सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 455

४३२ सूर्य सिद्धान्त
चित्र ८७
अधिक पिछड़ जाता है । रोमर ने ग्रहण काल जानने की रीति अनेक वेधों से निश्चित
की थी, जब पृथ्वी गुरु से दूर और निकट प्रत्येक दशा में रही थी । इसलिए इस
रीति से ग्रहण काल का जो समय आता था वह मध्यम मान के अनुसार ठीक होता
था । इस काल से प्रत्यक्ष ग्रहण जितने परिमाण में पिछड़ता था उसका आरम्भ वह
उस समय से करता था जिस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त निकट रहती थी अर्थात्
जब वह प बिन्दु की दशा में रहती थी । इसी प्रकार जब पृथ्वी पा से आगे बढ़ कर
वृहस्पति के पास पहुँचती जाती थी तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष-ग्रहण काल का
पिछड़ना कम पड़ता जाता था । जब पृथ्वी पि पर और वृहस्पति गि पर हो जाते
थे तब प्रत्यक्ष और गणित-सिद्ध कालों का अन्तर शून्य हो जाता था अर्थात् प्रत्यक्ष