको जाननेकी चेष्टाविशेष आदिसे, जिसको प्रतिपादन करना होता है, उसका अभिप्राय जानकर,
उसके द्वारा वचनोच्चारण करना ठीक हैं' - इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं । कहाँ चेष्टा ( इंगित ) और
कहाँ प्रत्यक्षदर्शन ! दूसरेके अभिप्रायको बतानेवाली चेष्टामें और प्रत्यक्षसे किसी पदार्थको जाननेमें बहुत
अन्तर है । क्योंकि चेष्टा दूसरेके अभिप्रायको जाननेमें लिंग है, और प्रत्यक्ष लिंगके बिना ही उत्पन्न होता है ।
प्रत्यक्षसे इन्द्रियोंके बाह्य दूसरेके मनका अभिप्राय नहीं जाना जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष इन्द्रियजन्य ही होता
१. अनुमानं द्विविधं स्वार्थं परार्थं च । तत्र हेतुग्रहणसम्बन्धस्मरणकारकं साध्यविधानं स्वार्थम् । पक्षहेतुवचनात्मकं
परार्थमनुमानमुपचारात् । प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कारे ३-१०, २३ । २ हैमसूत्रे ६-४-६६ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २० ] स्याद्वादमञ्जरी १९३
परिज्ञातुं शक्याः, तस्यैन्द्रियकत्वात् । मुखप्रसादादिचेष्टया तु लिङ्गभूतया पराभिप्रायस्य निश्चये
अनुमानप्रमाणमनिच्छतोऽपि तस्य बलादापतितम् । तथाहि—मद्वचनश्रवणाभिप्रायवानयं
पुरुषः, तादृग् मुखप्रसादादिचेष्टान्यथानुपपत्तेरिति । अतश्च हहा प्रमादः । हहा इति खेदे ।
अहो तस्य प्रमादः प्रमत्तता, यदनुभूयमानमप्यनुमानं प्रत्यक्षमात्राङ्गीकारेणापह्नुते ॥
अत्र संपूर्वस्य वेत्तेरकर्मकत्वे एवात्मनेपदम्, अत्र तु कर्मास्ति तत्कथमत्रानश् । अत्रो-
च्यते । अत्र संवेदितुं शक्तः संविदान इति कार्यम् । “वयःशक्तिशीले”१ इति शक्तौ शानविधा-
नात् । ततश्चायमर्थः । अनुमानेन विना पराभिसंहितं सम्यग् वेदितुमशक्तस्येति । एवं परबुद्धि-
ज्ञानान्यथानुपपत्त्यायमनुमानं हठाद् अङ्गीकारितः ॥
तथा प्रकारान्तरेणाप्ययमङ्गीकारयितव्यः । तथाहि—चार्वाकः काश्चित् ज्ञानव्यक्तीः संवा-
दित्वेनाव्यभिचारिणीरुपलभ्य, अन्याश्च विसंवादित्वेन व्यभिचारिणीः पुनः कालान्तरे तादृशी-
तराणां ज्ञानव्यक्तीनामवश्यं प्रमाणतेतरते व्यवस्थापयेत् ; न च संनिहितार्थबलेनोत्पद्यमानं
पूर्वापरपरामर्शशून्यं प्रत्यक्षं पूर्वापरकालभाविनीनां ज्ञानव्यक्तीनां प्रामाण्याप्रामाण्यव्यवस्थापकं
निमित्तमुपलक्षयितुं क्षमते । न चायं स्वप्रतीतिगोचराणामपि ज्ञानव्यक्तीनां परं प्रति प्रामाण्यम-
प्रामाण्यं वा व्यवस्थापयितुं प्रभवति । तस्माद् यथादृष्टज्ञानव्यक्तिसाधर्म्यद्वारेणेदानीन्तनज्ञान-
व्यक्तीनां प्रामाण्याप्रामाण्यव्यवस्थापकम् परप्रतिपादकं च प्रमाणान्तरमनुमानरूपमुपासीत ।
है । अतएव लिंगभूत मुख आदिकी चेष्टासे दूसरेके अभिप्रायको जाननेके लिये अनुमान प्रमाणको स्वीकार
करनेकी अनिच्छा होनेपर भी प्रत्यक्षके अतिरिक्त अनुमान प्रमाणको जबरन मानना पड़ता है । तथाहि—'यह
पुरुष मेरे वचनोंको सुननेकी इच्छा रखता है, क्योंकि यदि उसकी उक्त इच्छा न होती तो उसकी मुख-
प्रसाद आदि रूप चेष्टायें न दिखाई देतीं'—इस प्रकारका ज्ञान अनुमानके बिना नहीं होता । खेद है कि चार्वाक
लोग इस प्रकार अनुमान प्रमाणका अनुभव करते हुए भी अनुमानको उड़ाकर केवल प्रत्यक्षको ही स्वीकार
करना चाहते हैं।
शंका—सं-विद् धातु अकर्मक होनेपर आत्मनेपदमें ही प्रयुक्त होती है, इसलिये यहाँ 'पराभिसन्धिम्'
कर्मके होते हुए सं-विद् धातुमें 'आनश्' प्रत्यय होकर 'संविदानस्य' शब्द नहीं बन सकता । समाधान—
जो जाननेके लिये समर्थ हो, उसे 'संविदान' कहते है । यहाँ “वयःशक्तिशीले” सूत्रसे सामर्थ्यके अर्थमें 'शान'
प्रत्यय होनेसे 'संविदान' शब्द बना है । इसलिये यहाँ यह अर्थ होता है कि नास्तिक लोग दूसरे लोगोंके
अभिप्रायको सम्यक्रूपसे समझनेमें असमर्थ (असंविदानस्य) हैं, अतएव दूसरेके अभिप्रायको जाननेके लिये
अनुमान प्रमाण अवश्य मानना चाहिये ।
(क) तथा, प्रकारान्तसे भी अनुमान प्रमाण अंगीकार करना आवश्यक है। तथाहि—संवादी
होनेके कारण कुछ ज्ञानव्यक्तियोंको अव्यभिचारी, तथा विसंवादी होनेके कारण अन्य ज्ञानव्यक्तियोंको व्यभि-
चारी जानकर, पुनः कालान्तरमें संवादी एवं विसंवादी ज्ञानव्यक्तियोंकी प्रमाणता और अप्रमाणताका चार्वाक
अवश्यमेव निर्णय कर सकता है । किन्तु पूर्व एवं अपरकालमें उत्पन्न होनेवाले ज्ञानव्यक्तियोंके प्रामाण्य और
अप्रामाण्यका निर्णय करनेमें साधनभूत समीपस्थ अर्थके बलसे उत्पन्न होनेवाले पूर्व एवं अपर कालवर्ती पदार्थों-
के संबंधसे शून्य प्रत्यक्षको लक्ष्य करनेके लियें वह समर्थ नहीं है। अपने अनुभवका विषय बने हुए ज्ञानव्यक्तियों-
का दूसरेके लिये प्रमाण्य और अप्रामाण्यका निश्चय करनेके लिये चार्वाक समर्थ नहीं है। (ख) चार्वाक लोग
प्रत्यक्षसे दूसरोंके प्रति ज्ञानको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं ठहरा सकते। अतएव पूर्व कालमें जाने हुए ज्ञान-
