सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
४१४ सूर्य-सिद्धान्त
परन्तु हमें द च दा कोण के जानने की आवश्यकता नहीं है । हमको तो द
या दा से च का लम्बन जानना है अर्थात् हमको द च भ या दा च भ कोण जानना
है जो द और दा से च के लम्बन हैं । मान लो द च भ = ल और दा च भ = ला
और द च दा = च । अब
ज्या ल = ज्या न × भ द / भ च
ज्या ला = ज्या ना × भ दा / भ च = ज्या ना × भ द / भ च
क्योंकि भ द और भ दा दोनों पृथ्वी की त्रिज्याएँ हैं इसलिए समान मानी
जा सकती हैं । इसलिए
ज्या ल / ज्या न = ज्या ला / ज्या ना
अथवा ज्या ला = ज्या ला × ज्या न / ज्या ना
परन्तु ल = च - ला
∴ ज्या ( च - ला ) = ज्या ला × ज्या न / ज्या ना
[Diagram:
च at top vertex.
ख on upper-left ray from center/surface.
खा on upper-right ray from center/surface.
Points on circle / geometry: द, व, दा, उ, भ (center), वा (bottom).
]
चित्र ८०
त्रिप्रश्नाधिकार ४१५
⸫ ज्या च कोज्या ला — कोज्या च ज्या ला = ज्या ला ✕ ज्या न
—————
ज्या ना
यदि इस समीकरण के प्रत्येक पक्ष को ज्या च ज्या ला से भाग दिया
जाय तो
कोस्परे ला — को स्परे च = ज्या न
———————
ज्या च ज्या ना
अथवा कोस्परे ला = कोस्परे च + ज्या त
———————
ज्या च ज्या ना
इस प्रकार यह सिद्ध है कि यदि दो स्थानों से किसी ग्रह का नतांश वेध करके
जान लिया जाय तो उन स्थानों के अक्षांशों के ज्ञान से द च दा कोण अर्थात् च की
जानकारी हो सकती है। फिर च से ला की जानकारी उपर्युक्त समीकरण से की
जा सकती है।
यह तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रमा को छोड़कर अन्य ग्रहों के लम्बन बहुत छोटे
होते हैं इसलिए यदि इनके लम्बनों की ज्याओं के स्थान में इनके धनु ही रखे जायें
तो कोई हानि नहीं हो सकती। ऐसी दशा में
ज्या ( च — ला ) = ज्या ला ✕ ज्या न की जगह
—————
ज्या ना
च — ला = ला ✕ ज्या न लिखा जा सकता है।
—————
ज्या ना
⸫ च = ला + ला ✕ ज्या न
—————
ज्या ना
= ला ( १ + ज्या न )
—————
ज्या ना
= ला ✕ ज्या ना + ज्या न
————————————————
ज्या ना
⸫ ला = च ज्या ना
———————————————
ज्या न + ज्या ना
= च ज्या ना
—————————————————————————————————————
२ ज्या न + ना कोज्या न — ना (क)
—————— ——————
२ २
इस सूत्र से किसी ग्रह का वेध करके उसका साधारण लम्बन या क्षितिज
लम्बन जाना जा सकता है क्योंकि यदि क्षितिज लम्बन लि हो तो
४१६ सूर्य-सिद्धान्त
ज्या लि = ज्या ला / ज्या ना
अथवा लि = ला / ज्या ना (ख)
समीकरण (क) और (ख) को एकत्र करने से
लि = च / [२ ज्या (न+ना)/२ कोज्या (न-ना)/२] = च / [ज्या न + ज्या ना]
उदाहरण -- यदि द स्थान का उत्तर अक्षांश ५६°२०'३०" और दा का
दक्षिण अक्षांश ३३°५५'५" हो तथा द और दा से मंगल ग्रह के यामोत्तर नतांश
६८°१४'६" और २५°२' हो तो मंगल का क्षितिज लम्बन क्या है ?
