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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 458 में से

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पृष्ठ 128

७६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ९
बताया गया है ) और केवलिसमुद्घातमें आठ समय लगते हैं। केवलिसमुद्घातमें पहले चार समयोंमें आत्माके
प्रदेश क्रमसे दण्ड, कपाट, प्रतर ( मन्थान—लोकप्रकाश ) और लोकपूर्ण होते हैं, तथा बादमें प्रतर
( मन्थान ) कपाट और दण्ड-परिमाण होकर अपने स्थानको लौट जाते हैं। यहाँ केवलिसमुद्घात अवस्थामें
ही आत्माको सर्वव्यापक कहा है। ) स्याद्वाद रूपी मंत्रके कवचसे अवगुण्ठित हम लोगों को इस प्रकार की
विभीषिकाओंका भय नहीं है। यह श्लोकका अर्थ है।
भावार्थ—इस श्लोकमें आत्माके सर्वव्यापकत्वका खंडन किया गया है। अनुमान—'जहाँ जिस
वस्तुके गुण पाये जाते हैं, वह वस्तु उसी जगह उपलब्ध होती है, जैसे जहाँ घटके रूपादि गुण पाये जाते हैं,
वहीं पर घट उपलब्ध होता है।'
शंका—पुष्पके एक स्थानमें रहनेपर भी उसकी गंध दूसरे स्थानमें भी देखी जाती है। समा-
धान—दूर देशमें पाये जानेवाली गंध पुष्पका गुण नहीं है, पुष्पमें रहनेवाले गंध पुद्गल ही उड़कर हमारी
नाक तक आते हैं।
शंका—मंत्र आदि दूर स्थानसे भी मारण, उच्चाटन आदि क्रिया करते हैं। समाधान—मारण,
उच्चाटन मंत्रका गुण नहीं हैं, परन्तु मंत्रके अधिष्ठाता देव ही मारण आदि क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं।
इसलिए 'आत्मा व्यापक नहीं हैं, क्योंकि आत्माके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते । जिसके गुण सर्वत्र उपलब्ध
नहीं होते, वह व्यापक नहीं होता, जैसे घटके गुण सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते, इसलिए घट व्यापक नहीं है।
आत्माके गुण भी सर्वत्र नहीं पाये जाते, इसलिए आत्मा भी व्यापक नहीं है। आकाश व्यापक है, इसलिये
आकाशके गुण सर्वत्र पाये जाते हैं।'
शंका—अदृष्ट आत्माका गुण है। यह अदृष्ट दूर स्थानमें भी क्रिया करता है। यदि आत्माको सर्व-
व्यापक न मानें, तो अदृष्ट दूर देशमें क्रिया नहीं कर सकता। समाधान—अदृष्टके माननेकी कोई आवश्य-
कता नहीं है। अदृष्टकी सिद्धिमें हमें कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। अग्निकी शिखाका ऊँचा जाना आदि
कार्य वस्तुओंके स्वभावसे ही होते हैं। यदि अदृष्टसे सत्र कार्य होने लगें, तो फिर ईश्वरकी भी कोई आवश्य-
कता न रहे। तथा, आत्माको सर्वव्यापक मानकर उसे नाना स्वीकार करनेमें आत्माओंमें परस्पर भिड़न्त हो
जानी चाहिये, और एक आत्माका सुख दूसरी आत्माको उपभोग करना चाहिये। तथा, सर्वव्यापक आत्माको
ईश्वरकी आत्मामें प्रवेश करना चाहिए, इसलिए या तो ईश्वर भी सृष्टिकर्ता न रहेगा, अथवा आत्मा भी
सृष्टिकर्ता हो जायेगा।
शंका—यदि आत्माको व्यापक न मानें तो आत्मा अपने दूसरे जन्मके शरीरके योग्य परमाणुओंको
अपनी ओर कैसे आकर्षित कर सकता है ? यदि किसी तरह वह अपने शरीरके योग्य परमाणुओंको आकर्षित
कर भी ले, तो भी आत्मा शरीर-परिमाण ही ठहरेगा, इसलिए आत्माको सावयव होनेसे कार्य ( अनित्य )
मानना चाहिये। समाधान—जैन लोग आत्माको सावयव मानते हैं, इसलिए आत्मामें परिमाण भी होता
है। हम लोग किसी भी पदार्थको एकान्त नित्य नहीं मानते।
शंका—यदि आत्मा शरीर-परिमाण हैं, तो वह शरीरमें प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि एक मूर्त
पदार्थका दूसरे मूर्त पदार्थमें प्रवेश नहीं हो सकता। समाधान—मूर्तत्वसे यदि आप लोगोंका अभिप्राय
रूपादिको धारण करनेवालेसे है, तो हम लोग आत्माको रूप आदिसे युक्त नहीं मानते। हाँ, यदि अव्यापकत्व-
को आप लोग मूर्त कहते हैं, तो हम आत्माको अवश्य शरीर-परिमाण मानते हैं। अतएव जैनसिद्धान्त के
अनुसार आत्मा द्रव्यकी अपेक्षा नित्य है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य ।