स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
६६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
परपर्याययोरुच्छेदोऽस्त्येव । तदभावे मोक्षस्यैवायोगात् । संस्कारश्च मतिज्ञानविशेष एव ।
तस्य च मोहक्षयानन्तरं क्षीणत्वादभाव इति । तदेवं न संविदानन्दमयी च मुक्तिरिति युक्ति-
रिक्तेयमुक्तिः । इति काव्यार्थः ॥ ८ ॥
होता है। यद्यपि द्रव्य आदि छहों पदार्थोंमें 'अस्तित्व' रहता है, तथापि वह सामान्य आदि तीनमें अनुवृत्ति-
प्रत्यय (सामान्यज्ञान) का कारण नहीं है, और द्रव्यादि तीन पदार्थोंमें है, इसलिये द्रव्यादि तीन पदार्थोंमें
ही सत्ता रहती है। यदि सामान्य, विशेष और समवायमें सत्तासम्बन्ध स्वीकार किया जाय, तो क्रमसे
अनवस्था, रूपहानि और असम्बन्ध दोष आते हैं, अतएव सत्ताको सामान्य आदि तीन में स्वीकार न करके
द्रव्य, गुण और कर्ममें ही स्वीकार करना चाहिये ।
ख—सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न है (सत्ता द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं) । (अ) सत्ता द्रव्यसे
भिन्न है। जो द्रव्योंसे उत्पन्न न हुआ हो, अथवा द्रव्योंका उत्पादक न हो (अद्रव्यत्व), तथा जो अनेक द्रव्योंसे
उत्पन्न हुआ हो, अथवा अनेक द्रव्यों का उत्पादक हो (अनेकद्रव्यत्व), उसे द्रव्य कहते हैं। सत्तामें द्रव्यका
उक्त लक्षण घटित नहीं होता। सत्ता द्रव्यत्वकी तरह प्रत्येक द्रव्यमें रहती है, इसलिये सत्ता द्रव्य नहीं है।
(ब) सत्ता गुणसे भी भिन्न है। क्योंकि सत्ता गुणत्वकी तरह गुणोंमें रहती है। तथा गुण गुणोंमें नहीं रहते
(निर्गुणत्वाद् गुणानाम्) । (स) सत्ता कर्मसे भी भिन्न है, क्योंकि वह कर्मत्वकी तरह कर्ममें रहती है।
तथा कर्म कर्ममें नहीं रहते ।
'सत्ता' (सामान्य) पर सामान्य और अपर सामान्यके भेदसे दो प्रकारकी है। 'पदार्थत्व'
(द्रव्य, गुण आदि छह पदार्थोंमें रहनेवाले) को पर सामान्य अथवा महासामान्य कहते हैं। द्रव्यत्व,
गुणत्व आदि अपर सामान्य है। द्रव्यत्व आदिकी अपेक्षासे पृथिवीत्व आदि, और पृथिवीत्व आदिकी अपेक्षासे
घटत्व आदि अपर सामान्य कहे जाते हैं। अपर सामान्य एक पदार्थको जानते समय उस पदार्थकी दूसरे
पदार्थसे व्यावृत्ति करता है, इसलिये इसे सामान्य-विशेष भी कहते हैं। सत्ता अथवा सामान्यकी तरह 'विशेष'
भी भिन्न पदार्थ हैं । 'विशेष' सजातीय और विजातीय पदार्थोंसे अत्यन्त व्यावृत्ति कराते हैं, अतएव 'विशेष'
विशेष रूप ही हैं, सामान्य-विशेष रूप ये नहीं हो सकते। आधार और आधेय पदार्थोंमें इहप्रत्ययका कारण
'समवाय' भी भिन्न पदार्थ है। 'इन तंतुओंमें पट है' यह इहप्रत्यय हेतु तंतु और पटमें समवाय संबन्ध
स्थापित करता है।
जैन—(१) क—सत्ता (अस्तित्व—वस्तुका स्वरूप) को सम्पूर्ण छहों पदार्थोंमें स्वीकार करके
भी वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें ही 'अस्तित्व' (सत्ता) स्वीकार करते हैं, यह युक्तियुक्त नहीं है।
तथा द्रव्य, गुण, कर्मकी तरह 'सामान्यप्रत्यय' (सत्ता) सामान्य, विशेष और समवायमें भी होता है,
फिर कुछ पदार्थोंमें सामान्य (सत्ता) स्वीकार करना, और कुछमें नहीं, यह न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता ।
तथा सामान्य, विशेष और समवायमें सत्ता माननेसे अनवस्था, रूपहानि, और असंबन्ध नामक दोष आते
हैं, यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि सामान्यकी तरह द्रव्य, गुण, कर्ममें सत्ता स्वीकार करनेसे भी अनवस्था दोष
नहीं बच सकता । तथा विशेषमें सत्ता स्वीकार करनेपर उल्टी विशेषकी ही सिद्धि होती है, क्योंकि कहीं
भी सामान्य रहित विशेषकी उपलब्धि नहीं होती। इसी प्रकार समवायमें भी सत्ता (स्वरूपसत्ता)
माननी ही होगी।
ख—यदि सत्ताको द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न माना जाय, तो द्रव्यादिको असत् मानना होगा।
इसलिये सत्ता द्रव्य आदिसे भिन्न नहीं हो सकती ।
वैशेषिक—(२)—ज्ञान आत्मासे भिन्न है, अर्थात् ज्ञान समवाय संबन्धसे आत्माके साथ रहता
है। आत्मा स्वयं जड़ है। जिस समय हम किसी पदार्थका ज्ञान करते हैं, उस समय पहले पदार्थ और
इन्द्रियका संयोग होता है, बादमें इन्द्रिय मनसे, और मन आत्मासे संबद्ध होता है। यदि आत्मा और ज्ञान
अन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ६७
अथ ते वादिनः कायप्रमाणत्वमात्मनः स्वयं संवेद्यमानमपलप्य, तादृशकुशास्त्रशस्त्र-
संपर्कविनष्टदृष्टयस्तस्य विभुत्वं मन्यन्ते । अतस्त्रोपालम्भमाह—
यत्रैव यो दृष्टगुणः स तत्र कुम्भादिवद् निष्प्रतिपन्नमेतत् ।
तथापि देहाद् बहिरात्मतत्त्वमतत्त्ववादोपहताः पठन्ति ॥ ९ ॥
यत्रव—देशे, यः पदार्थः, दृष्टगुणो, दृष्टाः—प्रत्यक्षादिप्रमाणतोऽनुभूताः, गुणा धर्मा
यस्य स तथा; स पदार्थः, तत्रैव—विवक्षितदेश एव । उपपद्यते इति क्रियाध्याहारो गम्यः ।
पूर्वस्यैवकारस्यावधारणार्थस्यात्राप्यभिसम्बन्धात् तत्रैव नान्यत्रेत्यन्ययोगव्यवच्छेदः ।
अमुमेवार्थं दृष्टान्तेन द्रढयति । कुम्भादिवदिति—घटादिवत् । यथा कुम्भादेर्यत्रैव देशे रूपादयो
गुणा उपलभ्यन्ते, तत्रैव तस्यास्तित्वं प्रतीयते नान्यत्र । एवमात्मनोऽपि गुणाश्चैतन्यादयो
देह एव दृश्यन्ते न बहिः, तस्मात् तत्प्रमाण एवायमिति । यद्यपि पुष्पादीनामवस्थानदेशादन्य-
त्रापि गन्धादिगुण उपलभ्यते, तथापि तेन न व्यभिचारः । तदाश्रया हि गन्धादिपुद्गलाः
तेषां च वैस्रसिक्या प्रायोगिक्या वा गत्या गतिमत्त्वेन तदुपलम्भकघ्राणादिदेशं यावदा-
एक हों, तो दुःख, जन्म आदि नाश होनेपर जिस समय मुक्तावस्थामें बुद्धि, सुख आदिका नाश हो जाता है,
उस समय आत्माका भी नाश हो जाना चाहिये ।
जैन—( २ ) यदि आत्मा और ज्ञानको सर्वथा भिन्न माना जाय, तो हमें अपने ही ज्ञानसे अपनी
ही आत्माका भी ज्ञान न हो सकेगा । तथा वैशेषिकोंके मतमें आत्मा व्यापक है, इसलिये एक आत्मामें ज्ञान
होनेसे सब आत्माओंको पदार्थोंका ज्ञान होना चाहिये । तथा आत्मा और ज्ञानका समवाय संबन्ध भी नहीं
बन सकता । आत्मा और ज्ञानमें कर्त्ता और करण संबन्ध मानकर भी दोनोंको भिन्न मानना युक्त नहीं है ।
क्योंकि करण हमेशा कर्तासे भिन्न नहीं होता । जैसे 'सर्प अपनेको अपने आपसे वेष्टित करता हैं'—यहाँ
कर्त्ता और करण भिन्न नहीं हैं, इसी तरह आत्मा और ज्ञान अलग-अलग नहीं हो सकते । तथा, चैतन्यको
वैशेषिकोंने भी आत्माका स्वरूप माना है; इसलिये जैसे वृक्षका स्वरूप वृक्षसे भिन्न नहीं हो सकता, वैसे ही
चैतन्य आत्मासे भिन्न नहीं हो सकता । तथा, ज्ञान और आत्माको भिन्न माननेपर 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसा ज्ञान
नहीं हो सकेगा । अतएव आत्मा और ज्ञान भिन्न नहीं हैं ।
वैशेषिक—( ३ ) मोक्ष ज्ञान और आनन्द रूप नहीं है, क्योंकि दीपककी सन्तानकी तरह मोक्षमें
बुद्धि, सुख, दुःख आदि गुणोंकी सन्तानका सर्वथा नाश हो जाता है । तथा, मुक्तावस्था में जीव अपने ही
स्वरूपमें स्थित रहता है ।
जैन—( ३ ) यहाँ संतानत्व हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभाससे दूषित है । ज्ञान और सुखके अनुभवसे
सर्वथा शून्य वैशेषिकोंकी ऐसी मुक्तिके प्राप्त करनेके लिये कोई भी प्रयत्नवान न होगा । तथा, सांसारिक सुख
ही रागका कारण है, मोक्षका अक्षय और अनंत सुख रागका कारण नहीं । अतएव मोक्षमें ज्ञान और सुखका
आत्यन्तिक अभाव है, यह कहना ठीक नहीं है ।
अब आत्माको शरीरके प्रमाण न मानकर उसे सर्वव्यापक माननेवाले उस प्रकारके कुशास्त्ररूपी
शास्त्रके संपर्कसे विनष्ट दृष्टि हुए वैशेषिकोंकी मान्यताका खंडन करते हैं—
श्लोकार्थ—यह निर्विवाद है कि जिस पदार्थके गुण जिस स्थानमें देखे जाते हैं, वह पदार्थ उसी
स्थानमें रहता है; जैसे जहाँ घटके रूप आदि गुण रहते हैं, वहीं घट भी रहता है । तथापि कुवादी लोग
देहके बाह्य आत्माको कुत्सित तत्त्ववादसे व्यामोहित होकर ( सर्वव्यापक रूपसे ) स्वीकार करते हैं ।
व्याख्यार्थ—'यत्रैव यः दृष्टगुणो तत्रैव'—जिस स्थानमें घट आदिके रूप आदि गुण पाये जाते हैं,
उसी स्थानपर घटकी उपलब्धि होती है, अन्यत्र नहीं । इसी प्रकार आत्माके चैतन्य आदि गुण देहमें ही देखे
गमनोपपत्तेरिति । अत एवाह । निष्प्रतिपक्षमेतदिति । एतद् निष्प्रतिपक्षं—बाधकरहितम् ।
“न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम” इति न्यायात् ॥
ननु मन्त्रादीनां भिन्नदेशस्थानामप्याकर्षणोच्चाटनादिको गुणो योजनशतादेः परतोऽपि
दृश्यत इत्यस्ति बाधकमिति चेत् । मैवं वोचः । स हि न खलु मन्त्रादीनां गुणः, किन्तु
तदधिष्ठातृदेवतानाम् । तासां चाकर्षणीयोच्चाटनीयादिदेशगमने कौतस्कुतोऽयमुपालम्भः । न
जातु गुणा गुणिनमतिरिच्य वर्तन्त इति । अथोत्तरार्द्धं व्याख्यायते । तथापीत्यादि । तथापि—
एवं निःसपत्नं२ व्यवस्थितेऽपि तत्त्वे । अतत्त्ववादोपहताः । अनाचार इत्यत्रेव नञः कुत्सार्थ-
त्वात् । कुत्सिततत्त्ववादेन तदभिमताभासपुरुषविशेषप्रणीतेन तत्त्वाभासप्ररूपणेनोपहताः—
व्यामोहिताः । देहाद् बहिःशरीरव्यतिरिक्तेऽपि देशे, आत्मतत्त्वम्—आत्मरूपम् ; पठन्ति
शास्त्ररूपतया प्रणयन्ते । इत्यक्षरार्थः ॥
भावार्थस्त्वयम् । आत्मा सर्वगतो न भवति, सर्वत्र तद्गुणानुपलब्धेः । यो यः सर्वत्रा-
नुपलभ्यमानगुणः स स सर्वगतो न भवति, यथा घटः; तथा चायम् ; तस्मात् तथा ।
व्यतिरेके व्योमादि । न चायमसिद्धो हेतुः, कायव्यतिरिक्तदेशे तद्गुणानां बुद्ध्यादीनां वादिना
प्रतिवादिना वानभ्युपगमात् । तथा च भट्टः श्रीधरः३—“सर्वगतत्वेऽप्यात्मनो देहप्रदेशे
ज्ञातृत्वम् । नान्यत्र । शरीरस्योपभोगायतनत्वात् । अन्यथा तस्य वैयर्थ्यादिति” ॥
जाते हैं, देहके बाहर नहीं, अतएव आत्मा शरीरके ही परिमाण है। यद्यपि पुष्प आदिके एक स्थानमें रहते
हुए भी उसके दूसरे स्थानमें गन्ध आदि गुण उपलब्ध होते हैं, परन्तु इससे हेतुमें व्यभिचार नहीं आता ।
