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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 838 में से

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पृष्ठ 450

त्रिप्रश्नाधिकारः ४२७
ज्या लु० स भ
――――― = ――
ज्या स भ त स त
स भ
∵ ज्या लु = लु = ―― ✕ ज्या स भ त
स त
अर्थात् किसी तारे का वार्षिक लम्बन उस कोण की ज्या के अनुपात में होता
है जो उस तारे और सूर्य के बीच भूकेन्द्र पर बनता है । यह स्पष्ट है कि जब
कोण स भ त ९०° के समान होता है अर्थात् जब तारे का भोगांश सूर्य के भोगांश
से ९०° आगे या पीछे होता है तब लम्बन का परिमाण महत्तम होता है । इसलिये
किसी तारे का महत्तम लंबन वर्ष में दो बार देख पड़ता है । इसका सूत्र यह है :—
स भ
तारे का महत्तम लंबन = ――
स त
यदि महत्तम लंबन को लू मान लिया जाय तो तारे का किसी समय का
लम्बन
लु = लू ✕ ज्या स भ त
साधारणतः तारे के महत्तम लम्बन को ही तारे का लम्बन कहते हैं ।
ऊपर के सूत्रों में लु और लू रेडियन के दशमलव भिन्न में है। यदि इनको
विकलाओं में लिखा जाय तो
लू विकला स भ
―――― = ――
२०६२६५ स त
इससे सिद्ध होता है कि यदि लू मालूम हो तो स त अर्थात् तारे की दूरी
मालूम हो सकती है क्योंकि स भ तो मालूम ही है ।
उदाहरण—यदि किसी तारे का वार्षिक लंबन ०″.८ हो तो सूर्य से उस
तारे की दूरी बतलाओ ?
०.८ स भ
―――― = ――
२०६२६५ स त
२०६२६५
∴ स त = ―――― ✕ स भ = २,५७,८३१ स भ
.८
अर्थात् सूर्य पृथ्वी से जितनी दूर है उसकी २,५७,८३१ गुनी दूर सूर्य से वह
तारा है ।
मीलों में यह दूरी = २,५७,८३१ ✕ ९,३०,००,०००
= २,३९,७८,२८,३०,००,०००
इससे यह सिद्ध है कि यदि तारों के दूरी मीलों में लिखी जाय तो बहुत बड़ी
संख्या का व्यवहार करना आवश्यक होगा जिसमें सुभीता नहीं है । इसलिए