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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

अथ यथा युष्मन्मते “आरोग्गवोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दिंतु”१ इत्यादीनां वाक्यानां
लोकान्तर एव फलमिष्यते, एवमस्मदभिमतवेदवाक्यानामपि नेह जन्मनि फलमिति किं न
प्रतिपद्यते । अतश्च विवाहादौ नोपालम्भावकाशः, इति चेत् । अहो वचनवैचित्री । यथा
वर्तमानजन्मनि विवाहादिषु प्रयुक्तैर्मन्त्रसंस्कारैरागामिनि जन्मनि तत्फलम्, एवं द्वितीयादि-
जन्मान्तरेष्वपि विवाहादीनामेव प्रवृत्तिधर्माणां पुण्यहेतुत्वाङ्गीकारेऽनन्तभवानुसन्धानं प्रस-
ज्यते । एवं च न कदाचन संसारस्य परिसमाप्तिः । तथा च न कस्यचिदपवर्गप्राप्तिः । इति
प्राप्तं भवदभिमतवेदस्यापर्यवसितसंसारवल्लरीमूलकन्दत्वम् । आरोग्यादिप्रार्थना तु असत्या-
ऽमृषा२ भाषा परिणामविशुद्धिकारणत्वादू न दोषाय । तत्र हि भावारोग्यादिकमेव विवक्षितम्,
तच्च चातुर्गतिकसंसारलक्षणभावरोगपरिक्षयस्वरूपत्वाद् उत्तमफलम् । तद्विषया च प्रार्थना
कथमिव विवेकिनामनादरणीया । न च तज्जन्यपरिणामविशुद्धेस्तत्फलं न प्राप्यते । सर्ववादिनां
भावशुद्धेरपवर्गफलसम्पादनेऽविप्रतिपत्तेरिति ॥
की जाय, तो मन्त्रोंका असर नहीं रहता, यह कथन भी ठीक नहीं । इससे संशयकी निवृत्ति नहीं होती ।
क्योंकि मन्त्रोंकी विधिमें वैगुण्य होनेसे मन्त्रोंका प्रभाव नष्ट हो जाता है, अथवा स्वयं मन्त्रोंमें ही प्रभाव
दिखानेको असमर्थता है, यह कैसे निश्चय हो ? मन्त्रोंके फलसे अविनाभावकी सिद्धि नहीं होती ।
शंका—जिस प्रकार जैनमतमें “आरोग्य, सम्यक्त्व तथा समाधिको प्रदान करो” इत्यादि स्तुतियोंसे
दूसरे लोकमें फल प्राप्ति कही जाती है, उसी तरह हमारे माने हुए वेद-वाक्योंका और विवाह आदि मन्त्रोंका
भी परलोकमें ही फल मिलता है। समाधान—यदि आप लोग इस जन्ममें विवाह आदिमें प्रयुक्त मन्त्रोंका
फल आगामी भवमें स्वीकार करते हैं, तो यह आपके वचनोंकी विचित्रता है, और इस तरह तो दूसरे, तीसरे
आदि अनेक भवोंमें मन्त्रके संस्कारोंका फल मान लेनेसे अनन्त भवोंकी उत्पत्ति माननी होगी, और इस तरह
कभी संसारका अन्त न होनेसे किसीको भी मोक्ष न मिलेगा । इस प्रकार आपके द्वारा मान्य वेदको अनन्त
संसारवल्लरीका मूल मानना होगा । तथा, हम लोग जो आरोग्यलाभ आदिकी प्रार्थना करते हैं, वह
असत्यअमृषा (व्यवहार) भाषा द्वारा परिणामोंकी विशुद्धि करनेके लिए है, दोषके लिए नहीं ।
(असत्यअमृषा भाषा आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, प्रच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, इच्छानुकूलिका,
अनभिगृहीता, अभिगृहीता, संदेहकारिणी, व्याकृता, अव्याकृताके भेदसे बारह प्रकारकी बताई गयी है । ( १ )
'हे देव, यहाँ आओ', इस प्रकारके वचनोंको आमन्त्रणी भाषा कहते हैं । ( २ ) 'तुम यह करो' इस प्रकारके
आज्ञासूचक वचन कहना, आज्ञापनी भाषा है । ( ३ ) 'यह दो' इस प्रकार याचनाके सूचक वचन बोलना,
याचनी भाषा है । ( ४ ) अज्ञात अर्थको पूछना, प्रच्छनी भाषा है। ( ५ ) 'जीव हिंसासे निवृत्त होकर
चिरायुका उपभोग करते हैं' इस प्रकार शिष्योंके उपदेशसूचक वचनोंका कहना, प्रज्ञापनी भाषा है। ( ६ )
माँगनेवालेको निषेध करनेवाले वचनोंका बोलना प्रत्याख्यानी भाषा है । ( ७ ) किसी कार्यमें अपनी अनुमति
देनेको इच्छानुकूलिका भाषा कहते हैं । ( ८ ) 'बहुतसे कार्योंमें जो तुम्हें अच्छा लगे वह करो' इस प्रकारके
वचनोंको अनभिगृहीता भाषा कहते हैं । ( ९ ) 'बहुतसे कार्योंमें अमुक कार्य करना चाहिए, और अमुक
नहीं', इस प्रकार निश्चित वचनोंके बोलनेको अभिगृहीता भाषा कहते हैं । ( १० ) संशय उत्पन्न करनेवाली
भाषाको संदेहकारिणी भाषा कहते हैं; जैसे 'सैंधव' कहनेपर सिंघा नमक और घोड़ा दोनों पदार्थोंमें संशय उत्पन्न
होता है । ( ११ ) जिससे स्पष्ट अर्थका ज्ञान हो, वह व्याकृता भाषा है । (१२) गम्भीर अथवा अस्पष्ट अर्थको
बतानेवाले वचनोंको अव्याकृता भाषा कहते हैं । गोम्मटसार आदि दिगम्बर ग्रन्थोंमें असत्यअमृषा भाषाके नौ
१. छाया—आरोग्यं बोधिलाभं सामाधिवरमुत्तमं ददतु । आवश्यक २४-६ ।
२. आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, प्रच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, इच्छानुकूलिका, अनभिगृहीता,
अभिगृहीता, संदेहकारिणी, व्याकृता, अव्याकृता इति द्वादशविधा असत्याऽमृषाभाषा लोकप्रकाशे
तृतीयसर्गे योगाधिकारे ।

९४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
न च वेद‌निवेदिता हिंसा न कुत्सिता । सम्यग्दर्शनज्ञानसम्पन्नैरर्चिर्मार्गप्रपन्नैर्वेदान्त-
वादिभिश्च गर्हितत्वात् । तथा च तत्त्वदर्शिनः पठन्ति-
“देवोपहारव्याजेन यज्ञव्याजेन येऽथवा ।
घ्नन्ति जन्तून् गतघृणा घोरां ते यान्ति दुर्गतिम्” ॥
वेदान्तिका अप्याहुः-
“अन्धे तमसि मज्जामः पशुभिर्ये यजामहे ।
हिंसा नाम भवेद्धर्मो न भूतो न भविष्यति” ॥
तथा “अग्निर्मामेतस्माद्धिंसाकृतादेनसो मुञ्चतु” छान्दसत्वाद् मोचयतु इत्यर्थः । इति ।
व्यासेनाप्युक्तम्—
“ज्ञानपालिपरिक्षिप्ते ब्रह्मचर्यदयाम्भसि ।
स्नात्वाऽतिविमले तीर्थे पापपङ्कापहारिणि ॥ १ ॥
ध्यानाग्नौ जीवकुण्डस्थे दममारुतदीपिते ।
असत्कर्मसमिच्छस्त्रैरग्निहोत्रं कुरुत्तमम् ॥ २ ॥
कषायपशुभिर्दुष्टैर्धर्मकामार्थनाशकैः ।
शममन्त्रहुतैर्यज्ञं विधेहि विहितं बुधैः ॥३॥
प्राणिघातात् तु यो धर्ममीहते मूढमानसः ।
स वाञ्छति सुधावृष्टिं कृष्णाहिमुखकोटरात् ॥४॥
भेद बताये गये हैं—देखिये, गोम्मटसार जीवकाण्ड, २२४-२२५ ) । आरोग्य आदिकी प्रार्थना करनेसे हमारा
अभिप्राय केवल चतुर्गति रूप संसारके भाव-रोगोंको दूर करनेका है; वही उत्तम फल है। इस भाव-आरोग्यकी
प्रार्थनासे परिणामोंकी विशुद्धि होती है, अतएव विवेकीजन उसका अनादर नहीं कर सकते। ऐसी बात नहीं
कि उससे उत्पन्न परिणामोंकी विशुद्धिसे उसका फल प्राप्त न हो। सभी वादी लोग भावोंकी शुद्धिसे
ही मोक्ष फलकी प्राप्ति मानते हैं।
तथा, ऐसी बात नहीं है कि वेदोक्त हिंसा निंदनीय नहीं। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे सम्पन्न ज्ञान-
मार्गके अनुयायी वेदान्तियोंने भी हिंसाकी निंदा की है। तत्त्वदर्शी लोगोंने कहा है—
“जो निर्दय पुरुष देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये अथवा यज्ञके बहाने पशुओंका वध करते हैं, वे
लोग दुर्गतिमें पड़ते हैं।”
वेदान्तियोंने भी कहा है—
“यदि हम पशुओंसे यज्ञ करें तो घोर अंधकारमें पड़ें। अतएव हिंसा न कभी धर्म हुआ, न है,
और न होगा।”
तथा—“अग्नि-देवता इस हिंसाजन्य पापसे मुझे मुक्त करो।” वैदिक प्रयोग होनेसे 'मुक्त करो'
यह अर्थ किया गया है।
व्यासने कहा है—
“ज्ञानरूपी दीवारसे परिवेष्टित ब्रह्मचर्य और दयारूपी-जलसे पूर्ण, पापरूपी-कीचड़को नष्ट करनेवाले,
अत्यन्त निर्मल तीर्थमें स्नान करके ॥१॥
जीवरूपी-कुण्डमें दमरूपी-पवनसे उद्दीपित ध्यानरूपी-अग्निमें अशुभ कर्मरूपी काष्ठकी आहुति देकर
उत्तम अग्निहोत्र यज्ञ करो ॥२॥
धर्म, काम और अर्थको नष्ट करनेवाले, दुष्ट, कषायरूपी-पशुओंका शम-मंत्रोंसे यज्ञ करो, ऐसा पण्डितों
ने कहा है ॥३॥
जो मूढ़ पुरुष प्राणियोंका वध करके धर्मकी कामना करते हैं, वे काले सर्पकी खोहसे अमृतकी वर्षा
चाहते हैं ॥४॥”

अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी ९५
इत्यादि १ ॥
यच्च याज्ञिकानां लोकपूज्यत्वोपलम्भादित्युक्तम् । तदप्यसारम् । अबुधा एव पूजयन्ति
तान् न तु विविक्तबुद्धयः । अबुधपूज्यता तु न प्रमाणम् । तस्याः सारमेयादिष्वप्युपलम्भात् ।
यदप्यभिहितं देवतातिथिपितृप्रीतिसंपादकत्वाद् वेदविहिता हिंसा न दोषायेति । तदपि वित-
थम् । यतो देवानां संकल्पमात्रोपनताभिमताहारपुद्गलरसास्वादसुहितानां वैक्रियशरीरत्वाद्²,
युष्मदावर्जितजुगुप्सितपशुमांसाद्याहुतिप्रगृहीतौ, इच्छैव दुःसंभवा । औदारिकशरीरिणामेव³
तदुपादानयोग्यत्वात् । प्रक्षेपाहारस्वीकारे च देवानां मन्त्रमयदेहत्वाभ्युपगमबाधः । न च
तेषां मन्त्रमयदेहत्वं भवत्पक्षे न सिद्धम् । “चतुर्थ्यन्तं पदमेव देवता” इति जैमिनिवचन-
प्रामाण्यात् । तथा च मृगेन्द्रः—
“शब्देतरत्वे युगपद् भिन्नदेशेषु यष्टृषु ।
न सा प्रयाति सांनिध्यं मूर्तत्वादस्मदादिवत्” ॥
सेति देवता । हूयमानस्य च वस्तुनो भस्मीभावमात्रोपलम्भात्, तदुपभोगजनिता
देवानां प्रीतिः प्रलापमात्रम् । अपि च, योऽयं त्रेताग्निः⁴ स त्रयस्त्रिंशत्कोटिदेवतानां मुखम् ।
“अग्निमुखा वै देवाः⁵” इति श्रुतेः । ततश्चोत्तममध्यमाधमदेवानामेकेनैव मुखेन भुञ्जानाना-
इत्यादि ।
तथा, आपने जो याज्ञिक पुरुषोंको लोकमें पूज्य बताया, वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि मूर्ख ही
याज्ञिकोंकी पूजा करते हैं, पण्डित नहीं । तथा, मूर्खोंके द्वारा याज्ञिकोंका पूजा जाना प्रमाण नहीं कहा जा
सकता, क्योंकि कुत्ते आदि भी लोकमें पूजे जाते हैं । तथा, आपने जो कहा, कि वेदोक्त हिंसा, देवता, अतिथि
और पितरोंको प्रसन्न करती है, अतएव वह निर्दोष है, यह कथन भी निस्सार है । क्योंकि देव वैक्रियक
शरीरके धारक होते हैं, अतएव वे अपने संकल्प मात्रसे किसी भी इष्ट पदार्थको उत्पन्न कर उसके पुद्गलोंका
रसा-स्वादन कर सकते हैं । इसलिये ग्लानि युक्त आप लोगोंकी दी हुई पशुके मांस आदिकी आहुति ग्रहण
करनेकी इच्छा भी वे नहीं कर सकते । औदारिक (स्थूल) शरीरवाले प्राणी ही इस आहुतिको ग्रहण कर
सकते हैं । यदि आप देवोंको यज्ञकी अग्निमें आहुतिमें प्रक्षिप्त आहारका भक्षक स्वीकार करेंगे, तो देवोंको
मंत्रमय शरीरके धारक नहीं कह सकते । परन्तु आपने देवोंको मंत्रमय शरीरके धारक स्वीकार किया है ।
जैमिनी ऋषिने कहा भी है—"देवताओंके लिए चतुर्थीका ही प्रयोग करना चाहिये ।" (पूर्व मीमांसकोंने
ईश्वरका अस्तित्व नहीं माना है । उनके मतमें आहुति दिये जानेवाले देवताओंको छोड़ कर दूसरे देवोंका
अस्तित्व नहीं है) । मृगेन्द्रने भी कहा है—
“यदि देवता मंत्रमय शरीरके धारक न होकर हम लोंगोंकी तरह मूर्त शरीरके धारक हों, तो जैसे
हम एक साथ बहुत स्थानोंमें नहीं जा सकते, उसी प्रकार देवता भी एक साथ सब यज्ञोंमें उपस्थित नहीं
हो सकेंगे ।”
उपर्युक्त श्लोकमें 'सा' का प्रयोग देवताके अर्थमें हुआ है । होम किये हुए पदार्थ भस्म हो जाते हैं,
और उन पदार्थोंके उपभोगसे देव प्रसन्न होते हैं, यह कथन प्रलापमात्र है । तथा, आपने त्रेता अग्नि (दक्षिण
अग्नि, आहवनीय अग्नि और गार्हपत्य अग्नि) को तैंतीस करोड़ देवताओंका मुख स्वीकार किया है । श्रुतिमें
१. अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव । छान्दोग्य. उ. ८-५-१; मुण्डक उ. १-२-६; बृहदारण्यक
उ० ३-१; भ० गीता ४-३३; महाभारते शांतिपर्वणि ।
२. अष्टगुणैश्वर्ययोगादेकानेकाणुमहच्छरीरविविधकरणं विक्रिया सा प्रयोजनमस्येति वैक्रियकं ।
३. उदारं स्थूलं, उदारं प्रयोजनं अस्येति औदारिकं ।
४. दक्षिणाग्निः, आहवनीयः, गार्हपत्य इति त्रयोऽग्नयः । 'अग्नित्रयमिदं त्रेता' इत्यमरः ।
५. आश्व. गृ. सू. अ. ४

९६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
मन्योन्योच्छिष्टभुक्तिप्रसङ्गः । तथा च ते तुरुष्केभ्योऽप्यतिरिच्यन्ते । तेऽपि तावदेकत्रैवामत्रे
भुञ्जते, न पुनरेकेनैव वदनेन । किञ्च, एकस्मिन् वपुषि वदनबाहुल्यं क्वचन श्रूयते, यत्पुनरेनेक-
शरीरेष्वेकं मुखमिति महदाश्चर्यम् । सर्वेषां च देवानामेकस्मिन्नेव मुखेऽङ्गीकृते, यदा केन-
चिदेको देवः पूजादिनाऽराद्धोऽन्यश्च निन्दादिना विराद्धः, ततश्चेकेनैव मुखेन युगपदनुग्रह-
निग्रहवाक्योच्चारणसङ्करः प्रसज्येत । अन्यच्च, मुखं देहस्य नवमो भागः, तदपि येषां दाहात्मकं,
तेषामेकैकशः सकलदेहस्य दाहात्मकत्वं त्रिभुवनभस्मीकरणपर्यवसितमेव संभाव्यत इत्य-
लमतिचर्चया ॥
यच्च कारीरीयागादौ वृष्ट्यादिफलेऽव्यभिचारस्तत्प्रीणितदेवतानुग्रहहेतुक उक्तः
सोऽप्यनैकान्तिकः । क्वचिद् व्यभिचारस्यापि दर्शनात् । यत्रापि न व्यभिचारस्तत्रापि न
त्वदाहिताहुतिभोजनजन्मा तदनुग्रहः । किन्तु स देवताविशेषोऽतिशयज्ञानी स्वोद्देशनिर्वर्तितं
पूजोपचारं यदा स्वस्थानावस्थितः सन् जानीते, तदा तत्कर्त्तारं प्रति प्रसन्नचेता वृष्ट्यादितत्त-
त्कार्या

न्तरं प्राप्तास्ते तावत् स्वकृतसुकृतदुष्कृत-
Line 9: कर्मानुसारेण सुरनारकादिगतिषु सुखमसुखं वा भुञ्जाना एवासते ते कथमिव तनयादि-
Line 10: भिरावर्जितं पिण्डमुपभोक्तुं स्पृहयालवोऽपि स्युः । तथा च युष्मद्यूथिनः पठन्ति-
Line 11: “मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत् तृप्तिकारणम् ।
Line 12: तन्निर्वाणप्रदीपस्य स्नेहः संवर्धयेच्छिखाम्” ॥
Line 13: इति । कथं च श्राद्धविधानाच्चार्जितं पुण्यं तेषां समीपमुपैतु । तस्य तदन्यकृतत्वात् जडत्वात्
Line 14: निश्चरणत्वाच्च ॥
Line 15: अथ तेषामुद्देशेन श्राद्धादिविधानेऽपि पुण्यं दातुरेव तनयादेः स्यादिति चेत् । तन्न । तेन
Line 16: तज्जन्यपुण्यस्य स्वाध्यवसायाद्युत्तारितत्वात् । एवं च तत्पुण्यं नैकतरस्यापि इति विचाल एव
Line 17: विलोनं त्रिशङ्कुज्ञातेन । किन्तु पापानुबन्धिपुण्यत्वात् तत्त्वतः पापमेव । अथ विप्रोपभुक्त

९८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
श्रद्धातुमपि न शक्यते । भोजनावसरे तत्सङ्क्रमलिङ्गस्य कस्याप्यनवलोकनात् विप्राणामेव च
तृप्तेः साक्षात्करणात् । यदि परं त एव स्थूलकवलैराकुलतरमतिगार्ध्द्याद् भक्षयन्तः प्रेतप्रायाः,
इति मुधैव श्राद्धादिविधानम् । यदपि च गयाश्राद्धादियाचनमुपलभ्यते, तदपि तादृशविप्रलम्भ-
कविभङ्ग'ज्ञानिव्यन्तरादिकृतमेव निश्चेयम् ॥
यदप्युदितम् आगमश्चात्र प्रमाणमिति । तदप्यप्रमाणम् । स हि पौरुषेयो वा स्यात्,
अपौरुषेयो वा ? पौरुषेयश्चेत् सर्वज्ञकृतः, तदितरकृतो वा ? आद्यपक्षे युष्मन्मतव्याहतिः ।
तथा च भवत्सिद्धान्तः ।
“अतीन्द्रियाणामर्थानां साक्षाद् द्रष्टा न विद्यते ।
नित्येभ्यो वेदवाक्येभ्यो यथार्थत्वविनिश्चयः” ॥१॥
द्वितीयपक्षे तु तत्र दोषवत्कर्तृत्वेनाश्वासप्रसङ्गः । अपौरुषेयश्चेत् न सम्भवत्येव । स्वरूपनिरा-
करणात्, तुरङ्गशृङ्गवत् । तथाहि । उक्तिर्वचनमुच्यते इति चेति पुरुषक्रियानुगतं रूपमस्य ।
एतत्क्रियाऽभावे कथं भवितुमर्हति । न चैतत् केवलं क्वचिद् ध्वनदुपलभ्यते । उपलब्धावप्य-
दृश्यवक्त्राशङ्कासम्भवात् । तस्मात् यद् वचनं तत् पौरुषेयमेव, वर्णात्मकत्वात्, कुमारसम्भ-
वादिवचनवत् । वचनात्मकश्च वेदः । तथा चाहुः-