की समानता देखकर वर्तमान कालके ज्ञानको प्रमाण अथवा अप्रमाण ठहरानेके लिये प्रत्यक्षके अतिरिक्त
अनुमानके रूपमें कोई दूसरा प्रमाण अवश्य मानना चाहिये । प्रत्यक्षके अतिरिक्त दूसरा प्रमाण अनुमान ही हो
१. हैमसूत्रे ५-२-२४
२५
१९४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २०
परलोकादिनिषेधश्च न प्रत्यक्षमात्रेण शक्यः कर्तुम्, संनिहितमात्रविषयत्वात् तस्य । परलोका-
दिकं चाप्रतिषिध्य नायं सुखमास्ते, प्रमाणान्तरं च नेच्छतीति डिम्भहेवाकः ॥
किञ्च, प्रत्यक्षस्याप्यर्थाव्यभिचारादेव प्रामाण्यम्, कथमितरथा स्नानपानावगाहनाद्यर्थ-
क्रियाऽसमर्थे मरुमरीचिकानिचयचुम्बिनि जलज्ञाने न प्रामाण्यम् ? तच्च अर्थप्रतिबद्धलिङ्गशब्द-
द्वारा समुन्मज्जतोरनुमानागमयोरप्यर्थाव्यभिचारादेव किं नेष्यते ? व्यभिचारिणोरप्यनयोर्दर्श-
नाद् अप्रामाण्यमिति चेत्, प्रत्यक्षस्यापि तिमिरादिदोषाद् निशीथिनीनाथयुगलावलम्बिनोऽ-
प्रमाणस्य दर्शनात् सर्वत्राप्रामाण्यप्रसङ्गः । प्रत्यक्षाभासं तदिति चेत्, इतरत्रापि तुल्यमेतत्
अन्यत्र पक्षपातात् । एवं च प्रत्यक्षमात्रेण वस्तुव्यवस्थानुपपत्तेः तन्मूला जीवपुण्यापुण्यपरलोक-
निषेधादिवादा अप्रमाणमेव ॥
एवं नास्तिकाभिमतो भूतचिद्वादोऽपि निराकार्यः । तथा च द्रव्यालङ्कारकारौ उपयोग-
वर्णने—"न चायं भूतधर्मः सत्त्वकठिनत्वादिवद् मद्याङ्गेषु भ्रम्यादिसद्गशक्तिवद् वा प्रत्येक-
मनुपलम्भात् । अनभिव्यक्तावात्मसिद्धिः । कायाकारपरिणतेभ्यस्तेभ्यः स उत्पद्यते इति चेत्,
कायपरिणामोऽपि तन्मात्रभावी न कादाचित्कः । अन्यस्त्वात्मैव स्यात् । अहेतुत्वे न देशादि-
सकता है । (ग) प्रत्यक्ष प्रमाणसे परलोक आदिका निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष पासके पदार्थों-
को ही जान सकता है । परलोकका अभाव माने बिना चार्वाक लोगोंको शांति नहीं मिलती, और साथ ही
वे लोग प्रत्यक्षके अतिरिक्त अन्य प्रमाण न माननेकी भी हठ करते हैं—यह कैसी बालचेष्टा है !
तथा, प्रत्यक्षका प्रामाण्य ( ज्ञेयार्थको जाननेकी क्रियाकी-प्रमितिकी-उत्पत्तिमें साधकतम )
प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञेय पदार्थके ज्ञानका अविसंवादित्व होनेपर ही सिद्ध होता है । यदि प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञेय पदार्थका
ज्ञान अविसंवादी न होने पर भी प्रत्यक्षका प्रामाण्य सिद्ध होता हो तो स्नान, पान, अवगाहन आदि प्रयोजन
की निष्पत्ति करनेमें असमर्थ मृगतृष्णा विषयक जलज्ञानमें प्रामाण्य कैसे नहीं हो सकता ? अर्थके साथ प्रति-
बद्ध ( अविनाभाव युक्त ) ऐसे हेतु और शब्दके द्वारा उत्पन्न अनुमान एवं आगमके द्वारा ज्ञात पदार्थके ज्ञानकी
अविसंवादिता होनेसे इन दोनोंका प्रामाण्य क्यों स्वीकार नहीं किया जाता ? यदि कहो कि अनुमान और
आगममें ज्ञात पदार्थके ज्ञानकी अविसंवादिता नहीं देखी जाती इसलिये उन्हें प्रमाण नहीं माना जा सकता,
तो इस प्रकार प्रत्यक्षमें भी तिमिर आदि नेत्ररोगके कारण एक चन्द्रमाका दो चन्द्रमा रूप ज्ञान होता है,
इसलिये प्रत्यक्षको भी सर्वत्र अप्रमाण ही मानना चाहिये । यदि कहो कि नेत्ररोगके कारण एक चन्द्रमाके
स्थानपर दो चन्द्रमा दिखाई देते हैं, इसलिये एक चन्द्रमामें दो चन्द्रका ज्ञान प्रत्यक्षाभास है, तो इसी तरह हम
सदोष अनुमानको अनुमानाभास, और सदोष आगमको आगमाभास कहते हैं । अतएव केवल प्रत्यक्ष प्रमाणसे
पदार्थोंका निश्चित स्वरूप नहीं जाना जा सकता, इसलिये प्रत्यक्ष प्रमाणका अवलम्बन लेकर जीव, पुण्य, पाप,
परलोक आदिका निषेध करनेवाले दर्शन अप्रमाण ही हैं ।
इससे नास्तिक लोगोंके भूतचिद्वाद (पांच भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति) का भी निराकरण करना चाहिये ।
द्रव्यालंकारके (दो) कर्ता उपयोगका वर्णन करते समय कहते हैं—"जिस प्रकार सत्त्व, कठिनत्व आदि भूतोंके
धर्म हैं, अथवा जिस प्रकार मादक द्रव्योंमें थकावट एवं मद उत्पन्न करनेवाली शक्ति होती है, उसी प्रकार
पंच महाभूतोंमेंसे प्रत्येक भूतमें चैतन्य नहीं पाया जाता, अतएव वह भूतधर्म नहीं है । यह चैतन्य भूतोंमें
अभिव्यक्त नहीं होता, अतएव आत्माकी सिद्धि होती है । चार्वाक—जिस समय पृथिवी आदि पांच महाभूत
शरीर रूपमें परिणत होते हैं, उसी समय उनमें चैतन्य उत्पन्न हो जाता है । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि
यदि आप लोग पृथिवी आदिके मिलनेसे ही शरीरका परिणमन मानते हैं, तो वह अनित्य नहीं होता (शरीरके
अनित्य न होनेके कारण उसकी उत्पत्ति होना असंभव है, अतएव चैतन्य धर्मकी भी उत्पत्ति नहीं होती ) ।
और यदि पृथिवी आदिके अतिरिक्त चैतन्य कोई भिन्न वस्तु है, तो उसे आत्मा कहना चाहिये । यदि चैतन्य
अन्य. यो. व्य. श्लोक २० ] स्याद्वादमञ्जरी १९५
नियमः । मृतादपि च स्यात् । शोणिताद्युपाधिः सुप्तादावप्यस्ति । न च सतस्तस्योत्पत्तिः, भूयो-