क्योंकि पुष्प आदिमें रहनेवाले गन्ध आदि पुद्गल ही अपने स्वभाव अथवा वायुके प्रयोगसे गमन करते हैं,
इसलिये पुष्प आदिमें रहनेवाले गन्ध-पुद्गल नासिका इन्द्रिय तक जाते हैं । अतएव उक्त कथन बाधा रहित
है, क्योंकि “प्रत्यक्षसे देखे हुए पदार्थमें असिद्धकी सम्भावना नहीं होती ।”
शंका—मन्त्र आदिके भिन्न देशमें रहते हुए भी सैकड़ों योजनकी दूरीपर उनके आकर्षण, उच्चाटन
आदि गुण देखे जाते हैं, अतएव उक्त कथन बाधायुक्त है । समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि आकर्षण,
उच्चाटन आदि गुण मन्त्रके नहीं हैं, किन्तु ये गुण मन्त्र आदिके अधिष्ठाता देवताओंके हैं । मन्त्रके अधिष्ठाता
देव ही आकर्षण उच्चाटन आदिसे प्रभावित स्थानमें स्वयं जाते हैं, इसलिये उक्त दोष ठीक नहीं है। क्योंकि
कभी भी गुण गुणीको छोड़कर नहीं रहते । इस प्रकार हमारे सिद्धान्तके निर्विवाद सिद्ध होनेपर भी कुत्सित
तत्त्ववाद ( जैसे अनाचार शब्दमें कुत्सित अर्थमें नञ् समास किया गया है, उसी तरह 'अतत्त्ववाद'
में भी नञ् समास कुत्सित अर्थमें है ।) से व्यामोहित वैशेषिक लोग आत्माको शरीरके बाहर भी
स्वीकार करते हैं ।
भाव यह है कि आत्मा सर्वव्यापक नहीं है, क्योंकि सब जगह आत्माके गुण उपलब्ध नहीं होते । जिस
वस्तुके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते, वह सर्वव्यापक नहीं होती । जैसे घड़ेके रूप आदि गुण सर्वत्र नहीं
दिखाई देते, इसलिये घड़ा सर्वव्यापक नहीं है । इसी तरह आत्माके गुण भी सर्वत्र उपलब्ध नहीं हैं, इसलिये
आत्मा भी सर्वव्यापक नहीं है । व्यतिरेक दृष्टान्तमें—जो सर्वव्यापी होता है, उसके गुण सब जगह उपलब्ध
होते हैं, जैसे आकाश । उक्त हेतु असिद्ध नहीं है, क्योंकि वादी अथवा प्रतिवादीने बुद्धि आदि आत्माके गुणोंको
शरीरको छोड़कर अन्यत्र स्वीकार नहीं किया है । श्रीधर भट्टने कहा भी है “आत्माके सर्वव्यापक होनेपर
भी शरीरमें रहकर ही आत्मा पदार्थोंको जानता है, दूसरी जगह नहीं । क्योंकि शरीर ही उपभोगका स्थान
है, यदि शरीरको उपभोगका स्थान न माना जाय तो शरीर व्यर्थ हो जाये ।” ( इस प्रकार भट्टके कथनके
अनुसार आत्माके बुद्धि आदि गुण शरीरसे बाहर नहीं रहते ।)
१. दृष्टे वस्तुनि उपपत्तेरनपेक्षेत्यर्थः । २. निर्विवादमित्यर्थः । ३. न्यायकन्दल्यां ।
अथ स्याददृष्टमात्मनो विशेषगुणः । तच्च सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तं सर्वव्यापकं च । कथ-
मितरथा द्वीपान्तरादिष्वपि प्रतिनियतदेशवर्तिपुरुषोपभोग्यानि कनकरत्नचन्दनाङ्गनादीनि
तेनोत्पाद्यन्ते । गुणश्च गुणिनं विहाय न वर्तते । अतोऽनुमीयते सर्वगत आत्मेति । नैवम् ।
अदृष्टस्य सर्वगतत्वसाधने प्रमाणाभावात् । अथास्त्येव प्रमाणं वहेरूध्वर्ज्वलनं, वायोस्तिर्यक्-
पवनं चादृष्टकारितमिति चेत् । न । तयोस्तत्स्वभावत्वादेव तत्सिद्धेः, दहनस्य दहनशक्तिवत् ।
साप्यादृष्टकारिता चेत्, तर्हि जगत्त्रयवैचित्रीसूत्रणेऽपि तदेव सूत्रधारायतां, किमीश्वरकल्पनया ।
तन्नायमसिद्धो हेतुः । न चानैकान्तिकः । साध्यसाधनयोर्व्याप्तिग्रहणेन व्यभिचाराभावात् ।
नापि विरुद्धः । अत्यन्तं विपक्षव्यावृत्तत्वात् । आत्मगुणाश्च बुद्ध्यादयः शरीर एवोपलभ्यन्ते,
ततो गुणिनापि तत्रैव भाव्यम् । इति सिद्धः कायप्रमाण आत्मा ॥
अन्यच्च, त्वयात्मनां बहुत्वमिष्यते “नानात्मानो व्यवस्थातः१” इति वचनात् । ते च
व्यापकाः । ततस्तेषां प्रदीपप्रभामण्डलानामिव परस्परानुवेधे तदाश्रितशुभाशुभकर्मणामपि
परस्परं सङ्करः स्यात् । तथा चैकस्य शुभकर्मणा अन्यः सुखी भवेद्, इतरस्याशुभकर्मणा चान्यो
दुःखीत्यसमञ्जसमापद्येत । अन्यच्च, एकस्यैवात्मनः स्वोपार्जितशुभकर्मविपाकेन सुखित्वं, परोपा-
र्जिताशुभकर्मविपाकसम्वन्धेन च दुःखित्वमिति युगपत्सुखदुःखसंवेदनप्रसङ्गः। अथ स्वावष्टब्धं
भोगायतनमाश्रित्यैव शुभाशुभयोर्भोगः, तर्हि स्वोपार्जितमप्यदृष्टं कथं भोगायतनाद् बहि-
र्निष्क्रम्य वहेरूध्वर्ज्वलनादिकं करोति इति चिन्त्यमेतत् ॥
शंका—आत्माका अदृष्ट नामका एक विशेष गुण है । यह अदृष्ट उत्पन्न होनेवाले सब पदार्थोंमें
निमित्त कारण है, और यह सर्वव्यापक है; अन्यथा इससे दूसरे द्वीपोंमें भी निश्चित स्थानमें रहनेवाले पुरुषोंके
भोगने योग्य, सुवर्ण, रत्न, चन्दन तथा स्त्री आदि कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? यदि आत्मा सर्वव्यापक नहीं
होता, तो आत्माका अदृष्ट गुण अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं कर सकता था । गुण गुणीको छोड़कर नहीं रहते,
अतएव आत्मा सर्वव्यापक ही है । इस प्रकार आत्माके अदृष्ट गुणको सर्वत्र देखनेसे आत्माकी सर्वव्यापकता
सिद्ध होती है । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि अदृष्टके सर्वव्यापी होनेमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि
कहो कि अग्निकी शिखाका ऊँचा जाना, हवाका तिरछे बहना, यह सब अदृष्टसे ही होता है, अतएव अदृष्टका
साधक प्रमाण अवश्य है, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि अग्निका ऊँचे जाना और वायुका तिरछे बहना अदृष्टके
बलसे ही सिद्ध नहीं होता । कारण कि जैसे अग्निमें दहनशक्ति स्वभावसे ही है, उसी तरह अग्निका ऊँचा
जाना भी स्वभावसे ही मानना चाहिये, अदृष्टके बलसे नहीं । यदि कहो कि अग्निमें दहनशक्ति भी अदृष्टके
बलसे ही है, तो फिर तीनों लोकोंकी सृष्टिमें भी अदृष्टको कारण मानना चाहिए, फिर ईश्वरकी कल्पना
करनेसे कोई लाभ नहीं । अतएव 'आत्मा सर्वगत नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते,'
यह हेतु असिद्ध नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण सब जगह नहीं उपलब्ध होते । तथा, यह हेतु अनैकान्तिक भी
नहीं है, क्योंकि यहाँ 'असर्वगत' साध्यकी, 'आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते' साधनके साथ व्याप्ति
ठीक बैठती है । यह हेतु विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि 'आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते' हेतु, 'सर्व-
गतत्व' विपक्षसे अत्यंत व्यावृत्त है । तथा, आत्माके गुण बुद्धि आदि शरीरमें ही उपलब्ध होते हैं, अतएव
गुणी ( आत्मा ) को भी उसी स्थानमें रहना चाहिये । इससे सिद्ध होता है कि आत्मा शरीरके प्रमाण है ।
तथा, वैशेषिकोंने आत्माका बहुत्व स्वीकार किया है। कहा भी है—“प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न
आत्मा होनेसे आत्मा नाना हैं !” अतएव यदि ये नाना आत्मा व्यापक हैं, तो दीपकोंकी प्रभाओंके परस्पर
सम्मिश्रणकी तरह आत्माके शुभ-अशुभ कर्मोंका भी परस्पर सम्मिश्रण हो जाना चाहिये । इसलिए आत्माको
नाना और व्यापक माननेसे आत्माके भिन्न-भिन्न शुभ-अशुभ कर्मोंके एक दूसरेसे सम्मिलित हो जानेपर एकके
१. नानाभेदभिन्नानां सुखदुःखादीनां प्रत्यात्मप्रतिसंधानं व्यवस्था ।
७० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
आत्मनां च सर्वगतत्वे एकैकस्य सृष्टिकर्तृत्वप्रसङ्गः । सर्वगतत्वेनेश्वरान्तरानुप्रवेशस्य
सम्भावनीयत्वात् । ईश्वरस्य वा तदन्तरानुप्रवेशे तस्याप्यकर्तृत्वापत्तिः । न हि क्षीरनीरयोरन्यो-
न्यसम्बन्धे, एकतरस्य पानादिक्रियान्यतरस्य न भवतीति युक्तं वक्तुम् । किञ्च, आत्मनः सर्व-
गतत्वे नरनारकादिपर्यायाणां युगपदनुभवानुषङ्गः । अथ भोगायतनमभ्युपगमाद् नायं दोष
इति चेत्, ननु स भोगायतनं सर्वात्मना अवष्टभ्नीयाद्, एकदेशेन वा ? सर्वात्मना चेद्,
अस्मदभिमताङ्गीकारः । एकदेशेन चेत्, सावयवत्वप्रसङ्गः । परिपूर्णभोगाभावश्च ॥
अथात्मनो व्यापकत्वाभावे दिग्देशान्तरवर्तिपरमाणुभिर्युगपत्संयोगाभावाद् आद्यकर्मा-
भावः, तदभावाद् अन्त्यसंयोगस्य, तन्निर्मितशरीरस्य, तेन तत्सम्बन्धस्य चाभावाद् अनुपाय-
सिद्धः सर्वदा सर्वेषां मोक्षः स्यात् । नैवम् । यद् येन संयुक्तं तदेव तं प्रत्युपसर्पतीति नियमा-
सम्भवात् । अयस्कान्तं प्रति अयसस्तेनासंयुक्तस्याप्याकर्षणोपलब्धेः । अथासंयुक्तस्याप्याकर्षणे
तच्छरीरारम्भं प्रत्येकमुखीभूतानां त्रिभुवनोदरविवरवर्तिपरमाणूनामुपसर्पणप्रसङ्गाद् न जाने
तच्छरीरं कियत्प्रमाणं स्याद् इति चेत्, संयुक्तस्याप्याकर्षणे कथं स एव दोषो न भवेत् ।
आत्मनो व्यापकत्वेन सकलपरमाणूनां तेन संयोगात् । अथ तद्भावाविशेषेऽप्यदृष्टवशाद्
विवक्षितशरीरोत्पादनानुगुणा नियता एव परमाणव उपसर्पन्ति । तदितरत्रापि तुल्यम् ॥
शुभ कर्मसे दूसरा सुखी, और दूसरेके अशुभ कर्मसे दूसरा मनुष्य दुःखी हुआ करेगा। तथा, एक ही आत्माके
स्वयं उपार्जित शुभ कर्मोंसे सुखी, और दूसरेसे उपार्जित अशुभ कर्मोंसे दुःखी होनेके कारण एक ही समयमें एक
साथ सुख-दुःखका संवेदन होना चाहिये। यदि कहो कि आत्मा अपने शरीरके आश्रित रहकर ही अपने शुभ-
अशुभ कर्मका फल भोगता है, तो स्वयं उपार्जन किया हुआ अदृष्ट शरीरसे बाहर निकल कर अग्निके ऊँचे ले
जाने आदि कार्यको कैसे कर सकता है ? यह विचारणीय है। (इसलिए आत्माको अपने शरीरके आश्रित रह-
कर ही सुख-दुःखका भोक्ता माननेसे आत्माका अदृष्ट, शरीरके बाहर निकलकर अग्निको ऊँचे जलाने आदि
कार्यको नहीं कर सकता । क्योंकि सुख-दुःखकी तरह अदृष्ट भी आत्माका ही गुण है । )
तथा, आत्माको सर्वव्यापक माननेपर प्रत्येक आत्माको सृष्टिका कर्त्ता मानना चाहिये । फिर, ईश्वरके
सर्वव्यापक होनेसे नाना आत्माओंमें भी ईश्वर व्यापक होकर रहेगा । अथवा, नाना आत्मायें सर्वव्यापक हैं,
इसलिये वे ईश्वरमें भी व्यापक होकर रहेंगी, इसलिए ईश्वरके कर्तृत्वका अभाव हो जानेका प्रसंग खड़ा हो
जायेगा। जैसे दूध और पानीके मिल जानेपर उनमेंसे एकका पान किया जा सकता है, दूसरेका पान नहीं
किया जा सकता—ऐसा कहना युक्त नहीं है, उसी प्रकार ईश्वर आत्मा दोनोंको सर्वव्यापक माननेसे, दोनोंका