उसी प्रकार श्राद्धसे उत्पन्न पुण्यके पिता और पुत्र दोनों हीके अनुपभोगके कारण यह पुण्य बीचमें ही लटका
रह जाता है) । वस्तुतः यह पुण्य पापका कारण होनेसे पाप ही है। यदि कहें कि ब्राह्मणोंको खिलाया
हुआ भोजन पितरोंके पास पहुँच जाता है, तो इसका कौन विश्वास करेगा ? क्योंकि जो भोजन ब्राह्मणोंको
खिलाया जाता है, उससे ब्राह्मणोंका ही पेट बड़ा होता देखा जाता है । पितरोंका ब्राह्मणोंके शरीरमें प्रविष्ट
होना भी विश्वासके योग्य नहीं; क्योंकि ब्राह्मणोंको भोजन कराते समय उनके शरीरमें पितरोंके प्रवेश
होनेका कोई भी चिह्न दिखाई नहीं पड़ता, और भोजन पाकर ब्राह्मणोंकी ही तृप्ति देखी जाती है। ये
ब्राह्मण बड़े-बड़े ग्रासों-द्वारा अत्यन्त लोलुपतापूर्वक भोजन करते हुए साक्षात् प्रेतोंके समान मालूम होते हैं ।
अतएव श्राद्ध आदिमें विश्वास करना बिलकुल व्यर्थ है । तथा, गया आदि तीर्थ स्थानोंमें श्राद्ध करनेके लिए
जो कहते हैं, वे कोई ठगनेवाले विभंगज्ञानके धारक व्यंतर आदि नीच जातिके देव ही होने चाहिए ।
इस सम्बन्धमें आप लोगोंने जो आगमको प्रमाण कहा, वह आगम ही प्रमाण नहीं कहा जा सकता ।
वह आगम पौरुषेय है ? अथवा अपौरुषेय है ? यदि वह आगम पौरुषेय है तो वह सर्वज्ञकृत है ? या
असर्वज्ञकृत ? यदि आगमका बनानेवाला पुरुष सर्वज्ञ है तो आप लोगोंके सिद्धान्तसे विरोध आता है। क्योंकि
आपके सिद्धान्तमें कहा है—
अतीन्द्रिय पदार्थोंका कोई साक्षात् द्रष्टा नहीं है, अतएव नित्य वेद वाक्योंसे ही अतीन्द्रिय पदार्थोंकी
यथार्थताका निश्चय होता है ॥१॥”
यदि असर्वज्ञ पुरुषको आगम कर्ता मानो तो असर्वज्ञ पुरुषके सदोष होनेके कारण उस आगममें विश्वास
नहीं किया जा सकता । यदि कहो कि आगम अपौरुषेय है तो यह सम्भव नहीं है। क्योंकि घोड़ेके सींगके
समान उसके स्वरूपका ही निराकरण हो जाता है। कैसे ? उक्तिको वचन कहते हैं—इस कथनके अनुसार,
आगमका स्वरूप पुरुषकी क्रियाके अनुसार होता है । पुरुषकी क्रियाके अभावमें आगम सद्रूप नहीं हो सकता ।
यह वचन कहीं पर भी केवल ध्वनिके रूपमें नहीं पाया जाता । यदि कहीं ध्वनिके रूपमें पाया भी जाये तो
उस स्थानमें किसी अदृश्य वक्ताकी कल्पना करनी होगी। अतएव जो ‘वचन’ है वह पौरुषेय ही है,
वर्णात्मक होनेसे; कुमारसम्भव आदिकी तरह । जैसे कुमारसम्भव आदि वर्णात्मक होनेसे पौरुषेय हैं,
वैसे वेद भी वचन रूप होनेसे वर्णात्मक हैं, इसलिये वेद पौरुषेय हैं । कहा भी है—


१. तत्त्वार्थसू० १-३२ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी ९९
“ताल्वादिजन्मा ननु वर्णवर्गो वर्णात्मको वेद इति स्फुटं च ।
पुंसश्च ताल्वादि ततः कथं स्यादपौरुषेयोऽयमिति प्रतीतिः ” ॥
श्रुतेरपौरुषेयत्वमुररीकृत्यापि तावद्भवद्भिरपि तदर्थव्याख्यानं पौरुषेयमेवाङ्गीक्रियते ।
अन्यथा “अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः”१ इत्यस्य श्वमांसं भक्षयेदिति किं नार्थः । नियाम-
काभावात् । ततो वरं सूत्रमपि पौरुषेयमभ्युपगतम् । अस्तु वा अपौरुषेयः, तथापि तस्य न
प्रामाण्यम् । आप्तपुरुषाधीना हि वाचां प्रमाणतेति । एवं च तस्याप्रामाण्ये, तदुक्तस्तदनुपाति-
स्मृतिप्रतिपादितश्च हिंसात्मको यागश्राद्धादिविधिः प्रामाण्यविधुर एवेति ॥
अथ योऽयं “न हिंस्यात् सर्वभूतानि”२ इत्यादिना हिंसानिषेधः स औत्सर्गिको मार्गः,
सामान्यतो विधिरित्यर्थः । वेदविहिता तु हिंसा अपवादपदम्, विशेषतो विधिरित्यर्थः ।
ततश्चापवादेनोत्सर्गस्य बाधितत्वाद् न श्रौतो हिंसाविधिर्दोषाय । “उत्सर्गापवादयोरपवादो
विधिर्बलीयान्”३ इति न्यायात् । भवतामपि हि न खल्वेकान्तेन हिंसानिषेधः । तत्तत्कारणे
जाते पृथिव्यादिप्रतिसेवनानामनुज्ञानात् । ग्लानाद्यसंस्तरे४ आधाकर्मादि५ग्रहणभणनाच्च ।
अपवादपदं च याज्ञिकी हिंसा, देवतादिप्रीते, पुष्टालम्बनत्वात् ॥
“वर्णोंका समूह निश्चय ही तालु आदिसे उत्पन्न होता है, तथा वेद वर्णात्मक है । तालु आदि स्थान
पुरुषके ही होते हैं, इसलिये वेद अपौरुषेय नहीं हो सकता ।”
तथा, श्रुतिको अपौरुषेय मान कर भी आप लोगोंने श्रुतिके व्याख्यानको पौरुषेय ही माना है । यदि
श्रुतिके अर्थका व्याख्यान पौरुषेय न मानो तो “अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः” ( स्वर्गकी इच्छा रखने-
वाला अग्निहोत्र यज्ञकी आहुति दे ) इस श्रुतिका यह अर्थ भी किया जा सकता है कि “स्वर्गके इच्छुकको
कुत्तेके मांसका भक्षण करना चाहिये” (अग्निहा श्वा तस्य उत्रं मांसं जुहुयात् भक्षयेत्) । क्योंकि यदि श्रुतिका
व्याख्याता पुरुष नहीं है, तो अमुक श्रुतिका अमुक ही अर्थ होता है, अन्य नहीं, इसका कोई नियम न रह
जायेगा । अतएव श्रुतिके अर्थकी तरह श्रुतिको भी पौरुषेय ही स्वीकार करना चाहिये । अथवा, वेदको यदि
अपौरुषेय मान भी लें तो वह प्रमाण नहीं हो सकता । क्योंकि वेदका प्रामाण्य भी आप्त पुरुषोंके वचनोंके ऊपर
ही अवलम्बित है । इस प्रकार वेदके अप्रामाण्य होनेपर वेद और स्मृति आदि द्वारा प्रतिपादित हिंसात्मक याग,
श्राद्ध आदिका विधान भी अप्रामाण्य ही मानना होगा ।
शंका--( उत्सर्ग—सामान्य—और अपवादके भेदसे विधि दो प्रकारकी होती है ) । प्रस्तुत प्रसंगमें
“किसी जीवकी हिंसा न करो ( मा हिंस्यात् सर्वभूतानि )” यह सामान्य विधि है, तथा “वेदविहित हिंसा
पापके लिये नहीं होती” यह अपवाद विधि है । अतएव सामान्य और अपवाद विधिमें अपवाद विधिके
बलवान होनेके कारण वेदोक्त हिंसा दोषपूर्ण नहीं है । कहा भी है—“उत्सर्ग और अपवाद विधिमें अपवाद
विधि ही बलवान् होती है ।” तथा जैन भी हिंसाका सर्वथा निषेध नहीं करते, क्योंकि अमुक कारणोंके
उपस्थित होनेपर पृथिवी आदिके वध करनेकी आज्ञा जैन शास्त्रोंमें भी दी गई है । तथा, सामान्य रूपसे
साधुओंको उद्दिष्ट भोजनके त्यागकी आज्ञा होनेपर भी, रोग आदिके कारण संयमका पालन करनेमें असमर्थ
मुनियोंके लिए उद्दिष्ट भोजन ( आधाकर्म ) ग्रहण करनेकी आज्ञा जैन शास्त्रोंने दी है । अतएव सामान्यसे
हिंसाका निषेध करके भी देवता आदिको प्रसन्न करनेके लिये हमारे शास्त्रोंमें यज्ञ सम्बन्धी हिंसाका विधान
अपवाद विधिसे ही किया गया समझना चाहिये ।
१. तैत्तरीयसंहिता । २. छन्दोग्य उ. ८ । ३. हेमहंसगणिसमुच्चितहेमव्याकरणस्थन्यायः । 'मा
हिंस्यात् सर्वभूतानि' इत्युत्सर्गस्य 'वायव्यं श्वेतमालभेत' इति शास्त्रमपवादः । ४. संयमनिर्वाहः । ५. आधाय
साधूंश्चेतसि प्रणिधाय यत्क्रियते भक्तादि तदाधाकर्म । पृषोदरादित्वादिति यलोपः । आधानं साधुनिमित्तं चेतसः
प्रणिधानं यथामुकस्य साधो कारणेन मया भक्तादि पचनीयमिति । आधाय कर्म पाकादिक्रिया आधाकर्म ।
तद्योगाद् भक्ताद्यपि आधाकर्म ।