भूयः प्रसङ्गात् । अलब्धआत्मनश्च प्रसिद्धमर्थक्रियाकारित्वं विरुध्यते । असतः सकलशक्तिविकलस्य
कथमुत्पत्तौ कर्तृत्वम्, अन्यस्यापि प्रसङ्गात् ? तन्न भूतकार्यमुपयोगः ॥
कुतस्तर्हि सुप्तोत्थितस्य तदुदयः ? असंवेदनेन चैतन्यस्याभावात् । न, जाग्रदवस्थानुभूतस्य
स्मरणात् । असंवेदनं तु निद्रोपघातात् । कथं तर्हि कायविकृतौ चैतन्यविकृतिः ? नैकान्तः,
श्वित्रादिना कश्मलवपुषोऽपि बुद्धिशुद्धेः, अविकारे च भावनाविशेषतः प्रीत्यादिभेददर्शनात्
शोकादिना बुद्धिविकृतौ कायविकारादर्शनाच्च । परिणामिनो विना च न कार्योत्पत्तिः । न च
भूतान्येव तथा परिणमन्ति विजातीयत्वात् । काठिन्यादेरनुपलम्भात् । अणव एवेन्द्रियग्राह्यत्व-
रूपां स्थूलतां प्रतिपद्यन्ते तज्जात्यादि चोपलभ्यते । तन्न भूतानां धर्मः फलं वा उपयोगः । तथा
भवांश्च यदाक्षिपति तदस्य लक्षणम् । स चात्मा स्वसंविदितः । भूतानां तथाभावे बहिर्मुखं
स्याद् । गौरोऽहमित्यादि तु नान्तर्मुखं वाह्यकरणजन्यत्वात् । अनभ्युपगतानुमानप्रामाण्यस्य
चात्मनिषेधोऽपि दुर्लभः ।
धर्मको अहेतुक माना जाय तो देश और कालका नियम नहीं बन सकता । यदि कहो कि भूतोंके शरीर रूपमें
परिणमन होनेसे चैतन्यकी उत्पत्ति होती है, तो मृतक पुरुषमें भी चैतन्य पाया जाना चाहिये, क्योंकि वहाँ
भी पृथिवी आदिका कायरूप परिणमन मौजूद है। यदि कहो कि मृतक पुरुषमें रक्तका संचार नहीं होता,
अतएव मुर्देमें चेतन शक्तिका अभाव है, तो सोते हुए मनुष्यमें रक्तका संचार होनेपर भी उसे ज्ञान क्यों नहीं
होता ? तथा, यदि कहो कि चैतन्य धर्मका सद्भाव होनेपर भी उसकी उत्पत्ति होती है तो यह भी ठीक नहीं ।
क्योंकि चैतन्य धर्मकी पुनः पुनः उत्पत्ति होनेका प्रसंग आयेगा; तथा, अनुत्पन्न चैतन्यधर्मका अर्थक्रियाकारित्व
विरुद्ध पड़ेगा । जिस पदार्थका सर्वथा अभाव है, और जो सर्व शक्तिसे रहित है, वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता
कैसे हो सकता है ? यदि सकल शक्तिशून्य असत् पदार्थको भी उत्पत्ति क्रियाका कर्ता माना जाये तो विशिष्ट
शक्तिशून्य पदार्थको भी कर्ता माननेका प्रसंग उपस्थित होगा । अतएव उपयोग अर्थात् चैतन्य धर्म पंच
महाभूतोंत्पन्न कार्य नहीं है ।
शंका—यदि पृथिवी आदि पांच भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती, तो सो कर उठनेवाले पुरुषमें
चेतन शक्ति कहाँसे आती है, क्योंकि सोनेके समय पूर्व चेतन शक्ति नष्ट हो जाती है । समाधान—सो कर
उठनेके पश्चात् हमें जाग्रत अवस्थामें अनुभूत पदार्थोंका ही स्मरण होता है । सोते समय चेतन शक्तिका
निद्राके उदयसे आच्छादन हो जाता है । शंका—यदि शरीर और चैतन्यका कोई संबंध नहीं है, तो शरीरमें
विकार उत्पन्न होनेसे चेतनामें विकार क्यों होता है ? समाधान--यह एकान्त नियम नहीं है। क्योंकि
बहुतसे कोढ़ी पुरुष भी बुद्धिमान होते हैं, और शरीरमें किसी प्रकारका विकार न होनेपर भी बुद्धिमें राग,
द्वेष आदिका भावनाविशेषके कारण सद्भाव पाया जाता है; इसी तरह शोक आदिसे बुद्धिमें विकार होनेपर
भी शरीरमें विकार नहीं देखा जाता । परिणामी अर्थात् परिणमनशील उपादानके अभावमें कार्य अर्थात्
परिणामकी उत्पत्ति नहीं होती । तथा, पृथिवी आदि पंचभूतोंका चैतन्य रूप परिणमन मानना ठीक नहीं,
क्योंकि पृथिवी आदि चैतन्यके विजातीय हैं—पृथिवी आदिकी तरह चैतन्यमें काठिन्य आदि गुण नहीं
पाये जाते । परमाणु ही इन्द्रियग्राह्यत्व रूप स्थूल पर्यायको धारण करते हैं, और स्थूल पर्यायको प्राप्त
करनेपर भी परमाणुओंकी जातिमें कोई अन्तर नहीं पड़ता । अतएव चैतन्य पृथिवी आदि पांच भूतोंका धर्म
अथवा फल (कार्य) नहीं कहा जा सकता । तथा, आपलोग जिस पर आक्षेप करते हैं, हम उसे ही आत्मा
कहते हैं । आत्मा स्वसंवेदनका विषय है । यदि आत्मा भूतोंसे उत्पन्न हो, तो 'मैं गोरा हूँ' यह अंतर्मुख ज्ञान
न होकर 'यह गोरा है' इस प्रकारका बहिर्मुख ज्ञान होना चाहिये, क्योंकि वह बाह्य कारणसे उत्पन्न होता
है । तथा, अनुमान प्रमाणके स्वीकार किये बिना आत्माका निषेध नहीं किया जा सकता ।
१९६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २१
धर्मः फलं च भूतानाम् उपयोगो भवेद् यदि ।
प्रत्येकमुपलम्भः स्यादुत्पादो वा विलक्षणात् ॥”
इति काव्यार्थः ॥ २० ॥
एवमुक्तयुक्तिभिरेकान्तवादप्रतिक्षेपमाख्याय साम्प्रतमनाद्यविद्यावासनाप्रवासितसन्म-
तयः प्रत्यक्षोपलक्ष्यमाणमप्यनेकान्तवादं येऽवमन्यन्ते तेषामुन्मत्ततामाविर्भावयन्नाह—
प्रतिक्षणोत्पादविनाशयोगिस्थिरैकमध्यक्षमपीक्षमाणः ।
जिन त्वदाज्ञामवमन्यते यः स वातकी नाथ पिशाचकी वा ॥२१॥
प्रतिक्षणं प्रतिसमयम् । उत्पादेनोत्तराकारस्वीकाररूपेण विनाशेन च पूर्वाकारपरिहार-
लक्षणेन युज्यत इत्येवंशीलं प्रतिक्षणोत्पादविनाशयोगि । किं तत् ? स्थिरैकं कर्मतापन्नं । स्थिर-
'यदि चैतन्य ( उपयोग ) पृथिवी आदि भूतोंका धर्म या कार्य हो, तो प्रत्येक पदार्थमें चैतन्यकी