परस्पर सम्मिश्रण होनेके कारण, या तो आत्मा स्वयं सृष्टिका कर्ता होना चाहिए, अथवा ईश्वर भी सृष्टिका
कर्ता नहीं हो सकता । तथा, आत्माको सर्वव्यापक माननेपर मनुष्य, नरक आदि पर्यायोंका एक ही साथ
अनुभव होना चाहिए। यदि कहो कि आत्मा शरीरमें रह कर ही उपभोग करता है, इसलिये उक्त दोष ठीक
नहीं है, तो प्रश्न होता है कि आत्मा सम्पूर्ण रूपसे शरीरमें व्याप्त है, अथवा एक देशसे ? प्रथम पक्ष स्वीकार
करनेसे हमारे ही मतकी स्वीकृति होगी, क्योंकि हम भी आत्माको शरीरके परिमाण ही मानते हैं। यदि
द्वितीय पक्ष स्वीकार करो तो सम्पूर्ण शरीरमें न रहनेसे आत्माको अवयव सहित मानना चाहिये, और आत्माके
सावयव होनेसे वह पूर्ण रूपसे शरीरका भोग भी न कर सकेगो।
शंका—आत्मा यदि व्यापक न हो, तो अन्य स्थानोंमें रहनेवाले परमाणुओंके साथ एक समयमें
उसका संयोग न हो सकेगा, अतएव आद्य-कर्मका अभाव होगा। आद्यकर्मके अभावसे अन्त्य-संयोगका भी
अभाव होगा, अन्त्य-संयोगके अभावसे अंत्य-संयोगके निमित्त से उत्पन्न होनेवाले शरीरका अभाव होगा,
तथा शरीरका अभाव होनेने शरीरका आत्माके साथ सम्बन्ध नहीं बन सकता, अतएव सब जीवोंको
विना प्रयत्नके मोक्ष प्राप्त हो जायेगा। ( भाव यह है कि वैशेषिक लोग अदृष्टसे युक्त आत्माके
संयोगसे परमाणुओंमें क्रिया मानते हैं। परमाणुओंमें क्रिया होनेसे परमाणु आकाशके एक प्रदेशको छोड़ कर
अन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ७१
अथास्तु यथाकथञ्चिच्छरीरोत्पत्तिः, तथापि सावयवं शरीरं प्रत्यवयवमनुप्रविशन्नात्मा
सावयवः स्यात् । तथा चास्य पटादिवत् कार्यत्वप्रसङ्गः । कार्यत्वे चासौ विजातीयैः सजाती-
यैर्वा कारणैरारभ्येत । न तावद्विजातीयैः तेषामनारम्भकत्वात् । न हि तन्तवो घटमारभन्ते ।
न च सजातीयैः । यत आत्मत्वाभिसम्बन्धादेव तेषां कारणानां सजातीयत्वम् । पार्थिवादि-
परमाणूनां विजातीयत्वात् । तथा चात्मभिरात्मा आरभ्यत इत्यायातम् । तच्चायुक्तम् । एकत्र
शरीरेऽनेकात्मनामात्मारम्भकाणामसम्भवात् । सम्भवे वा प्रतिसन्धानानुपपत्तिः । न हि
अन्येन दृष्टमन्यः प्रतिसन्धातुमर्हति, अतिप्रसङ्गात् । तदारभ्यत्वे चास्य घटवदवयवक्रियातो
विभागात् संयोगविनाशाद् विनाशः स्यात् । तस्माद् व्यापक एवात्मा युज्यते । कायप्रमाणता-
यामुक्तदोषसद्भावादिति चेत् । न । सावयवत्वकार्यत्वयोः कथञ्चिदात्मन्यभ्युपगमात् । तत्र
सावयवत्वं तावद् असंख्येयप्रदेशात्मकत्वात् । तथा च द्रव्यालङ्कारकारः—"आकाशोऽपि
सदेशः, सकृत्सर्वमूर्त्ताभिसम्बन्धार्हत्वात्" इति । यद्यप्यवयवप्रदेशयोर्गन्धहस्त्यादिषु भेदोऽस्ति
तथापि नात्र सूक्ष्मेक्षिक्या चिन्त्या । प्रदेशेष्ववयवव्यवहारात् । कार्यत्वं तु वक्ष्यामः ॥
( विभाग ) दूसरे प्रदेशसे संयुक्त ( संयोग ) होते हैं । इस तरह आकाशके प्रदेशमें परमाणुओंके इकट्ठे होनेसे
द्वयणुक, त्र्यणुक आदि कार्य होते हैं । यदि आत्माको सर्वव्यापक न मानें, तो उसका परमाणुओंके साथ
सम्बन्ध न हो सकेगा, इसलिए वह परमाणुओंमें कोई क्रिया नहीं कर सकती, अतः क्रियाका अभाव
होगा । क्रियाका अभाव होनेसे परमाणुका आकाशके प्रदेशोंसे विभाग और संयोग नहीं बन सकता, इसलिये
जिन द्वयणुक, त्र्यणुक आदि अवयवोंका संयोग होनेसे शरीर बनता है, उस अन्त्य-संयोगका भी अभाव होगा ।
अतएव अन्त्य-संयोगसे होनेवाले शरीरका भी अभाव हो जाना चाहिये । तथा शरीरका अभाव ही मोक्ष है,
अतएव आत्माको सर्वव्यापक न माननेसे सब जीवोंको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायेगी ।) समाधान—
यह ठीक नहीं । क्योंकि यह नियम नहीं कि जो जिसके साथ संयुक्त हो, वह उसके प्रति आकर्षित होता ही
हो । चुम्बक और लोहके परस्पर संयुक्त न होनेपर भी उनमें आकर्षण देखा जाता है । इसलिए जैसे लोहे
और चुम्बकका संयोग नहीं है, फिर भी उनमें आकर्षण होता है, वैसे ही आत्मा और परमाणुओंका संयोग
न होनेपर भी आत्मा परमाणुओंको आकर्षित कर सकता है, उसे सर्वव्यापक माननेकी आवश्यकता नहीं ।
शंका—यदि बिना संयोगके भी आत्माका परमाणुओंके प्रति आकर्षण हो, तो आत्माको बनानेवाले प्रत्येक
मुखीभूत त्रिभुवनके उदरवर्ती परमाणुओंके प्रति आत्माका आकर्षण होनेसे न जाने आत्माको कितने महत्
परिमाणवाला मानना होगा । समाधान—वैशेषिक लोगोंके मतमें आत्माके साथ संयुक्त पदार्थोंका आकर्षण
माननेपर भी उक्त दोष वैसा ही रहता है । क्योंकि आत्माके व्यापक होनेसे उसका सम्पूर्ण परमाणुओंके साथ
सम्बन्ध रहता ही है । शंका—अदृष्टके बलसे शरीरके उत्पन्न करनेके अनुकूल नियत परमाणु ही आत्माके
प्रति आकर्षित होते हैं । समाधान—लेकिन यही बात असंयुक्त परमाणुओंके साथ आत्माका सम्बन्ध
माननेमें भी कही जा सकती है ।
शंका—शरीरकी उत्पत्ति चाहे संयुक्त परमाणुओंसे हो, अथवा असंयुक्त परमाणुओंसे, परन्तु शरीर
अवयव सहित है । अतएव शरीरके प्रत्येक अवयवमें प्रवेश करनेसे आत्माको भी सावयव मानना चाहिये ।
जैसे पट आदि सावयव होनेसे कार्य हैं, वैसे ही आत्माको भी सावयव होनेसे कार्य मानना चाहिये । तथा,
यदि आत्मा कार्य है, तो वह सजातीय कारणोंसे बनती है, अथवा विजातीय कारणोंसे ? आत्मा विजातीय
कारणोंसे नहीं बन सकती, क्योंकि विजातीय कारणोंसे कोई भी कार्य नहीं होता है; उदाहरणके लिये,
तन्तुओंसे घड़ा नहीं बन सकता । आत्मा सजातीय कारणोंसे भी उत्पन्न नहीं हो सकती । क्योंकि पार्थिव आदि
परमाणु विजातीय हैं, इसलिये सजातीय कारण आत्माके सम्बन्धसे ही सजातीय कहे जा सकते हैं । अर्थात्
जिन कारणोंसे आत्माका सम्बन्ध हो, वे ही कारण आत्माके सजातीय हो सकते हैं । अतएव यह अर्थ निकला
कि आत्माओंसे आत्मा उत्पन्न किया जाता है । परन्तु जैन लोगोंको यह मान्य नहीं है । क्योंकि एक ही
७२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
नन्वात्मनां कार्यत्वे घटादिवत्प्राक्प्रसिद्धसमानजातीयावयवारभ्यत्वप्रसक्तिः । अव-
यवा ह्यवयविनमारभन्ते, यथा तन्तवः पटमिति चेत् । न वाच्यम् । न खलु घटादावपि कार्ये
प्राक्प्रसिद्धसमानजातीयकपालसंयोगारभ्यत्वं दृष्टम् । कुम्भकारादिव्यापारान्वितान्मृत्पि-
ण्डात् प्रथममेव पृथुबुध्नोदराद्याकारस्यास्योत्पत्तिप्रतीतेः । द्रव्यस्य हि पूर्वाकारपरित्यागे-
नोत्तराकारपरिणामः कार्यत्वम् । तच्च बहिरिवान्तरप्यनुभूयत एव ततश्चात्मापि स्यात् कार्यः ।
न च पटादौ स्वावयवसंयोगपूर्वककार्यत्वोपलम्भात् सर्वत्र तथाभावो युक्तः । काष्ठे लोह-
लेख्यत्वोपलम्भाद् वज्रेऽपि तथाभावप्रसङ्गात् । प्रमाणबाधनमुभयत्रापि तुल्यम् । न चोक्त-
लक्षणकार्यत्वाभ्युपगमेऽप्यात्मनोऽनित्यत्वानुषङ्गात् प्रतिसन्धानाभावोऽनुषज्यते । कथञ्चिद्-
नित्यत्वे सत्येवास्योपपद्यमानत्वात् । प्रतिसन्धानं हि यमहमद्राक्षं तमहं स्मरामीत्यादिरूपम् ।
तच्चैकान्तनित्यत्वे कथमुपपद्यते । अवस्थाभेदात् । अन्या ह्यनुभवावस्था, अन्या च स्मरणा-
वस्था । अवस्थाभेदे चावस्थावतोऽपि भेदादेकरूपत्वक्षतेः कथञ्चिदनित्यत्वं युक्त्यायातं
केन वार्यताम् ॥
शरीरमें अनेक आत्मायें एक आत्माको उत्पन्न नहीं कर सकतीं। यदि अनेक आत्मायें एक आत्माको उत्पन्न
करने लगें तो किसी पदार्थको स्मृति न हो सकेगी। क्योंकि एक आत्मासे देखे हुए पदार्थको दूसरा आत्मा
स्मरण नहीं कर सकता । तथा, आत्मा रूप सजातीय कारणोंसे आत्माके उत्पन्न होनेपर घटकी तरह आत्माका
अवयव-क्रियासे विभाग होगा, और इस प्रकार संयोगके नाश होनेसे आत्माका भी नाश हो जाना चाहिये ।
अर्थात् जैसे घट रूप कार्यका अवयव-क्रियासे विभाग होनेके कारण पूर्वसंयोगका नाश होता है, उसी तरह
आत्मा रूप कार्यका भी अवयव-क्रियासे विभाग होनेपर संयोगका नाश हो जाना चाहिये । अतएव आत्माको
शरीरके परिमाण माननेमें अनेक दोष आते हैं। समाधान—यह कथन ठीक नहीं। क्योंकि हम लोग
सावयवत्व और कार्यत्वको कथंचित् रूपसे आत्मामें स्वीकार करते ही हैं। हम लोग आत्माको असंख्य प्रदेशी
मानते हैं, इसलिये आत्माका सावयव है। द्रव्यालंकारके कर्त्ता कहते हैं—‘‘आकाश भी प्रदेश सहित है,
क्योंकि आकाशमें एक ही समयमें सम्पूर्ण मूर्त पदार्थ रहते हैं।’’ यद्यपि गन्धहस्ति आदि ग्रन्थोंमें अवयव
और प्रदेशमें भेद बताया गया है, परन्तु यहाँ हम इस सूक्ष्म चर्चामें नहीं उतरते क्योंकि प्रदेशोंमें भी अवयवका
व्यवहार होता है। आत्माके कार्यत्वका आगे प्ररूपण करेंगे ।
शंका—आत्माको कार्य माननेपर घटादिकी तरह आत्माकी उत्पत्ति भी सजातीय अवयवोंसे माननी
चाहिये। क्योंकि अवयव ही अवयवीको उत्पन्न करते हैं; जैसे तन्तु पटको उत्पन्न करते हैं, वैसे ही आत्माकी
भी अपने सजातीय अवयवोंसे उत्पत्ति माननी चाहिये । समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि सजातीय दो
कपालोंके संयोगसे घट आदि कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती, कारण कि कुम्हारके व्यापारसे युक्त मिट्टीके पिण्डसे
दोनों कपालोंके उत्पन्न होनेके पहले ही मोटे, गोल और उदर आकारवाले घटका ज्ञान होता है। जिस समय
कुम्हार मिट्टीके पिण्डसे घड़ा बनानेको बैठता है, उस समय मिट्टीके पिण्डसे दो कपालोंकी उत्पत्ति हुए
बिना ही मोटे, गोल आदि आकारवाले घटकी उत्पत्ति होती है। तथा, द्रव्यके पहले आकारको छोड़कर दूसरा
आकार धारण करनेको कार्यत्व कहते हैं। यह कार्यत्व जैसे घट आदिमें बाह्य रूपमें देखा जाता है, वैसे ही
आत्मामें अन्तरंग रूपमें देखा जाता है, अतएव आत्मा भी कथंचित् कार्य है। यदि कहो कि जैसे पटमें तन्तु
रूप अवयवोंके संयोगसे पट आदि कार्य होते हैं, वैसे ही सब पदार्थोंमें अवयवोंके संयोगसे ही कार्य होते हैं,
तो यह ठीक नहीं। क्योंकि सब जगह एकसे नियम नहीं होते । उदाहरणके लिये, लकड़ी लोहेसे खोदी जाती
है, परन्तु वज्र लोहेसे नहीं खोदा जा सकता। यदि कहो कि वज्रका लोहेसे खोदा जाना प्रत्यक्षसे बाधित है,