१०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
इति परमाशङ्क्य स्तुतिकार आह। नोत्सृष्टमित्यादि। अन्यार्थमिति मध्यवर्ति पदं
डमरुकमणिन्यायेनो¹भयत्रापि सम्बन्धनीयम् । अन्यार्थमुत्सृष्टम्--अन्यस्मै कार्याय प्रयुक्तम्--
उत्सर्गवाक्यम्, अन्यार्थप्रयुक्तेन वाक्येन नापोद्यते-नापवादगोचरीक्रियते । यमेवार्थमाश्रित्य
शास्त्रेऽुत्सर्गः प्रवर्तते, तमेवार्थमाश्रित्यापवादोऽपि प्रवर्तते तयोर्निम्नोन्नतादिव्यवहारवत्
परस्परसापेक्षत्वेनैकार्थसाधनविषयत्वात्। यथा जैनानां संयमपरिपालनार्थं नवकोटिविशुद्धा-
हारग्रहणमुत्सर्गः। तथाविधद्रव्यक्षेत्रकालभावापत्सु च निपतितस्य गत्यन्तराभावे पंचकादिय-
तनया अनेषणीयादिग्रहणमपवादः। सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव। न च मरणैकशरणस्य
गत्यन्तराभावोऽसिद्ध इति वाच्यम्।
"सव्वत्थ संजमं संजमाओ अप्पाणमेव रक्खिज्जा।
मुच्चइ अइवायाओ पुणो विसोही न याऽविरई" ²॥
इत्यागमात् ॥
तथा आयुर्वेदेऽपि यमेवैकं रोगमधिकृत्य कस्याञ्चिदवस्थायां किञ्चिद्द्रव्यमपथ्यं, तदेवा-
वस्थान्तरे तत्रैव रोगे पथ्यम्-
"उत्पद्यते हि ऽसावस्था देशकालामयान् प्रति ।
यस्यामकार्यं कार्यं स्यात् कर्म कार्यं तु वर्जयेत् ॥"


समाधान-इस प्रकार अन्य वादियोंकी शंका उपस्थित कर स्तुतिकारने 'नोत्सृष्टमित्यादि' कहा है ।
'अन्यार्थम्' इस मध्यवर्ती पदको डमरुकमणि न्यायसे दोनों वाक्योंके साथ जोड़ना चाहिये । किसी एक कार्यके
लिये प्रयुक्त किया गया उत्सर्ग वाक्य उससे भिन्न कार्यके लिये प्रयुक्त किये गये वाक्यके द्वारा अपवादका
विषय नहीं बनाया जा सकता । जिस कार्यके लिये शास्त्रोंमें उत्सर्ग ( वाक्य ) प्रवृत्त होता है, उसी कार्यके
लिये अपवाद ( वाक्य ) भी प्रवृत्त होता है । क्योंकि अच्छे और बुरे आदि व्यवहारके समान परस्पर सापेक्ष
रूपसे एक ही अर्थकी सिद्धि करना उनका विषय है । जिस प्रकार जैन मुनियोंके मन-वचन-काय और कृत-कारित-
अनुमोदन रूप नव कोटिसे विशुद्ध आहारग्रहण रूप उत्सर्ग संयमकी रक्षाके लिये होता है, उसी प्रकार द्रव्य
क्षेत्र, काल और भाव-जन्य आपदाओंसे ग्रस्त मुनिके यदि उसे अन्य कोई उपाय सूझ न पड़े, तो वह पंच
कोटिसे विशुद्ध अभक्ष्य, उद्दिष्ट आदि आहारका ग्रहण कर सकता है, जो अपवाद है । वह भी केवल संयमकी
रक्षाके लिये ही है । क्योंकि मरणासन्न मुनिके अपवाद मार्गका अवलम्बन करनेके सिवाय और कोई मार्ग नहीं
है । यदि कहो, कि मरणासन्न मुनिके भी अन्य उपायका अभाव असिद्ध है तो यह ठीक नहीं है क्योंकि-
"मुनिको सर्वत्र संयमकी रक्षा करना चाहिए । संयमकी अपेक्षा अपनी ही रक्षा करनी चाहिए । इस
तरह मुनि संयमभ्रष्टतासे मुक्त हो जाता है । वह फिरसे विशुद्ध हो सकता है, और वह अविरतिका भागी
नहीं होता ।"
ऐसा आगमका वचन है ।
आयुर्वेदमें भी जो वस्तु रोगकी एक अवस्थामें अपथ्य है, वही दूसरी अवस्थामें पथ्य कही गयी है ।
कहा भी है-
"देश और कालसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें न करने योग्य कार्योंको करना पड़ता है, और करने योग्य
कार्योंको छोड़ना पड़ता है।"


१. डमरुमध्ये प्रतिबद्धो मणिरेक एव सन् डमरुविचाले तदुभयाङ्गसंबद्धो भवति तद्वदेकमेवान्यार्थमिति
पदमुभयत्र संबध्यते । अयमेव न्यायो देहलीदीपन्याय इत्यप्यभिधीयते ।
२. छाया-सर्वत्र संयमं संयमादात्मानमेव रक्षेत् । मुच्यतेऽतिपातात्पुनर्विशुद्धिर्न चाविरतिः ॥
निशीथचूर्णीपीठिकायां ४५१ इत्यस्य चूर्णी ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक ११ ] स्याद्वादमञ्जरी १०१
इति वचनात् । यथा बलवदादेर्ज्वरिणो लङ्घनं, क्षीणधातोस्तु तद्विपर्ययः । एवं देशाद्यपेक्षया
ज्वरिणोऽपि दधिपानादि योज्यम् । तथा च वैद्याः—
“कालाविरोधि निर्दिष्टं ज्वरादौ लङ्घनं हितम् ।
ऋतेऽनिलश्रमक्रोधशोककामकृतज्वरान् ॥”
एवं च यः पूर्वमपथ्यपरिहारो, यत्र तत्रैवावस्थान्तरे तस्यैव परिभोगः । स खलूभयो-
रपि तस्यैव रोगस्य शमनार्थः । इति सिद्धमेकविषयकत्वमुत्सर्गापवादयोरिति ॥
भवतां चोत्सर्गोऽन्यार्थः अपवादश्चान्यार्थः “न हिंस्यात् सर्वभूतानि” इत्युत्सर्गो हि
दुर्गतिनिषेधार्थः । अपवादस्तु वैदिकहिंसाविधिर्देवताऽतिथिपितृप्रीतिसंपादनार्थः । अतश्च
परस्परनिरपेक्षत्वे कथमुत्सर्गोऽपवादेन बाध्यते । “तुल्यबलयोर्विरोध” इति न्यायात् । भिन्ना-
र्थत्वेऽपि तेन तद्बाधने अतिप्रसङ्

१०२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
अत्राग्निकार्यशब्दवाच्यस्य यागादिविधेरुपयान्तरैरपि लभ्यानां संपदामेव हेतुत्वं
वदन्नाचार्यः तस्य सुगतिहेतुत्वमर्थात् कदर्थितवानेव । तथा च स एव भावाग्निहोत्रं ज्ञान-
पालीत्यादिश्लोकैः स्थापितवान् ॥
तदेवं स्थिते तेषां वादिनां चेष्टामुपमया दूषयति स्वपुत्रेत्यादि । परेषां भवत्प्रणीतवचन-
पराङ्मुखानां स्फुरितं—चेष्टितम्, स्वपुत्रघाताद् नृपतित्वलिप्ससब्रह्मचारिनिजसुतनिपातेन
राज्यप्राप्तिमनोरथसदृशम् । यथा किल कश्चिदविपश्चित् पुरुषः परुषाशयतया निजमङ्गजं
व्यापाद्य राज्यश्रियं प्राप्तुमीहते । न च तस्य तत्प्राप्तावपि पुत्रघातपातककलङ्कपङ्कः क्वचिद-
पयाति । एवं वेदविहितहिंसया देवतादिप्रीतिसिद्धावपि, हिंसासमुत्थं दुष्

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०३
सांप्रतं नित्यपरोक्षज्ञानवादिनां मीमांसकभेदभट्टानाम् एकात्मसमवायिज्ञानान्तरवेद्य-
ज्ञानवादिनां च यौगानां मतं विकुट्टयन्नाह-
स्वार्थावबोधक्षम एव बोधः प्रकाशते नार्थकथान्यथा तु ।
परे परेभ्यो भयतस्तथापि प्रपेदिरे ज्ञातमनात्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥
बोधो—ज्ञानं, स च स्वार्थावबोधक्षम एव प्रकाशते । स्वस्य—आत्मस्वरूपस्य, अर्थस्य
च पदार्थस्य योऽवबोधः—परिच्छेदस्तत्र, क्षम एव—समर्थ एव प्रतिभासते इत्ययोगव्यवच्छेदः।
प्रकाशत इति क्रियया अवबोधस्य प्रकाशरूपत्वसिद्धेः सर्वप्रकाशानां स्वार्थप्रकाशकत्वेन,
होनेवाले सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति जैसे महान् पुण्यके सामने वह नगण्य है । जिस प्रकार कोई वैद्य रोगीको अच्छा
करनेके लिये नश्तर लगाना, लंघन कराना आदि दुख रूप क्रियाओंको करता हुआ भी अपने शुभ परिणामोंके
कारण पुण्यका ही भागी होता है, उसी तरह जिन मन्दिरोंका निर्माण शुभ परिणामोंसे अनन्त सुखकी प्राप्तिके
लिये ही किया जाता है। तथा, वेदोक्त हिंसा स्वर्गकी प्राप्तिमें कारण नहीं होती। क्योंकि वध-स्थलपर ला कर
इकट्ठे किये हुए पशुओंका करुणापूर्ण आक्रन्दन अशुभ गतिका ही कारण होता है। तथा, आप लोगोंने स्वयं
यम, नियमादिको स्वर्ग पानेमें कारण बताया है। तथा, यदि यज्ञमें वध किये हुए सब पशुओंको स्वर्ग
मिलने लगे, तो संसारके सभी हिंसकोंको स्वर्ग मिल जाना चाहिये। अतएव सांख्य मतके अनुयायियोंने
कहा है—“यदि पशुओंको मारकर, उनके रक्तसे पृथ्वी मण्डलको सींचकर, स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है, तो
फिर नरक जानेके लिये और भी महा भयंकर पाप करने चाहिये ।” तथा यदि छोटे-छोटे मूक पशुओंके वधसे
स्वर्ग मिल सकता है, तो अपने प्रिय माता-पिताकी यज्ञमें आहुति देनेसे मोक्ष मिलना चाहिये ।
शंका—वाक्य सामान्य और अपवादके भेदसे दो प्रकारके होते हैं । जैसे, 'न हिंस्यात् सर्वभूतानि,'
अर्थात् किसी प्राणीको मत मारो, यह सामान्य वाक्य है, और 'वेदोक्त हिंसा पुण्यका कारण होती है,' यह
अपवाद वाक्य है । सामान्य और अपवाद वाक्योंमें अपवाद वाक्य विशेष बलवान् होता है, इसलिये वेदोक्त
हिंसामें पाप नहीं है। समाधान—सामान्य और अपवाद दोनों वाक्य एक ही भावके द्योतक होने चाहिये,
परन्तु प्रस्तुत प्रसंगमें अपवाद वाक्य देवता, अतिथि और पितरोंको प्रसन्न करनेके लिये है, और सामान्य
वाक्य पाप और उसके फलको दूर करनेके लिये बताया गया है। तथा, देवता आदिको प्रसन्न करनेके लिये
हिंसाके अतिरिक्त अन्य दूसरे उपाय आपके शास्त्रोंमें भी बतलाये हैं, फिर आप हिंसात्मक उपायोंका ही क्यों
समर्थन करते हैं।
(२) इस लोकमें ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ भोजन किसी भी तरह मृत प्राणियोंको तृप्त नहीं कर
सकता। इसलिये श्राद्ध करना भी धर्म नहीं है ( देखिये व्याख्या ) ।
( ३ ) वर्णात्मक वेद तालु आदिसे उत्पन्न होता है, और तालु आदि स्थान पुरुषके ही संभव हैं।
तथा, श्रुतिके तात्पर्यको समझानेके लिये भी किसी वक्ताकी आवश्यकता है, अतएव वेदको पौरुषेय मानना ही
युक्तियुक्त है।
अब ज्ञानको प्रत्यक्ष न मान कर उसे नित्य परोक्ष माननेवाले भट्ट मीमांसक, तथा एक ज्ञानको अन्य
ज्ञानोंसे संवेद्य स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिक लोगोंके मतको दूषित सिद्ध करते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—ज्ञान अपनेको और दूसरे पदार्थोंको जाननेमें समर्थ ही है। यदि वह स्वरूप-प्रकाशक न
हो तो पदार्थ सम्बन्धी कथन प्रकट नहीं हो सकता। तथापि ज्ञानके स्वपर-प्रकाशक होने पर भी पूर्वपक्ष
वादियोंके भयसे अन्य लोग ज्ञानको आत्मनिष्ठ स्वीकार नहीं करते ।
व्याख्यार्थ—जिस प्रकार दीपक अपने और दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित करता है, वैसे ही ज्ञान निज
और पर पदार्थोंको जानता है। यदि ज्ञानको स्वसंविदित न माना जाय, तो पदार्थोंकी अस्ति-नास्ति रूप
व्यवस्था नहीं बन सकती । क्योंकि यदि ज्ञान स्वसंवेदन रूप नहीं हो, तो एक ज्ञानके जाननेके लिये दूसरा

