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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 458 में से

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पृष्ठ 146

९४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
न च वेद‌निवेदिता हिंसा न कुत्सिता । सम्यग्दर्शनज्ञानसम्पन्नैरर्चिर्मार्गप्रपन्नैर्वेदान्त-
वादिभिश्च गर्हितत्वात् । तथा च तत्त्वदर्शिनः पठन्ति-
“देवोपहारव्याजेन यज्ञव्याजेन येऽथवा ।
घ्नन्ति जन्तून् गतघृणा घोरां ते यान्ति दुर्गतिम्” ॥
वेदान्तिका अप्याहुः-
“अन्धे तमसि मज्जामः पशुभिर्ये यजामहे ।
हिंसा नाम भवेद्धर्मो न भूतो न भविष्यति” ॥
तथा “अग्निर्मामेतस्माद्धिंसाकृतादेनसो मुञ्चतु” छान्दसत्वाद् मोचयतु इत्यर्थः । इति ।
व्यासेनाप्युक्तम्—
“ज्ञानपालिपरिक्षिप्ते ब्रह्मचर्यदयाम्भसि ।
स्नात्वाऽतिविमले तीर्थे पापपङ्कापहारिणि ॥ १ ॥
ध्यानाग्नौ जीवकुण्डस्थे दममारुतदीपिते ।
असत्कर्मसमिच्छस्त्रैरग्निहोत्रं कुरुत्तमम् ॥ २ ॥
कषायपशुभिर्दुष्टैर्धर्मकामार्थनाशकैः ।
शममन्त्रहुतैर्यज्ञं विधेहि विहितं बुधैः ॥३॥
प्राणिघातात् तु यो धर्ममीहते मूढमानसः ।
स वाञ्छति सुधावृष्टिं कृष्णाहिमुखकोटरात् ॥४॥
भेद बताये गये हैं—देखिये, गोम्मटसार जीवकाण्ड, २२४-२२५ ) । आरोग्य आदिकी प्रार्थना करनेसे हमारा
अभिप्राय केवल चतुर्गति रूप संसारके भाव-रोगोंको दूर करनेका है; वही उत्तम फल है। इस भाव-आरोग्यकी
प्रार्थनासे परिणामोंकी विशुद्धि होती है, अतएव विवेकीजन उसका अनादर नहीं कर सकते। ऐसी बात नहीं
कि उससे उत्पन्न परिणामोंकी विशुद्धिसे उसका फल प्राप्त न हो। सभी वादी लोग भावोंकी शुद्धिसे
ही मोक्ष फलकी प्राप्ति मानते हैं।
तथा, ऐसी बात नहीं है कि वेदोक्त हिंसा निंदनीय नहीं। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे सम्पन्न ज्ञान-
मार्गके अनुयायी वेदान्तियोंने भी हिंसाकी निंदा की है। तत्त्वदर्शी लोगोंने कहा है—
“जो निर्दय पुरुष देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये अथवा यज्ञके बहाने पशुओंका वध करते हैं, वे
लोग दुर्गतिमें पड़ते हैं।”
वेदान्तियोंने भी कहा है—
“यदि हम पशुओंसे यज्ञ करें तो घोर अंधकारमें पड़ें। अतएव हिंसा न कभी धर्म हुआ, न है,
और न होगा।”
तथा—“अग्नि-देवता इस हिंसाजन्य पापसे मुझे मुक्त करो।” वैदिक प्रयोग होनेसे 'मुक्त करो'
यह अर्थ किया गया है।
व्यासने कहा है—
“ज्ञानरूपी दीवारसे परिवेष्टित ब्रह्मचर्य और दयारूपी-जलसे पूर्ण, पापरूपी-कीचड़को नष्ट करनेवाले,
अत्यन्त निर्मल तीर्थमें स्नान करके ॥१॥
जीवरूपी-कुण्डमें दमरूपी-पवनसे उद्दीपित ध्यानरूपी-अग्निमें अशुभ कर्मरूपी काष्ठकी आहुति देकर
उत्तम अग्निहोत्र यज्ञ करो ॥२॥
धर्म, काम और अर्थको नष्ट करनेवाले, दुष्ट, कषायरूपी-पशुओंका शम-मंत्रोंसे यज्ञ करो, ऐसा पण्डितों
ने कहा है ॥३॥
जो मूढ़ पुरुष प्राणियोंका वध करके धर्मकी कामना करते हैं, वे काले सर्पकी खोहसे अमृतकी वर्षा
चाहते हैं ॥४॥”