उपलब्धि होनी चाहिये, और विजातीय पदार्थोंसे सजातीय पदार्थोंकी उत्पत्ति होनी चाहिये' ॥ यह श्लोकका
अर्थ है ॥
भावार्थ—चार्वाक (१) प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है । अतएव पांच इन्द्रियोंके बाह्य कोई वस्तु नहीं
है, इसलिए स्वर्ग, नरक और मोक्षका सद्भाव नहीं मानना चाहिये । वास्तवमें कण्टक आदिसे उत्पन्न होने-
वाले दुखको नरक कहते हैं, प्रजाके नियन्ता राजाको ईश्वर कहते हैं, और देहको छोड़नेको मोक्ष कहते हैं ।
अतएव मनुष्य जीवनको खूब आनन्दसे बिताना चाहिये, कारण कि मरनेके बाद फिर संसारमें जन्म नहीं
होता । जैन—अनुमान प्रमाणके बिना दूसरेके मनका अभिप्राय ज्ञात नहीं हो सकता । क्योंकि प्रत्यक्षसे
इन्द्रियोंके बाह्य दूसरोंका अभिप्राय नहीं जाना जा सकता । 'यह पुरुष मेरे वचनोंको सुनना चाहता है, क्योंकि
इसके मुँहपर अमुक प्रकारकी चेष्टा दिखाई देती है'—इस प्रकारका ज्ञान अनुमानके बिना नहीं हो सकता ।
तथा, बिना अनुमान प्रमाणके ज्ञानके प्रामाण्य और अप्रामाण्य का भी निश्चय नहीं हो सकता । इसके अति-
रिक्त, प्रत्यक्षकी सत्यता भी अनुमानसे ही जानी जाती है । इसलिये अनुमान अवश्य मानना चाहिये ।
चार्वाक—(२) जिस प्रकार मादक पदार्थोंसे मदशक्ति पैदा होती है, वैसे ही पृथिवी आदि भूतोंसे
चैतन्यकी उत्पत्ति होती है । पाँच भूतोंके नाश होनेसे चैतन्यका भी नाश हो जाता है, इसलिये आत्मा कोई
वस्तु नहीं है । आत्माके अभाव होनेसे धर्म, अधर्म, और पुण्य, पाप भी कोई वस्तु नहीं ठहरते । जैन—यदि
मादक शक्तिकी तरह चैतन्यको पांच भूतोंका विकार माना जाय, तो जिस तरह मदशक्ति प्रत्येक मादक
पदार्थमें पायी जाती है, वैसे ही चेतन शक्तिको भी प्रत्येक पदार्थमें उपलब्ध होना चाहिये । तथा, यदि पृथिवी
आदिसे चेतन शक्ति उत्पन्न हो, तो मृतक पुरुषमें भी चेतना माननी चाहिये । इसके अतिरिक्त, पृथिवी आदि
चैतन्यके विजातीय हैं, क्योंकि चैतन्यमें पृथिवीके काठिन्य आदि गुण नहीं पाये जाते । अतएव चेतना शक्तिको
भौतिक विकार नहीं मानकर आत्माको स्वतंत्र पदार्थ मानना चाहिये ।
इस प्रकार एकान्तवादका खंडन करके, अनादि अविद्याकी वासनासे मलिन बुद्धिवाले जो लोग
अनेकांतको प्रत्यक्षसे देखते हुए भी उसकी अवमानना करते हैं, उनकी उन्मत्तताका प्रदर्शन करते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, प्रत्येक क्षणमें उत्पन्न और नाश होनेवाले पदार्थोंको प्रत्यक्षसे स्थिर देखकर
भी वातरोग अथवा पिशाचसे ग्रस्त लोगोंकी तरह लोग आपकी आज्ञाकी अवहेलना करते हैं ।
व्याख्यार्थ—प्रत्येक द्रव्य प्रतिक्षण उत्तर पर्यायोंके होनेसे उत्पन्न ( उत्पाद ) और पूर्व पर्यायोंके
नाश होनेसे नष्ट ( व्यय ) होकर भी स्थिर रहता है । जिस प्रकार चैत्र और मैत्र दोनों भाइयोंका अधिकरण
अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९७
मुत्पादविनाशयोरनुयायित्वात् त्रिकालवर्ति यदेकं द्रव्यं स्थिरैकम् । एकशब्दोऽत्र साधारणवाची ।
उत्पादे विनाशे च तत्साधारणम्, अन्वयिद्रव्यत्वात् । यथा चैत्रमैत्रयोरेका जननी साधारणे-
त्यर्थः । इत्थमेव हि तयोरेकाधिकरणता पर्यायाणां, कथञ्चिदनेकत्वेऽपि तस्य कथञ्चिदेकत्वात् ।
एवं त्र्यात्मकं वस्तु अध्यक्षमपीक्षमाणः प्रत्यक्षमवलोकयन् अपि । हे जिन रागादिजैत्र ।
त्वदाज्ञाम् आ सामस्त्येनानन्तधर्मविशिष्टतया ज्ञायन्तेऽवबुद्ध्यन्ते जीवाजीवादयः पदार्था यया
सा आज्ञा आगमः ,शासनं तवाज्ञा त्वदाज्ञा । तां त्वदाज्ञां भवत्प्रणीतस्याद्वादमुद्राम् यः
कश्चिदविवेकी अवमन्यतेऽवजानाति । जात्यपेक्षमेकवचनमवज्ञया वा । स पुरुषपशुर्वातकी
पिशाचकी वा । वातो रोगविशेषोऽस्यास्तीति वातकी । वातकीव वातकी । वातूल इत्यर्थः । एवं
पिशाचकीव पिशाचकी । भूताविष्ट इत्यर्थः ॥
अत्र वाशब्दः समुच्चयार्थः उपमानार्थो वा । स पुरुषापसदो वातकिपिशाचकिभ्यामधि-
रोहति तुलामित्यर्थः । “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” १इत्यनेन मत्वर्थीयः कश्चान्तः । एवं
पिशाचकीत्यपि । यथा किल वातेन पिशाचेन वाक्रान्तवपुर्वस्तुतत्त्वं साक्षात्कुर्वन्नपि तदावेश-
वशात् अन्यथा प्रतिपद्यते एवमयमप्येकान्तवादापस्मारै२रपवश इति । अत्र च जिनेति साभि-
प्रायम् । रागादिजेतृत्वाद् हि जिनः । ततश्च यः किल विगलितदोषकालुष्यतयावधेयवचन-
स्यापि तत्रभवतः शासनमवमन्यते तस्य कथं नोन्मत्ततेति भावः । नाथ हे स्वामिन् । अलब्धस्य
सम्यग्दर्शनादेर्लम्भकतया लब्धस्य च तस्यैव निरतिचारपरिपालनोपदेशदायितया च योगक्षेम-
करत्वोपपत्तेर्नाथः । तस्यामन्त्रणम् ॥
एक माता है, उसी तरह उत्पाद और विनाश दोनोंका अधिकरण एक अन्वयी द्रव्य है, इसलिये उत्पाद और
विनाशके रहते हुए भी द्रव्य सदा स्थिर रहता है । क्योंकि उत्पाद और व्यय रूप पर्यायोंके कथंचित् अनेक
होने पर भी द्रव्य कथंचित् एक माना गया है । इस प्रकार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप पदार्थोंको प्रत्यक्षसे