द भ दा = ५६°२०'३०" + ३३°५५'५" = ६३°१५'३५"
न+ना = ६८°१४'६" + २५°२' = ६३°१६'६"
∵ च = द च दा = न + ना - द भ दा
= ६३°१६'६" - ६३°१५'३५"
= ३१"
ज्या न = ज्या ६८°१४'६" = .६२८७
ज्या ना = ज्या २५°२' = .४२३१
∵ ज्या न + ज्या ना = १·३५१८
∵ क्षितिज लंबन लि = ३१" / १·३५१८ = २२"·६३
यह प्रकट है कि इस रीति से च का मान जानने के लिए हमको दो स्थानों
के अक्षांश जानना आवश्यक है। परन्तु यदि हम यह देखें कि जिस समय ग्रह
यामोत्तर वृत्त पर है उस समय वह किसी पासवाले तारे से कितना ऊपर या नीचे
दोनों स्थानों से देख पड़ता है तो च का मान सहज ही जाना जा सकता है। मान
लो कि चित्र ८१ में च ग्रह का स्थान है और त उसी के पास वाले किसी तारे का
स्थान है। द से देखने पर त से च का अन्तर त द च कोण के समान है और दा
से इन दोनों का अन्तर त दा च कोण के समान है।
इसलिए द च दा = त द च + त दा च + द त दा
परन्तु तारा त इतनी दूर होता है कि द त दा कोण शून्य के समान होता
है। इसलिए
द च दा = त द च + त दा च
त्रिप्रश्नाधिकार ४१७
चित्र ८१
इस चित्र में द स्थान से, त से नीचे च देख पड़ता है और दा स्थान से त
से ऊपर च देख पड़ता है। इसलिए च और त के अन्तरों का योग किया गया है।
यदि दोनों स्थानों से, त के एक ही ओर च देख पड़े तो त द च और त दा च
कोणों का अन्तर द च दा कोण के समान होता है।
व्यवहार में ठीक एक ही देशान्तर रेखा के दो स्थानों से किसी ग्रह या तारे
का वेध लेना कठिन है। परन्तु यदि दो स्थान ऐसे हों जिसके देशान्तरों के थोड़ा
ही भेद हो तो भी उपर्युक्त नियम लागू हो सकता है क्योंकि इससे जो अशुद्धि होगी
वह नहीं के समान होगी।
केवल चन्द्रमा और मङ्गल ग्रह का लम्बन जानने के लिए यह रीति काम
में लायी जा सकती है। मङ्गल के लिए भी यह रीति तभी शुद्ध हो सकती है जब
वह पृथ्वी के बहुत पास हो अर्थात् सूर्य से ६ राशि के लगभग दूर हो। अन्य दूर के
ग्रहों के लिए यह रीति उपयोगी नहीं है क्योंकि जब लंबन १० या १२ विकला से
२७
४१८ सूर्य-सिद्धान्त
कम होता है तब इस रीति से काम लेने में वेध करने की कुछ भूलें ऐसी रह जाती
हैं जिनसे फल बहुत अशुद्ध हो जाता है । चन्द्रमा इतने पास है कि यदि पृथ्वी को
पूर्ण गोल मानना जाय जैसा कि उपर्युक्त नियम के लिए भ द और भ दा समान समझ
लिये गये हैं तो भी कुछ स्थूलता रह जाती है। इसलिए चन्द्रमा का लंबन जानने के
लिए भ द को भ दा के समान न समझ कर इनका यथार्थ परिमाण लेना पड़ेगा । यदि
ज्या ल की जगह ल और ज्या ला की जगह ला रखा जाय तो ४१४ पृष्ठ के अनुसार.
भ द
ल = ――― × ज्या न
भ च
भ दा
ला = ――― × ज्या न
भ च
भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना
∴ च = ल + ला = ―――――――――――――――――
भ च
त्र
परन्तु क्षितिज लम्बन लि = ――― जहां त्र = पृथ्वी की त्रिज्या
भ च
त्र
∴ भ च = ――
लि
त्र
∴ च × ―― = भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना
लि
च × त्र
∴ लि = ――――――――――――――
भ द × ज्या न + भ दा × ज्या न
यहाँ न और ना चन्द्रमा के यथार्थ नतांश हैं। यदि भौगोलिक या स्पष्ट
नतांश के अनुसार लि का मान जानना हो तो पृष्ठ ३८३ में बतलायी गयी
रीति से भौगोलिक नतांश से यथार्थ मतांश जान लेना चाहिए। उपर्युक्त सूत्र से यह
सिद्ध होता है कि द्रष्टा के स्थान में भिन्नता होने से क्षितिज लंबन में भिन्नता होती
है क्योंकि भ द और भ दा बदलते रहेंगे। यह बात वेध से भी देखी गयी है कि
भिन्न-भिन्न स्थानों में चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन भिन्न-भिन्न देख पड़ता है । यह
इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है वरन् अंडाकार है ।
सूर्य का लम्बन उपर्युक्त रीति से नहीं जाना जा सकता । इसके लिए कई
रीतियां काम में लायी जाती हैं जिनमें से दो नीचे लिखी जाती हैं :-
पहली रीति — भूतल पर दो स्थान द और दा ऐसे चुने जाते हैं जो विषवत्
