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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 838 में से

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पृष्ठ 454

त्रिप्रश्नाधिकार ४३१
प्रकाश की गति—प्रकाश की गति नापने की कई रीतियां हैं। इनमें से
पहली रीति की चर्चा यहां की जायगी :—
प्रकाश की चाल का पता रोमर नामक ज्योतिषी ने संवत् १७३२ विक्रमीय में
लगाया। इसके पहले किसी की कल्पना में भी यह बात नहीं आयी थी कि एक स्थान
से दूसरे स्थान तक जाने में प्रकाश को भी कुछ समय की आवश्यकता पड़ती है।
रोमर ने कैसे इस बात का पता लगाया यह भी आश्चर्यजनक है। आप लोगों ने
चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण कई बार देखा होगा। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और
चन्द्रमा के बीच आ जाती है इसलिए चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में पड़ जाता है। जब
पूरा चन्द्रमा छाया में आ जाता है तब पूर्ण ग्रहण लगता है और जब कुछ ही भाग
छाया में पड़ता है तब खंड ग्रहण लगता है। जैसे चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता
है और कभी आधा, कभी चोथाई, कभी तीन चौथाई देख पड़ता है वैसे ही वृहस्पति
के चारों ओर चार पांच चंद्रमा चक्कर लगाते हैं। वृहस्पति के चंद्रमा इतने छोटे हैं
कि बिना दूरबीन के देखे नहीं जा सकते। ये चंद्रमा घूमते-घूमते बहुत जल्दी-जल्दी
वृहस्पति की छाया में चले जाते हैं इसलिए कुछ देर तक दिखाई नहीं पड़ते। इसलिए
यह कहा जा सकता है कि जब बृहस्पति के चन्द्रमा उसकी छाया में पड़ जाते हैं तब
उनका ग्रहण लगता है। इन ग्रहणों के समय भी गणना करके कई वर्ष पहले उसी
प्रकार जान लिये जाते हैं जिस प्रकार सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के समय। जहाज
वाले तो इन ग्रहणों को देख कर घड़ी का काम लेते हैं। बस इसी के सम्बन्ध में
सोचते-सोचते रोमर को प्रकाश की गति का पता मिला।
कल्पना कीजिए कि चित्र ८७ में स सूर्य है, प पा पि पृथ्वी के तीन स्थान
अपनी कक्षा पर हैं और ग गा गि गुरु अथवा वृहस्पति के तीन स्थान वृहस्पति की
कक्षा पर हैं। पृथ्वी और गुरु दोनों एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा क्रमानुसार
१ और १२ वर्ष में करते हैं। जिस समय सूर्य पृथ्वी और गुरु क्रम से स प और ग
स्थानों में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु के बहुत पास होती है और जिस समय
पृथ्वी पा पर, गुरु गा पर और सूर्य मध्य में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त
दूर हो जाती है। प से पा पर पहुँचने में पृथ्वी को ६।। महीने लग जाते हैं। १३
महीने में पृथ्वी प से पा पर होती हुई फिर पि पर पहुँच कर सूर्य और गुरु के बीच
आ जाती है। जैसे-जैसे पृथ्वी प से चल कर पा के पास होती जाती है तैसे-तैसे
वृहस्पति के चन्द्रमा के ग्रहण का प्रत्यक्ष समय गणित से जाने हुए समय से पीछे
पड़ता जाता है और जब पृथ्वी पा पर पहुँच जाती है और बृहस्पति गा पर अर्थात्
पृथ्वी बृहस्पति से बहुत दूर हो जाती है तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष काल सबसे