देखकर भी वातरोग अथवा पिशाचसे ग्रस्त लोगोंकी तरह अविवेकी लोग आपकी अनेकान्त रूप आज्ञाका
उल्लंघन करते हैं ।
यहाँ 'वा' शब्द समुच्चय अथवा उपमान अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । इसलिये यह अर्थ होता है कि
आपकी आज्ञाको उल्लंघन करनेवाले अधम पुरुष वातकी ( वात रोगसे ग्रस्त ) अथवा पिशाचकी ( पिशाचसे
ग्रस्त ) की तरह हैं । यहाँ “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” सूत्रसे वात और पिशाच शब्दसे मत्वर्थमें इन्
प्रत्यय होकर अन्तमें 'क' लग जाता है । जिस प्रकार वात और पिशाचसे ग्रस्त पुरुष पदार्थोंको देखते हुए
भी उन्हें वात और पिशाचके आवेशमें अन्यथा रूपसे प्रतिपादन करता है, वैसे ही एकान्तवाद रूपी अपस्मार
( मृगी ) से पीड़ित मनुष्य प्रत्येक पदार्थमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य अवस्थायें देखकर भी उन्हें अन्यथा
रूपसे प्रतिपादन करता है । श्लोकमें 'जिन' शब्दका प्रयोग विशेष अर्थ बतानेके लिये किया गया है । जिसने
राग, द्वेष आदि दोषोंको जीत लिया है, उसे जिन कहते हैं । अतएव आपके वचनोंके निर्दोष होनेपर भी
जो लोग उनकी अवज्ञा करते हैं, उन्हें उन्मत्त ही कहना चाहिये । हे स्वामिन्, आप सम्यग्दर्शनको प्राप्त
करानेवाले और उसे निरतिचार पालन करनेका उपदेश देनेवाले होनेके कारण सुख और शांतिके दाता हैं,
इसलिये आप नाथ हैं ।
१. हैमसूत्रे ७-२-६१ ।
२. अपस्मर्यते पूर्ववृत्तं विस्मर्यतेऽनेन । रोगविशेषः ।
तमःप्रवेशो संरम्भो दोषोद्रेकहतस्मृतेः ।
अपस्मार इति ज्ञेयो गदो घोरश्चतुर्विधः ॥
शब्दकल्पद्रुमे ।
१९८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २१
वस्तुतत्त्वं चोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकम् । तथाहि सर्वं वस्तु द्रव्यात्मना नोत्पद्यते विपद्यते
वा, परिस्फुटमन्वयदर्शनात् । लूनपुनर्जातनखादिष्वन्वयदर्शनेन व्यभिचार इति न वाच्यम्,
प्रमाणेन बाध्यमानस्यान्वयस्यापरिस्फुटत्वात् । न च प्रस्तुतोऽन्वयः प्रमाणविरुद्धः सत्यप्रत्य-
भिज्ञानसिद्धत्वात् ।
“सर्वव्यक्तिषु नियतं क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेषः ।
सत्योश्चित्यपचित्योराकृतिजातित्यवस्थानात्” ॥
इति वचनात् ॥
ततो द्रव्यात्मना स्थितिरेव सर्वस्य वस्तुनः । पर्यायात्मना तु सर्वं वस्तूत्पद्यते विपद्यते
च, अस्खलितपर्यायानुभवसद्भावात् । न चैवं शुक्ले शङ्खे पीतादिपर्यायानुभवेन व्यभिचारः, तस्य
स्खलद्रूपत्वात् । न खलु सोऽस्खलद्रूपो येन पूर्वाकारविनाशाजह
अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९९
ननूत्पादादयः परस्परं भिद्यन्ते न वा ? यदि भिद्यन्ते, कथमेकं वस्तु त्रयात्मकम् ? न
भिद्यन्ते चेत्, तथापि कथमेकं त्रयात्मकम् ? तथा च
"यद्युत्पादादयो भिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् ।
अथोत्पादादयोऽभिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् "
इति चेत्, तदयुक्तं, कथञ्चिद्भिन्नलक्षणत्वेन तेषां कथञ्चिद्भेदाभ्युपगमात् । तथाहि-उत्पादविनाश-
ध्रौव्याणि स्याद् भिन्नानि, भिन्नलक्षणत्वात्, रूपादिवदिति । न च भिन्नलक्षणत्वमसिद्धम् ।
असत आत्मलाभः सतः सत्तावियोगः द्रव्यरूपतयानुवर्तनं च खलूत्पादादीनां परस्परमसंकीर्णानि
लक्षणानि सकललोकसाक्षिकान्येव ॥
न चामी भिन्नलक्षणा अपि परस्परानपेक्षाः, खपुष्पवदसत्त्वापत्तेः । तथाहि-उत्पादः केवलो
नास्ति, स्थितिविगमराहित्वात् कूर्मरोमवत् । तथा विनाशः केवलो नास्ति, स्थित्युत्पत्तिरहि-
तत्त्वात्, तद्वत् । एवं स्थितिः केवला नास्ति, विनाशोत्पादशून्यत्वात्, तद्वदेव । इत्यन्योऽन्या-
पेक्षाणामुत्पादादीनां वस्तुनि सत्त्वं प्रतिपत्तव्यम् । तथा चोक्तम्--
“घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥ १ ॥
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
अगोरसव्रतो नोभे तस्माद् वस्तु त्रयात्मकम् ॥ २ ॥१”
शंका-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, या अभिन्न ? यदि उत्पाद आदि परस्पर भिन्न
हैं, तो वस्तुका स्वरूप उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप नहीं कहा जा सकता । यदि वे परस्पर अभिन्न हैं, तो
तीनों एक रूप होनेसे तीन रूप कैसे हो सकते हैं ? कहा भी है--
“यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, तो वे तीन रूप नहीं कहे जा सकते । यदि उत्पाद
आदि अभिन्न हैं, तो उन्हें तीन रूप न मानकर एक ही मानना चाहिये ।”
समाधान--यह ठीक नहीं। क्योंकि हम लोग उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद होनेसे
उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद मानते हैं । तथाहि—उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य कथंचित् भिन्न
हैं, भिन्न लक्षणवाले होनेसे; रूप, रस, स्पर्श और गंधकी भाँति । यहाँ भिन्न लक्षणरूप हेतु असिद्ध नहीं