रेखा के निकट हैं और परस्पर बहुत दूर हैं। सरलता के लिए यह भी मान लो कि
शुक्र की कक्षा शु शु और सूर्य भी विषुवत् रेखा के तल पर है जिस तल पर द, दा
विप्रश्नाधिकार ४१६
स्थान हैं। द, दा स्थानों से सूर्य के स बिन्दु तक दो स्पर्शरेखाएं द स और दा स
खींचो। द स्थान का द्रष्टा यह ध्यान से देखता है कि शुक्र शु किस समय सूर्य बिम्ब
के सामने पहुँच कर उसको भीतर से स्पर्श करता है। इसी प्रकार दा स्थान का द्रष्टा
शुक्र और सूर्यबिम्ब के भीतरी स्पर्श का समय ध्यान से देख लेता है। इन दोनों
४२० सूर्य-सिद्धान्त
वेधों के समय में जो अन्तर होता है उतने ही समय में शुक्र शु बिन्दु से शू बिन्दु पर
अपनी कक्षा में जाता है अर्थात् उतने ही समय में शुक्र सूर्य की परिक्रमा शु स शू
कोण के समान करता हुआ देख पड़ता है । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि सूर्य के
चारों ओर जाने वाली शुक्र की यह गति शुक्र और पृथ्वी की गतियों के अन्तर के
समान है । परंतु हमको मालूम है कि शुक्र और पृथ्वी दोनों कितने समय में सूर्य की
परिक्रमा करती हुई एक रेखा में आ जाती है, इसलिए शु स शू या द स दा कोण का
परिमाण जाना जा सकता है । जब यह मालूम हो गया कि सूर्यबिम्ब के एक बिन्दु
पर भूतल के दो स्थानों से कितना कोण बनता है तब चित्र ८० और ८१ में
बतलायी गयी रीति से यह सहज ही जाना जा सकता है कि सूर्य का क्षितिज लम्बन
क्या है ।
व्यवहार में यह रीति इतनी सुविधाजनक नहीं है जितनी देख पड़ती है
क्योंकि शुक्र और पृथ्वी की कक्षाएँ एक ही तल में नहीं हैं, दूसरे द, दा स्थानों के
देशान्तरों को बहुत ही शुद्धतापूर्वक जानने की आवश्यकता है। यह रीति डीलिस्ले
(Delisle) ने चलायी थी।
दूसरी रीति—इस रीति में द्रष्टा के स्थानों के देशान्तरों के जानने की
आवश्यकता ही नहीं पड़ती । यहाँ तो केवल यह देखा जाता है कि दो भिन्न-भिन्न
स्थानों से शुक्र कितनी देर तक सूर्यबिम्ब के सम्मुख एक किनारे से दूसरे किनारे
तक जाता हुआ देख पड़ता है। इस काम के लिए दो द्रष्टाओं के स्थान परस्पर बहुत
दूर परन्तु उत्तर दखिन होने चाहिए।
मान लो कि शु शुक्र और द दा भूतल पर द्रष्टा के दो स्थान एक ही तल पर
अर्थात् कागज के तल पर हैं और सूर्य का बिम्ब प्रकट करने वाला वृत्त जिसका केन्द्र
स है इस तल के समकोण पर है। दा स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि शुक्र अपनी
कक्षा में तीर की दिशा में चलता हुआ सूर्य बिम्ब को क ख रेखा में काटता हुआ
जाता है। परन्तु द स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि सूर्य के बिम्ब को शुक्र ग घ
रेखा में काटता हुआ जाता है। जितनी देर में शुक्र सूर्य के सामने एक किनारे से
दूसरे किनारे तक जाता हुआ देख पड़ता है वह समय प्रत्येक स्थान से ध्यानपूर्वक
देख कर लिख लेना चाहिए। शुक्र जिस गति से सूर्य के बिम्ब को काटता हुआ
निकल जाता है उसकी गणना सहज ही की जा सकती है। यह १ मिनट में ४
विकला के लगभग होती है। इसलिए जब यह मालूम है कि शुक्र क ख या ग घ
रेखाओं को कितने समय में पार करता है तब इन रेखाओं के विकलात्मक मान सहज
ही और बहुत शुद्धतापूर्वक जाने जा सकते हैं। इसलिए क ख और ग घ चापों के
त्रिप्रश्नाधिकार ४२१
चित्र ८३
आधे भागों के भी परिमाण जाने जा सकते हैं । परन्तु सूर्य बिम्ब का कोणात्मक
मान विकलाओं में मालूम ही रहता है । इसलिए स च और स छ के विकलात्मक
मान भी जाने जा सकते हैं क्योंकि रेखागणित के अनुसार-
२२ सूर्य-सिद्धान्त
स छ² = स घ² - घ छ²
और स च² = स ख² - ख च²
स च और स छ की जानकारी हो जाने पर इन दोनों का अन्तर निकाल लेने
से हमको च छ का ज्ञान हो जाता है। इससे च छ की दूरी मीलों में भी मालूम हो
सकती है क्योंकि यदि दोनों त्रिभुज द शु दा और च शु छ सजातीय (Similar)
समझ लिये जायें तो
च छ शु छ
------ = ------
द दा शु द
परन्तु शु छ और शु द का सम्बन्ध हमें केपलर के नियमों से मालूम है क्योंकि