तो इसी तरह कपालके संयोगसे घटका उत्पन्न होना भी प्रत्यक्षसे बाधित है। तथा, पूर्व आकार छोड़ कर
उत्तर आकारको ग्रहण करने रूप कार्यत्वके माननेपर आत्माके अनित्य होनेसे स्मरणका अभाव नहीं हो
सकता । क्योंकि आत्माके कथंचित् अनित्य माननेपर भी स्मरणकी सिद्धि होती है। ‘जो मैंने देखा, उसे स्मरण
अन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ७३
अथात्मनः शरीरपरिमाणत्वे मूर्तत्वानुषङ्गात् शरीरेऽनुप्रवेशो न स्याद्, मूर्ते मूर्तस्यानु-
प्रवेशविरोधात् । ततो निरात्मकमेवाखिलं शरीरं प्राप्नोतीति चेत्, किमिदं मूर्तत्वं नाम ।
असर्वगतद्रव्यपरिमाणत्वं, रूपादिमत्त्वं वा ? तत्र नाद्यः पक्षो दोषाय, संमतत्वात् । द्वितीय-
स्त्वयुक्तः, व्याप्त्यभावात् । नहि यदसर्वगतं तद् नियमेन रूपादिमदित्यविनाभावोऽस्ति ।
मनसोऽसर्वगतत्वेऽपि भवन्मते तदसम्भवात् । आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वं¹ परमहत्त्वं²
सर्वसंयोगिसमानदेशत्वं³ चेत्युक्तत्वाद् मनसो वैधर्म्यात्, सर्वगतत्वेन प्रतिषेधनात् । अतो
नात्मनः शरीरेऽनुप्रवेशानुपपत्तिः, येन निरात्मकं तत् स्यात् । असर्वगतद्रव्यपरिमाणलक्षण-
मूर्तत्वस्य मनोवत् प्रवेशाप्रतिबन्धकत्वात् । रूपादिमत्त्वलक्षणमूर्तत्वोपेतस्यापि जलादेर्वालुका-
दावनुप्रवेशो न निषिध्यते आत्मनस्तु तद्रहितस्यापि तत्रासौ प्रतिषिध्यत इति महच्चित्रम् ॥
अथात्मनः कायपरिमाणत्वे बालशरीरपरिमाणस्य सतो युवशरीरपरिमाणस्वीकारः
कथं स्यात् । किं तत्परिमाणत्यागात्, तदपरित्यागाद् वा ? परित्यागात् चेत्, तदा शरीरवत्
तस्यानित्यत्वप्रसङ्गात् परलोकाद्यभावानुषङ्गः । अथापरित्यागात्, तन्न । पूर्वपरिमाणापरित्यागे
शरीरवत् तस्योत्तरपरिमाणोत्पत्त्यनुपपत्तेः । तदयुक्तम् । युवशरीरपरिमाणावस्थायामात्मनो
बालशरीरपरिमाणपरित्यागे सर्वथा विनाशासम्भवात्, विफणावस्थोत्पादे सर्पवत् । इति कथं
परलोकाभावोऽनुषज्यते । पर्यायतस्तस्यानित्यत्वेऽपि द्रव्यतो नित्यत्वात् ॥
करता हूँ', यह स्मरण आत्माको एकान्त नित्य माननेपर नहीं बन सकता; क्योंकि अनुभवकी अवस्था स्मरणकी
अवस्थासे भिन्न है । तथा अवस्थाके भिन्न होनेसे अवस्थावाले आत्मामें भी भेद मानना चाहिये । अतएव
आत्माको एकान्त नित्य नहीं कहा जा सकता । उसे कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य मानना ही
युक्तियुक्ति है ।
शंका—आत्माको शरीरके परिमाण माननेपर आत्माको मूर्त मानना चाहिये, अतएव आत्मा मूर्त
शरीरमें प्रवेश न कर सकेगी, क्योंकि मूर्त मूर्तमें प्रवेश नहीं कर सकता । अतएव समस्त शरीर आत्मासे रहित
हो जायेगा । समाधान—आप शरीर-परिमाण को ( असर्वगत ) मूर्त कहते हैं, अथवा रूपादि धारण
करनेको मूर्त कहते हैं ? प्रथम पक्ष हम स्वयं स्वीकार करते हैं । तथा रूपादि धारण करनेकी शरीर-
परिमाणके साथ व्याप्ति नहीं है इसलिये दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं । क्योंकि जो असर्वगत है, अर्थात् शरीरके
परिमाण है, वह रूपादिसे युक्त नहीं होता; क्योंकि मनके शरीर-परिमाण होनेपर भी वह आपके मतमें रूपादि-
से युक्त नहीं है। आप लोगोंने आकाश, काल, दिक् और आत्माको सर्वगत, परम महान् और सब मूर्त द्रव्यों
के संयोगका धारक कह कर मनको अव्यापक सिद्ध किया है। अतएव आत्माका शरीरमें प्रवेश करना असिद्ध
नहीं है, जिससे शरीरको आत्मासे रहित कहा जा सके । क्योंकि असर्वगत मनकी तरह शरीर-परिमाण मूर्त
आत्मा भी शरीरमें प्रवेश कर सकता है । अतएव जैसे वैशेषिकोंके अनुसार मूर्त मन मूर्त शरीरमें प्रवेश कर
सकता है, वैसे ही हमारे मतमें मूर्त आत्मा भी मूर्त शरीरमें प्रवेश कर सकती है । तथा रूपादिसे युक्त जल
आदि मूर्त पदार्थ मूर्त बालुका आदिमें प्रवेश करते देखे ही जाते हैं, फिर रूपादिसे रहित आत्मा मूर्त शरीरमें
न प्रवेश कर सके, यह एक महान् आश्चर्य ही होगा ।
शंका—आत्माको शरीरके परिमाण स्वीकार करनेमें बालकका शरीर युवाके शरीरमें कैसे बदल
सकता है ? हम पूछते हैं कि बालकके शरीरके परिमाणको छोड़कर युवाका शरीर बनता है, अथवा पूर्व
परिमाणको बिना छोड़े ही उत्तर शरीरका परिमाण बन जाता है ? प्रथम पक्षमें, शरीरकी तरह आत्माको
भी अनित्य होना चाहिये, तथा आत्माके अनित्य होनेपर परलोक आदि भी नहीं बन सकता । द्वितीय पक्षमें,
१. सर्वमूर्तसंयोगित्वम् । २. इयत्तारहितत्वम् । ३. सर्वेषां मूर्तद्रव्याणां आकाशं समानो देश एक
आधार इत्यर्थः । एवं दिगादिष्वपि व्याख्येयं । यद्यपि आकाशादिकं सर्वसंयोगिनामाधारो न भवति, इहप्रत्य-
यविषयत्वेनावस्थानात् । तथापि सर्वसंयोगिसंयोगाधारभूतत्वादुपचारेण सर्वसंयोगिनामप्याधार उच्यते ॥
१०
७४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
अथात्मनः कायपरिमाणत्वे तत्खण्डने खण्डनप्रसङ्गः, इति चेत्, कः किमाह शरीरस्य
खण्डने कथंचित् तत्खण्डनस्येष्टत्वात् । शरीरसम्बद्धात्मप्रदेशेभ्यो हि कतिपयात्मप्रदेशानां
खण्डितशरीरप्रदेशेऽवस्थानादात्मनः खण्डनम् । तच्चात्र विद्यत एव । अन्यथा शरीरात् पृथग-
भूतावयवस्य कम्पोपलब्धिर्न स्यात् । न च खण्डितावयवानुप्रविष्टस्यात्मप्रदेशस्य पृथगात्म-
त्वप्रसङ्गः, तत्रैवानुप्रवेशात् । न चैकत्र सन्तानेऽनेके आत्मानः । अनेकार्थप्रतिभासिज्ञानाना-
मेकप्रमात्राधारतया प्रतिभासाभावप्रसङ्गात् । शरीरान्तरव्यवस्थितानेकज्ञानावसेयार्थसंवि-
त्तिवत् ॥
कथं खण्डितावयवयोः संघट्टनं पश्चाद् इति चेत्, एकान्तेन छेदानभ्युपगमात् । पद्मिना-
लतन्तुवत् छेदस्यापि स्वीकारात् । तथाभूतादृष्टवशात् तत्संघट्टनमविरुद्धमेवेति तनुपरिमाण
एवात्माङ्गीकर्तव्यः, न व्यापकः । तथा च आत्मा व्यापको न भवति, चेतनत्वात्, यत्तु व्यापकं न
तत् चेतनम्, यथा व्योम, चेतनश्चात्मा, तस्माद् न व्यापकः । अव्यापकत्वे चास्य तत्रैवोपल-
शरीरके पहले परिमाणको छोड़े बिना उत्तर परिमाणकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? समाधान—यह ठीक
नहीं । क्योकि बालकका शरीर छोड़ कर युवा शरीर प्राप्त करते समय आत्माका सर्वथा विनाश नहीं होता ।
जैसे फण सहित अवस्थाको छोड़कर फण रहित अवस्थाको प्राप्त करते समय सर्पकी आत्माका सर्वथा विनाश
नहीं होता, उसी तरह बाल शरीरसे युवा शरीरकी अवस्था प्राप्त करते समय आत्माका नाश नहीं होता ।
अतएव आत्माको शरीर-परिमाण माननेपर परलोक आदिका अभाव नहीं हो सकता । क्योंकि पर्यायकी
अपेक्षासे अनित्य होने पर भी द्रव्यकी अपेक्षासे आत्मा नित्य है ।
शंका—आत्माको शरीर-परिमाण माननेपर शरीरके नाश होनेसे आत्माका भी नाश हो जाना चाहिये ।
समाधान—आप यह क्या कहते हैं, शरीरके नाश होनेपर आत्माका कथंचित् नाश हमने स्वयं स्वीकार
किया है । क्योंकि शरीरसे सम्बद्ध आत्मप्रदेशोंमें कुछ आत्मप्रदेशोंके खण्डित शरीरमें रहनेकी अपेक्षासे आत्माका
नाश होता ही है । यदि इस अपेक्षासे आत्माका नाश न माना जाय, तो शरीरके तलवार आदिसे काटे जानेपर
शरीरसे भिन्न अवयवोंमें कम्पन की उपलब्धि नहीं होनी चाहिये । परन्तु जिस समय पूर्ण शरीरसे कुछ अवयव
कट कर अलग हो जाते हैं, उस समय उन अवयवोंमें कम्पन आदि क्रिया होती है ( जैन मान्यताके अनुसार,
इन कटे हुए अवयवोंमें आत्माके कुछ प्रदेश रहते हैं, इसीलिये यह क्रिया होती है ) अतएव आत्मा नाशमान भी
है । शंका—शरीरके खण्डित अवयवोंमें आत्माके प्रदेशोंको स्वीकार करनेसे खण्डित अवयवोंमें भिन्न आत्मा
मानना चाहिये । समाधान—यह बात नहीं है । क्योंकि खण्डित अवयवोंमें रहनेवाले आत्माके प्रदेश फिरसे
पहले शरीरमें ही लौट आते हैं । तथा, एक स्थानमें अनेक आत्मा नहीं बन सकते, अन्यथा अनेक पदार्थोंका
निश्चय करानेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको एक ज्ञाता रूप आत्माके आधारसे पदार्थोंका
निश्चय न हो सकेगा । इसलिये एक शरीरमें अनेक आत्मा माननेपर जिस रूपको शरीरके नेत्र रूप अवयवमें
स्थित आत्मा देखता है, उसका निश्चय नेत्रस्थ आत्माको ही होना चाहिये, कानकी आत्माको नहीं । फिर,
एक ज्ञाताके आधारसे प्रत्येक आत्मामें ‘मैं देखता हूँ’, ‘मैं सूँघता हूँ’ इस प्रकारका निश्चित ज्ञान नहीं हो
सकता ।
शंका—आत्माके अवयव खण्डित हो जानेपर वे बादमें एक कैसे हो जाते हैं ? समाधान—हम
लोग आत्माके प्रदेशोंका सर्वथा उच्छेद नहीं मानते । हमारे मतमें कमलकी डण्डीके तन्तुओंकी तरह आत्माका
उच्छेद स्वीकार किया गया है । जिस प्रकार कमलकी नालके टुकड़े करनेपर टूटे हुए तन्तु फिरसे आकर मिल
जाते हैं, वैसे ही शरीरके खण्डित होनेपर खण्डित आत्माके प्रदेश फिरसे पहले आत्माके प्रदेशोंसे आकर मिल
जाते हैं । इन आत्माके प्रदेशोंका मिल जाना अदृष्टके बलसे सम्भव है, इसलिए आत्माको व्यापक न मानकर
शरीर-परिमाण ही मानना चाहिये । तथा, चेतन होनेसे आत्मा व्यापक नहीं है । जो व्यापक है वह चेतन
नहीं है, जैसे आकाश । आत्मा चेतन है, इसलिये वह व्यापक नहीं है । आत्माके अव्यापक होनेपर, 'जहां
अन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ७५
भ्यमानगुणत्वेन सिद्धा कायप्रमाणता । यत्पुनरष्टसमयेसाध्यकेवलिसमुद्घातदशायामार्हता-
नामपि चतुर्दशरज्जूच्चैस्तमकलोकव्यापित्वेनात्मनः सर्वव्यापकत्वम्, तत् कादाचित्कम्, इति
न तेन व्यभिचारः । स्याद्वादमन्त्रकवचावगुण्ठितानां च नेदृशविभीषिकाभ्यो भयम् ।। इति
काव्यार्थः ॥ ९ ॥
जिसके गुण पाये जाते हैं' हेतुसे आत्मा शरीर-परिमाण ही सिद्ध होती है। तथा केवलीके समुद्घात दशामें
आठ समयमें चौदह राजू परिमाण तीन लोकमें व्याप्त होनेकी अपेक्षा जो आत्माको व्यापक कहा है, वह कभी-
कभी होता है, नियमित रूपसे नहीं, इसलिये यहाँ पर समुद्घात दशामें आत्माके व्यापक होनेसे व्यभिचार नहीं
आता। ( मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर निकलनेको समुद्घात कहते हैं। यह समुद्घात
वेदना, कषाय, मारणांतिक, तैजस, विक्रिया, आहारक और केवलीके भेदसे सात प्रकारका है। ( १ ) तीव्र