है । उत्पत्तिके पूर्व जिसका ( कथंचित् ) अभाव होता है उसका प्रादुर्भाव ( आत्मलाभ ), जो विद्यमान होता
है उसकी सत्ताका अभाव, तथा द्रव्य रूपसे अनुवर्तन—ये वस्तुतः उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके परस्पर
असंकीर्ण लक्षण सभीके द्वारा जाने जाते हैं ।
उत्पाद आदि परस्पर भिन्न होकर भी एक दूसरेसे निरपेक्ष नहीं हैं । यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य
को एक दूसरेसे निरपेक्ष मानें, तो आकाश-पुष्पकी तरह उनका अभाव मानना पड़े । अतएव जैसे कछुवेकी
पीठपर बालोंके नाश और स्थितिके विना, बालोंका केवल उत्पाद होना संभव नहीं है, उसी तरह व्यय
और ध्रौव्यसे रहित केवल उत्पादका होना नहीं बन सकता । इसी प्रकार कछुवेके बालोंकी तरह उत्पाद
और ध्रौव्यसे रहित केवल व्यय, तथा उत्पाद और नाशसे रहित केवल स्थिति भी संभव नहीं है ।
अतएव एक दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप वस्तुका लक्षण स्वीकार करना चाहिये ।
कहा भी है--
“घड़े, मुकुट और सोनेके चाहनेवाले पुरुष घड़ेके नाश, मुकुटके उत्पाद, और सोनेकी स्थितिमें क्रमसे
शोक, हर्ष और माध्यस्थ भाव रखते हैं । तथा, ‘मैं दूध ही पीऊँगा’ इस प्रकारका व्रत रखनेवाला पुरुष सिर्फ
दूध ही पीता है, दही नहीं खाता; ‘मैं आज दही ही खाऊँगा’ इस प्रकारका नियम लेनेवाला पुरुष सिर्फ दही
१ आप्तमीमांसायां ५९,६०
२०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
इति काव्यार्थः ॥ २१ ॥
अथान्ययोगव्यवच्छेदस्य प्रस्तुतत्वात् आस्तां तावत्साक्षाद् भवान्, भवदीयप्रवचना-
वयवा अपि परतीर्थिकतिरस्कारबद्धकक्षा इत्याशयवान् स्तुतिकारः स्याद्वादन्यव्यवस्थापनाय प्रयोग-
मुपन्यस्यन् स्तुतिमाह—
अनन्तधर्मात्मकमेव तत्त्वमतोऽन्यथा सत्त्वमसूपपादम् ।
इति प्रमाणान्यपि ते कुवादिकुरङ्गसंत्रासनसिंहनादाः ॥ २२ ॥
तत्त्वं परमार्थभूतं वस्तु जीवाजीवलक्षणम् अनन्तधर्मात्मकमेव । अनन्तास्त्रिकाल-
विषयत्वाद् अपरिमिता ये धर्माः सहभाविनः क्रमभाविनश्च पर्यायाः । त एवात्मा स्वरूपं
यस्य तदनन्तधर्मात्मकम् । एवकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । अत एवाह अतोऽन्यथा इत्यादि ।
ही खाता है, दूध नहीं पीता; और गोरसका व्रत लेनेवाला पुरुष दूध और दही दोनों नहीं खाता । अतः
प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप है ।”
( यहाँ उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको दृष्टांतसे समझाया गया है । एक राजाके एक पुत्र और एक पुत्री
थी । राजाकी पुत्रीके पास एक सोनेका घड़ा था, राजाके पुत्रने उस घड़ेको तुड़वा कर उसका मुकुट बनवा
लिया । घड़ेके नष्ट होनेपर ( व्यय ) राजाकी पुत्रीको शोक हुआ, मुकुटकी उत्पत्ति होनेसे ( उत्पाद ) राजाके
पुत्रको हर्ष हुआ, तथा राजा दोनों अवस्थाओंमें मध्यस्थ था ( ध्रौव्य ), इसलिये राजाको शोक और हर्ष दोनों
नहीं हुए । इससे मालूम होता है, कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनों अवस्थायें मौजूद रहती
हैं । इसी प्रकार दूधका व्रती दही, और दहीका व्रती दूध, और गोरसका व्रती दही और दूध दोनों नहीं
खाता है । इसलिये प्रत्येक वस्तु तीनों रूप है ) ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—जैन दर्शनके अनुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही वस्तुका लक्षण है ( उत्पादव्यय-
ध्रौव्ययुक्तं सत् ) । वेदान्ती लोगोंके अनुसार, वस्तु तत्त्व सर्वथा नित्य, और बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
सर्वथा क्षणिक है । परन्तु जैन लोगोंका मत है कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं, इसलिये
पर्यायकी अपेक्षा वस्तु अनित्य है, तथा उत्पत्ति और नाश होते हुए भी हमें वस्तुकी स्थिरताका भान होता
है, अतएव द्रव्यकी अपेक्षा वस्तु नित्य है। अतएव जैन दर्शनमें प्रत्येक वस्तु कथंचित् नित्य, और कथंचित्
अनित्य स्वीकार की गई है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर कथंचित् भिन्न होकर भी सापेक्ष हैं । जिस
प्रकार नाश और स्थितिके विना केवल उत्पाद संभव नहीं है, तथा उत्पाद और स्थितिके विना नाश संभव
नहीं है, उसी तरह उत्पाद और नाशके विना स्थिति भी संभव नहीं । अतएव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको
ही वस्तुका लक्षण मानना चाहिये ।
साक्षात् भगवान्की बात तो दूर रही, भगवान्के उपदेशके कुछ अंश ही कुवादियोंको पराजित करनेमें
समर्थ हैं, इसलिये स्तुतिकार स्याद्वादका प्रतिपादन करते हैं—
श्लोकार्थ—प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म मौजूद हैं, पदार्थमें अनन्त धर्म माने बिना वस्तुकी सिद्धि
नहीं होती । अतएव आपके प्रमाणवाक्य कुवादी रूप मृगोंको डरानेके लिये सिंहकी गर्जनाके समान हैं ।