शु छ शुक्र से सूर्य की दूरी है और शु द शुक्र से पृथ्वी की दूरी है। इसलिए यदि शु
छ ७२३ और शु द २७७ हो तो
च छ ७२३
------ = ------
द दा २७७
द दा पृथ्वी तल के दो स्थान हैं इसलिए इनकी परस्पर दूरी सहज ही जानी
जा सकती है। इस प्रकार च छ का परिमाण मीलों में भी जाना जा सकता है।
परन्तु उपर्युक्त रीति से च छ का परिमाण विकलाओं में भी जाना जा सकता है।
इसलिए जब इसका परिमाण विकलाओं और मीलों दोनों में मालूम है तब यह सहज
ही जाना जा सकता है कि सूर्य पृथ्वी से कितनी दूर है क्योंकि
च छ का विकलात्मक मान च छ का मान मीलों में
--------------------- = ----------------------
२०६२६५ पृथ्वी से सूर्य की दूरी
२०६२६५ × च छ का मान मीलों में
∴ पृथ्वी से सूर्य की दूरी = ---------------------------------
च छ का मान विकलाओं में
इससे सूर्य का लंबन सहज ही जाना जा सकता है। हैली (Hally) ने
१७७३ वि० में इस रीति का आविष्कार किया था। इन दोनों रीतियों में यह दोष
है कि शुक्र और सूर्य के बिम्बों के भीतरी स्पर्श का समय ठीक-ठीक वेध करना बड़ा
कठिन होता है। शुक्र की गति इतनी मन्द होती है और सूर्य के बिम्ब का किनारा
इतना अस्पष्ट होता है कि स्पर्शकाल के समय में कई असुओं का अन्तर पड़
सकता है।
क्षितिज लम्बन जानकर सूर्य और चन्द्रमा की दूरी जानना—यह बतलाया
गया है कि क्षितिज लंबन की ज्या = त्र ÷ क, जहाँ त्र पृथ्वी की त्रिज्या और क
भूकेन्द्र से ग्रह की दूरी है।
त्रिप्रश्नाधिकार ४२३
$\because$ कं = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{क्षितिज लम्बन की ज्या}$
क्षितिज लम्बन की ज्या को कलाओं और विकलाओं में प्रकट करने से सुविधा
होती है इसलिए पृथ्वी की त्रिज्या को भी कलाओं और विकलाओं में लिखना
चाहिए। यह बतलाया गया है कि
त्रिज्या $\times$ २ $\times$ ३.१४१५९ = परिधि = ३६०°
$\therefore$ त्रिज्या = $\frac{३६०°}{२\times३.१४१५६}$ = ५७°.२९५७७९५
= ३४३७'.७४६७७
= २०६२६४''.८०६२
= २०६२६५''
सूर्य का मध्यम क्षितिज लम्बन = ८''.८०
$\therefore$ सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{८.८}$
= २३४३६ पृथ्वी की त्रिज्याओं में
यह दूरी पृथ्वी की त्रिज्याओं में है जिसका विषुवद्वृत्तीय मान ३९६३.३
मील है । इसलिए सूर्य की दूरी = २३४३६ $\times$ ३९६३.३ मील = ९२८९५७८६
मील ।
चंद्रमा का मध्यम क्षितिज लम्बन = ५७'१''.८ = ३४२२''
$\therefore$ चंद्रमा की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{३४२२}$
= ६०.३ पृथ्वी की त्रिज्याओं में
= ६०.३ $\times$ ३९६३.३ = २३८६८७ मील
सूर्य और चन्द्रमा के विस्तार—यदि किसी आकाशीय पिंड का कोणात्मक
अर्द्धव्यास वेध से जान लिया जाय और उसका लम्बन भी ज्ञात हो तो उसका विस्तार
भी जाना जा सकता है क्योंकि
कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या = $\frac{पिंड की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$
लम्बन की ज्या = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$
$\therefore$ $\frac{पिण्ड की त्रिज्या}{पृथ्वी की त्रिज्या}$ = $\frac{पिण्ड की कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या}{पिण्ड की लंबन की ज्या}$
४२४ सूर्य-सिद्धान्त
सूर्य का अर्द्धव्यास १६' और लम्बन ८".८ है, इसलिए
सूर्य की त्रिज्या १६' ९६०
──────── = ──── = ─── = १०६
पृथ्वी की त्रिज्या ८".८ ८.८
∴ सूर्य की त्रिज्या = १०६ × पृथ्वी की त्रिज्या
= १०६ × ३९६३.३ मील
= ४३१६६६.७ मील
= ४३२००० मील
चन्द्रमा का अर्द्धव्यास १५' ३६".६ और लम्बन ५७' १".८ है
ज्या १५' ३६".६
इसलिए चंद्रमा की त्रिज्या = पृथ्वी की त्रिज्या × ──────────
ज्या ५७' १".८
१५' ३६".६
= पृथ्वी की त्रिज्या × ────────
५७' १".८
= ३९६३.३ × .२७५
= १०८६.६
= १०९० मील
चित्र ८४ में ∠ प भ च = चंद्रमा का कोणात्मक अर्द्धव्यास
∠ भ च द = चंद्रमा का लम्बन
