स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ स्याददृष्टमात्मनो विशेषगुणः । तच्च सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तं सर्वव्यापकं च । कथ-
मितरथा द्वीपान्तरादिष्वपि प्रतिनियतदेशवर्तिपुरुषोपभोग्यानि कनकरत्नचन्दनाङ्गनादीनि
तेनोत्पाद्यन्ते । गुणश्च गुणिनं विहाय न वर्तते । अतोऽनुमीयते सर्वगत आत्मेति । नैवम् ।
अदृष्टस्य सर्वगतत्वसाधने प्रमाणाभावात् । अथास्त्येव प्रमाणं वहेरूध्वर्ज्वलनं, वायोस्तिर्यक्-
पवनं चादृष्टकारितमिति चेत् । न । तयोस्तत्स्वभावत्वादेव तत्सिद्धेः, दहनस्य दहनशक्तिवत् ।
साप्यादृष्टकारिता चेत्, तर्हि जगत्त्रयवैचित्रीसूत्रणेऽपि तदेव सूत्रधारायतां, किमीश्वरकल्पनया ।
तन्नायमसिद्धो हेतुः । न चानैकान्तिकः । साध्यसाधनयोर्व्याप्तिग्रहणेन व्यभिचाराभावात् ।
नापि विरुद्धः । अत्यन्तं विपक्षव्यावृत्तत्वात् । आत्मगुणाश्च बुद्ध्यादयः शरीर एवोपलभ्यन्ते,
ततो गुणिनापि तत्रैव भाव्यम् । इति सिद्धः कायप्रमाण आत्मा ॥
अन्यच्च, त्वयात्मनां बहुत्वमिष्यते “नानात्मानो व्यवस्थातः१” इति वचनात् । ते च
व्यापकाः । ततस्तेषां प्रदीपप्रभामण्डलानामिव परस्परानुवेधे तदाश्रितशुभाशुभकर्मणामपि
परस्परं सङ्करः स्यात् । तथा चैकस्य शुभकर्मणा अन्यः सुखी भवेद्, इतरस्याशुभकर्मणा चान्यो
दुःखीत्यसमञ्जसमापद्येत । अन्यच्च, एकस्यैवात्मनः स्वोपार्जितशुभकर्मविपाकेन सुखित्वं, परोपा-
र्जिताशुभकर्मविपाकसम्वन्धेन च दुःखित्वमिति युगपत्सुखदुःखसंवेदनप्रसङ्गः। अथ स्वावष्टब्धं
भोगायतनमाश्रित्यैव शुभाशुभयोर्भोगः, तर्हि स्वोपार्जितमप्यदृष्टं कथं भोगायतनाद् बहि-
र्निष्क्रम्य वहेरूध्वर्ज्वलनादिकं करोति इति चिन्त्यमेतत् ॥
शंका—आत्माका अदृष्ट नामका एक विशेष गुण है । यह अदृष्ट उत्पन्न होनेवाले सब पदार्थोंमें
निमित्त कारण है, और यह सर्वव्यापक है; अन्यथा इससे दूसरे द्वीपोंमें भी निश्चित स्थानमें रहनेवाले पुरुषोंके
भोगने योग्य, सुवर्ण, रत्न, चन्दन तथा स्त्री आदि कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? यदि आत्मा सर्वव्यापक नहीं
होता, तो आत्माका अदृष्ट गुण अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं कर सकता था । गुण गुणीको छोड़कर नहीं रहते,
अतएव आत्मा सर्वव्यापक ही है । इस प्रकार आत्माके अदृष्ट गुणको सर्वत्र देखनेसे आत्माकी सर्वव्यापकता
सिद्ध होती है । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि अदृष्टके सर्वव्यापी होनेमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि
कहो कि अग्निकी शिखाका ऊँचा जाना, हवाका तिरछे बहना, यह सब अदृष्टसे ही होता है, अतएव अदृष्टका
साधक प्रमाण अवश्य है, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि अग्निका ऊँचे जाना और वायुका तिरछे बहना अदृष्टके
बलसे ही सिद्ध नहीं होता । कारण कि जैसे अग्निमें दहनशक्ति स्वभावसे ही है, उसी तरह अग्निका ऊँचा
जाना भी स्वभावसे ही मानना चाहिये, अदृष्टके बलसे नहीं । यदि कहो कि अग्निमें दहनशक्ति भी अदृष्टके
बलसे ही है, तो फिर तीनों लोकोंकी सृष्टिमें भी अदृष्टको कारण मानना चाहिए, फिर ईश्वरकी कल्पना
करनेसे कोई लाभ नहीं । अतएव 'आत्मा सर्वगत नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते,'
यह हेतु असिद्ध नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण सब जगह नहीं उपलब्ध होते । तथा, यह हेतु अनैकान्तिक भी
नहीं है, क्योंकि यहाँ 'असर्वगत' साध्यकी, 'आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते' साधनके साथ व्याप्ति
ठीक बैठती है । यह हेतु विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि 'आत्माके गुण सब जगह नहीं पाये जाते' हेतु, 'सर्व-
गतत्व' विपक्षसे अत्यंत व्यावृत्त है । तथा, आत्माके गुण बुद्धि आदि शरीरमें ही उपलब्ध होते हैं, अतएव
गुणी ( आत्मा ) को भी उसी स्थानमें रहना चाहिये । इससे सिद्ध होता है कि आत्मा शरीरके प्रमाण है ।
तथा, वैशेषिकोंने आत्माका बहुत्व स्वीकार किया है। कहा भी है—“प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न
आत्मा होनेसे आत्मा नाना हैं !” अतएव यदि ये नाना आत्मा व्यापक हैं, तो दीपकोंकी प्रभाओंके परस्पर
सम्मिश्रणकी तरह आत्माके शुभ-अशुभ कर्मोंका भी परस्पर सम्मिश्रण हो जाना चाहिये । इसलिए आत्माको
नाना और व्यापक माननेसे आत्माके भिन्न-भिन्न शुभ-अशुभ कर्मोंके एक दूसरेसे सम्मिलित हो जानेपर एकके
१. नानाभेदभिन्नानां सुखदुःखादीनां प्रत्यात्मप्रतिसंधानं व्यवस्था ।