व्याख्यार्थ—जीवरूप और अजीवरूप परमार्थभूत वस्तु अनन्तधर्मात्मक होती है । त्रिकालविषय
होनेसे जो धर्म अनन्त हैं वे सहभावी पर्याय (गुणरूप) और क्रमभावी पर्यायरूप होते हैं । सहभावी और
क्रमभावी पर्यायें जिसका स्वरूप होती हैं, वह वस्तु अनंतधर्मात्मक होती है । यहाँ 'एव' शब्द, अनंतधर्मात्मक
न होनेवालो वस्तुका परिहार करनेके लिये प्रयुक्त किया गया है। अतएव 'अतोऽन्यथा' इत्यादि शब्दोंका
Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:
अन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०१
अतोऽन्यथा उक्तप्रकारवैपरीत्येन । सत्त्वं वस्तुतत्त्वम् । असूपपादं सुखेनोपपाद्यते घटनाकोटि-
संटङ्कमारोप्यते इति सूपपादं । न तथा असूपपादं । दुर्घटमित्यर्थः । अनेन साधनं दर्शितम् ।
तथाहि—तत्त्वमिति धर्मि । अनन्तधर्मात्मकत्वं साध्यो धर्मः । सत्त्वान्यथानुपपत्तेरिति हेतुः,
अन्यथानुपपन्नत्वैकलक्षणत्वाद्धेतोः । अन्तर्व्याप्त्यैव$^१$ साध्यस्य सिद्धत्वाद् दृष्टान्तादिभिर्न प्रयो-
जनम् । यदनन्तधर्मात्मकं न भवति तत् सदपि न भवति, यथा वियदिन्दीवरम् इति केवल-
व्यतिरेकी हेतुः, साधर्म्यदृष्टान्तानां पक्षकुक्षिनिक्षिप्तत्वेनान्वयायोगात् ।
अनन्तधर्मात्मकत्वं च आत्मनि तावद् साकारानाकारोपयोगिता । कर्तृत्वं भोक्तृत्वं
प्रदेशाष्टकनिश्चलता अमूर्तत्वम् असंख्यातप्रदेशात्मकता जीवत्वमित्यादयः$^३$ सहभाविनो
प्रयोग किया गया है। 'अतोऽन्यथा' अर्थात् उक्त प्रकारसे विपरीत । 'सत्त्व' अर्थात् वस्तुका स्वरूप । 'सूपपादं'—
सुखसे प्राप्त करने योग्य । जो 'सूपपाद' नहीं, वह 'असूपपाद' अर्थात् दुर्घट । इसके द्वारा साधन प्रदर्शित किया
गया है। तथाहि—'तत्त्वं' यह धर्मी है । 'अनन्त धर्मात्मकत्व' यह साध्यभूत धर्म है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
है; क्योंकि अन्यथानुपपन्नत्व हेतुका लक्षण है। 'वस्तुतत्त्व (पक्ष) अनन्त धर्मात्मक (साध्य) है, क्योंकि
दूसरे प्रकारसे वस्तुतत्त्वकी सिद्धि नहीं होती (हेतु)'—यहाँ अन्तर्व्याप्तिसे साध्यकी सिद्धि होती है, इसलिये
उक्त हेतुमें दृष्टांतकी आवश्यकता नहीं है । (जहाँ साधनसाध्यसे व्याप्त होता है, अर्थात् जहाँ साध्य अपने
स्वरूपसे साधनमें होता है, उसे अन्तर्व्याप्ति कहते हैं । जिस समय प्रतिवादीको व्याप्ति संबंधका ज्ञान करते
समय व्याप्ति-संबंधका स्मरण होता है, उस समय प्रतिवादीको हेतुके सर्वत्र साध्य युक्त होनेका ज्ञान होता है,
और साथ ही अन्तर्व्याप्ति ज्ञानसे प्रतिवादीको यह भी ज्ञान होता है कि प्रस्तुत पक्षमें वर्तमान हेतु भी साध्यसे
युक्त है । दृष्टांतके विना पक्षके भीतर ही हेतुसे साध्यकी सिद्धि हो जाती है, इसलिये यहाँ पक्षके बाहर
दृष्टांतके द्वारा कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ) । 'जो अनन्त धर्मात्मक नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता, जैसे
आकाशका फूल' । आकाशके फूलमें अनन्त धर्म नहीं रहते, इसलिये वह सत् भी नहीं है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः'
यह हेतु केवलव्यतिरेकी है । जहाँ जहाँ साध्य नहीं रहता, वहाँ वहाँ साधन नहीं रहता । क्योंकि 'जहाँ-जहाँ
सत् है, वहाँ वहाँ अनन्त धर्म पाये जाते हैं' इस अन्वयव्याप्तिमें दिया जानेवाला प्रत्येक दृष्टांत पक्षमें ही
गर्भित हो जाता है। अतएव यहाँ अन्वयव्याप्ति न बताकर केवल व्यतिरेक व्याप्ति बताई गई है ।
ज्ञानोपयोग, दर्शनोपयोग, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आठ मध्य प्रदेशोंकी स्थिरता, अमूर्तत्व, असंख्यात प्रदेशीपना
१. अन्तःपक्षमध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वमन्तर्व्याप्तिः । तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेः ।
अयमर्थः । अन्तर्व्याप्तेः साध्यसंसिद्धिशक्तौ बाह्यव्याप्तेर्वर्णनं वन्ध्यमेव । साध्यसंसिद्ध्यशक्तौ बाह्यव्याप्ते-
र्वर्णनं व्यर्थमेव ।
२. तत्र सर्वकालं जीवाष्टमध्यप्रदेशाः निरपवादाः सर्वजीवानां स्थिता एव । केवलिनामपि अयोगिनां सिद्धानां
च सर्वे प्रदेशा स्थिता एव । व्यायामदुःखपरितापोद्रेकपरिणतानां जीवानां यथोक्ताष्टमध्यप्रदेशवर्जिता
इतरे प्रदेशा अवस्थिता एव । शेषाणां प्राणिनां स्थिताश्चास्थिताश्चेति । तत्त्वार्थराजवार्तिके पृ० २०३
३. जीवो उवओगमओ अमृत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो ।
भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥
छाया—जीवः उपयोगमयः अमूर्ति कर्त्ता स्वदेहपरिमाणः ।
भोक्ता संसारस्थः सिद्धः स विस्रसा ऊर्ध्वगतिः ॥ द्रव्यसंग्रहे २
जीवसिद्धिः चार्वाकं प्रति; ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणं नैयायिकं प्रति; अमूर्तजीवस्थापनं भट्टचार्वा-
कद्वयं प्रति; कर्मकर्तृत्वस्थापनं सांख्यं प्रति; स्वदेहप्रमितिस्थापनं नैयायिकमीमांसकसांख्यत्रयं प्रति; कर्म-