वेदना होनेके समय मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर जानेको वेदनासमुद्घात कहते हैं।
( २ ) तीव्र कषायके उदयसे दूसरेका नाश करनेके लिये मूल शरीरको विना छोड़े आत्माके प्रदेशोंके बाहर
निकलनेको कषायसमुद्घात कहते हैं। ( ३ ) जिस स्थानमें आयुका बन्ध किया हो, मरनेके अन्तिम समय उस
स्थानके प्रदेशोंको स्पर्श करनेके लिये मूल शरीरको न छोड़ कर आत्माके प्रदेशोंके बाहर निकलनेको मारणां-
तिकसमुद्घात कहते हैं। ( ४ ) तैजससमुद्घात शुभ और अशुभके भेदसे दो प्रकारका होता है। जीवोंको किसी
व्याधि अथवा दुर्भिक्षसे पीड़ित देखकर मूल शरीरको न छोड़ मुनियोंके शरीरसे बारह योजन लम्बे, मूलभागमें
सूच्यंगुलके असंख्येयभाग, अग्रभागमें नौ योजन, शुभ आकृति वाले पुतलेके बाहर निकल कर जानेको शुभ-
तैजससमुद्घात कहते हैं। यह पुतला, व्याधि, दुर्भिक्ष आदिको नष्ट करके वापिस लौट आता है। किसी प्रकार-
के अपने अनिष्टको देखकर क्रोधके कारण मूल शरीरके बिना छोड़े ही मुनियोंके शरीरसे उक्त परिमाणवाले
अशुभ पुतलेके बाहर निकल कर जानेको अशुभ-तैजससमुद्घात कहते हैं। यह अशुभ पुतला अपनी अनिष्ट
वस्तुको नष्ट करके मुनिके साथ स्वयं भी भस्म हो जाता है। द्वीपायन मुनिने अशुभ-तैजससमुद्घात किया
था। ( ५ ) मूल शरीरको न छोड़ कर किसी प्रकारकी विक्रिया करनेके लिये आत्माके प्रदेशोंके बाहर जानेको
विक्रियासमुद्घात कहते हैं। ( ६ ) ऋद्धिधारी मुनियोंको किसी प्रकारकी तत्वसम्बन्धी शंका होनेपर उनके
मूल शरीरको बिना छोड़े शुद्ध स्फटिकके आकार, एक हाथके बराबर पुतलेका मस्तकके बीचसे निकलकर शंकाकी
निवृत्तिके लिये केवली भगवान्के पास जाना, आहारकसमुद्घात है। यह पुतला अन्तर्मुहूर्तमें केवलीके पास
पहुँच जाता है, और शंकाकी निवृत्ति होनेपर अपने स्थानको लौट आता है। ( ७ ) वेदनीय कर्मके अधिक
रहनेपर और आयु कर्मके कम रह जानेपर आयु कर्मको बिना भोगे ही आयु और वेदनीय कर्मके बराबर करनेके
लिये आत्मप्रदेशोंका समस्त लोकमें व्याप्त हो जाना केवलिसमुद्घात है। वेदना, कषाय, मारणांतिक, तैजस,
वैक्रियक और आहारक समुद्घातमें छह समय ( लोकप्रकाश आदि श्वेताम्बर शास्त्रोंमें इनका समय अन्तमुहूर्त
१. हंतेर्गमिक्रियात्वात्संभूयात्मप्रदेशानां च बहिरुद्गमनं समुद्घातः । स सप्तविधः । वेदनाकषायमारणां-
तिकतेजोविक्रियाऽऽहारककेवलिविषयभेदात् । वेदनीयस्य बहुत्वार्दलपत्वाच्चायुषोऽनाभोगपूर्वक्रमायुःसमकरणार्थं
द्रव्यस्वभावत्वात् सुराद्रव्यस्य फेनवेगबुद्बुदाविर्भावोपशमनवद्देहस्यात्मप्रदेशानां बहिःसमुद्घातनं केवलिसमु-
द्घातः । केवलिसमुद्घातः अष्टसमयिकः । दंडकपाटप्रतरलोकपूरणानि चतुर्षु समयेषु, पुनः प्रतरकपाटदण्ड-
स्वशरीरानुप्रवेशाश्चतुर्षु इति । राजवार्तिके पृ० ५३
२. उब्भियदलेकमुरवद्धयसंचयसण्णिहो हवे लोगो ।
अद्धदयो मुरवसमो चोद्दसरज्जूउदो सव्वो ॥
छाया-उद्भूतदलैकमुरजध्वजसंचयसन्निभो भवेत् लोकः ।
अर्धोदयः मुरजसमः चतुर्दशरज्ज्वोदयः सर्वः ॥
त्रिलोकसारे १-६
७६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
बताया गया है ) और केवलिसमुद्घातमें आठ समय लगते हैं। केवलिसमुद्घातमें पहले चार समयोंमें आत्माके
प्रदेश क्रमसे दण्ड, कपाट, प्रतर ( मन्थान—लोकप्रकाश ) और लोकपूर्ण होते हैं, तथा बादमें प्रतर
( मन्थान ) कपाट और दण्ड-परिमाण होकर अपने स्थानको लौट जाते हैं। यहाँ केवलिसमुद्घात अवस्थामें
ही आत्माको सर्वव्यापक कहा है। ) स्याद्वाद रूपी मंत्रके कवचसे अवगुण्ठित हम लोगों को इस प्रकार की
विभीषिकाओंका भय नहीं है। यह श्लोकका अर्थ है।
भावार्थ—इस श्लोकमें आत्माके सर्वव्यापकत्वका खंडन किया गया है। अनुमान—'जहाँ जिस
वस्तुके गुण पाये जाते हैं, वह वस्तु उसी जगह उपलब्ध होती है, जैसे जहाँ घटके रूपादि गुण पाये जाते हैं,
वहीं पर घट उपलब्ध होता है।'
शंका—पुष्पके एक स्थानमें रहनेपर भी उसकी गंध दूसरे स्थानमें भी देखी जाती है। समा-
धान—दूर देशमें पाये जानेवाली गंध पुष्पका गुण नहीं है, पुष्पमें रहनेवाले गंध पुद्गल ही उड़कर हमारी
नाक तक आते हैं।
शंका—मंत्र आदि दूर स्थानसे भी मारण, उच्चाटन आदि क्रिया करते हैं। समाधान—मारण,
उच्चाटन मंत्रका गुण नहीं हैं, परन्तु मंत्रके अधिष्ठाता देव ही मारण आदि क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं।
इसलिए 'आत्मा व्यापक नहीं हैं, क्योंकि आत्माके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते । जिसके गुण सर्वत्र उपलब्ध
नहीं होते, वह व्यापक नहीं होता, जैसे घटके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते, इसलिए घट व्यापक नहीं है।
आत्माके गुण भी सर्वत्र नहीं पाये जाते, इसलिए आत्मा भी व्यापक नहीं है। आकाश व्यापक है, इसलिये
आकाशके गुण सर्वत्र पाये जाते हैं।'
शंका—अदृष्ट आत्माका गुण है। यह अदृष्ट दूर स्थानमें भी क्रिया करता है। यदि आत्माको सर्व-
व्यापक न मानें, तो अदृष्ट दूर देशमें क्रिया नहीं कर सकता। समाधान—अदृष्टके माननेकी कोई आवश्य-
कता नहीं है। अदृष्टकी सिद्धिमें हमें कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। अग्निकी शिखाका ऊँचा जाना आदि
कार्य वस्तुओंके स्वभावसे ही होते हैं। यदि अदृष्टसे सत्र कार्य होने लगें, तो फिर ईश्वरकी भी कोई आवश्य-
कता न रहे। तथा, आत्माको सर्वव्यापक मानकर उसे नाना स्वीकार करनेमें आत्माओंमें परस्पर भिड़न्त हो
जानी चाहिये, और एक आत्माका सुख दूसरी आत्माको उपभोग करना चाहिये। तथा, सर्वव्यापक आत्माको
ईश्वरकी आत्मामें प्रवेश करना चाहिए, इसलिए या तो ईश्वर भी सृष्टिकर्ता न रहेगा, अथवा आत्मा भी
सृष्टिकर्ता हो जायेगा।
शंका—यदि आत्माको व्यापक न मानें तो आत्मा अपने दूसरे जन्मके शरीरके योग्य परमाणुओंको
अपनी ओर कैसे आकर्षित कर सकता है ? यदि किसी तरह वह अपने शरीरके योग्य परमाणुओंको आकर्षित
कर भी ले, तो भी आत्मा शरीर-परिमाण ही ठहरेगा, इसलिए आत्माको सावयव होनेसे कार्य ( अनित्य )
मानना चाहिये। समाधान—जैन लोग आत्माको सावयव मानते हैं, इसलिए आत्मामें परिमाण भी होता
है। हम लोग किसी भी पदार्थको एकान्त नित्य नहीं मानते।
शंका—यदि आत्मा शरीर-परिमाण हैं, तो वह शरीरमें प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि एक मूर्त
पदार्थका दूसरे मूर्त पदार्थमें प्रवेश नहीं हो सकता। समाधान—मूर्तत्वसे यदि आप लोगोंका अभिप्राय
रूपादिको धारण करनेवालेसे है, तो हम लोग आत्माको रूप आदिसे युक्त नहीं मानते। हाँ, यदि अव्यापकत्व-
को आप लोग मूर्त कहते हैं, तो हम आत्माको अवश्य शरीर-परिमाण मानते हैं। अतएव जैनसिद्धान्त के
अनुसार आत्मा द्रव्यकी अपेक्षा नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ७७
वैशेषिकनैयायिकयोः प्रायः समानतन्त्रत्वादौलुक्यमते क्षिप्ते यौगमतमपि क्षिप्तमेवा-
वसेयम्। पदार्थेषु च तयोरपि न तुल्या प्रतिपत्तिरिति सांप्रतमक्षपादप्रतिपादितपदार्थानां
सर्वेषां चतुर्थपुरुषार्थं प्रत्यसाधकतमत्वे वाच्येऽपि, तदन्तःपातिनां छलजातिनिग्रहस्थानानां
परोपन्यासनिरासमात्रफलतया अत्यन्तमनुपादेयत्वात् तदुपदेशदातुर्वैराग्यमुपहसन्नाह—
स्वयं विवादग्रहिले वितण्डापाण्डित्यकण्डूलमुखे जनेऽस्मिन् ।
मायोपदेशात् परमर्म भिन्दन्नहो विरक्तो मुनिरन्यदीयः ॥१०॥
अन्ये—अविज्ञाततत्वदाङ्गासारतयाऽनुपादेयनामानः परे, तेषामयं शास्त्रत्वेन सम्बन्धी
अन्यदीयो मुनिः अक्षपादऋषिः, अहो विरक्तः–अहो वैराग्यवान् । अहो इत्युपहासगर्भमाश्र्चर्यं
सूचयति । अन्यदीय इत्यत्र “ईयकारके”१ इति दोऽन्तः । किं कुर्वन्नित्याह । परमर्म भिन्दन्—
जातावेकवचनप्रयोगात् परमर्माणि व्यथयन् । “बहुभिरात्मप्रदेशैरधिष्ठिता देहावयवा मर्माणि”
इति पारिभाषिकी संज्ञा। तत उपचारात् साध्यस्वतत्त्वसाधनाव्यभिचरितया प्राणभूतः
साधनोपन्यासोऽपि मर्मैव मर्म । कस्मात् तद्भिन्दन्, मायोपदेशाद्धेतोः, माया–परवञ्चनम्,
तस्या उपदेशः छलजातिनिग्रहस्थानलक्षणपदार्थत्रयप्ररूपणद्वारेण शिष्येभ्यः प्रतिपादनं, तस्मात्
“गुणाद्स्त्रियां न वा”२ इत्यनेन हेतौ तृतीयाप्रसङ्गे पञ्चमी । कस्मिन् विषये मायामयमुपदिष्टवान्
इत्याह । अस्मिन् प्रत्यक्षोपलक्ष्यमाणे, जने–तत्त्वातत्त्वविमर्शबहिर्मुखतया प्राकृतप्राये लोके ।
कथम्भूते, स्वयम्-आत्मना परोपदेशनिरपेक्षमेव, विवादग्रहिले-विरुद्धः-परस्परलक्ष्यीकृतपक्षा-
धिक्षेपपक्षः, वादो-वचनोपन्यासो विवादः। तथा च भगवान् हरिभद्रसूरिः—
“लब्धिख्यात्यर्थिना तु स्याद् दुःस्थितेनामहात्मना ।
छलजातिप्रधानो यः स विवाद इति स्मृतः ”३ ॥
तेन ग्रहिल इव-ग्रहगृहीत इव । तत्र यथा ग्रहाद्यपस्मारपरवशः पुरुषो यत्किञ्चनप्रलापी स्याद्
एवमयमपि जन इति भावः । तथा, वितण्डा–प्रतिपक्षस्थापनाहीनं वाक्यम् । वितण्ड्यते
आहन्यतेऽनया प्रतिपक्षसाधनमिति व्युत्पत्तेः । “अभ्युपेत्य पक्षं यो न स्थापयति स वैतण्डिक
वैशेषिक और नैयायिकोंके सिद्धान्त प्रायः एकसे ही हैं, इसलिये वैशेषिकोंके सिद्धान्तोंका खण्डन होनेसे
नैयायिकोंके सिद्धान्तोंका भी खण्डन हो गया समझना चाहिये । वैशेषिक और नैयायिक लोग पदार्थोंको भिन्न
प्रकारसे स्वीकार करते हैं । अतएव यद्यपि अक्षपादद्वारा प्रतिपादित सम्पूर्ण पदार्थ मोक्षके कारण नहीं हैं,
फिर भी उन पदार्थोंमें गर्भित, केवल दूसरेके कथनका तिरस्कार करनेवाले छल, जाति और निग्रहस्थान
नामक पदार्थ सर्वथा त्याज्य हैं, इसलिए छल जाति और निग्रहस्थानके उपदेष्टाके वैराग्यका उपहास करते
हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—आश्चर्य है कि स्वयं ही विवाद रूपी पिशाचसे जकड़े हुए, वितण्डा रूप पाण्डित्यसे
मुँहको खुजलाते हुए, तथा छल, जाति और निग्रहस्थानके उपदेशसे दूसरोंके निर्दोष हेतुओंका खण्डन करने-
वाले मुनि, वीतराग समझे जाते हैं !