प च = चंद्रमा की त्रिज्या
भ द = पृथ्वी की त्रिज्या
वार्षिक लम्बन
वार्षिक लम्बन—यह बतलाया गया है कि तारे हमसे इतनी दूर हैं कि
भूतल के किसी दो स्थानों से देखने पर इनके लम्बन का पता नहीं लग सकता।
परन्तु यदि पूरे वर्ष भर तक किसी तारे का वेध किया जाय तो पृथ्वी की वार्षिक-
गति के कारण एक ही द्रष्टा से स्थानों में बहुत अंतर पड़ता जाता है जिससे देख
पड़ता है कि तारे में भी कुछ लम्बन होता है। यह अभी सिद्ध हुआ है कि पृथ्वी से
सूर्य की दूरी ६,३०,००००० मील के लगभग है। यह विदित ही है कि पृथ्वी एक
वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है। इस लिए ६ मास में पृथ्वी आधा परिक्रमा
करती है। अब यदि किसी तारे का वेध किसी दिन किया जाय और
फिर ६ महीने के बाद उसी तारे का वेध किया जाय तो द्रष्टा के स्थानों
का अन्तर १८,६०,००,००० मील हो जाता है जिससे तारे की दिशा में कुछ
परिवर्तन देख पड़ता है। यह परिवर्तन लम्बन के कारण होता है। जब द्रष्टा के
त्रिप्रश्नाधिकार ४२५
चित्र ८४
दो स्थानों का अंतर अठारह करोड़ साठ लाख मील दूर होता है तब भी सब तारों
का लम्बन नहीं देख पड़ता है क्योंकि बहुत से तारे हमसे इतनी दूर हैं कि पृथ्वी
की कक्षा का व्यास भी उनके सामने शून्य के समान है। इसलिए बहुत सूक्ष्म
यंत्रों से भी थोड़े ही तारों का लंबन नापा जा सका है।
वार्षिक लम्बन—किसी तारे का वार्षिक लंबन वह कोण है जो पृथ्वी की
४२६ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र ८५
पृथ्वी का कक्षा
कक्षा के अर्द्धव्यास के सम्मुख तारे पर बनता है । चित्र ८५ में यदि भ पृथ्वी, स
सूर्य और त किसी तारे के स्थान हों तो त का वार्षिक लम्बन कोण स त भ अथवा
लु के समान है ।
जिस प्रकार चन्द्रमा या ग्रह का लम्बन जानने के लिए सूत्र स्थापित किये
गये हैं उसी तरह तारे का लम्बन जानने का सूत्र भी स्थापित हो सकता है ।
त्रिप्रश्नाधिकारः ४२७
ज्या लु० स भ
――――― = ――
ज्या स भ त स त
स भ
∵ ज्या लु = लु = ―― ✕ ज्या स भ त
स त
अर्थात् किसी तारे का वार्षिक लम्बन उस कोण की ज्या के अनुपात में होता
है जो उस तारे और सूर्य के बीच भूकेन्द्र पर बनता है । यह स्पष्ट है कि जब
कोण स भ त ९०° के समान होता है अर्थात् जब तारे का भोगांश सूर्य के भोगांश
से ९०° आगे या पीछे होता है तब लम्बन का परिमाण महत्तम होता है । इसलिये
किसी तारे का महत्तम लंबन वर्ष में दो बार देख पड़ता है । इसका सूत्र यह है :—
स भ
तारे का महत्तम लंबन = ――
स त
यदि महत्तम लंबन को लू मान लिया जाय तो तारे का किसी समय का
लम्बन
लु = लू ✕ ज्या स भ त
साधारणतः तारे के महत्तम लम्बन को ही तारे का लम्बन कहते हैं ।
ऊपर के सूत्रों में लु और लू रेडियन के दशमलव भिन्न में है। यदि इनको
विकलाओं में लिखा जाय तो
लू विकला स भ
―――― = ――
२०६२६५ स त
इससे सिद्ध होता है कि यदि लू मालूम हो तो स त अर्थात् तारे की दूरी
मालूम हो सकती है क्योंकि स भ तो मालूम ही है ।
उदाहरण—यदि किसी तारे का वार्षिक लंबन ०″.८ हो तो सूर्य से उस
तारे की दूरी बतलाओ ?
०.८ स भ
―――― = ――
२०६२६५ स त
२०६२६५
∴ स त = ―――― ✕ स भ = २,५७,८३१ स भ
.८
अर्थात् सूर्य पृथ्वी से जितनी दूर है उसकी २,५७,८३१ गुनी दूर सूर्य से वह
तारा है ।
मीलों में यह दूरी = २,५७,८३१ ✕ ९,३०,००,०००
= २,३९,७८,२८,३०,००,०००
इससे यह सिद्ध है कि यदि तारों के दूरी मीलों में लिखी जाय तो बहुत बड़ी
संख्या का व्यवहार करना आवश्यक होगा जिसमें सुभीता नहीं है । इसलिए
४. ग्रहयुत्यधिकार व भग्रहयुत्यधिकार (ग्रह समागम)
४२८ सूर्य-सिद्धान्त
ज्योतिषियों ने इतनी बड़ी दूरी को प्रकट करने के लिए एक और इकाई स्थिर की है
जिसे प्रकाश वर्ष कहते हैं। एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूर चलता है उसे प्रकाश वर्ष
कहते हैं। यह कई प्रयोगों से सिद्ध हो गया है कि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक ८ मिनट