१०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
बोधस्यापि तत्सिद्धिः । विपर्यये दूषणमाह । नार्थकथान्यथा त्विति । अन्यथेति—अर्थप्रकाशने
ऽविवादाद्, ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वानभ्युपगमेऽर्थकथैव न स्यात् । अर्थकथा—पदार्थसम्बन्धिनी
वार्ता, सदसद्रूपात्मकं स्वरूपमिति यावत् । तुशब्दोऽवधारणे भिन्नक्रमश्च स चार्थकथया सह
योजित एव । यदि हि ज्ञानं स्वसंविदितं नेष्यते, तदा तेनात्मज्ञानाय ज्ञानान्तरमपेक्षणीयं
तेनाप्यपरमित्याद्यनवस्था । ततो ज्ञानं तावत् स्वावबोधनव्यग्रतामग्नम् । अर्थस्तु जडतया
स्वरूपज्ञापनासमर्थ इति को नामार्थस्य कथामपि कथयेत् । तथापि एवं ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वे
युक्त्या घटमानेऽपि, परे—तीर्थान्तरीयाः, ज्ञानं—कर्मतापन्नम्, अनात्मनिष्ठं—न विद्यते
आत्मनः स्वस्य निष्ठा निश्चयो यस्य तदनात्मनिष्ठम्, अस्वसंविदितमित्यर्थः, प्रपेदिरे—प्रपन्नाः
कुतः इत्याह । परेभ्यो भयतः, परे—पूर्वपक्षवादिनः, तेभ्यः सकाशात् ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वं
नोपपद्यते, स्वात्मनि क्रियाविरोधादित्युपालम्भसम्भावनासम्भवं यद्भयं तस्मात् तदाश्रित्ये-
त्यर्थः ॥
इत्थमक्षरगमनिकां विधाय भावार्थः प्रपञ्च्यते । भाट्टास्तावदिदं वदन्ति । यत् ज्ञानं
स्वसंविदितं न भवति, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । न हि सुशिक्षितोऽपि नटबटुः स्वस्कन्धम-
धिरोढुं पटुः, न च सुतीक्ष्णाप्यसिधारा स्वं छेत्तुमाहितव्यापारा । ततश्च परोक्षमेव ज्ञानमिति ।
तदेतन्न सम्यक् । यतः किमुत्पत्तिः स्वात्मनि विरुध्यते ज्ञप्तिर्वा ? यद्युत्पत्तिः सा विरुध्यताम् ।
नहि वयमपि ज्ञानमात्मानमुत्पादयतीति मन्यामहे । अथ ज्ञप्तिः नेयमात्मनि विरुद्धा । तदात्म-
नैव ज्ञानस्य स्वहेतुभ्य उत्पादात् । प्रकाशात्मनेव प्रदीपालोकस्य । अथ प्रकाशात्मैव प्रदीपालोक
उत्पन्न इति परप्रकाशोऽस्तु । आत्मानमप्येतावन्मात्रेणैव प्रकाशयतीति कोऽयं न्यायः इति चेत्,
तत्किं तेन वराकेणाप्रकाशितेनैव स्थातव्यम्, आलोकान्तराद् वास्य प्रकाशेन भवितव्यम् ।
प्रथमे प्रत्यक्षबाधः । द्वितीयेऽपि सैवानवस्थापत्तिश्च ॥
और दूसरेके लिये तीसरे ज्ञानकी आवश्यकता होनेसे अनवस्था दोष मानना पड़ेगा । इसलिये जब ज्ञान ही
अपने आपको नहीं जान सकता, तो फिर जड़ रूप पदार्थोके ज्ञान कैसे हो सकता है ? अतएव पदार्थके विषयमें
कोई बात करना भी असंभव हो जायगा । इस प्रकार युक्तिसे ज्ञानके स्वसंवेदन रूप सिद्ध होनेपर भी 'आत्मामें
क्रियाके विरोध होनेसे ज्ञान स्वप्रकाशक नहीं हो सकता'—दूसरे वादियोंके इस उपालंभके भयसे भट्टमतके
अनुयायी ज्ञानको स्वप्रकाशक नहीं मानते ।
भट्ट मीमांसक—ज्ञान स्वप्रकाशक नहीं होता, वह पहले नहीं जाने हुए पदार्थोंको ही जानता है ।
प्रकाश होना क्रिया है, इसलिये कोई भी क्रिया स्वयं ही अपना विषय नहीं हो सकती । जैसे चतुरसे चतुर नट
भी स्वयं अपने कंधेपर नहीं चढ़ सकता, तथा पैनीसे पैनी तलवारकी धार भी अपने आपको नहीं काट सकती,
वैसे ही ज्ञानमें भी क्रिया होना संभव नहीं है, अतएव ज्ञान परोक्ष ही है । जैन—यह ठीक नहीं । हम पूछते
हैं, ज्ञानमें ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे विरोध आता है ? अथवा ज्ञानमें जाननेकी क्रियाकी ( ज्ञप्तिकी ) उत्पत्ति
होनेमें विरोध आता है ? यदि ज्ञानमें ज्ञानकी उत्पत्ति होनेमें विरोध आता है तो भले ही आ जाय ।
ज्ञान अपने आपको उत्पन्न करता है, ऐसा हम भी नहीं मानते । यदि ज्ञानमें जाननेकी क्रियाकी उत्पत्ति
होनेमें विरोध आता है तो यह जाननेकी क्रियाकी ज्ञानमें उत्पत्ति होना विरुद्ध नहीं है । क्योंकि जिस प्रकार
प्रकाशात्मक रूपसे ही प्रदीपका प्रकाश उत्पन्न होता है, उसी प्रकार जाननेकी क्रिया रूपसे ही ज्ञान अपने
हेतुओंसे उत्पन्न होता है । शंका—प्रकाशात्मक रूपसे उत्पन्न प्रदीपका आलोक दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित
करने वाला भले ही हो, लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने आपको भी प्रकाशित करता
है । समाधान—यदि ऐसी बात है तो उस विचारेको अप्रकाशित ही रहना चाहिये, अथवा किसी अन्य
प्रकाशसे प्रकाशित होना चाहिये । प्रथम पक्षमें प्रत्यक्षसे बाधा आती है । द्वितीय पक्षमें वही अनवस्था दोष
उपस्थित होता है ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०५
अथ नासौ स्वमपेक्ष्य कर्मतया चकास्तीत्यस्वप्रकाशकः स्वीक्रियते, आत्मानं न प्रकाश-
यतीत्यर्थः । प्रकाशरूपतया तूत्पन्नत्वात् स्वयं प्रकाशत एवेति चेत्, चिरञ्जीव । न हि वयमपि
ज्ञानं कर्मतयैव प्रतिभासमानं स्वसंवेद्यं ब्रूमः । ज्ञानं स्वयं प्रतिभासत इत्यादावकर्मकस्य तस्य
चकासनात् । यथा तु ज्ञानं स्वं जानामीति कर्मतयापि तद्भाति, तथा प्रदीपः स्वं प्रकाशयतीत्य-
यमपि कर्मतया प्रथित एव ॥
यस्तु स्वात्मनि क्रियाविरोधो दोष उद्भावितः सोऽयुक्तः । अनुभवसिद्धेऽर्थे विरोधो-
सिद्धेः । घटमहं जानामीत्यादौ कर्तृकर्मवद् ज्ञप्तेरप्यवभासमानत्वात् । न चाप्रत्यक्षोपलम्भ-
स्यार्थदृष्टिः प्रसिध्यति । न च ज्ञानान्तरात् तदुपलम्भसम्भावना, तस्याप्यनुपलब्धस्य प्रस्तुतो-
पलम्भप्रत्यक्षीकाराभावात् । उपलम्भान्तरसम्भावने चानवस्था । अर्थोपलम्भात् तस्योपलम्भे
अन्योन्याश्रयदोषः ॥
अथार्थप्राकट्यमन्यथा नोपपद्येत यदि ज्ञानं न स्यात्, इत्यर्थापत्त्या२ तदुपलम्भ इति
चेत् । न । तस्या अपि ज्ञापकत्वेनाज्ञाताया ज्ञापकत्वायोगात् । अर्थापत्त्यन्तरान तज्ज्ञानेऽनव-
स्थेतरेतराश्रयदोषापत्तेः तदवस्थः परिभवः । तस्मादर्थोन्मुखतयेव स्वोन्मुखतयाऽपि ज्ञानस्य
प्रतिभासात् स्वसंविदितत्वम् ॥
शंका—अपनी अपेक्षा करके यह प्रदीप कर्म रूपसे प्रकाशमान नहीं होता, अतः अस्वप्रकाशक
रूपसे स्वीकृत होता है, अर्थात् वह अपने आपको प्रकाशित नहीं कर सकता; प्रकाश रूपसे उत्पन्न होनेसे
वह स्वयं प्रकाशमान होता ही है । समाधान—यदि ऐसी बात है तो ज्ञान कर्म रूपसे ही प्रकाशमान होनेसे
स्वसंवेद्य होता है, ऐसा हम भी नहीं मानते । क्योंकि 'ज्ञान स्वयं प्रकाशमान होता है' इस वाक्यमें भी
कर्मरूप न होनेवाला ज्ञानका प्रकाश होता है । जिस प्रकार 'ज्ञान अपने आपको जानता है' इस प्रकार कर्म
रूपसे वह भासित होता है, वैसे ही 'प्रदीप अपने आपको प्रकाशित करता है' इस प्रकार प्रदीप भी कर्म रूपसे
प्रकट होता है ।
ज्ञानमें स्वसंवेदन क्रियाका सद्भाव होनेसे जो विरोध रूप दोष बताया गया है, वह भी ठीक नहीं ।
क्योंकि अनुभवसे सिद्ध पदार्थोंमें यह विरोध नहीं देखा जाता । जिस प्रकार 'मैं घटको जानता हूँ' इत्यादि
प्रयोगोंमें कर्ता और कर्मका ज्ञान होता है, उसी तरह जाननेकी क्रियाका ज्ञान भी अवभासित होनेसे विरोध
रहित है । जो ज्ञान स्वयंको नहीं जानता उस ज्ञान द्वारा ज्ञेयार्थको जानना सिद्ध नहीं होता । किसी अन्य
ज्ञान द्वारा उस अज्ञात ज्ञानको जाननेकी संभावना नहीं, क्योंकि अज्ञात रूप अन्य ज्ञान प्रस्तुत अज्ञात ज्ञानको
प्रत्यक्ष रूपसे नहीं जान सकता । उस अज्ञात रूप अन्य ज्ञानको जानने वाले अन्य ज्ञानकी कल्पना करने
पर अनवस्था दोष आता है । ज्ञेयार्थका ज्ञान होने पर ज्ञातृज्ञानका ज्ञान होता है, इस सिद्धांतके माननेसे
अन्योन्याश्रय दोष आता है । क्योंकि ज्ञेयार्थका ज्ञान होने पर ज्ञातृज्ञानका ज्ञान होगा और ज्ञातृज्ञान होने पर
ज्ञेयार्थका ज्ञान हो सकेगा ।
भट्टमीमांसक—यदि अर्थ ( घट ) का ज्ञान न हुआ तो उस अर्थज्ञान ( घटज्ञान ) के अभावमें
अर्थ ( घट ) की प्रकटता नहीं होगी, अतएव अर्थापत्तिसे अर्थ-( घट ) ज्ञातृज्ञान जाना जाता है । जैन—यह
भी ठीक नहीं । क्योंकि जिसे अपना ज्ञापकत्व स्वरूप अज्ञात होता है, ऐसी अर्थापत्तिका ज्ञापकत्व ( अर्थज्ञातृ-
ज्ञापकत्व ज्ञान ) घटित नहीं होता । अन्य अर्थापत्ति ज्ञानसे प्रकृत अर्थापत्तिके ज्ञापकत्व स्वरूपका ज्ञान होने
पर अनवस्था और इतरेतराश्रय दोष आ जानेसे दोषापत्ति जैसी की तैसी बनी रहती है । अतएव जिस प्रकार
ज्ञान ज्ञेयार्थके उन्मुख होता है, उसी प्रकार स्वोन्मुख भी होनेसे उसका स्वसंविदितत्व सिद्ध होता है ।
१. न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नामेति न्यायात् ।
२. 'पुष्टो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्ये पुष्टत्वान्यथानुपपत्

