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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 458 में से

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पृष्ठ 152

१०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ११
इति परमाशङ्क्य स्तुतिकार आह। नोत्सृष्टमित्यादि। अन्यार्थमिति मध्यवर्ति पदं
डमरुकमणिन्यायेनो¹भयत्रापि सम्बन्धनीयम् । अन्यार्थमुत्सृष्टम्--अन्यस्मै कार्याय प्रयुक्तम्--
उत्सर्गवाक्यम्, अन्यार्थप्रयुक्तेन वाक्येन नापोद्यते-नापवादगोचरीक्रियते । यमेवार्थमाश्रित्य
शास्त्रेऽुत्सर्गः प्रवर्तते, तमेवार्थमाश्रित्यापवादोऽपि प्रवर्तते तयोर्निम्नोन्नतादिव्यवहारवत्
परस्परसापेक्षत्वेनैकार्थसाधनविषयत्वात्। यथा जैनानां संयमपरिपालनार्थं नवकोटिविशुद्धा-
हारग्रहणमुत्सर्गः। तथाविधद्रव्यक्षेत्रकालभावापत्सु च निपतितस्य गत्यन्तराभावे पंचकादिय-
तनया अनेषणीयादिग्रहणमपवादः। सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव। न च मरणैकशरणस्य
गत्यन्तराभावोऽसिद्ध इति वाच्यम्।
"सव्वत्थ संजमं संजमाओ अप्पाणमेव रक्खिज्जा।
मुच्चइ अइवायाओ पुणो विसोही न याऽविरई" ²॥
इत्यागमात् ॥
तथा आयुर्वेदेऽपि यमेवैकं रोगमधिकृत्य कस्याञ्चिदवस्थायां किञ्चिद्द्रव्यमपथ्यं, तदेवा-
वस्थान्तरे तत्रैव रोगे पथ्यम्-
"उत्पद्यते हि ऽसावस्था देशकालामयान् प्रति ।
यस्यामकार्यं कार्यं स्यात् कर्म कार्यं तु वर्जयेत् ॥"


समाधान-इस प्रकार अन्य वादियोंकी शंका उपस्थित कर स्तुतिकारने 'नोत्सृष्टमित्यादि' कहा है ।
'अन्यार्थम्' इस मध्यवर्ती पदको डमरुकमणि न्यायसे दोनों वाक्योंके साथ जोड़ना चाहिये । किसी एक कार्यके
लिये प्रयुक्त किया गया उत्सर्ग वाक्य उससे भिन्न कार्यके लिये प्रयुक्त किये गये वाक्यके द्वारा अपवादका
विषय नहीं बनाया जा सकता । जिस कार्यके लिये शास्त्रोंमें उत्सर्ग ( वाक्य ) प्रवृत्त होता है, उसी कार्यके
लिये अपवाद ( वाक्य ) भी प्रवृत्त होता है । क्योंकि अच्छे और बुरे आदि व्यवहारके समान परस्पर सापेक्ष
रूपसे एक ही अर्थकी सिद्धि करना उनका विषय है । जिस प्रकार जैन मुनियोंके मन-वचन-काय और कृत-कारित-
अनुमोदन रूप नव कोटिसे विशुद्ध आहारग्रहण रूप उत्सर्ग संयमकी रक्षाके लिये होता है, उसी प्रकार द्रव्य
क्षेत्र, काल और भाव-जन्य आपदाओंसे ग्रस्त मुनिके यदि उसे अन्य कोई उपाय सूझ न पड़े, तो वह पंच
कोटिसे विशुद्ध अभक्ष्य, उद्दिष्ट आदि आहारका ग्रहण कर सकता है, जो अपवाद है । वह भी केवल संयमकी
रक्षाके लिये ही है । क्योंकि मरणासन्न मुनिके अपवाद मार्गका अवलम्बन करनेके सिवाय और कोई मार्ग नहीं
है । यदि कहो, कि मरणासन्न मुनिके भी अन्य उपायका अभाव असिद्ध है तो यह ठीक नहीं है क्योंकि-
"मुनिको सर्वत्र संयमकी रक्षा करना चाहिए । संयमकी अपेक्षा अपनी ही रक्षा करनी चाहिए । इस
तरह मुनि संयमभ्रष्टतासे मुक्त हो जाता है । वह फिरसे विशुद्ध हो सकता है, और वह अविरतिका भागी
नहीं होता ।"
ऐसा आगमका वचन है ।
आयुर्वेदमें भी जो वस्तु रोगकी एक अवस्थामें अपथ्य है, वही दूसरी अवस्थामें पथ्य कही गयी है ।
कहा भी है-
"देश और कालसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें न करने योग्य कार्योंको करना पड़ता है, और करने योग्य
कार्योंको छोड़ना पड़ता है।"


१. डमरुमध्ये प्रतिबद्धो मणिरेक एव सन् डमरुविचाले तदुभयाङ्गसंबद्धो भवति तद्वदेकमेवान्यार्थमिति
पदमुभयत्र संबध्यते । अयमेव न्यायो देहलीदीपन्याय इत्यप्यभिधीयते ।
२. छाया-सर्वत्र संयमं संयमादात्मानमेव रक्षेत् । मुच्यतेऽतिपातात्पुनर्विशुद्धिर्न चाविरतिः ॥
निशीथचूर्णीपीठिकायां ४५१ इत्यस्य चूर्णी ।