१८ सेकेन्ड में पहुँचता है अर्थात् प्रकाश की गति प्रति सेकेन्ड १,८६,०० मील है।
इसलिए एक सायन वर्ष में प्रकाश ३६५.२४२२ × २४ × ६० × ६० × १८६०००
मील अथवा ५८,६६,५८,८२,५०,८८० मील चलता है। इसलिए इसी दूरी को एक
प्रकाश वर्ष कहते हैं।
यह भी याद रखना चाहिए कि जहां इतनी बड़ी दूरियों का हिसाब लगाया
जाता है वहां लाखों मील की दूरी की भूल रह जाना साधारण बात है क्योंकि यदि
| नाम अंग्रेजी में | नाम हिन्दी में | वार्षिक लम्बन | पृथ्वी से सूर्य की दूरी का कितने गुनी दूरी | प्रकाश वर्ष में दूरी |
|---|---|---|---|---|
| α Centauri | ... | ०".७५० ± ०".०१ | २,८०,००० | ४.४ |
| 61 Cygni | ... | ०.३७ ± ०.०२ | ५,६०,००० | ८.८ |
| Sirius | लुब्धक | ०.३७ ± ०.०१ | ५,६०,००० | ८.८ |
| Procyon | प्रश्वा | ०.३१ | ६,६०,००० | ११ |
| Altair | श्रवण | ०.२८ ± ०.०२ | ७,४०,००० | १२ |
| Aldebaran | रोहिणी | ०.१७ ± ०.०२ | १४,००,००० | २२ |
| Capella | ब्रह्म हृदय | ०.१२ ± ०.०२ | १७,००,००० | २७ |
| Vega | अभिजित् | ०.१२ ± ०.०२ | १७,००,००० | २७ |
| Polaris | ध्रुव तारा | ०.०७ ± ०.०२ | ३०,००,००० | ४७ |
| Arcturus | स्वाती | ०.०२४ | ८७,००,००० | १४० |
| α Gruis | ... | ०.०१५ | १,४०,००,००० | २२० |
त्रिप्रश्नाधिकार ४२६
किसी तारे के लंबन के वेध करने में .००१ विकला की भूल रह जाय, जो असम्भव
नहीं है, तो उसकी दूरी में बहुत अन्तर पड़ सकता है ।
पीछे एक सारिणी दी गई है जिससे जान पड़ेगा कि कुछ तारों के लम्बन
और उनकी दूरियां क्या हैं । यह सारिणी R. S. Ball की Spherical Astronomy
पृष्ठ ३२८ से ली गई है ।
प्रकाश वर्ष की दूरी की कल्पना इस प्रकार की जा सकती है । जब यह कहा
जाता है कि आकाश मण्डल का सबसे चमकीला तारा लुब्धक हमसे ८.८ प्रकाश वर्ष
दूर है तब इसका अर्थ यह भी होता है कि लुब्धक की जो किरण इस समय हमारी
आँखों में पहुँच कर लुब्धक का परिचय करा रही है वह वहाँ से ८.८ वर्ष पहले चली
थी अर्थात् यह आज की किरण लुब्धक की ८.८ वर्ष पहले की दशा बतला रही है ।
अब लुब्धक की क्या दशा है इसका ज्ञान आज से ८.८ वर्ष बाद हो सकता है, इसके
पहले नहीं जैसे पत्र के द्वारा किसी दूर के मित्र का जो कुछ समाचार मिलता है वह
उस समय का समाचार होता है जिस समय पत्र लिखा जाता है न कि इसके पहुँचने
के समय का ।
आजकल दूरदर्शक यंत्रों से ऐसे तारों का भी परिचय मिला है जो यहाँ से
लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं ।
चित्र ८६
४३० सूर्य-सिद्धान्त
वार्षिक लम्बन के कारण तारा वर्ष भर में एक नन्हे से दीर्घवृत्त पर चलता
हुआ जान पड़ता है ।
चित्र ८६ में स सूर्य है, प, पि, पु, पे चार विन्दुओं पर पृथ्वी अपनी वार्षिक
परिक्रमा करती हुई दिखलाई गई है। न तारे का स्थान है। यदि प और स से दो
रेखाएँ त तक खींच कर और आगे, त से भी बहुत दूर स्थित तारों के पास पहुँचायी
जाय तो स सूर्य से देखने पर तारा ता स्थान पर पृथ्वी से देखने पर पा स्थान पर
देख पड़ेगा । इसी तरह जब पृथ्वी पि पु और पे बिंदुओं पर रहेगी तब तारा क्रमा-
नुसार पी, पू और पै बिन्दुओं पर देख पड़ेगा । इसका परिणाम यह होगा कि तारा
पा पी पू पै बिंदुओं से बनी हुई कक्षा पर घूमता हुआ देख पड़ेगा । यह छोटी कक्षा
क्रान्तिवृत्त प पि पू पे के समानान्तर तल पर होगी और इसका आकार दीर्घवृत्त की
तरह का देख पड़ेगा ।
जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुवों अर्थात् कदम्बों पर होता है उसकी कक्षा केवल
वृत्त के आकार की देख पड़ती है क्योंकि ऐसी दशा में इस छोटी कक्षा का तल
हमारे दृष्टिसूत्र से समकोण पर रहेगा । परन्तु जो तारा क्रान्तिवृत्त पर
होता है वह मध्य स्थान से छः महीने तक पूरब और छः महीने तक पच्छिम
देख पड़ेगा जैसे किसी वृत्त पर घूमता हुआ पिंड उस समय केवल आगे बढ़ता
हुआ या पीछे हटता हुआ जान पड़ता है जब वृत्त का तल देखनेवाले के दृष्टिसूत्र