१०६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
नन्वनुभूतेरनुभाव्यत्वे घटादिवदननुभूतित्वप्रसङ्गः । प्रयोगस्तु ज्ञानमनुभवरूपम-
प्यनुभूतिर्न भवति, अनुभाव्यत्वाद्, घटवत्, अनुभाव्यं च भवद्भिरिष्यते ज्ञानं, स्वसंवेद्यत्वात् ।
नैवम् । ज्ञातुर्ज्ञातृत्वेनेवानुभूतेरनुभूतित्वेनैवानुभवात् । न चानुभूतेरनुभाव्यत्वं दोषः । अर्था-
पेक्षयानुभूतित्वात्¹ स्वापेक्षया चानुभाव्यत्वात् । स्वपितृपुत्रापेक्षयैकस्य पुत्रत्वपितृत्ववद्
विरोधाभावात् ॥
अनुमानाच्च स्वसंवेदनसिद्धिः । तथाहि । ज्ञानं स्वयं प्रकाशमानमेवार्थं प्रकाशयति,
प्रकाशकत्वात्, प्रदीपवत् । संवेदनस्य प्रकाश्यत्वात् प्रकाशकत्वमसिद्धमिति चेत् । न । अज्ञान-
निरासादिद्वारेण प्रकाशकत्वोपपत्तेः ॥
ननु नेत्रादयः प्रकाशका अपि स्वं न प्रकाशयन्तीति प्रकाशकत्वहेतोरनैकान्तिकतेति चेत्,
न नेत्रादिभिरनैकान्तिकता । तेषां लब्ध्युपयोग²लक्षणभावेन्द्रियरूपाणामेव प्रकाशकत्वात् ।
भावेन्द्रियाणां च स्वसंवेदनरूपतयैवेति न व्यभिचारः । तथा संवित् स्वप्रकाशा, अर्थ-
प्रतीतित्वात्, यः स्वप्रकाशो न भवति नासावर्थप्रतीतिः, यथा घटः ॥
शंका—यदि अनुभूति ( ज्ञानको ) को अनुभाव्य ( ज्ञेय ) स्वीकार किया जाय, तो ज्ञेय घट-पटके
समान ज्ञानको भी अज्ञान रूप मानना चाहिये । अतएव 'ज्ञान अनुभव रूप हो कर भी अनुभाव्य ( ज्ञेय )
होनेसे घटकी तरह अनुभूति ( ज्ञान ) नहीं हो सकता ।' और आपने ज्ञानको अनुभाव्य माना है, स्वसंवेद्य
होनेसे । समाधान—जैसे ज्ञाताका ज्ञातृत्व रूपसे अनुभव होता है, वैसे ही अनुभूति भी अनुभूति रूपसे
ही अनुभवमें आती है । तथा, अनुभूतिको अनुभाव्य माननेमें दोष नहीं आता, क्योंकि अनुभूति पदार्थोंको
जाननेकी अपेक्षा अनुभूति रूप है, परन्तु जब वही अनुभूति स्वसंवेदन करती है, तब वह अनुभाव्य कही जाती
है । जिस प्रकार एक ही पुरुषको अपने पिताकी अपेक्षा पुत्र और अपने पुत्रोंकी अपेक्षा पिता कहा जाता है,
उसी प्रकार एक ही अनुभूति भिन्न-भिन्न अपेक्षाओंसे अनुभूति और अनुभाव्य कही जाती है । इसलिये कोई
विरोध नहीं है ।
तथा, 'ज्ञान स्वयं प्रकाशित होता हुआ ही दूसरे पदार्थोंको जानता है, क्योंकि वह प्रकाशक है, दीपककी
तरह' इस अनुमानसे ज्ञानके स्वसंवेदनकी सिद्धि होती है । यदि कहो कि ज्ञान प्रकाश्य है, इसलिये प्रकाशक
नहीं हो सकता तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि ज्ञान अज्ञानको नाश करता है, इसलिये वह प्रकाशक ही है ।
शंका--नेत्र आदि प्रकाशक होनेपर भी अपने आपको प्रकाशित नहीं करते, इसलिये प्रकाशकत्व हेतु
अनैकान्तिक है । समाधान—यह ठीक नहीं, क्योंकि नेत्र आदि लब्धि और उपयोग रूप भावेन्द्रियद्वारा
अपने आपको भी जानते हैं । (मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाली विशुद्धि, अथवा विशुद्धिसे
उत्पन्न होनेवाले उपयोगात्मक ज्ञानको भावेन्द्रिय कहते हैं । लब्धि और उपयोग भावेन्द्रिय कही जाती हैं ।
स्पर्शन, रसना आदि पांच इन्द्रियोंके आवरणके क्षयोपशम होनेपर पदार्थोंके जाननेकी शक्तिविशेषको लब्धि,
तथा अपनी अपनी लब्धिके अनुसार आत्माके पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेको उपयोग कहते हैं ।) भावेन्द्रियां
स्वसंवेदन रूप होती हैं, अतएव इसमें कोई विरोध नहीं है । अतएव ज्ञान स्वप्रकाशक है, क्योंकि वह पदार्थों
को जानता है; जो स्वप्रकाशक नहीं होता, वह पदार्थोंको नहीं जानता, जैसे घट ।
१. प्रदीपस्याप्यपेक्षया प्रकाशकत्वं स्वापेक्षया च प्रकाश्यप्रकाशकत्वम् ।
२. जन्तोः श्रोत्रादिविषयस्तत्तदावरणस्य यः ।
स्यात् क्षयोपशमो लब्धिरूपं भावेन्द्रियं हि तत् ॥
स्वस्वलब्ध्यनुसारेण विषयेषु यः आत्मनः ।
व्यापार उपयोगाख्यं भवेद्भावेन्द्रियं च तत् ॥ लोकप्रकाशे ३ ॥

. अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०७
तदेवं सिद्धेऽपि प्रत्यक्षातुमानाभ्यां ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वे “सत्संप्रयोगे इन्द्रियबुद्धि-
जन्मलक्षणं ज्ञानं, ततोऽर्थप्राकट्यं, तस्मादर्थापत्तिः, तया प्रवर्त्तकज्ञानस्योपलम्भः'” इत्येवंरूपा
त्रिपुटीप्रत्यक्षकल्पना भट्टानां प्रयासफलैव ॥
यौगास्त्वाहुः । ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यम्, ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति प्रमेयत्वात्, घटवत्
समुत्पन्नं हि ज्ञानमेकात्मसमवेतमनन्तरोद्भूविष्णुमानसप्रत्यक्षेणैव लक्ष्यते, न पुनः स्वेन । न
चैवमनवस्था । अर्थावसायिज्ञानोत्पादमात्रेणैवार्थसिद्धौ प्रमातुः कृतार्थत्वात् । अर्थज्ञानजिज्ञा-
सायां तु तत्रापि ज्ञानमुत्पद्यत एवेति । तदयुक्तम् । पक्षस्य प्रत्यनुमानबाधितत्वेन हेतोः
कालात्ययापदिष्टत्वात् । तथाहि । विवादास्पदं ज्ञानं स्वसंविदितं, ज्ञानत्वात्, ईश्वरज्ञानवत् ।
न चायं वाद्यप्रतीतो दृष्टान्तः, पुरुषविशेषस्येश्वरतया जैनैरपि स्वीकृतत्वेन तज्ज्ञानस्य तेषां
प्रसिद्धेः ॥
व्यर्थविशेष्यश्चात्र तव हेतुः, समर्थविशेषणोपादानेनैव साध्यसिद्धेः । अग्निसिद्धौ
धूमवत्त्वे सति द्रव्यत्वादितिवद्, ईश्वरज्ञानान्यत्वादित्येतावत्तैव गतत्वात् । न हीश्वरज्ञाना-
दन्यत् स्वसंविदितमप्रमेयं वा ज्ञानमस्ति, यद्व्यवच्छेदार्थं प्रमेयत्वादिति क्रियेत । भवन्मते
तदन्यज्ञानस्य सर्वस्य प्रमेयत्वात् ॥
इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमानसे ज्ञानके स्वयं संवेदक सिद्ध हो जानेपर भाट्टोंकी त्रिपुटी प्रत्यक्षकी
कल्पना करना भी बिलकुल व्यर्थ है । भाट्टोंके अनुसार, ( १ ) विद्यमान पदार्थोंके साथ इन्द्रिय और बुद्धिका
संयोग होनेसे ज्ञान उत्पन्न होता है, ( २ ) इस ज्ञानसे अर्थप्राकट्य, अर्थात् पदार्थका ज्ञान होता है, ( ३ )
पदार्थके ज्ञानसे होनेवाली अर्थापत्तिसे प्रकाशक ज्ञानका संवेदन होता है। इसे भाट्ट मतमें त्रिपुटी प्रत्यक्ष कहा है ।
न्यायवैशेषिक—घटसे भिन्न ज्ञानके द्वारा जिस प्रकार घट प्रकाशित किया जाता है, उसी प्रकार
ईश्वरज्ञानसे भिन्नता होने पर प्रमेय रूप होनेसे ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके द्वारा प्रकाश्य है । अपनी उत्पत्ति
होनेके बाद जिसका एक आत्माके साथ समवाय संबंध होता है, ऐसे पदार्थका ज्ञान अपनी उत्पत्तिके बाद
उत्पन्न होने वाले मानस प्रत्यक्षके द्वारा जाना जाता है, स्वयं अपने द्वारा नहीं जाना जाता । इस प्रकार
ज्ञानको अन्य ज्ञान द्वारा प्रकाश्य मानने पर अनवस्था दोष नहीं आता । क्योंकि अर्थको जाननेवाले ज्ञानकी
उत्पत्ति मात्रसे ज्ञातृज्ञानके प्रयोजनकी सिद्धि हो जाने पर ज्ञातृज्ञान कृतार्थ हो जाता है । जब प्रमाताको
पदार्थोंको जानने की इच्छा होती है उस समय भी ज्ञानकी उत्पत्ति होती है । जैन—यह कथन ठीक
नहीं है । क्योंकि 'ज्ञान अपने से भिन्न ज्ञानके द्वारा जाना जाता है'—इस अनुमानका पक्ष 'विवादास्पद ज्ञान
स्वसंविदित है, ज्ञान होनेसे, ईश्वरज्ञानकी भाँति'—इस प्रति अनुमानसे बाधित होनेके कारण हेतु काला-
त्ययापदिष्ट ( हेत्वाभास ) हो गया है ( जो हेतु पक्षके प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि प्रमाणोंके द्वारा बाधित
किये जाने पर उपस्थित किया जाता है, उसे कालात्ययापदिष्ट कहते हैं ) । यहाँ ईश्वरज्ञानका दृष्टान्त अप्रतीत
नहीं क्योंकि पुरुष विशेषको जैनोंने भी ईश्वररूपसे स्वीकार किया है ।
इसके अतिरिक्त, उक्त हेतु व्यर्थविशेष्यसे दूषित है, क्योंकि यहाँ समर्थ विशेषणसे ही साध्यकी सिद्धि
हो जाती है । 'ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यम् ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति प्रमेयत्वात् घटवत्' ( ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके
द्वारा प्रकाश्य है, ईश्वरज्ञानसे भिन्न होने पर, घटकी भाँति )—यहाँ 'ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति' विशेषणको
ग्रहण करनेसे ही 'ज्ञानं स्वान्यप्रकाश्यं'—साध्यकी सिद्धि हो जाती है, अतएव 'प्रमेयत्वात्' विशेष्य व्यर्थ है ।
१. जैमिनिसूत्रे १-१-४५ सूत्रार्थानुगुणमेतत् । घटादिविषये ज्ञाने जाते 'मया ज्ञातोऽयं घटः' इति
घटस्य ज्ञातत्वं प्रतिसंधीयते । तेन, ज्ञाने जाते सति 'ज्ञातता नाम कश्चिद्धर्मो जातः' इत्यनुमीयते । सा च
( ज्ञातता ) ज्ञानात्पूर्वमजातत्वात्, ज्ञाने जाते च जातत्वाच्च, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां 'ज्ञानेन जन्यते' इत्यवधार्यते
( तर्कभाषा पृ. २२ ) । ज्ञानस्य मितिः माता मेयम् तद्विषयकत्वात् त्रिपुटी तत्प्रत्यक्षता ।

१०८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १२
अप्रयोजकञ्चायं हेतुः । सोपाधित्वात् । साधनाव्यापकः साध्येन समव्याप्तिश्च खलु
उपाधिरभिधीयते । तत्पुत्रत्वादौना श्यामत्वे साध्ये शाकाद्याहारपरिणामवत् । उपाधिश्चात्र
जडत्वम् । तथाहि ईश्वरज्ञानान्यत्वे प्रमेयत्वे च सत्यपि यदेव जडं स्तम्भादि तदेव स्वस्मादन्येन
प्रकाश्यते । स्वप्रकाशे परमुखप्रेक्षित्वं हि जडस्य लक्षणं । न च ज्ञानं जडस्वरूपम् । अतः
साधनाव्यापकत्वं जडत्वस्य । साध्येन समव्याप्तिकत्वं चास्य स्पष्टमेव । जाड्यं विहाय
स्वप्रकाशाभावस्य तं च त्यक्त्वा जाड्यस्य क्वचिदप्यदर्शनात् इति ॥
यच्चोक्तं समुत्पन्नं हि ज्ञानमेकात्मसमवेतम् इत्यादि । तदप्यसत्यम् । इत्थमर्थज्ञानतज्ज्ञा-
नयोरुत्पद्यमानयोः क्रमानुपलक्ष्णत्वात् । आशूत्पादात्क्रमानुपलक्षणमुत्पल

अन्य. यो. व्य. श्लोक १२ ] स्याद्वादमञ्जरी १०९
मुत्पाद्यत्वं घटते अजिज्ञासितेष्वपि योग्यदेशेषु विषयेषु तदुत्पादप्रतीतेः। न चार्थज्ञानमयोग्य-
देशम्। आत्मसमवेतस्यास्य समुत्पादात्। इति जिज्ञासा मन्तरेणैवार्थज्ञाने ज्ञानोत्पादप्रसङ्गः।
अथोत्पद्यतां नामेदं को दोषः इति चेत्, नन्वेवमेव तज्ज्ञानज्ञानेऽप्यपरज्ञानोत्पादप्रसङ्गः। तत्रापि
चैवमयम्। इत्यपरापरज्ञानोत्पादपरम्परायामेवात्मनो व्यापारात् न विषयान्तरसंचारः
स्यादिति। तस्माद्यज्ज्ञानं तदात्मबोधं प्रत्यनपेक्षितज्ञानान्तरव्यापारम्, यथा गोचरान्तरग्राहि-
ज्ञानात् प्राग्भावि गोचरान्तरग्राहिधारावाहिज्ञान१प्रबन्धस्यान्त्यज्ञानम्। ज्ञानं च विवादाध्या-
सितं रूपादिज्ञानम्, इति न ज्ञानस्य ज्ञानान्तरज्ञेयता युक्तिं सहते ॥ इति काव्यार्थः ॥ १२ ॥
पत्तोंके ढेरको सूईंसे बींधते समय हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हमने सभी पत्तोंका एक ही साथ वेधन किया है,
परन्तु वास्तवमें इनके बींधनेमें सूक्ष्म क्रम रहता है, उसी तरह पदार्थके ज्ञान और ज्ञानके ज्ञानमें भी सूक्ष्म
क्रम रहता है। यह ठीक नहीं। क्योंकि पदार्थज्ञानके ज्ञानकी उत्पत्ति, पदार्थज्ञानकी उत्पत्तिके बाद उत्पन्न
[L12

इस प्रत्यनुमानसे बाधित है । इसलिये ज्ञानको स्वसंवेदक ही मानना चाहिये ।`

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(२) यह अनुमान व्यर्थविशेष्य भी है, क्योंकि यहां 'ईश्वरज्ञानान्यत्व' हेतुके विशेष्य 'प्रमेयत्व' हेतुके कहनेसे

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कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । (३) उक्त हेतु अप्रयोजक होनेसे सोपाधिक भी है । क्योंकि 'स्वान्य-

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प्रकाश्यं ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति, प्रमेयत्वात्' यह तर्क ज्ञानके साथ व्याप्त न हो कर जड़ पदार्थोंके साथ व्याप्त

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है, क्योंकि ईश्वरज्ञानसे भिन्न हो कर प्रमेय होनेपर भी स्तंभ वगैरह जड़ पदार्थ ही अपनेको छोड़ कर

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दूसरेसे प्रकाशित होते हैं ।

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अब अविद्या अथवा मायाके कारण तीनों लोकोंके वस्तु-प्रपंचको अपारमार्थिक स्वीकार करनेवाले

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ब्रह्माद्वैतवादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—

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श्लोकार्थ—यदि माया सत् रूप है, तो ब्रह्म और माया दो पदार्थोंका सद्भाव होनेसे अद्वैतकी सिद्धि