भोक्तृत्वव्याख्यानं बौद्धं प्रति; संसारस्य व्याख्यानं सदाशिवं प्रति; सिद्धत्वव्याख्यानं भट्टाचार्वाकद्वयं प्रति;
ऊर्ध्वगतिस्वभावकथनं माण्डलिकग्रन्थकारं प्रति, इति मतार्थो ज्ञातव्यः । द्रव्यसंग्रहवृत्तौ ।
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२०२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
धर्माः। हर्षविषादशोकसुखदुःखदेवनरनारकतियंक्तवादयस्तु क्रमभाविनः। धर्मास्तिकाया-
दिष्वपि असंख्येयप्रदेशात्मकत्वम् गत्याद्युपग्रहकारित्वम्¹ मत्यादिज्ञानविषयत्वम् तत्तदवच्छेद-
कावच्छेदत्वम् अवस्थितत्वम् अरूपित्वम् एकद्रव्यत्वम् निष्क्रियत्वमित्यादयः । घटे पुनरामत्वम्
पाकजरूपादिमत्त्वम् पृथुबुध्नोदरत्वम् कम्बुग्रीवत्वम् जलादिधारणाहरणसामर्थ्यम् मत्यादि-
ज्ञानज्ञेयत्वम् नवत्वम् पुरातनत्वमित्यादयः । एवं सर्वपदार्थेष्वपि नानानयमताभिज्ञेन शाब्दा-
नार्थांश्च पर्यायान् प्रतीत्य वाच्यम् ॥
और जीवत्व इत्यादि आत्माके सहभावी धर्म हैं । [ जो धर्म सदा द्रव्यके साथ रहते हैं, उन्हें सहभावी धर्म
कहते हैं । सहभावी धर्म गुण भी कहे जाते हैं। ( १ ) व्यवहार नयकी अपेक्षा साकार ज्ञानोपयोग और निरा-
कार दर्शनोपयोग जीवका लक्षण है । ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग जीवसे कभी अलग नहीं होते । चक्षु,
अचक्षु, अवधि और केवलदर्शनके भेदसे दर्शनोपयोग चार, और मति, श्रुति अवधि, मनःपर्यय, केवल, कुमति,
कुश्रुति, और कुवधि ज्ञानके भेदसे ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका है। निश्चय नयसे शुद्ध अखंड केवलज्ञान ही
जीवका लक्षण है। नैयायिक लोग ज्ञान और दर्शनको आत्माका स्वभाव न मानकर उन्हें आत्माके साथ
समवाय संबंधसे संबद्ध मानते हैं, इसलिये जीवको उपयोग रूप बताया है। ( २ ) जीव कर्ता है। जीव
सांख्योंके पुरुषकी तरह कर्मोंसे निर्लिप्त होकर केवल द्रष्टाकी तरह नहीं रहता, किन्तु ज्ञानावरण आदि कर्मोंका
स्वयं करनेवाला निमित्तकर्ता है। यहाँ सांख्य मतके निराकरणके लिये जीवको कर्ता बताया गया है। ( ३ )
यह जीव सुख-दुख रूप कर्मोंके फलका भोग करता है । क्षणिकवादी बौद्धोंके मतमें जो कर्ता है, वह भोक्ता
नहीं हो सकता, इसलिये जीवको भोक्ता कहा गया है। ( ४ ) जीवके आठ मध्यप्रदेश सदा एकसे अवस्थित
रहते हैं। अयोगकेवली और सिद्धोंके सम्पूर्ण प्रदेश स्थिर रहते हैं। व्यायाम दुख, परिताप आदिसे युक्त
जीवोंके आठ प्रदेशोंके अतिरिक्त बाकीके प्रदेश प्रवृत्तिशोल होते हैं। शेष जीवोंके प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति दोनों
रूप प्रदेश होते हैं। ( ५ ) यह जीव स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णसे रहित है, इसलिये निश्चय नयसे अमूर्त
है। ( ६ ) जीव लोकाकाशके बराबर असंख्यात प्रदेशोंका धारक है । वास्तवमें जैन दर्शनके अनुसार नैयायिक,
मीमांसक आदि दर्शनोंकी तरह जीवको प्रदेशोंकी अपेक्षा व्यापक नहीं माना, किन्तु जैन दर्शनमें ज्ञानकी
अपेक्षा व्यवहार नयसे व्यापक कहा है।² ( ७ ) जीवमें जीवत्व जीवका पारिणामिक ( स्वाभाविक ) भाव है।
व्यवहार नयसे दस प्राण, और निश्चय नयसे चेतना जीवका जीवत्व है । ] हर्ष विषाद, शोक, सुख, दुख,
देव, मनुष्य, नारक, तिर्यंच आदि अवस्था जीवके क्रमभावी अर्थात् क्रमसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाले धर्म हैं।
(क्रमभावी धर्मोंका दूसरा नाम पर्याय भी है।) (१) धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय प्रत्येक द्रव्यमें असंख्यात
प्रदेश ( अविभाज्य अंश ) होते हैं। ( २ ) जिस प्रकार जल मछलीके चलानेमें सहायता करता है, और
वृक्षकी छाया पथिकके ठहरानेमें निमित्त होती है, उसी तरह धर्म गतिशील पदार्थोंकी गतिमें, और अधर्म
ठहरनेवाले पदार्थोंकी स्थितिमें निमित्त कारण होते हैं। ( ३ ) धर्म और अधर्म मति, श्रुति आदि ज्ञानोंसे
निश्चित किये जाते हैं। ( ४ ) धर्म और अधर्म अपने स्वरूपको छोड़कर पररूप नहीं होते, इसलिये परस्पर
मिश्रण न होनेसे अवस्थित हैं। ( ५ ) धर्म और अधर्म स्पर्श आदिसे रहित होनेसे अरूपी हैं। ( ६ ) एक
व्यक्तिरूप होनेसे एक हैं, तथा ( ७ ) क्रिया रहित होनेसे निष्क्रिय हैं। इसी प्रकार घड़ेमें कच्चापन, पक्कापन,
मोटापन, चौड़ापन, कम्बुग्रीवापन ( शंख जैसी गर्दन ) जलधारण, जलआहरण, ज्ञेयपन, नयापन, पुरानापन
आदि अनन्त धर्म रहते हैं। अतएव नाना नयोंकी दृष्टिसे शब्द और अर्थकी अपेक्षा प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म
विद्यमान हैं।
१. नित्यावस्थितान्यरूपणि । आ आकाशादेकद्रव्याणि । निष्क्रियाणि च । असंख्येयाः प्रदेशाः धर्माधर्मयोः ।
गतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारः। तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये पंचमाध्याये सूत्राणि ।
२. देखिये द्रव्यसंग्रहवृत्ति गा. १० ।