की ही सीध में हो । तारे के वार्षिक लम्बन जानने की विधि भी प्रायः उसी तरह है
जैसा चित्र ८१ में बतलाया गया है । परन्तु इस काम के लिए बहुत सूक्ष्म वेध रखना
पड़ता है जिसकी चर्चा करने की आवश्यकता यहाँ नहीं जान पड़ती ।
भूचलन संस्कार (Aberration)
यह ऊपर बतलाया गया है कि प्रकाश एक सेकंड में १,८६,००० मील चलता
है । पृथ्वी भी वर्ष भर में सूर्य की परिक्रमा करती है जिससे यह अपनी कक्षा में प्रति
सेकंड १८½ मील चलती है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा का परिमाण २ π × ६,३०,००,
००० मील है और एक वर्ष में ३६५.२४२२ × २४ × ६० × ६० सेकंड होते हैं,
इसलिए पृथ्वी की कक्षा को एक वर्ष के सेकंडों से भाग देने पर १८½ मील के लगभग
आता है । इन दोनों गतियों के कारण दूरदर्शक यंत्र में आकाशीय पिंडों का जो स्थान
देख पड़ता है वह यथार्थ स्थान से कुछ आगे या पीछे होता है । किसी पिंड के यथार्थ
और स्पष्ट स्थानों में इन दोनों गतियों के कारण जो अंतर देख पड़ता है उसे भूचलन
संस्कार (Aberration) कहते हैं । इसकी मीमांसा करने के पहले संक्षेप में यह
बतलाना आवश्यक है कि प्रकाश की गति कैसे नापी गयी और दो गतियों के संयोग
से पदार्थों के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में कैसा अंतर देख पड़ता है ।
त्रिप्रश्नाधिकार ४३१
प्रकाश की गति—प्रकाश की गति नापने की कई रीतियां हैं। इनमें से
पहली रीति की चर्चा यहां की जायगी :—
प्रकाश की चाल का पता रोमर नामक ज्योतिषी ने संवत् १७३२ विक्रमीय में
लगाया। इसके पहले किसी की कल्पना में भी यह बात नहीं आयी थी कि एक स्थान
से दूसरे स्थान तक जाने में प्रकाश को भी कुछ समय की आवश्यकता पड़ती है।
रोमर ने कैसे इस बात का पता लगाया यह भी आश्चर्यजनक है। आप लोगों ने
चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण कई बार देखा होगा। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और
चन्द्रमा के बीच आ जाती है इसलिए चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में पड़ जाता है। जब
पूरा चन्द्रमा छाया में आ जाता है तब पूर्ण ग्रहण लगता है और जब कुछ ही भाग
छाया में पड़ता है तब खंड ग्रहण लगता है। जैसे चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता
है और कभी आधा, कभी चोथाई, कभी तीन चौथाई देख पड़ता है वैसे ही वृहस्पति
के चारों ओर चार पांच चंद्रमा चक्कर लगाते हैं। वृहस्पति के चंद्रमा इतने छोटे हैं
कि बिना दूरबीन के देखे नहीं जा सकते। ये चंद्रमा घूमते-घूमते बहुत जल्दी-जल्दी
वृहस्पति की छाया में चले जाते हैं इसलिए कुछ देर तक दिखाई नहीं पड़ते। इसलिए
यह कहा जा सकता है कि जब बृहस्पति के चन्द्रमा उसकी छाया में पड़ जाते हैं तब
उनका ग्रहण लगता है। इन ग्रहणों के समय भी गणना करके कई वर्ष पहले उसी
प्रकार जान लिये जाते हैं जिस प्रकार सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के समय। जहाज
वाले तो इन ग्रहणों को देख कर घड़ी का काम लेते हैं। बस इसी के सम्बन्ध में
सोचते-सोचते रोमर को प्रकाश की गति का पता मिला।
कल्पना कीजिए कि चित्र ८७ में स सूर्य है, प पा पि पृथ्वी के तीन स्थान
अपनी कक्षा पर हैं और ग गा गि गुरु अथवा वृहस्पति के तीन स्थान वृहस्पति की
कक्षा पर हैं। पृथ्वी और गुरु दोनों एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा क्रमानुसार
१ और १२ वर्ष में करते हैं। जिस समय सूर्य पृथ्वी और गुरु क्रम से स प और ग
स्थानों में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु के बहुत पास होती है और जिस समय
पृथ्वी पा पर, गुरु गा पर और सूर्य मध्य में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त
दूर हो जाती है। प से पा पर पहुँचने में पृथ्वी को ६।। महीने लग जाते हैं। १३
महीने में पृथ्वी प से पा पर होती हुई फिर पि पर पहुँच कर सूर्य और गुरु के बीच
