स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक १० ] स्याद्वादमञ्जरी ८५
तथा विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् । तत्र विप्रतिपत्तिः साधनाभासे साधन-
बुद्धिः, दूषणाभासे च दूषणबुद्धिरिति । अप्रतिपत्तिः साधनस्यादूषणं, दूषणस्य चानुद्धरणम् ।
तच्च निग्रहस्थानं द्वाविंशतिविधम् । तद्यथा—प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरम् प्रतिज्ञाविरोधः
प्रतिज्ञासंन्यासः हेत्वन्तरम् अर्थान्तरम् निरर्थकम् अविज्ञातार्थम् अपार्थकम् अप्राप्तकालम्
न्यूनम् अधिकम् पुनरुक्तम् अननुभाषणम् अज्ञानम् अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्यो-
पेक्षणम् निरनुयोज्यानुयोगः अपसिद्धान्तः हेत्वाभासाश्च ।
तत्र हेतावनैकान्तिकीकृते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्युपगच्छतः प्रतिज्ञाहानिर्नाम
निग्रहस्थानम् । यथा अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वाद्, घटवदिति प्रतिज्ञासाधनाय वादी वदन्,
परेण सामान्यमैन्द्रियकमपि नित्यं दृष्टमिति हेतावनैकान्तिकीकृते, यद्येवं ब्रूयात् सामान्यवद्
घटोऽपि नित्यो भवत्विति, स एवं ब्रुवाणः शब्दाऽनित्यत्वप्रतिज्ञां जह्यात् । प्रतिज्ञातार्थप्रति-
षेधे परेण कृते तत्रैव धर्मिणि धर्मान्तरं साधनीयमभिदधतः प्रतिज्ञान्तरं नाम निग्रहस्थानं
भवति । अनित्यः शब्दः, ऐन्द्रियकत्वादित्युक्ते, तथैव सामान्येन व्यभिचारे चोदिते, यदि
ब्रूयाद् युक्तं यत् सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्, तद्धि सर्वगतम्, असर्वगतस्तु शब्द इति । तदिदं
शब्देऽनित्यत्वलक्षणपूर्वप्रतिज्ञातः प्रतिज्ञान्तरमसर्वगतः शब्द इति निग्रहस्थानम् अनया दिशा
शेषाण्यपि विंशतिर्ज्ञेयानि । इह तु न लिखितानि, पूर्वहेतोरेव । इत्येवं मायाशब्देनात्र छला-
द्वित्त्रयं सूचितम् । तदेवं परवञ्चनात्मकान्यपि छलजातिनिग्रहस्थानानि तत्त्वरूपतयोपदिशतो
अक्षपादर्षेर्वैराग्यव्यावर्णनं तमसः प्रकाशात्मकत्वप्रख्यापनमिव कथमिव नोपहसनीयम् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ १० ॥
अभिव्यक्तिके समान मानना ( क्योंकि दोनोंमें प्रयत्नकी आवश्यकता होती है ), और केवल इतनेसे ही सत्य
हेतुका खण्डन करना, कार्यसमा जाति है । जैसे, प्रयत्नके बाद शब्दकी उत्पत्ति भी होती है, और अभिव्यक्ति
( प्रगट होना ) भी, फिर शब्द को अनित्य कैसे कहा जा सकता है ? यह उत्तर ठीक नहीं है, क्योंकि प्रयत्नके
अनन्तर होनेका मतलब है, स्वरूप लाभ करना । और अभिव्यक्तिको स्वरूप लाभ नहीं कह सकते । प्रयत्नके
पहले यदि शब्द उपलब्ध होता, या उसका आवरण उपलब्ध होता, तो अभिव्यक्ति कही जा सकती थी १ ।'' ]
विप्रतिपत्ति और अप्रतिपत्तिको निग्रहस्थान कहते हैं । साधनाभासमें साधनकी बुद्धि और दूषणाभासमें
दूषणकी बुद्धिको विप्रतिपत्ति, अर्थात् विरुद्धप्रतिपत्ति कहते हैं । तथा प्रतिवादीके साधनको दोष रहित मान
लेना, अथवा प्रतिवादीके दूषणको दूर न करना, अप्रतिपत्ति है । निग्रहस्थान बाईस प्रकार है—१ प्रतिज्ञाहानि
२ प्रतिज्ञान्तर, ३ प्रतिज्ञाविरोध, ४ प्रतिज्ञासंन्यास, ५ हेत्वन्तर, ६ अर्थान्तर, ७ निरर्थक, ८ अविज्ञातार्थ,
९ अपार्थक, १० अप्राप्तकाल, ११ न्यून, १२ अधिक, १३ पुनरुक्त, १४ अननुभाषण, १५ अज्ञान, १६ अप्र-
तिभा, १७ विक्षेप, १८ मतानुज्ञा, १९ पर्यनुयोज्योपेक्षण, २० निरनुयोज्यानुयोग, २१ अपसिद्धान्त, २२
हेत्वाभास । ( इनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षण छह अप्रतिपत्तिसे, और
शेष सोलह विप्रतिपत्तिसे होते हैं । )
(१) प्रतिवादीद्वारा हेतुके अनैकांतिक सिद्ध किये जानेपर वादीद्वारा विरोधीके दृष्टांतका धर्म अपने
दृष्टांतमें स्वीकार किये जानेको प्रतिज्ञाहानि कहते हैं । जैसे, वादीने कहा, 'शब्द अनित्य है, क्योंकि वह
इन्द्रियका विषय है, घटकी तरह' । इसपर प्रतिवादीका कथन है कि यह अनुमान अनैकांतिक हेत्वाभास है,
क्योंकि सामान्य ( जाति ) भी इन्द्रियोंका विषय है, लेकिन वह नित्य है । इससे वादीके पक्षकी पराजय होतो
है, लेकिन वादी पराजय न मान कर उत्तर देता है कि 'सामान्यकी तरह घट भी नित्य रहे' । यहाँ वादी अपनी
अनित्यत्वकी प्रतिज्ञाको छोड़ देता है । (२) प्रतिज्ञाके खण्डित होनेपर धर्मीमें दूसरे धर्मको स्वीकार करनेको,
१ दरबारीलाल न्यायतीर्थ, न्यायप्रदीप. पृ० ८०-८७