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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 838 में से

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पृष्ठ 453

४३० सूर्य-सिद्धान्त
वार्षिक लम्बन के कारण तारा वर्ष भर में एक नन्हे से दीर्घवृत्त पर चलता
हुआ जान पड़ता है ।
चित्र ८६ में स सूर्य है, प, पि, पु, पे चार विन्दुओं पर पृथ्वी अपनी वार्षिक
परिक्रमा करती हुई दिखलाई गई है। न तारे का स्थान है। यदि प और स से दो
रेखाएँ त तक खींच कर और आगे, त से भी बहुत दूर स्थित तारों के पास पहुँचायी
जाय तो स सूर्य से देखने पर तारा ता स्थान पर पृथ्वी से देखने पर पा स्थान पर
देख पड़ेगा । इसी तरह जब पृथ्वी पि पु और पे बिंदुओं पर रहेगी तब तारा क्रमा-
नुसार पी, पू और पै बिन्दुओं पर देख पड़ेगा । इसका परिणाम यह होगा कि तारा
पा पी पू पै बिंदुओं से बनी हुई कक्षा पर घूमता हुआ देख पड़ेगा । यह छोटी कक्षा
क्रान्तिवृत्त प पि पू पे के समानान्तर तल पर होगी और इसका आकार दीर्घवृत्त की
तरह का देख पड़ेगा ।
जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुवों अर्थात् कदम्बों पर होता है उसकी कक्षा केवल
वृत्त के आकार की देख पड़ती है क्योंकि ऐसी दशा में इस छोटी कक्षा का तल
हमारे दृष्टिसूत्र से समकोण पर रहेगा । परन्तु जो तारा क्रान्तिवृत्त पर
होता है वह मध्य स्थान से छः महीने तक पूरब और छः महीने तक पच्छिम
देख पड़ेगा जैसे किसी वृत्त पर घूमता हुआ पिंड उस समय केवल आगे बढ़ता
हुआ या पीछे हटता हुआ जान पड़ता है जब वृत्त का तल देखनेवाले के दृष्टिसूत्र
की ही सीध में हो । तारे के वार्षिक लम्बन जानने की विधि भी प्रायः उसी तरह है
जैसा चित्र ८१ में बतलाया गया है । परन्तु इस काम के लिए बहुत सूक्ष्म वेध रखना
पड़ता है जिसकी चर्चा करने की आवश्यकता यहाँ नहीं जान पड़ती ।
भूचलन संस्कार (Aberration)
यह ऊपर बतलाया गया है कि प्रकाश एक सेकंड में १,८६,००० मील चलता
है । पृथ्वी भी वर्ष भर में सूर्य की परिक्रमा करती है जिससे यह अपनी कक्षा में प्रति
सेकंड १८½ मील चलती है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा का परिमाण २ π × ६,३०,००,
००० मील है और एक वर्ष में ३६५.२४२२ × २४ × ६० × ६० सेकंड होते हैं,
इसलिए पृथ्वी की कक्षा को एक वर्ष के सेकंडों से भाग देने पर १८½ मील के लगभग
आता है । इन दोनों गतियों के कारण दूरदर्शक यंत्र में आकाशीय पिंडों का जो स्थान
देख पड़ता है वह यथार्थ स्थान से कुछ आगे या पीछे होता है । किसी पिंड के यथार्थ
और स्पष्ट स्थानों में इन दोनों गतियों के कारण जो अंतर देख पड़ता है उसे भूचलन
संस्कार (Aberration) कहते हैं । इसकी मीमांसा करने के पहले संक्षेप में यह
बतलाना आवश्यक है कि प्रकाश की गति कैसे नापी गयी और दो गतियों के संयोग
से पदार्थों के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में कैसा अंतर देख पड़ता है ।