आ जाती है। जैसे-जैसे पृथ्वी प से चल कर पा के पास होती जाती है तैसे-तैसे
वृहस्पति के चन्द्रमा के ग्रहण का प्रत्यक्ष समय गणित से जाने हुए समय से पीछे
पड़ता जाता है और जब पृथ्वी पा पर पहुँच जाती है और बृहस्पति गा पर अर्थात्
पृथ्वी बृहस्पति से बहुत दूर हो जाती है तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष काल सबसे
४३२ सूर्य सिद्धान्त
चित्र ८७
अधिक पिछड़ जाता है । रोमर ने ग्रहण काल जानने की रीति अनेक वेधों से निश्चित
की थी, जब पृथ्वी गुरु से दूर और निकट प्रत्येक दशा में रही थी । इसलिए इस
रीति से ग्रहण काल का जो समय आता था वह मध्यम मान के अनुसार ठीक होता
था । इस काल से प्रत्यक्ष ग्रहण जितने परिमाण में पिछड़ता था उसका आरम्भ वह
उस समय से करता था जिस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त निकट रहती थी अर्थात्
जब वह प बिन्दु की दशा में रहती थी । इसी प्रकार जब पृथ्वी पा से आगे बढ़ कर
वृहस्पति के पास पहुँचती जाती थी तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष-ग्रहण काल का
पिछड़ना कम पड़ता जाता था । जब पृथ्वी पि पर और वृहस्पति गि पर हो जाते
थे तब प्रत्यक्ष और गणित-सिद्ध कालों का अन्तर शून्य हो जाता था अर्थात् प्रत्यक्ष
त्रिप्रश्नाधिकार [L1_right] ४३३
ग्रहण का समय भी वही होता था जो गणित से ठीक आता था । चित्र ८७ से जान
पड़ेगा कि गणित से निकाले हुए ग्रहण के समय और प्रत्यक्ष ग्रहण के समय में जो
सबसे अधिक अन्तर पड़ता है वह उन दोनों समयों के अन्तर के समान होगा जितने
में गुरु के चंद्रमा का प्रकाश ग से प तक और ग₁ से प₁ तक जाता है अर्थात् यह
अंतर उस समय के समान होगा जितने में प्रकाश पृथ्वी की कक्षा के व्यास के समान
दूरी तै करता है ।
अनुभव से यह जाना गया है कि प₁ और प से देखने पर ग्रहण के समय में
जो अन्तर पड़ता है वह सबसे अधिक होता है और १६ मिनट ३६ सेकेंड के समान
होता है । पृथ्वी की कक्षा का अर्द्धव्यास ९,३०,००,००० मील के लगभग है इसलिए
इसका व्यास १८,६०,००,००० मील हुआ । इसलिए जब प्रकाश इतनी दूर चलने
में १६ मिनट ३६ सेकेंड का समय लेता है तब एक सेकेंड में इसकी गति १८,६०,
००,००÷९९६ = १,८६,००० मील के लगभग ।
इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति नापने के प्रयोग किये ।
इन सब प्रयोगों से जो फल निकले वे प्रायः एक से हैं । इन प्रयोगों से यह सिद्ध हो
गया कि प्रकाश की गति १,८६,३५० मील है ।
जब यह सिद्ध हो गया कि प्रकाश गतिमान है तब यह समझ लेना कठिन
नहीं है कि यदि गतिमान प्रकाश किसी दूसरी गतिवाली वस्तु में प्रवेश करे तो इसकी
दिशा में परिवर्तन हो जायगा । उदाहरण के लिए मान लो कि एक रेलगाड़ी ६०
मील प्रति घंटे के हिसाब से दौड़ी चली जा रही है । यदि एक बन्दूक रेलगाड़ी को
लक्ष्य करके इस तरह चलायी जाय कि गोली गाड़ी की दिशा से समकोण बनाती
हुई एक ओर घुसे और दूसरी ओर आर-पार निकल जाय तो क्या गोली गाड़ी के
डब्बे के भीतर भी उसकी दिशा से समकोण बनाती जायगी ? जितनी देर में गोली
रेलगाड़ी के समान दीवाल से पीछे की दीवाल तक पहुँचेगी उतनी देर में गाड़ी कुछ
आगे बढ़ जायगी और गोली पीछे की दीवाल में घुसने के छेद के ठीक सामने न
लगकर कुछ पीछे पड़ जायगी । कल्पना करो कि र ल गाड़ी का एक डब्बा है जो
र की ओर ६० मील प्रति घंटे या ८८ फुट प्रति सेकेंड की गति से आगे बढ़ रहा है
और ब स्थान से बन्दूक ऐसी दागी गई कि गोली ब ग दिशा में चलती हुई डब्बे में
ग स्थान से घुसती है । जिस समय गोली ग पर आयी डब्बा र ल स्थिति में था ।
यदि गाड़ी स्थिर होती तो गोली घ स्थान पर छेद करती हुई बाहर निकल जाती ।
परन्तु बात ऐसी नहीं होने पाती क्योंकि जिस समम गोली ग छेद से घुसकर घ की
ओर जाती रहती है उस समय गाड़ी भी आगे बढ़ी जा रही है । इसलिए जिस समय
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