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अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी १११
तैर्वादिभिस्तात्त्विकात्मब्रह्मव्यतिरिक्ता या माया-अविद्या प्रपञ्चहेतुः परिकल्पिता, सा
सद्रूपा असद्रूपा वा द्वयी गतिः। सती-सद्रूपा चेत् तदा द्वयतत्त्वसिद्धिः—द्वाववयवौ यस्य तद्
द्वयं, तथाविधं यत् तत्त्वं परमार्थः, तस्य सिद्धिः। अयमर्थः। एकं तावत् त्वदभिमतं तात्त्वि-
कमात्मब्रह्म, द्वितीया च माया तत्त्वरूपा सद्रूपतयाऽङ्गीक्रियमाणत्वात्। तथा चाद्वैतवादस्य
मूले निहितः कुठारः। अथेति पक्षान्तरद्योतने। यदि असती-गगनाम्भोजवद्वस्तुरूपा सा
माया, ततः हन्त इत्युपदर्शने आश्चर्यं वा। कुतः प्रपञ्चः। अयं त्रिभुवनोदरविवरवर्तिपदार्थ-
सार्थरूपः प्रपञ्चः कुतः ? न कुतोऽपि संभवतीत्यर्थः। मायाया अवस्तुत्वेनाभ्युपगमात् अवस्तु-
नश्च तुरङ्गशृङ्गस्येव सर्वोपाख्याविरहितस्य साक्षात्क्रियमाणेद्दशविवर्तजननेऽसमर्थत्वात्।
किलेन्द्रजालादौ मृगतृष्णादौ वा मायोपदर्शितानामर्थक्रियायामसामर्थ्यं दृष्टम् अत्र तु तदु-
पलम्भात् कथं मायाव्यपदेशः श्रद्धीयताम्। अथ मायापि भविष्यति, अर्थक्रियासमर्थपदार्थो-
पदर्शनक्षमा च भविष्यति इति चेत्, तर्हि स्ववचनविरोधः। न हि भवति माता च वन्ध्या
चेति। एनमेवार्थं हृदि निधायोत्तरार्धमाह। मायैव चेदित्यादि। अत्रैवकारोऽप्यर्थः। अपि च
समुच्चयार्थः। अग्रेतनचकारश्च तथा। उभयोश्च समुच्चयार्थयोर्योगपद्यद्योतकत्वं प्रतीतमेव।
यथा रघुवंशे “ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः”१। इति तदयं वाक्यार्थः माया च भवि-
ष्यति अर्थसहा च भविष्यति। अर्थसहा-अर्थक्रियासमर्थपदार्थोपदर्शनक्षमा। चेच्छब्दोऽत्र
योज्यते, इति चेत्, एवं परमाशङ्क्य तस्य स्ववचनविरोधमुद्भावयति। तत् किं भवत्परेषां
माता च वन्ध्या च। किमिति-संभावने। संभाव्यत एतत्-भवतो ये परे-प्रतिपक्षाः,
तेषां भवत्परेषां भवद्व्यतिरिक्तानां, भवदाज्ञापृष्ठग्भूतत्वेन तेषां वादिनां, यन्माता च
भविष्यति, वन्ध्या च भविष्यतीत्युपहासः। माता हि प्रसवधर्मिणी वनितोच्यते। वन्ध्या च
तद्विपरीता। ततश्च माता चेत्कथं वन्ध्या, वन्ध्या चेत्कथं माता तदेवं। मायाया अवास्तव्या
अप्यर्थसहत्वेऽङ्गीक्रियमाणे, प्रस्तुतवाक्यवत् स्पष्ट एव स्ववचनविरोधः। इति समासार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। ते वादिन इदं प्रणिगदन्ति। तात्त्विकमात्मब्रह्मैवास्ति—
नहीं हो सकती। यदि माया असत् है, तो तीनों लोकोंके पदार्थोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदि कहो कि
माया माया भी होकर अर्थक्रिया करती है, तो जैसे एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती,
वैसे ही मायामें भी एक साथ दो विरोधी गुण नहीं रह सकते।
व्याख्यार्थ—ब्रह्माद्वैतवादियोंने जो तत्त्वरूप ब्रह्मात्मसे भिन्न माया (अविद्या) को प्रपंचका
कारण स्वीकार किया है, वह माया सत् रूप है, या असत् रूप ? यदि माया सत् है, तो ब्रह्म और माया दो
पदार्थोंके अस्तित्व होनेसे अद्वैतकी सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि अद्वैतवादियोंने एक आत्मा (ब्रह्म) को
ही सत् पदार्थ स्वीकार किया है, इसलिये यदि माया भी सत् हो, तो अद्वैतके मूलमें ही कुठाराघात होता है।
यदि मायाको आकाशके पुष्प की तरह अवस्तु स्वीकार करो, तो संसारके किसी भी पदार्थकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती। क्योंकि मायाके अवस्तु होनेसे घोड़ेके सींगकी तरह वह प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर होनेवाले प्रपंचको
उत्पन्न नहीं कर सकती। इन्द्रजाल तथा मृगतृष्णा आदिमें मायाद्वारा दिखाये जानेवाले पदार्थ अर्थक्रिया नहीं
करते। परन्तु समस्त पदार्थोंमें अर्थक्रिया देखनेमें आती है, अतएव इन पदार्थोंमें मायाका व्यवहार नहीं हो
सकता। यदि आप कहें कि माया माया भी है, और वह अर्थक्रिया भी करती है, यह ठीक नहीं। क्योंकि
इसमें स्ववचन विरोध आता है। जिस प्रकार एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती, वैसे ही
माया भी माया (अवस्तु) होकर अर्थक्रिया (वस्तु) नहीं कर सकती। यह संक्षिप्त अर्थ है।
यहाँ विस्तृत अर्थ दिया जाता है।
वेदान्ती—हमारे मतसे तत्त्व रूप एक ब्रह्म ही सत् है। शास्त्रोंमें कहा भी है—
१ अव्याक्षेपो भविष्यन्त्याः कार्यसिद्धेर्हि लक्षणम्। इत्युत्तरार्धम्। रघुवंशे १०-६।

११२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
“सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तत्पश्यति कश्चन” ॥
इति समयात् । अयं तु प्रपञ्चो मिथ्यारूपः, प्रतीयमानत्वात् । यदेवं तदेवम् । यथा शुक्तिकशकले
कलधौतम् । तथा चायं, तस्मात् तथा ॥
तदेतद्वार्तम् । तथाहि । मिथ्यारूपत्वं तैः कीदृग् विवक्षितम् । किमत्यन्तासत्त्वम्,
उतान्यस्यान्याकारतया प्रतीतत्वम्, आहोस्विदनिर्वाच्यत्वम् ? प्रथमपक्षे ऽसत्ख्यातिप्रसङ्गः ।
द्वितीये विपरीतख्यातिस्वीकृतिः । तृतीये तु किमिद‌मनिर्वाच्यत्वम् ? निःस्वभावत्वं चेत्, निसः
प्रतिषेधार्थत्वे, स्वभावशब्दस्यापि भावाभावयोरन्यतरार्थत्वे, असत्ख्यातिसत्ख्यात्यभ्युपगम-
प्रसङ्गः । भावप्रतिषेधे असत्ख्यातिः, अभावप्रतिषेधे सत्ख्यातिरिति । प्रतीत्यगोचरत्वं निःस्व-
भावत्वमिति चेत् । अत्र विरोधः । स प्रपञ्चो हि न प्रतीयते चेत् कथं धर्मितयोपात्तः । कथं च
प्रतीयमानत्वं हेतुतयोपात्तम् । तथोपादाने वा कथं न प्रतीयते । यथा प्रतीयते न तथेति चेत्,
तर्हि विपरीतख्यातिरिय‌मभ्युपगता स्यात् ॥
“यह सब ब्रह्मका ही स्वरूप है, इसमें नाना रूप नहीं हैं । ब्रह्मके प्रपंचको सब लोग देखते है, परन्तु
ब्रह्मको कोई नहीं देखता ।”
तथा, ‘यह प्रपंच मिथ्या है, क्योंकि यह प्रतीतिका विषय है । जो प्रतीतिका विषय होता है, वह
मिथ्या रूप होता है । जैसे सीपके टुकड़ेमें प्रतीत होनेवाला चाँदी मिथ्या रूप होती है । उसी तरह यह प्रपंच
प्रतीत होता है, इसलिये यह मिथ्या रूप है ।’
जैन—यह ठीक नहीं है । आप लोगोंने जो दृश्यमान प्रपंचको मिथ्या कहा है, सो आपका मिथ्यात्वसे
क्या अभिप्राय है ? (१) यदि वंध्या के पुत्रकी तरह अत्यंत असत्त्वको मिथ्यात्व कहते हो तो असत्ख्याति दोष
आता है । ( शून्यवादी बौद्धोंके अनुसार समस्त पदार्थोंका ज्ञान मिथ्या है, क्योंकि समस्त पदार्थ असत्
हैं । अतएव जब हमें सीपमें चांदीका ज्ञान होता है, उस समय असत् रूप चांदी सत् रूपमें प्रतिभासित
होती है । अतएव विपरीत ज्ञानका विषय सर्वथा असत् है । क्योंकि असत् पदार्थोंको सत् रूप
देखना ही विपरीत ज्ञान है । असत्ख्याति-वादियोंके मतमें पदार्थ और पदार्थका ज्ञान दोनों ही असत्
हैं । परन्तु वेदान्तो शून्यवादियोंकी असत्ख्यातिको स्वीकार नहीं करते । ) (२) यदि एक पदार्थके
दूसरे रूपमें प्रतिभासित होनेको मिथ्या कहो तो विपरीतख्याति दोष आता है । ( नैयायिक आदि मतके
अनुसार जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय सीप चाँदीके रूपमें प्रतिभासित होती है,
इसलिये एक पदार्थको दूसरे पदार्थके रूपमें जानना ही मिथ्या है, वास्तवमें सीप अथवा चाँदीमें कोई मिथ्यापन
नहीं । इस विपरीत अथवा अन्यथाख्यातिमें दो पदार्थोंके सद्भाव ( द्वैत ) होनेके कारण वेदान्ती इसे भी
स्वीकार नहीं करते ) । (३) यदि अनिर्वचनीयत्व अर्थात् निस्स्वभावत्वको मिथ्यात्व कहो तो ‘निस्स्वभावत्व’
में स्वभाव शब्दका अर्थ क) ‘भाव’ लिया जाय तो असत्ख्याति दोष आता है ( परन्तु यह असत्ख्याति
वेदान्तियों को मान्य नहीं है ) । (ख) यदि स्वभावका अर्थ ‘अभाव’ किया जाय, तो सत्ख्याति दोष आता
है । ( रामानुजका सिद्धांत है कि जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय इस मिथ्या ज्ञानका
विषय मिथ्या नहीं होता, क्योंकि सीपमें चाँदीके परमाणु मिले रहते हैं, इसीलिये सीपमें चाँदीका ज्ञान होता
है । परन्तु यह सत्ख्याति भी वेदान्तियोंको मान्य नहीं है ) । (ग) यदि दृश्यमान प्रपंचके ज्ञानके विषय न
होनेको निस्स्वभाव कहो तो ‘अर्थप्रपंचः मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्’ इस अनुमानमें जब प्रपंच प्रतीत ही नहीं
होता तो ‘प्रपंच’ को पक्ष नहीं बना सकते । तथा प्रपंचके ज्ञानका विषय न होनेसे ‘प्रतीयमानत्व’ हेतु भी
१. छांदोग्य उ. ३–१४ ।
२. आत्मख्यातिर‌सत्ख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनख्यातिरित्युक्तख्यातिपञ्चकम् ॥ षड्विधाः ख्यातिरित्त्यन्ये मन्यन्ते ।