व्याख्यार्थ—‘अस्मिन् स्वयं विवादग्रहिले वितण्डापाण्डित्यकण्डूलमुखे जने मायोपदेशात् परमर्म
भिन्दन् अन्यदीयः मुनिः अहो विरक्तः’—भूत पिशाच आदिके वशीभूत हुए पुरुषकी तरह स्वयं दूसरोंके उपदेशके
बिना. ही विवाद [ दूसरेके मतको खण्डन करनेवाला वचन । हरिभद्रसूरिने कहा है—
“लाभ और ख्यातिके चाहनेवाले कलुषित और नीच लोग छल और जातिसे युक्त जो कुछ कथन करते
हैं, वह विवाद है ।” ] से ग्रसित, तथा वितण्डा [ जिससे प्रतिपक्ष, अर्थात् अपने पक्षमें प्रतिवादीद्वारा दिये हुए
१. हैमसू. ३-२-१२१ । २. हैमसू. २-२२-७७ । ३. हरिभद्रसूरिकृते अष्टके १२-४ ।
७८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
इत्युच्यते'” इति न्यायवार्त्तिकम् । वस्तुतस्त्वपरामृष्टतत्त्वात्त्वविचारं मौखर्यं वितण्डा । तत्र
यत्पाण्डित्यम्-अविकलं कौशलं, तेन कण्डूलं मुखं लपनं यस्य स तथा तस्मिन् । कण्डूः-खर्जूः,
कण्डूरस्यास्तीति कण्डूलम्, सिध्मादित्वाद् मत्वर्थीयो लप्रत्ययः । यथा क्लान्तरुत्पन्नकृमि-
कुलजनितां कण्डूतिं निरोद्धुमपारयन् पुरुषो व्याकुलतां कलयति, एवं तन्मुखमपि वितण्डा-
पाण्डित्येनासंबद्धप्रलापचापलमाकलयत् कण्डूलमित्युपचर्यते ॥
एवं च स्वरसत एव स्वस्वाभिमतव्यवस्थापनाविसंस्थुलो वैतण्डिकलोकः । तत्र च
तत्परमाप्तभूतपुरुषविशेषपरिकल्पितपरवञ्चनप्रचुरवचनरचनोपदेशश्चेत् सहायः समजनेि, तदा
स्वत एव ज्वालाकलापजटिले प्रज्वलति हुताशन इव कृतो घृताहुतिप्रक्षेप इति । तैश्च भवाभि-
नन्दिभिर्वादिभिरेतादृशोपदेशदानमपि तस्य मुनेः कारुणिकत्वकोटावारोपितम् । तथा चाहुः-
“दुःशिक्षितकुतर्कांशलेशवाचालितstepाननाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपमण्डिताः ॥१॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्रतारितः ।
मा गादिति छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः” ॥२॥
कारुणिकत्वं च वैराग्याद् न भिद्यते । ततो युक्तमुक्तम् अहो विरक्त इति स्तुतिकारेणो-
पहासवचनम् ॥
अथ मायोपदेशादिति सूचनासूत्रं वितन्यते । अक्षपादमते किल षोडशपदार्थाः।
“प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रह-
स्थानानां तत्त्वज्ञानाद् निःश्रेयसाधिगमः” इति वचनात् । न चैतेषां व्यस्तानां समस्तानां वा
दोषोंका खण्डन कर अपने पक्षका स्थापन न किया जा सके। न्यायवार्तिकमें कहा है- “अपने पक्षको
स्वीकार कर के जो स्वपक्षको स्थापित नहीं कर सकता, उसे वैतण्डिक कहते हैं।" वास्तवमें तत्त्व-अतत्त्वका
विचार न कर मौखर्यको ही वितण्डा कहा है] रूप पाण्डित्यसे असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले तत्त्व और
अतत्त्वके विचारसे बहिर्मुख, छल जाति और निग्रहस्थानका उपदेश देकर दूसरोंके निर्दोष हेतुओंका खण्डन
करनेवाले, आपकी आज्ञासे बाह्य, ऐसे अक्षपाद ऋषि, आश्चर्य है कि वीतराग कहे जाते हैं !
यदि अपने मतको स्थापित करनेके लिए आतुर वैतण्डिक लोगोंको परम आप्त कहे जानेवाले पुरुषोंके
द्वारा दूसरोंकी वंचना करनेवाले वचनोंका उपदेश दिया जाय, तो वह जलती हुई अग्निमें घीकी आहुतिका
काम देता है । संसारमें आनन्द माननेवाले वादियोंने इस प्रकारका उपदेश करनेवाले मुनि भी कारुणिक
बताया है ! उन लोगोंने कहा है-
“कुतर्कसे वाचालित वितण्डावादी छल आदिके बिना नहीं जीते जा सकते ॥१॥
लोग एक दूसरेके पीछे चलनेवाले होते हैं। इसलिये कुताकिकोंसे ठगाये जाकर लोग उनका अनुकरण
न करने लग जांय, अतएव कारुणिक मुनि ने छल आदि का उपदेश किया है।" ॥२॥
करुणा और वैराग्य अलग अलग नहीं हैं । अतएव स्तुतिकारने, 'अहो विरक्तः' ऐसा कह कर जो
उपहासवचन का प्रयोग किया है, वह ठीक है ।
१ उद्योतकरविरचितन्यायवार्त्तिके १-१-१ ।
२ भवाभिनन्दी-
असारोऽप्येष संसारः सारवानिव लक्ष्यते ।
दधिदुग्धाम्बुताम्बूलपुष्पपण्याङ्गनादिभिः ॥
इत्यादिवचनैः संसाराभिनन्दनशीलः ।
३ गौतमसूत्रे १-१-१
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ७९
अधिगमो निःश्रेयसावाप्तिहेतुः। न ह्येकेनैव क्रियाविरहितेन ज्ञानमात्रेण मुक्तिर्युक्तिमती ।
असमग्रसामग्रीकत्वात् । विघटितैकचक्ररथेन मनीषितनगरप्राप्तिवत् ॥
न च वाच्यं न खलु वयं क्रियां प्रतिषिधामः, किन्तु तत्त्वज्ञानपूर्विकाया एव तस्या
मुक्तिहेतुत्वमिति ज्ञानार्थं तत्त्वज्ञानाद् निःश्रेयसाधिगम इति ब्रूम इति। न ह्यमीषां संहते अपि
ज्ञानक्रिये मुक्तिप्राप्तिहेतुभूते । वितथत्वात् तज्ज्ञानक्रिययोः । न च वितथत्वमसिद्धम् । विचार्य-
माणानां षोडशानामपि तत्त्वाभासत्वात् । तथाहि तैः प्रमाणस्य तावद् लक्षणमित्थं सूत्रितम्—
“अर्थोपलब्धिहेतुः प्रमाणम्” १इति । एतच्च न विचारसहम् । यतोऽर्थोपलब्धौ हेतुत्वं यदि
निमित्तत्वमात्रं, तत्सर्वकारकासाधारणमिति कर्तृकर्मादेरपि प्रमाणत्वप्रसङ्गः । अथ कर्तृकर्मादि-
विलक्षणं हेतुशब्देन करणमेव विवक्षितं, तर्हि तज्ज्ञानमेव युक्तं, न चेन्द्रियसन्निकर्षादि ।
यस्मिन् हि सत्यर्थ उपलब्धो भवति, स तत्करणम् । न चेन्द्रियसन्निकर्षसामग्र्यादौ सत्यपि
ज्ञानाभावेऽर्थोपलम्भः । साधकतमं हि करणम् । अव्यवहितफलं च तदिष्यते । व्यवहितफल-
स्यापि करणत्वे दुग्धभोजनादेरपि तथाप्रसङ्गः । तन्न ज्ञानादन्यत्र प्रमाणत्वम् । अन्यत्रोपचा-
रात् । यदपि न्यायभूषणसूत्रकारेणोक्तम्— “सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्” २ इति, तत्रापि
साधनग्रहणात् कर्तृकर्मनिरासेन करणस्यैव प्रमाणत्वं सिध्यति । तथाऽप्यव्यवहितफलत्वेन
साधकतमत्वं ज्ञानस्यैव इति न तत् सम्यग्लक्षणम् । “स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम्” ३
इति तु तात्त्विकं लक्षणम् ॥
अक्षपादके (नैयायिकोंके) मतमें सोलह पदार्थ माने गये हैं । कहा भी है— “प्रमाण, प्रमेय, संशय,
प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान
के तत्त्वज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है ।” किन्तु इन सोलह पदार्थोंमें एक-एकका अथवा समस्त पदार्थोंका जान
लेना मोक्षकी प्राप्तिमें कारण नहीं है । क्योंकि क्रियाके बिना केवल ज्ञानमात्रसे ही मुक्ति नहीं मिलती । जिस
प्रकार रथके दो पहियोंके बिना केवल एक पहियेसे नगरमें नहीं घूमा जा सकता, उसी तरह ज्ञान और क्रिया
दोनोंके बिना केवल ज्ञान-मात्रसे मोक्ष नहीं मिलता ।
शंका—हम लोग क्रियाका निषेध नहीं करते, किन्तु सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे होनेवाली क्रिया ही
मोक्षकी प्राप्तिमें कारण है, यह बतानेके लिये हमने कहा है “तत्त्वज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती हैं ।”
समाधान—आप लोगोंके द्वारा माने हुए ज्ञान और क्रिया दोनों मिल कर भी मोक्षके कारण नहीं हो सकते,
क्योंकि वे ज्ञान और क्रिया दोनों मिथ्या हैं । ज्ञान और क्रियाका मिथ्या होना असिद्ध नहीं है, क्योंकि विचार
करनेपर ये सोलह पदार्थ तत्त्वाभास सिद्ध होते हैं । आप लोगोंने जो “अर्थोपलब्धिमें हेतुको प्रमाण”
स्वीकार किया है, वह ठीक नहीं । क्योंकि यदि निमित्त मात्रको ही अर्थोपलब्धिमें हेतु कहा जाय तो
कर्ता, कर्म आदि कारकोंको भी प्रमाण मानना चाहिये । कर्ता, कर्म आदि भी पदार्थोंके ज्ञानमें निमित्त कारण
हैं । यदि आप कर्ता, कर्म आदि कारकोंसे विलक्षण करण कारकको ही हेतु कहें, तो इन्द्रिय और पदार्थके
सम्बन्धको पदार्थके ज्ञानमें कारण न कह कर केवल ज्ञानको ही पदार्थोंके करण मानना चाहिये । क्योंकि
इन्द्रिय और पदार्थका सम्बन्ध होनेपर भी ज्ञानका अभाव होनेसे पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । जिसके होनेपर
पदार्थका ज्ञान होता है, वह पदार्थके ज्ञानका करण है, परन्तु इन्द्रियसन्निकर्ष आदि सामग्रीके रहते हुए भी
ज्ञानके अभावमें पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । तथा, साधकतमको ही करण मानना चाहिये । इसी साधकतम
ज्ञान रूप करणके होनेसे ही पदार्थोंके जानने रूप कार्यकी उत्पत्ति होती है । यदि करणको परम्परासे फल
देनेवाला माना जाय, तो दुग्ध, भोजन आदि भी पदार्थके ज्ञानमें करण हो सकते हैं । अतएव ज्ञानको छोड़
कर और कोई प्रमाण नहीं मानना चाहिये । क्योंकि ज्ञान ही पदार्थोंके जाननेमें करण है, ज्ञानको छोड़कर
१. वात्स्यायनभाष्ये । २. न्यायसारे भासर्वज्ञप्रणीते १-१ । ३. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे १-२ ।
८० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
प्रमेयमपि तत्रात्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रत्यभावफलदुःखापवर्गभेदाद्
द्वादशविधमुक्तम् । तन्न सम्यग् । यतः शरीरेन्द्रियबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषफलदुःखानाम् आत्म-
न्येवान्तर्भावो युक्तः । संसारिण आत्मनः कथञ्चित् तद्विषयभूतत्वात् । आत्मा च प्रमेय
एव न भवति । तस्य प्रमातृत्वात् । इन्द्रियबुद्धिमनसां तु करणत्वात् प्रमेयत्वाभावः । दोषास्तु
रागद्वेषमोहाः, ते च प्रवृत्तेर्न पृथग्भवितुमर्हन्ति । वाङ्मनःकायव्यापारस्य शुभाशुभफलस्य
विंशतिविधस्य तन्मते प्रवृत्तिशब्दवाच्यत्वात् । रागादिदोषाणां । च मनोव्यापारात्मकत्वात् ।
दुःखस्य शब्दादीनामिन्द्रियार्थानां च फल एवान्तर्भावः । “प्रवृत्तिदोषजनितं सुखदुःखात्मकं
मुख्यं फलं, तत्साधनं तु गौणम्” १ इति जयन्तवचनात् । प्रेत्यभावापवर्गयो
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८१
चेति । तत्र साधारणे शब्दे प्रयुक्ते वक्तुरभिप्रेतादर्थादर्थान्तरकल्पनया तन्निषेधो वाक्छलम् ।
यथा नवकम्बलोऽयं माणवक इति नूतनविवक्षया कथिते, परः संख्यामारोप्य निषेधति कुतोऽ
स्य नव कम्बलाः इति । संभावनायातिप्रसङ्गिनोऽपि सामान्यस्योपन्यासे हेतुत्वारोपणेन तन्नि-
षेधः सामान्यच्छलम् । यथा अहो नु खल्वसौ ब्राह्मणो विद्याचरणसंपन्न इति ब्राह्मणस्तुतिप्रसङ्गे,
कश्चिद् वदति सम्भवति ब्राह्मणे, विद्याचरणसम्पदिति, तत् छलवादी ब्राह्मणत्वस्य हेतुतामा-
रोप्य निराकुर्वन्नभियुङ्क्ते यदि ब्राह्मणे विद्याचरणसंपद् भवति, व्रात्ये¹ऽपि सा भवेद्, व्रात्योऽपि
ब्राह्मण एवेति । औपचारिके प्रयोगे मुख्यप्रतिषेधेन प्रत्यवस्थानम् उपचारच्छलम् । यथा मञ्चाः
क्रोशन्तीत्युक्ते, परः प्रत्यवतिष्ठते कथमचेतनाः मञ्चाः क्रोशन्ति मञ्चस्थाः पुरुषाः क्रोशन्तीति ॥
तथा सम्यग्हेतौ हेत्वाभासे वा वादिना प्रयुक्ते, झटिति तद्दोषतत्त्वाप्रतिभासे हेतुप्रति-
बिम्बनप्रायं किमपि प्रत्यवस्थानं जातिः दूषणाभास इत्यर्थः । सा च चतुर्विंशतिभेदा । साध-
र्म्यादिप्रत्यवस्थानभेदेन यथा "साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यऽवर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्य-
प्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्ताऽनुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः" ॥²
