स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक ९ ] स्याद्वादमञ्जरी ७१
अथास्तु यथाकथञ्चिच्छरीरोत्पत्तिः, तथापि सावयवं शरीरं प्रत्यवयवमनुप्रविशन्नात्मा
सावयवः स्यात् । तथा चास्य पटादिवत् कार्यत्वप्रसङ्गः । कार्यत्वे चासौ विजातीयैः सजाती-
यैर्वा कारणैरारभ्येत । न तावद्विजातीयैः तेषामनारम्भकत्वात् । न हि तन्तवो घटमारभन्ते ।
न च सजातीयैः । यत आत्मत्वाभिसम्बन्धादेव तेषां कारणानां सजातीयत्वम् । पार्थिवादि-
परमाणूनां विजातीयत्वात् । तथा चात्मभिरात्मा आरभ्यत इत्यायातम् । तच्चायुक्तम् । एकत्र
शरीरेऽनेकात्मनामात्मारम्भकाणामसम्भवात् । सम्भवे वा प्रतिसन्धानानुपपत्तिः । न हि
अन्येन दृष्टमन्यः प्रतिसन्धातुमर्हति, अतिप्रसङ्गात् । तदारभ्यत्वे चास्य घटवदवयवक्रियातो
विभागात् संयोगविनाशाद् विनाशः स्यात् । तस्माद् व्यापक एवात्मा युज्यते । कायप्रमाणता-
यामुक्तदोषसद्भावादिति चेत् । न । सावयवत्वकार्यत्वयोः कथञ्चिदात्मन्यभ्युपगमात् । तत्र
सावयवत्वं तावद् असंख्येयप्रदेशात्मकत्वात् । तथा च द्रव्यालङ्कारकारः—"आकाशोऽपि
सदेशः, सकृत्सर्वमूर्त्ताभिसम्बन्धार्हत्वात्" इति । यद्यप्यवयवप्रदेशयोर्गन्धहस्त्यादिषु भेदोऽस्ति
तथापि नात्र सूक्ष्मेक्षिक्या चिन्त्या । प्रदेशेष्ववयवव्यवहारात् । कार्यत्वं तु वक्ष्यामः ॥
( विभाग ) दूसरे प्रदेशसे संयुक्त ( संयोग ) होते हैं । इस तरह आकाशके प्रदेशमें परमाणुओंके इकट्ठे होनेसे
द्वयणुक, त्र्यणुक आदि कार्य होते हैं । यदि आत्माको सर्वव्यापक न मानें, तो उसका परमाणुओंके साथ
सम्बन्ध न हो सकेगा, इसलिए वह परमाणुओंमें कोई क्रिया नहीं कर सकती, अतः क्रियाका अभाव
होगा । क्रियाका अभाव होनेसे परमाणुका आकाशके प्रदेशोंसे विभाग और संयोग नहीं बन सकता, इसलिये
जिन द्वयणुक, त्र्यणुक आदि अवयवोंका संयोग होनेसे शरीर बनता है, उस अन्त्य-संयोगका भी अभाव होगा ।
अतएव अन्त्य-संयोगसे होनेवाले शरीरका भी अभाव हो जाना चाहिये । तथा शरीरका अभाव ही मोक्ष है,
अतएव आत्माको सर्वव्यापक न माननेसे सब जीवोंको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायेगी ।) समाधान—
यह ठीक नहीं । क्योंकि यह नियम नहीं कि जो जिसके साथ संयुक्त हो, वह उसके प्रति आकर्षित होता ही
हो । चुम्बक और लोहके परस्पर संयुक्त न होनेपर भी उनमें आकर्षण देखा जाता है । इसलिए जैसे लोहे
और चुम्बकका संयोग नहीं है, फिर भी उनमें आकर्षण होता है, वैसे ही आत्मा और परमाणुओंका संयोग
न होनेपर भी आत्मा परमाणुओंको आकर्षित कर सकता है, उसे सर्वव्यापक माननेकी आवश्यकता नहीं ।
शंका—यदि बिना संयोगके भी आत्माका परमाणुओंके प्रति आकर्षण हो, तो आत्माको बनानेवाले प्रत्येक
मुखीभूत त्रिभुवनके उदरवर्ती परमाणुओंके प्रति आत्माका आकर्षण होनेसे न जाने आत्माको कितने महत्
परिमाणवाला मानना होगा । समाधान—वैशेषिक लोगोंके मतमें आत्माके साथ संयुक्त पदार्थोंका आकर्षण
माननेपर भी उक्त दोष वैसा ही रहता है । क्योंकि आत्माके व्यापक होनेसे उसका सम्पूर्ण परमाणुओंके साथ
सम्बन्ध रहता ही है । शंका—अदृष्टके बलसे शरीरके उत्पन्न करनेके अनुकूल नियत परमाणु ही आत्माके
प्रति आकर्षित होते हैं । समाधान—लेकिन यही बात असंयुक्त परमाणुओंके साथ आत्माका सम्बन्ध
माननेमें भी कही जा सकती है ।
शंका—शरीरकी उत्पत्ति चाहे संयुक्त परमाणुओंसे हो, अथवा असंयुक्त परमाणुओंसे, परन्तु शरीर
अवयव सहित है । अतएव शरीरके प्रत्येक अवयवमें प्रवेश करनेसे आत्माको भी सावयव मानना चाहिये ।
जैसे पट आदि सावयव होनेसे कार्य हैं, वैसे ही आत्माको भी सावयव होनेसे कार्य मानना चाहिये । तथा,
यदि आत्मा कार्य है, तो वह सजातीय कारणोंसे बनती है, अथवा विजातीय कारणोंसे ? आत्मा विजातीय
कारणोंसे नहीं बन सकती, क्योंकि विजातीय कारणोंसे कोई भी कार्य नहीं होता है; उदाहरणके लिये,
तन्तुओंसे घड़ा नहीं बन सकता । आत्मा सजातीय कारणोंसे भी उत्पन्न नहीं हो सकती । क्योंकि पार्थिव आदि
परमाणु विजातीय हैं, इसलिये सजातीय कारण आत्माके सम्बन्धसे ही सजातीय कहे जा सकते हैं । अर्थात्
जिन कारणोंसे आत्माका सम्बन्ध हो, वे ही कारण आत्माके सजातीय हो सकते हैं । अतएव यह अर्थ निकला
कि आत्माओंसे आत्मा उत्पन्न किया जाता है । परन्तु जैन लोगोंको यह मान्य नहीं है । क्योंकि एक ही