तत्र साधर्म्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमा जातिर्भवति । अनित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्,
घटवदिति प्रयोगे कृते साधर्म्यप्रयोगेणैव प्रत्यवस्थानम् नित्य शब्दो, निरवयवत्वात्,
आकाशवत् । न चास्ति विशेषहेतुः घटसाधर्म्यात् कृतकत्वाद्वनित्यः शब्दः, न पुनराकाश-
बदल कर वादीके वचनोंके निषेध करनेको छल कहते हैं। यह छल वाक्, सामान्य और उपचारके भेदसे तीन
प्रकारका है । ( १ ) वक्ताके किसी साधारण शब्दके प्रयोग करनेपर उसके विवक्षित अर्थको जान बूझकर
उपेक्षा कर अर्थान्तरकी कल्पना करके वक्ताके वचनके निषेध करनेको वाक्छल कहते हैं। जैसे वक्ताने कहा
कि 'नवकम्बलोऽयं माणवकः' — यहाँ हम जानते हैं, कि 'नव' कहनेसे वक्ताका अभिप्राय 'नूतनसे' है फिर भी
दुर्भावनासे उसके वचनोंका निषेध करनेके लिये हम 'नव' शब्दका अर्थ 'नौ' करके वक्तासे पूछते हैं कि इस
माणवकके पास नौ कम्बल कहाँ हैं ? ( २ ) सम्भावना मात्रसे व्यापक सामान्य का कथन करने पर सामान्यके
ऊपर हेतुका आरोप करके सामान्यका निषेध करना सामान्यछल है। जैसे 'आश्चर्य है कि यह वाह्मण विद्या
और आचरणसे युक्त है,' यह कह कर कोई पुरुष ब्राह्मणकी स्तुति करता है। इस पर कोई दूसरा पुरुष कहता
है कि विद्या और आचरणका तो ब्राह्मणमें होना स्वाभाविक है। यहाँ यद्यपि ब्राह्मणत्वका सम्भावना मात्रसे
कथन किया गया है, फिर भी छलवादी ब्राह्मणमें विद्या और आचरणके होनेके सामान्य नियम बना कर
कहता है कि यदि ब्राह्मणमें विद्या और आचरण का होना स्वाभाविक है, तो विद्या और आचरण व्रात्य
(पतित) ब्राह्मणमें भी होना चाहिये, क्योंकि व्रात्य ब्राह्मण भी ब्राह्मण ही है। ( ३ ) उपचार अर्थमें मुख्य
अर्थका निषेध करके वक्ताके वचनोंका निषेध करना, उपचारछल है। जैसे कोई कहे कि मंच रोते हैं, तो
छलवादी उत्तर देता है कि कहीं मंच जैसे अचेतन पदार्थ भी रो सकते हैं, अतएव कहना चाहिये कि मंचपर
बैठे हुए आदमी रोते हैं ।
वादीके द्वारा सम्यक् हेतु अथवा हेत्वाभासके प्रयोग करनेपर, वादीके हेतुकी सदोषताकी बिना
परीक्षा किये हुए, हेतुके समान मालूम होनेवाला शीघ्रतासे कुछ भी कह देना जाति है । अर्थात् दूषणाभास
यह जाति "साधर्म्य, वैधर्म्य, उत्कर्ष, अपकर्ष, वर्ण्य, अवर्ण्य, विकल्प, साध्य, प्राप्ति, अप्राप्ति, प्रसंग,
प्रतिदृष्टांत, अनुत्पत्ति, संशय, प्रकरण, हेतु, अर्थापत्ति, अविशेष, उपपत्ति, उपलब्धि, अनुपलब्धि, नित्य, अनित्य
और कार्यसम" के भेदसे चौबीस प्रकारकी है ।
( १ ) साधर्म्यसे उपसंहार करने पर दृष्टांत की समानता दिखला कर साध्यसे विपरीत कथन करनेको ·
साधर्म्यसमा जाति कहते हैं। जैसे, वादीने कहा, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि कृतक है; जो कृतक होता है, वह
१. सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः । २. गौतमसूत्रे ५-१-१।
११
८२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
साधर्म्याद् निरवयवत्वाद् नित्यः इति । वैधर्म्येण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमा जातिर्भवति ।
अनित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवदित्यत्रैव प्रयोगे, स एव प्रतिहेतुर्वैधर्म्येण प्रयुज्यते नित्यः
शब्दो निरवयवत्वात् । अनित्यं हि सावयवं दृष्टम् घटादीति । न चास्ति विशेषहेतुः घटसा-
धर्म्यात् कृतकत्वादनित्यः शब्दः, न पुनस्तद्वैधर्म्याद् निरवयवत्वाद् नित्य इति । उत्कर्षापक-
र्षाभ्यां प्रत्यवस्थानम् उत्कर्षापकर्षसमे जाती भवतः । तत्रैव प्रयोगे, दृष्टान्तधर्मं कञ्चित्
साध्यधर्मिण्यापादयन् उत्कर्षसमां जातिं प्रयुङ्क्ते । यदि घटवत् कृतकत्वादनित्यः शब्दः
घटवदेव मूर्त्तोऽपि भवतु, न चेद् मूर्तः, घटवदनित्योऽपि मा भूदिति शब्दे धर्मान्तरोत्कर्षमा-
पादयति । अपकर्षस्तु घटः कृतकः सन् अश्रावणो दृष्टः, एवं शब्दोऽप्यस्तु, नो चेद् घटवद्-
नित्योऽपि मा भूदिति शब्दे श्रावणत्वधर्ममपकर्षतीति । इत्येताश्चतस्रो दिङ्मात्रदर्शनार्थं जातय
उक्ताः । एवं शेषा अपि विंशतिरक्षपादशास्त्रादवसेयाः । अत्र त्वनुपयोगित्वाद् न लिखिताः ॥
अनित्य है, जैसे घड़ा' । इसमें दोष देनेके लिये प्रतिवादी कहता है, 'यदि कृतक रूप धर्मसे शब्द और घड़ेमें
समानता है, तो निरवयव रूप धर्मसे शब्द और आकाशमें भी समानता है, अतएव शब्द आकाशके समान नित्य
होना चाहिये' । यहाँ वादीद्वारा शब्दको अनित्य सिद्ध करनेमें कृतकत्व हेतुका प्रतिवादीने बिलकुल खण्डन नहीं
किया । और केवल दृष्टान्तकी समानता दिखानेसे साध्यका खण्डन नहीं होता । उसके लिए हेतु देना चाहिए,
या वादीके हेतुका खण्डन करना चाहिये । ( २ ) वैधर्म्यके उपसंहार करनेपर वैधर्म्य दिखला कर खण्डन करना,
वैधर्म्यसमा जाति है । जैसे, 'शब्द अनित्य है, कृतक होने से, घटकी तरह' । इसके खण्डन में प्रतिवादीका कथन
है, 'शब्द नित्य है, निरवयव होनेसे, आकाशकी तरह' । यहाँ प्रतिवादीका कहना है कि यदि नित्य आकाशके
वैधर्म्यसे शब्द अनित्य है, तो अनित्य घटके वैधर्म्यसे शब्दको अनित्य मानना चाहिये । परन्तु यहाँ कोई ऐसा
नियामक नहीं है कि घटके रूप साधर्म्यसे कृतक होनेके कारण शब्द नित्य नहीं हो । अतएव इससे वादीके
हेतुका कोई खण्डन नहीं होता । ( ३ ) दृष्टांतके धर्मको साध्यमें मिला कर वादीके खण्डन करनेको उत्कर्षसमा
जाति कहते हैं । जैसे, वादी ने कहा, 'शब्द अनित्य है, कृतक होनेसे, घटकी तरह' । इस अनुमानमें दोष
देनेके लिये प्रतिवादी कहता है, 'जैसे घटकी तरह शब्द अनित्य है, वैसे ही उसे घटकी तरह मूर्त भी मानना
चाहिये । यदि शब्द मूर्त नहीं है, तो वह घटकी तरह अनित्य भी नहीं है।' यहाँ वादी घटका दृष्टान्त देकर
शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध करना चाहता है, परन्तु प्रतिवादी घटके दूसरे धर्म मूर्तत्वको शब्दमें सिद्ध करके वादीका
खण्डन करता है । ( ४ ) उत्कर्षसमाकी उल्टी अपकर्षसमा जाति कही जाती है । साध्यधर्मीमें से दृष्टान्तमें
नहीं रहनेवाले धर्मको निकाल कर वादीके प्रति विरुद्ध भाषण करनेको अपकर्षसमा जाति कहते हैं । जैसे,
'शब्द अनित्य है, कृतक होनेसे, घटकी तरह' । इस पर प्रतिवादीका कथन है, 'जैसे, घट कृतक होनेसे श्रवणका
विषय नहीं है, इसी तरह शब्दको भी श्रवणका विषय नहीं होना चाहिए । यदि शब्द अश्रावण नहीं है, तो
वह घटकी तरह अनित्य भी नहीं हो सकता । यहाँ केवल चार ही जातियोंका दिग्दर्शन कराया गया है ।
[ (५-६) “जिसका कथन किया जाता है, उसे वर्ण्य और जिसका कथन नहीं किया जाता, उसे अवर्ण्य
कहते हैं । वर्ण्य या अवर्ण्यकी समानतासे जो असदुत्तर दिया जाता है, उसे वर्ण्यसमा या अवर्ण्यसमा कहते हैं ।
जैसे, यदि साध्यमें सिद्धिका अभाव है, तो दृष्टांतमें भी होना चाहिये (वर्ण्यसमा), और यदि दृष्टान्तमें सिद्धिका
अभाव नहीं है, तो साध्यमें भी न होना चाहिये ( अवर्ण्यसमा ) । (७) दूसरे धर्मके विकल्प उठा कर मिथ्या
उत्तर देना, विकल्पसमा जाति है । जैसे, कृत्रिमता और गुरुत्वका सम्बन्ध ठीक ठीक नहीं मिलता, गुरुत्व और
अनित्यत्वका नहीं मिलता, अनित्यत्व और मूर्तत्वका नहीं मिलता, अतएव अनित्यत्व और कृत्रिमताका भी सम्बन्ध
न मानना चाहिये, जिससे कृत्रिमतासे शब्द अनित्य सिद्ध किया जा सके । ( ८ ) वादीने जो साध्य बनाया है,
उसीके समान दृष्टान्त आदिको प्रतिपादन कर मिथ्या उत्तर देना, साध्यसमा जाति है । जैसे, यदि मिट्टीके ढेलेके
समान आत्मा है, तो आत्माके समान मिट्टीके ढेलेको भी मानना चाहिये । आत्मामें 'क्रिया' साध्य ( सिद्ध
करने योग्य, न कि सिद्ध ) है, तो मिट्टीके ढेलेमें भी साध्य मानो । यदि ऐसा नहीं मानते हो तो आत्मा और
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८३
मिट्टीके ढेलेको समान मत मानो । ये सब मिथ्या उत्तर हैं, क्योंकि दृष्टान्तमें सब धर्मोंकी समानता नहीं देखी
जाती; उसमें सिर्फ साध्य और साधनकी समानता देखी जाती है। विकल्पसमामें जो अनेक धर्मोंका व्यभिचार
बतलाया है, उससे वादीका अनुमान खण्डित नहीं होता, क्योंकि साध्य-धर्मके सिवाय अन्य धर्मोंके साथ यदि
साधनकी व्याप्ति न मिले, तो इससे साधनको व्यभिचारी नहीं कह सकते । हाँ, यदि साध्य-धर्मके साथ व्याप्ति
न मिले, तो व्यभिचारी हो सकता है । दूसरे धर्मोंके साथ व्यभिचार आनेसे साध्यके साथ भी व्यभिचारकी
कल्पना व्यर्थ है । धूमकी यदि पत्थरके साथ व्याप्ति नहीं मिलती, तो यह नहीं कहा जा सकता कि धूमकी
व्याप्ति, अग्निके साथ भी नहीं है । (९-१०) प्राप्ति और अप्राप्तिका प्रश्न उठाकर सच्चे हेतुको खण्डित प्रति-
पादन करना, प्राप्तिसमा और अप्राप्तिसमा जाति है । जैसे, हेतु साध्यके पास रहकर साध्यको सिद्ध करता है,
या दूर रहकर ? यदि पास रहकर तो कैसे ज्ञात होगा कि यह साध्य है और यह हेतु है ( प्राप्तिसमा ) ।
यदि दूर रह कर तो यह साधन अमुक धर्मकी ही सिद्धि करता है, दूसरेकी नहीं यह कैसे ज्ञात हो ( अप्राप्ति-
समा ) । ये असदुत्तर हैं, क्यों कि धूँआ आदि पास रह कर अग्निकी सिद्धि करते हैं तथा दूर रह कर भी
पूर्वचर आदि साधन, साध्यकी सिद्धि करते हैं। जिनमें अविनाभाव सम्बन्ध है, उन्हीं में साध्य-साधकता हो
सकती है, न कि सबमें । (११) जैसे साध्यके लिये साधनकी जरूरत है, उसी प्रकार दृष्टान्त के लिए भी
साधनकी जरूरत है, यह कथन प्रसंगसमा जाति है । दृष्टान्तमें वादी और प्रतिवादीको विवाद नहीं होता,
अतएव उसके लिए साधनकी आवश्यकता प्रतिपादन करना व्यर्थ है, अन्यथा वह दृष्टान्त ही न कहलायगा ।
(१२) बिना व्याप्तिके केवल दूसरा दृष्टान्त देकर दोष लगाना प्रतिदृष्टान्तसमा जाति है । जैसे घड़ेके दृष्टान्त-
से यदि शब्द अनित्य है, तो आकाशके दृष्टांतसे वह नित्य कहलाये । प्रतिदृष्टान्त देनेवाले ने कोई हेतु नहीं दिया
है जिससे यह कहा जाय कि दृष्टान्त साधक नहीं है-प्रतिदृष्टान्त साधक है । किन्तु बिना हेतु के खण्डन-
मण्डन कैसे हो सकता है ? ( १३ ) उत्पत्तिके पहले, कारणका अभाव दिखला कर मिथ्या खण्डन करना
अनुत्पत्तिसमा है । जैसे उत्पत्तिके पहले शब्द कृत्रिम है, या नहीं ? यदि है तो उत्पत्तिके पहले मौजूद होनेसे
शब्द नित्य हो गया; यदि नहीं है तो हेतु आश्रयासिद्ध हो गया । यह उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिके
पहले शब्द ही नहीं था, फिर कृत्रिम-अकृत्रिमका प्रश्न ही क्या ? (१४) व्याप्तिमें मिथ्या सन्देह प्रतिपादन कर
वादीके पक्षका खण्डन करना, संशयसमा जाति है । जैसे, कार्य होनेसे शब्द नित्य है—यहाँ यह कहना कि
इन्द्रियका विषय होनेसे शब्दकी अनित्यतामें सन्देह है, क्योंकि इन्द्रियोंके विषय नित्य भी होते हैं ( जैसे
गोत्व घटत्व आदि सामान्य ) और अनित्य भी ( जैसे घट, पट आदि ) । यह संशय ठीक नहीं, क्योंकि जब
तक कार्यत्व और अनित्यत्वकी व्याप्ति खण्डित न की जाय, तब तक वहाँ संशयका प्रवेश नहीं हो सकता ।
कार्यत्वकी व्याप्ति यदि नित्यत्व और अनित्यत्व दोनोंके साथ हो तो संशय हो सकता है, अन्यथा नहीं ।
लेकिन कार्यत्वकी व्याप्ति दोनोंके साथ नहीं हो सकती । ( १५ ) मिथ्या व्याप्तिके ऊपर अवलम्बित दूसरे
अनुमानसे दोष देना, प्रकरणसमा जाति है । जैसे, यदि अनित्य ( घट ) साधर्म्यसे कार्यत्व हेतु शब्दकी अनि-
त्यता सिद्ध करता है, तो गोत्व आदि सामान्यके साधर्म्यसे ऐन्द्रियकत्व ( इन्द्रियका विषय होना ) हेतु
नित्यताको सिद्ध करे । अतएव दोनों पक्ष समान कहलाये । यह असत्य उत्तर है, क्योंकि अनित्य और
कार्यत्वकी व्याप्ति है, लेकिन ऐन्द्रियकत्व और नित्यत्वकी व्याप्ति नहीं । ( १६ ) भूत आदि कालकी असिद्धि
प्रतिपादन कर हेतु मात्रको हेतु कहना, अहेतुसमा जाति है । जैसे, हेतु साध्यके पहले होता है, या पीछे होता
है, या साथ होता है ? पहले तो हो नहीं सकता, क्योंकि जब साध्य ही नहीं, तब साधक किस का ? न पीछे
हो सकता है, क्योंकि जब साध्य ही नहीं रहा, तब वह सिद्ध किसे करेगा ? अथवा जिस समय साध्य था,
उस समय यदि साधन नहीं था, तो वह साध्य कैसे कहलायेगा ? दोनों एक साथ भी नहीं बन सकते, क्योंकि
उस समय यह सन्देह हो सकता है कि कौन साध्य है, कौन साधक है ? जैसे, विंध्याचल से हिमालयकी और
हिमालयसे विंध्याचलकी सिद्धि करना अनुचित है, उसी तरह एक कालमें होनेवाली वस्तुओंको साध्य-साधक
ठहराना अनुचित है। यह असत्य उत्तर है, क्योंकि इस प्रकार त्रिकालकी असिद्धि प्रतिपादन करनेसे जिस हेतुके
द्वारा जातिवादीने हेतुको अहेतु ठहराया है, वह हेतु (जातिवादीका त्रिकालसिद्धि हेतु ) भी अहेतु ठहर
८४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १०
गया, जिससे जातिवादीका वक्तव्य स्वयं खण्डित हो गया। दूसरी बात यह है कि कालभेद होनेसे या अभेद
होनेसे अविनाभाव सम्बन्ध बिगड़ता नहीं है, यह बात पूर्वचर, उत्तरचर, सहचर, कार्य, कारण, आदि हेतुओंके
स्वरूपसे स्पष्ट विदित हो जाती है। जब अविनाभाव सम्बन्ध नहीं बिगड़ता, तब हेतु, अहेतु कैसे कहा जा
सकता है ? कालकी एकतासे साध्य-साधनमें सन्देह नहीं हो सकता, क्योंकि दो वस्तुओंके अविनाभावमें ही
साध्य-साधनका निर्णय होता है। अथवा दोनोंसे जो असिद्ध हो वह साध्य, और जो सिद्ध हो, उसे हेतु मान
लेनेसे संदेह मिट जाता है। ( १७ ) अर्थापत्ति दिखलाकर मिथ्या दूषण देना, अर्थापत्तिसमा जाति है। जैसे,
यदि अनित्यके साधर्म्य ( कृत्रिमता ) से शब्द अनित्य है, तो इसका मतलब हुआ कि नित्य ( आकाश ) के
साधर्म्य ( स्पर्श रहितता ) से नित्य है। यह उत्तर असत्य है, क्योंकि स्पर्श रहित होनेसे ही कोई नित्य
कहलाने लगे, तो सुख वगैरह भी नित्य कहलायेंगे। ( १८ ) पक्ष और दृष्टान्तमें अविशेषता देख कर किसी
अन्य धर्मसे सब जगह ( विपक्षमें भी ) अविशेषता दिखला कर साध्यका आरोप करना, अविशेषसमा जाति
है। जैसे, शब्द और घटमें कृत्रिमतासे अविशेषता होनेसे अनित्यता है, वैसे ही सब पदार्थोंमें सत्त्व धर्मसे
अविशेषता है, अतएव सभी ( आकाशादि-विपक्ष भी ) को अनित्य होना चाहिये। यह असत्य उत्तर है,
क्योंकि कृत्रिमताका अनित्यताके साथ अविनाभाव सम्बन्ध है, लेकिन सत्त्वका अनित्यताके साथ नहीं। ( १९ )
साध्य और साध्यविरुद्ध, इन दोनोंके कारण दिखला कर मिथ्या दोष देना, उपपत्तिसमा जाति है। जैसे, यदि
शब्दके अनित्यत्वमें कृत्रिमता कारण है तो उसके नित्यत्वमें स्पर्शरहितता कारण है। यहाँ जातिवादी अपने ही
शब्दोंसे अपने कथनका विरोध करता है। जब उसने शब्दके अनित्यत्वका कारण मान लिया तो नित्यत्वका
कारण कैसे मिल सकता है ? फिर स्पर्शरहितताकी नित्यत्वके साथ व्याप्ति नहीं है। ( २० ) निर्दिष्ट कारण
( साध्यकी सिद्धिका कारण-साधन ) के अभावमें साध्यकी उपलब्धि बताकर दोष देना, उपलब्धिसमा जाति
है। जैसे, प्रयत्नके बाद पैदा होनेसे शब्दका अनित्यत्व प्रतिपादन करना। लेकिन ऐसे बहुतसे शब्द हैं जो
प्रयत्नके बाद न होने पर भी अनित्य हैं; उदाहरणके लिए, मेघ गर्जना आदिमें प्रयत्नकी आवश्यकता नहीं
है। यह दूषण मिथ्या है, क्योंकि साध्यके अभावमें साधनके अभावका नियम है, न कि साधनके अभावमें
साध्यके अभावका। अग्निके अभावमें नियमसे धुँआ नहीं रहता, लेकिन धुँएके अभावमें नियमसे अग्निका
अभाव नहीं कहा जा सकतता। (२१) उपलब्धिके अभावमें अनुपलब्धिका अभाव कथन कर दूषण देना,
अनुपलब्धिसमा जाति है। जैसे, किसीने कहा कि उच्चारणके पहले शब्द नहीं था, क्योंकि उपलब्ध नहीं होता
था। यदि कहा जाय कि उस समय शब्दपर आवरण था, इसलिए अनुपलब्ध था, तो उसका आवरण तो
उपलब्ध होना चाहिये था। जैसे कपड़ेसे ढकी हुई कोई वस्तु भले ही दिखाई न दे लेकिन कपड़ा तो दिखाई
देता है, उसी तरह शब्दका आवरण तो उपलब्ध होना चाहिये। इसके उत्तरमें जातिवादी कहता है, जैसे
आवरण उपलब्ध नहीं होता, उसी तरह आवरणकी अनुपलब्धि ( अभाव ) भी तो उपलब्ध नहीं होती। यह
उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि आवरणकी अनुपलब्धि नहीं होनेसे ही आवरणकी अनुपलब्धि उपलब्ध हो जाती है।
(२२) एककी अनित्यतासे सबको अनित्य प्रतिपादन कर दूषण देना, अनित्यसमा जाति है। जैसे, यदि किसी
धर्मकी समानतासे शब्दको अनित्य सिद्ध किया जाये, तो सत्त्वकी समानतासे सब वस्तुएँ अनित्य सिद्ध हो
जायेंगी। यह उत्तर ठीक नहीं। क्योंकि वादी और प्रतिवादीके शब्दोंमें भी प्रतिज्ञा आदिकी समानता तो है
ही, इसलिए जिस प्रकार प्रतिवादी ( जातिका प्रयोग करनेवाला ) के शब्दोंसे वादीका खण्डन होगा, उसी
प्रकार प्रतिवादीका भी खण्डन हो जायगा। अतएव जहाँ जहाँ अविनाभाव हो, वहीं वहीं साध्यकी सिद्धि
मानना चाहिए, न कि सब जगह। (२३) अनित्यत्वमें नित्यत्वका आरोप करके खण्डन करना, नित्यसमा
जाति है। जैसे, शब्दको अनित्य सिद्ध करते हो, तो शब्दमें अनित्यत्व नित्य है, या अनित्य ? यदि अनित्यत्व
नित्य है, तो शब्द भी नित्य कहलाया ( धर्मके नित्य होनेपर धर्मीको नित्य मानना पड़ेगा )। यदि अनित्यत्व
अनित्य है, तो शब्द नित्य कहलाया। यह असत्य उत्तर हैं, क्योंकि जब शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध है, तो उसीका
अभाव कैसे कहा जा सकता है। दूसरे, इस तरह कोई भी वस्तु अनित्य सिद्ध नहीं हो सकेगी। तीसरे
अनित्यत्व एक धर्म है, यदि धर्ममें भी धर्मकी कल्पना की जायगी तो अनवस्था हो जायगो। ( २४ ) कार्यको
अन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८५
तथा विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् । तत्र विप्रतिपत्तिः साधनाभासे साधन-
बुद्धिः, दूषणाभासे च दूषणबुद्धिरिति । अप्रतिपत्तिः साधनस्यादूषणं, दूषणस्य चानुद्धरणम् ।
तच्च निग्रहस्थानं द्वाविंशतिविधम् । तद्यथा—प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरम् प्रतिज्ञाविरोधः
प्रतिज्ञासंन्यासः हेत्वन्तरम् अर्थान्तरम् निरर्थकम् अविज्ञातार्थम् अपार्थकम् अप्राप्तकालम्
न्यूनम् अधिकम् पुनरुक्तम् अननुभाषणम् अज्ञानम् अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्यो-
पेक्षणम् निरनुयोज्यानुयोगः अपसिद्धान्तः हेत्वाभासाश्च ।
तत्र हेतावनैकान्तिकीकृते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्युपगच्छतः प्रतिज्ञाहानिर्नाम
निग्रहस्थानम् । यथा अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वाद्, घटवदिति प्रतिज्ञासाधनाय वादी वदन्,
परेण सामान्यमैन्द्रियकमपि नित्यं दृष्टमिति हेतावनैकान्तिकीकृते, यद्येवं ब्रूयात् सामान्यवद्
घटोऽपि नित्यो भवत्विति, स एवं ब्रुवाणः शब्दाऽनित्यत्वप्रतिज्ञां जह्यात् । प्रतिज्ञातार्थप्रति-
षेधे परेण कृते तत्रैव धर्मिणि धर्मान्तरं साधनीयमभिदधतः प्रतिज्ञान्तरं नाम निग्रहस्थानं
भवति । अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वादित्युक्ते, तथैव सामान्येन व्यभिचारे चोदिते, यदि
ब्रूयाद् युक्तं यत् सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्, तद्धि सर्वगतम्, असर्वगतस्तु शब्द इति । तदिदं
शब्देऽनित्यत्वलक्षणपूर्वप्रतिज्ञातः प्रतिज्ञान्तरमसर्वगतः शब्द इति निग्रहस्थानम् अनया दिशा
शेषाण्यपि विंशतिर्ज्ञेयानि । इह तु न लिखितानि, पूर्वहेतोरेव । इत्येवं मायाशब्देनात्र छला-
द्वित्त्रयं सूचितम् । तदेवं परवञ्चनात्मकान्यपि छलजातिनिग्रहस्थानानि तत्त्वरूपतयोपदिशतो
अक्षपादर्षेर्वैराग्यव्यावर्णनं तमसः प्रकाशात्मकत्वप्रख्यापनमिव कथमिव नोपहसनीयम् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ १० ॥
अभिव्यक्तिके समान मानना ( क्योंकि दोनोंमें प्रयत्नकी आवश्यकता होती है ), और केवल इतनेसे ही सत्य
हेतुका खण्डन करना, कार्यसमा जाति है । जैसे, प्रयत्नके बाद शब्दकी उत्पत्ति भी होती है, और अभिव्यक्ति
( प्रगट होना ) भी, फिर शब्द को अनित्य कैसे कहा जा सकता है ? यह उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि प्रयत्नके
अनन्तर होनेका मतलब है, स्वरूप लाभ करना । और अभिव्यक्तिको स्वरूप लाभ नहीं कह सकते । प्रयत्नके
पहले यदि शब्द उपलब्ध होता, या उसका आवरण उपलब्ध होता, तो अभिव्यक्ति कही जा सकती थी १ ।'' ]
विप्रतिपत्ति और अप्रतिपत्तिको निग्रहस्थान कहते हैं । साधनाभासमें साधनकी बुद्धि और दूषणाभासमें
दूषणकी बुद्धिको विप्रतिपत्ति, अर्थात् विरुद्धप्रतिपत्ति कहते हैं । तथा प्रतिवादीके साधनको दोष रहित मान
लेना, अथवा प्रतिवादीके दूषणको दूर न करना, अप्रतिपत्ति है । निग्रहस्थान बाईस प्रकार है—१ प्रतिज्ञाहानि
२ प्रतिज्ञान्तर, ३ प्रतिज्ञाविरोध, ४ प्रतिज्ञासंन्यास, ५ हेत्वन्तर, ६ अर्थान्तर, ७ निरर्थक, ८ अविज्ञातार्थ,
९ अपार्थक, १० अप्राप्तकाल, ११ न्यून, १२ अधिक, १३ पुनरुक्त, १४ अननुभाषण, १५ अज्ञान, १६ अप्र-
तिभा, १७ विक्षेप, १८ मतानुज्ञा, १९ पर्यनुयोज्योपेक्षण, २० निरनुयोज्यानुयोग, २१ अपसिद्धान्त, २२
हेत्वाभास । ( इनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षण छह अप्रतिपत्तिसे, और
शेष सोलह विप्रतिपत्तिसे होते हैं । )
(१) प्रतिवादीद्वारा हेतुके अनैकांतिक सिद्ध किये जानेपर वादीद्वारा विरोधीके दृष्टांतका धर्म अपने
दृष्टांतमें स्वीकार किये जानेको प्रतिज्ञाहानि कहते हैं । जैसे, वादीने कहा, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि वह
इन्द्रियका विषय है, घटकी तरह' । इसपर प्रतिवादीका कथन है कि यह अनुमान अनैकांतिक हेत्वाभास है,
क्योंकि सामान्य ( जाति ) भी इन्द्रियोंका विषय है, लेकिन वह नित्य है । इससे वादीके पक्षकी पराजय होतो
है, लेकिन वादी पराजय न मान कर उत्तर देता है कि 'सामान्यकी तरह घट भी नित्य रहे' । यहाँ वादी अपनी
अनित्यत्वकी प्रतिज्ञाको छोड़ देता है । (२) प्रतिज्ञाके खण्डित होनेपर धर्मीमें दूसरे धर्मको स्वीकार करनेको,
१ दरबारीलाल न्यायतीर्थ, न्यायप्रदीप. पृ० ८०-८७